Hindi Patrakarita Samvad Aur Vimarsh
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कैलाश नाथ पाण्डेय की यह पुस्तक हिन्दी-पत्रकारिता के विविध आयामों—विशेषकर उसके इतिहास और विकास को जिस तरह विषय की समग्रता और विस्तार से प्रस्तुत करती है; वैसा कहीं अन्यत्र देखने को नहीं मिलता। उन्होंने पत्रकारिता से जुड़े हर तथ्य और जानकारी को एक पर्यटनशील अन्वेषक और अध्येता की तरह इस प्रकार संयोजित किया है कि यह पुस्तक एक साथ ही पत्रकारिता का विश्व-कोश, शास्त्र, विज्ञान और इतिहास-ग्रन्थ बन गई है।</p> <p>अपनी इस पुस्तक में लेखक ने न सिर्फ़ पत्रकारिता से सम्बन्धित तथ्यों-सत्यों, सूचनाओं और ऐतिहासिक स्मृतियों को संकलित किया है, बल्कि अपनी सरल, काव्यात्मक और सम्प्रेषणीय शैली में पत्रकारिता से जुड़े गरिष्ठ, क्लिष्ट और दुरूह ज्ञान को अत्यन्त बोधगम्य, सुपाच्य और सर्वसुलभ किया है। पाँच पर्वों एवं अनेक भागों में विभाजित यह पुस्तक पत्रकारिता के विविध रूप-प्रकारों से आरम्भ होकर उसके अस्तित्व तथा सृजन के सभी स्तरों और चरणों की विस्तृत पड़ताल करती है। हिन्दी पत्रकारिता के वर्तमान और इतिहास से लेकर पत्रकारिता के वैश्विक परिदृश्य तक; मुद्रित पत्रकारिता से लेकर मुद्रण-शिल्प-विज्ञान के तकनीकी पक्षों—अक्षर-संयोजन के शुद्धीकरण (प्रूफ़ रीडिंग), पृष्ठ-सज्जा तक; समाचार-लेखन और रचना-व्यवहार के सभी पहलुओं जैसे—प्रेषण, प्रस्तुति, वितरण और प्रबन्धन तक को लेखक ने पूरी सूक्ष्मता, सजीवता और प्रामाणिकता के साथ समेटा है।</p> <p>समाचार-पत्र लेखन से सम्बन्धित पत्रकारिता की सभी विधाओं पर प्रकाश डालते हुए प्रेस-आयोग, भारतीय प्रेस-परिषद्, प्रसार भारती जैसे संगठनात्मक एवं संवैधानिक निकायों से लेकर नए-पुराने मीडिया-क़ानूनों तथा संवैधानिक प्रावधानों तक इस पुस्तक का फलक इतना अधिक समाहारी और विस्तृत है कि इसे पत्रकारिता सम्बन्धी ज्ञान का विश्व-कोश ही कहना उचित होगा। यह पुस्तक पत्रकारिता के जिज्ञासु, अध्येता एवं विद्यार्थी सभी के लिए एकल समाधान होने का दावा कर सकती है।</p> <p>—राम प्रकाश कुशवाह
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कैलाश नाथ पाण्डेय की यह पुस्तक हिन्दी-पत्रकारिता के विविध आयामों—विशेषकर उसके इतिहास और विकास को जिस तरह विषय की समग्रता और विस्तार से प्रस्तुत करती है; वैसा कहीं अन्यत्र देखने को नहीं मिलता। उन्होंने पत्रकारिता से जुड़े हर तथ्य और जानकारी को एक पर्यटनशील अन्वेषक और अध्येता की तरह इस प्रकार संयोजित किया है कि यह पुस्तक एक साथ ही पत्रकारिता का विश्व-कोश, शास्त्र, विज्ञान और इतिहास-ग्रन्थ बन गई है।</p>
<p>अपनी इस पुस्तक में लेखक ने न सिर्फ़ पत्रकारिता से सम्बन्धित तथ्यों-सत्यों, सूचनाओं और ऐतिहासिक स्मृतियों को संकलित किया है, बल्कि अपनी सरल, काव्यात्मक और सम्प्रेषणीय शैली में पत्रकारिता से जुड़े गरिष्ठ, क्लिष्ट और दुरूह ज्ञान को अत्यन्त बोधगम्य, सुपाच्य और सर्वसुलभ किया है। पाँच पर्वों एवं अनेक भागों में विभाजित यह पुस्तक पत्रकारिता के विविध रूप-प्रकारों से आरम्भ होकर उसके अस्तित्व तथा सृजन के सभी स्तरों और चरणों की विस्तृत पड़ताल करती है। हिन्दी पत्रकारिता के वर्तमान और इतिहास से लेकर पत्रकारिता के वैश्विक परिदृश्य तक; मुद्रित पत्रकारिता से लेकर मुद्रण-शिल्प-विज्ञान के तकनीकी पक्षों—अक्षर-संयोजन के शुद्धीकरण (प्रूफ़ रीडिंग), पृष्ठ-सज्जा तक; समाचार-लेखन और रचना-व्यवहार के सभी पहलुओं जैसे—प्रेषण, प्रस्तुति, वितरण और प्रबन्धन तक को लेखक ने पूरी सूक्ष्मता, सजीवता और प्रामाणिकता के साथ समेटा है।</p>
