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Hindi : Kuchh Nai Chunotiya

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सुप्रसिद्ध कथाकार, ललित निबन्धकार डॉ. विवेकीराय अपनी एक सुप्रसिद्ध पुस्तक में लिखते हैं कि—“डॉ. कैलाशनाथ पाण्डेय का लेखन गम्भीर विषयों का स्पर्श करता है। आप मूलत: भाषा- वैज्ञानिक हैं।” ज़ाहिर है, कोई भी भाषा-वैज्ञानिक किसी भी भाषा पर निरपेक्ष दृष्टि से विचार करता है। डॉ. पाण्डेय ने भी इस पुस्तक में वही किया है। इनका मानना है कि बाज़ार के दबाव के कारण कुछ समय के लिए हिन्दी भले ही फलकजद हो जाए, किन्तु तमाम तरह के अन्तर्विरोधों के बावजूद आज भी यह इस देश के बहुत बड़े जन समुदाय की लचीली और उदार भाषा है। विस्तारवादी अंग्रेज़ी की अफ़ीम फाँक उसमें ऊभने-चूभनेवाले भले ही हिन्दी को ख़ालिस देसी और निठल्ली- पिछड़ी, गँवारू-अवैज्ञानिक भाषा घोषित करने की मुनादी करें, पर यह सच है कि अपनी ताक़त के बल पर इसने नई बन रही दुनिया में अपनी पुख़्ता और मुकम्मल जगह बना ली है। सच तो यह है कि हिन्दी ही नहीं, प्रत्येक भारतीय भाषा को आज अमेरिका की भूमंडलीय शक्ति और ब्रिटेन की साम्राज्यवादी तथा पूँजीवादी व्यवस्था की पोषक, संवेदना-रहित अंग्रेज़ी से जूझना पड़ रहा है। इस आयातित विदेशी भाषा के साथ कई तरह के क्रूर और अनैतिक सम्बन्धों के अंधड़ भी इस देश में आ गए हैं। यही समय-समय पर हिन्दी से ताल ठोंक उसे चुनौती देते रहते हैं। अत: ऐसी स्थिति में आज ज़रूरत है, हमें यह सोचने की, कि स्वतंत्रता संग्राम की सांस्कृतिक, भू-राजनैतिक और आर्थिक स्तर पर तेज़ आवर्त्त वाली भाषा हिन्दी का स्वरूप कैसे बचा रह सके?

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सुप्रसिद्ध कथाकार, ललित निबन्धकार डॉ. विवेकीराय अपनी एक सुप्रसिद्ध पुस्तक में लिखते हैं कि—“डॉ. कैलाशनाथ पाण्डेय का लेखन गम्भीर विषयों का स्पर्श करता है। आप मूलत: भाषा- वैज्ञानिक हैं।” ज़ाहिर है, कोई भी भाषा-वैज्ञानिक किसी भी भाषा पर निरपेक्ष दृष्टि से विचार करता है। डॉ. पाण्डेय ने भी इस पुस्तक में वही किया है। इनका मानना है कि बाज़ार के दबाव के कारण कुछ समय के लिए हिन्दी भले ही फलकजद हो जाए, किन्तु तमाम तरह के अन्तर्विरोधों के बावजूद आज भी यह इस देश के बहुत बड़े जन समुदाय की लचीली और उदार भाषा है। विस्तारवादी अंग्रेज़ी की अफ़ीम फाँक उसमें ऊभने-चूभनेवाले भले ही हिन्दी को ख़ालिस देसी और निठल्ली- पिछड़ी, गँवारू-अवैज्ञानिक भाषा घोषित करने की मुनादी करें, पर यह सच है कि अपनी ताक़त के बल पर इसने नई बन रही दुनिया में अपनी पुख़्ता और मुकम्मल जगह बना ली है। सच तो यह है कि हिन्दी ही नहीं, प्रत्येक भारतीय भाषा को आज अमेरिका की भूमंडलीय शक्ति और ब्रिटेन की साम्राज्यवादी तथा पूँजीवादी व्यवस्था की पोषक, संवेदना-रहित अंग्रेज़ी से जूझना पड़ रहा है। इस आयातित विदेशी भाषा के साथ कई तरह के क्रूर और अनैतिक सम्बन्धों के अंधड़ भी इस देश में आ गए हैं। यही समय-समय पर हिन्दी से ताल ठोंक उसे चुनौती देते रहते हैं। अत: ऐसी स्थिति में आज ज़रूरत है, हमें यह सोचने की, कि स्वतंत्रता संग्राम की सांस्कृतिक, भू-राजनैतिक और आर्थिक स्तर पर तेज़ आवर्त्त वाली भाषा हिन्दी का स्वरूप कैसे बचा रह सके?

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2004
Weight
466 grams
ISBN-13
9788180318153
Pages
377
Reading time
~13 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 22 cm
Language
Hindi

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