<p>समाचार-पत्र लेखन से सम्बन्धित पत्रकारिता की सभी विधाओं पर प्रकाश डालते हुए प्रेस-आयोग, भारतीय प्रेस-परिषद्, प्रसार भारती जैसे संगठनात्मक एवं संवैधानिक निकायों से लेकर नए-पुराने मीडिया-क़ानूनों तथा संवैधानिक प्रावधानों तक इस पुस्तक का फलक इतना अधिक समाहारी और विस्तृत है कि इसे पत्रकारिता सम्बन्धी ज्ञान का विश्व-कोश ही कहना उचित होगा। यह पुस्तक पत्रकारिता के जिज्ञासु, अध्येता एवं विद्यार्थी सभी के लिए एकल समाधान होने का दावा कर सकती है।</p>
<p>—राम प्रकाश कुशवाह
Book Details
-
ISBN9789386863270
-
Pages784
-
Avg Reading Time26 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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प्रभाष जोशी की इस पुस्तक में उनके सम्पूर्ण लेखन से चुनकर प्रतिनिधि लेखों का संग्रह किया गया है। वे एक समाजधर्मी पत्रकार थे जिन्होंने अपने समय के बनते इतिहास का दो टूक विश्लेषण किया। उसके साथ ही अपने सक्रिय वैचारिक पहल से समकालीन इतिहास को बनाने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज के समय में ऐसे पत्रकार और समाज चिन्तक की कमी एक गतिरोध और यथास्थिति का माहौल बना रही है। ऐसे में प्रभाष जोशी के ये लेख एक नई पहल के लिए प्रेरित करते हैं। पुस्तक में इन अध्यायों के अन्तर्गत लेख रखे गए हैं, उनके शीर्षक हैं : ‘पत्रकारिता है सदाचारिता’, ‘अपनी हिन्दी का हाल’, ‘शिखरों के आसपास’, ‘राजमंच का नेपथ्य’, ‘खेल का सौन्दर्यशास्त्र’ तथा ‘बार-बार लौटकर जाता हूँ नर्मदा’। ये शीर्षक ही पुस्तक में संकलित लेखों के कथ्य बयान कर देते हैं। एक बार फिर से प्रभाष जोशी को पढ़ना आपको इस मुश्किल समय से नए सिरे से परिचित कराएगा। सामाजिक बदलाव की पहल के लिए प्रेरित करेगा।
Itna To Yaad Hai Mujhe
- Author Name:
Bobby Sing
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क्या आप हिंदी सिनेमा और हिंदी फिल्म संगीत से दीवानगी की हद तक प्रेम करते हैं? यदि हाँ, तो यह पुस्तक आपके लिए ही है। इस पुस्तक के 51 अध्याय तीन भागों में विभाजित किए गए हैं। पहले भाग में नब्बे के दशक से पहले की हिंदी फिल्मों के तथ्यों के बारे में विवरण दिया गया है अर्थात् भारत में केबल टीवी क्रांति से पहले। दूसरा भाग दोनों काल के मध्य की कड़ी/लिंक पर आधारित है और तीसरा नब्बे के दशक के बाद की फिल्मों और हमारे वर्तमान सिनेमा पर। पुस्तक के कुछ खास विषय हैं— ** चिरकालिक ‘गाइड’ और इसका अंग्रेजी संस्करण ** ‘डिस्को डांसर’ की अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि के बारे में कुछ अनकहे तथ्य ** 1989 में म्यूजिक एलबम ‘लाल दुपट्टा मलमल का’ से लिपटा रहस्य ** उत्पल दत्त—जो सिर्फ एक कॉमेडियन नहीं थे ** ‘सिलसिला’ और ‘रब ने बना दी जोड़ी’ को जोड़नेवाला तथ्य ** हिंदी फिल्म संगीत से पहेली-आधारित गीतों की गुम हो चुकी कला।
Feature Lekhan : Swarup Aur Shilpa
- Author Name:
Manohar Prabhakar +1
- Book Type:

- Description:
माखनलाल चतुर्वेदी कवि थे, नाटककार थे, निबन्ध लेखक भी थे, अर्थात् उन्होंने साहित्य की विभिन्न विधाओं पर अपनी क़लम चलाई थी। वे देश की स्वतंत्रता के लिए लेखनी चलानेवाले एक अग्रणी पत्रकार भी थे। उनकी पत्रकारिता ने स्वतंत्रता आन्दोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। साहित्य और पत्रकारिता का यह संगम हमारी परम्परा में हमेशा रहा है। फिर भी यह दुर्भाग्य की बात है कि आजकल पत्रकारिता और साहित्य को दो अलग-अलग खाँचों में बाँटा जाता है। इस विभाजक रेखा को भी लाँघनेवाली विधाएँ हैं। उनमें से कुछ हैं—फ़ीचर, रिपोर्ताज, यात्रा-वृत्तान्त एवं संस्मरण।
इस पुस्तक के ज़रिए फ़ीचर लेखन के कौशल को सरल ढंग से पेश करने की कोशिश की गई है। उम्मीद है कि इससे पाठक साहित्य और पत्रकारिता की विभाजक रेखा को जोड़कर इन दोनों के सम्मिश्रण को नए सिरे से स्थापित कर सकेंगे। फ़ीचर लेखन जितनी अधिक मात्रा में होगा, उतनी ही मात्रा में साहित्य और पत्रकारिता को जनमानस में भी जुड़ा हुआ देखने की प्रवृत्ति विकसित होगी।
डॉ. मनोहर प्रभाकर ने, जो स्वयं उच्च कोटि के फ़ीचर लेखक रहे हैं और जिन्होंने ‘राजस्थान पत्रिका’, ‘नवज्योति’ एवं अन्य समाचार पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से अपने लेखन कौशल को पाठकों के सामने प्रस्तुत किया है, इस पुस्तक में अपने अनुभवों का सार इस ढंग से प्रस्तुत किया है कि उसे सरलता से व्यवहार में लाया जा सके।
Corporate Media : Dalal Street
- Author Name:
Dilip Mandal
- Book Type:

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राडिया कांड मीडिया की ताक़त और उसकी ख़ामी, दोनों को एक साथ दर्शाता है। ताक़त इस बात की कि मीडिया जनमत बना सकता है, जनमत को बदल सकता है, लोगों के सोचने के एजेंडे तय करता है और ख़ामी यह कि मीडिया पैसों के आगे किसी बात की परवाह नहीं करता। मीडिया को पैसेवाले पैसा कमाने के लिए और ताक़त के लिए चलाते हैं। इसलिए इसके दुरुपयोग की आशंका इसकी संरचना और स्वामित्व के ढाँचे में ही दर्ज है।
राडिया कांड से यह ज़गज़ाहिर हो गया कि ख़ासकर ऊँचे पदों पर मौजूद मीडियाकर्मी पैसे और प्रभाव के इस खेल में हिस्सेदार बन चुके हैं। पिछले 20 वर्षों में मीडियाकर्मियों के मालिक बनने की प्रक्रिया भी तेज़ हुई है। कुछ सम्पादक तो मालिक बन ही गए हैं। इसके अलावा भी मीडिया संस्थानों में मध्यम स्तर पर काम करनेवाले पत्रकारों तक को कम्पनी के शेयर दिए जाते हैं। कोई भी व्यक्ति, चाहे वह पत्रकार ही क्यों न हो, उस कम्पनी या उस व्यवसाय के विरुद्ध काम क्यों करेगा जिसमें उसके शेयर हों? इस तरह पत्रकारों की प्रतिबद्धता को नए ढंग से परिभाषित कर दिया जाता है। पत्रकारों का ईमानदार या बेईमान होना अब उनकी निजी पसन्द का ही मामला नहीं रहा। कोई पत्रकार अपनी मर्ज़ी से ईमानदार नहीं रह सकता। यह बात कई लोगों को तकलीफ़देह लग सकती है। राडिया कांड ने मीडिया को सचमुच गहरे ज़ख़्म दिए हैं।
—इसी पुस्तक से
Samachar Patra Prabandhan
- Author Name:
Gulab Kothari +1
- Book Type:

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आज आम शिकायत यह है कि सम्पादक नाम की संस्था का लोप हो रहा है। जहाँ वह मौजूद है, वहाँ या तो प्रतीकात्मक है या उसके कार्य-अधिकार, विवेक और निर्णय का दायरा घटता जा रहा है। वैश्वीकरण की अदम्य आँधी ने समाचार-पत्रों को भी एक बाज़ार की वस्तु का रूप ग्रहण करने के लिए बाध्य कर दिया है। ऐसी स्थिति में समाचार-पत्रों में प्रबन्धन की महत्ता और महिमा निरन्तर बढ़ती जा रही है।
समाचार-पत्र का एक व्यावसायिक वस्तु बनकर रह जाना दर्दनाक हादसा है। बाज़ारजनित दृष्टिकोण के कारण समाज में समाचार-पत्र के स्थान, सम्मान और विश्वसनीयता में परिवर्तन की प्रक्रिया धीरे-धीरे चल रही है।
इस माहौल में समाचार-पत्र प्रबन्धन के सम्बन्ध में एक ऐसी परिपक्व दृष्टि की ज़रूरत है जो बाज़ार की बढ़ती हुई ताक़त की व्यावहारिक ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए उन बुनियादी मूल्यों पर अडिग रहने की कला, दृष्टि और शक्ति दे, जिसके कारण समाचार-पत्रों ने लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ का दर्जा पाया है। पत्रकारिता के पुरोधा गुलाब कोठारी की इस पुस्तक से यह सब मिल सकेगा, ऐसा विश्वास है।
Idea Se Parde Tak : Kaise Sochta Hai Film Ka Lekhak?
- Author Name:
Ramkumar Singh +1
- Book Type:

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यह किताब सिनेमा के एक सहयोगी पेशेवर के रूप में फ़िल्म-लेखक के कामकाज का सिलसिलेवार वृत्तान्त प्रस्तुत करती है। फ़िल्म का अपना तौर-तरीक़ा है, जिसके दायरे में रहकर ही फ़िल्म-लेखक को काम करना पड़ता है। इसलिए एक हद तक अपनी स्वायत भूमिका रखने के बावजूद उसको अपना काम करते हुए निर्माता, निर्देशक, अभिनेता, कैमरा-निर्देशक आदि अनेक सहयोगी पेशेवरों के साथ संगति का ख़याल रखना पड़ता है। ज़ाहिर है, फ़िल्म-लेखन जिस हद तक कला है, उसी हद तक शिल्प और तकनीक भी। एक सफल फ़िल्म लेखक बनने के लिए जितनी ज़रूरत प्रतिभा की है, उतनी ही परिश्रम, कौशल, अनुशासन और समन्वय की। सबसे लोकप्रिय कला के रूप में अपनी जगह बना चुका सिनेमा आज एक महत्त्वपूर्ण इंडस्ट्री भी है जो लाखों-लाख युवाओं के सपनों का केन्द्र बन चुकी है। ऐसे में फ़िल्म-लेखन की दिशा में कदम बढ़ाने वालों के लिए यह किताब एक अपरिहार्य हैण्डबुक की तरह है।
Ruktapur
- Author Name:
Pushyamitra
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- Description:
यह किताब एक सजग-संवेदनशील पत्रकार की डायरी है, जिसमें उसकी ‘आँखों देखी’ तो दर्ज है ही, हालात का तथ्यपरक विश्लेषण भी है। यह दिखलाती है कि एक आम बिहारी तरक़्क़ी की राह पर आगे बढ़ना चाहता है पर उसके पाँवों में भारी पत्थर बँधे हैं, जिससे उसको मुक्त करने में उस राजनीतिक नेतृत्व ने भी तत्परता नहीं दिखाई, जो इसी का वादा कर सत्तासीन हुआ था। आख्यानपरक शैली में लिखी गई यह किताब आम बिहारियों की जबान बोलती है, उनसे मिलकर उनकी कहानियों को सामने लाती है और उनके दुःख-दर्द को सरकारी आँकड़ों के सामने रखकर दिखाती है। इस तरह यह उस दरार पर रोशनी डालती है जिसके एक ओर सरकार के डबल डिजिट ग्रोथ के आँकड़े और चमचमाते दावे हैं तो दूसरी तरफ़ वंचित समाज के लोगों के अभाव, असहायता और पीड़ा की झकझोर देने वाली कहानियाँ हैं। इस किताब के केन्द्र में बिहार है, उसके नीति-निर्माताओं की 73 वर्षों की कामयाबी और नाकामी का लेखा-जोखा है, लेकिन इसमें उठाए गए मुद्दे देश के हरेक राज्य की सचाई हैं। सरकार द्वारा आधुनिक विकास के ताबड़तोड़ दिखावे के बावजूद उसकी प्राथमिकताओं और आमजन की ज़रूरतों में अलगाव के निरंतर बने रहने को रेखांकित करते हुए यह किताब जिन सवालों को सामने रखती है, उनका सम्बन्ध वस्तुत: हमारे लोकतंत्र की बुनियाद है।
Patkatha Lekhan : Vyavaharik Nirdeshika
- Author Name:
Asghar Wajahat
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फ़िल्मों और टी.वी. के सर्वाधिक लोकप्रिय कार्यक्रम, धारावाहिक के लिए पटकथा अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त डाक्यूड्रामा और डाक्यूमेंट्री फ़िल्मों के लिए भी दृश्य-श्रव्य केन्द्रित लेखन आवश्यक है। फ़िल्म और टेलीविज़न के व्यापक होते क्षेत्र में शिक्षापरक/ज्ञानपरक मल्टीमीडिया कार्यक्रम भी आकर जुड़ गए हैं। ज्ञान और शिक्षा के अपार भंडार को दृश्य-श्रव्य माध्यम से उपलब्ध कराने की चुनौती भारत सरकार के मानव-संसाधन मंत्रालय के अतिरिक्त अनेक अन्य संगठनों ने ली है। प्रोग्राम प्रोडक्शन के क्षेत्र में यदि अभाव है तो पटकथा लेखकों का है। इसके कई कारण हैं। प्रोग्राम प्रोडक्शन सम्बन्धी तकनीकी प्रशिक्षण देने की तुलना में पटकथा-लेखन के पाठ्यक्रम बहुत कम हैं। जिन संस्थानों में पटकथा-लेखन के कार्यक्रम चलाए जाते हैं, वहाँ प्रायः अच्छे शिक्षकों की कमी बनी रहती है और यह भी ज़रूरी नहीं है कि अच्छा पटकथा लेखक अच्छा शिक्षक भी हो। प्रस्तुत पुस्तक में सिनेमा के इतिहास, सैद्धान्तिकी और समीक्षा इत्यादि पर कोई चर्चा नहीं की गई है, क्योंकि पुस्तक का उद्देश्य पटकथा के व्यावहारिक पक्ष को सामने लाना है। यह पुस्तक पटकथा-लेखन में रुचि लेनेवाले विद्यार्थियों तथा अन्य सभी पाठकों के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकती है। इस व्यावहारिक निर्देशिका में पटकथा के एक-एक बिन्दु की चर्चा की गई है। पुस्तक का उद्देश्य है कि इसके माध्यम से पटकथा-लेखन की तकनीक सीखी जा सके।
Television KI Bhasha
- Author Name:
Harish Chandra Barnwal
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अनुमान के मुताबिक़ हिन्दी में लगभग एक लाख पैंतालीस हज़ार शब्द हैं, लेकिन हिन्दी टेलीविज़न पत्रकारिता के लिए महज़ पन्द्रह सौ शब्दों की जानकारी ही काफ़ी है
यानी अगर आपने इतने शब्दों की जानकारी हासिल कर ली तो यक़ीन मानिए, आप भाषा के लिहाज़ से हिन्दी के अच्छे टेलीविज़न पत्रकार तो ज़रूर बन जाएँगे। अफ़सोस की बात है कि ये जानकारी भी टेलीविज़न पत्रकारों को भारी लगती है। शब्दों की सही समझ की कमी, भाषा के आधे–अधूरे ज्ञान की वजह से टेलीविज़न पत्रकार ऐसी ग़लतियाँ कर बैठते हैं कि कई बारगी मज़ाक़ का पात्र तक बन जाते हैं। यही नहीं, शब्दों के ग़लत इस्तेमाल से अर्थ का अनर्थ तक हो जाता है। इसलिए पत्रकारिता के लिहाज़ से भाषा की सही जानकारी बेहद ज़रूरी है।
हिन्दी न्यूज़ चैनलों की दुनिया भले ही समय के साथ काफ़ी व्यापक होती चली गई हो, लेकिन हक़ीक़त यही है कि आज भी टीवी पत्रकारिता में भाषा को लेकर एक भी ऐसी किताब नहीं है, जो भाषा और पत्रकारिता को जोड़ते हुए एक मुकम्मल जानकारी दे सके। यही परेशानी टीवी पत्रकारिता की पढ़ाई करनेवाले छात्र–छात्राओं के साथ है। हिन्दी के प्रोफ़ेसर ही पत्रकारिता के बच्चों को भी पढ़ाते हैं, ऐसे में पत्रकारिता की भाषा का व्यावहारिक ज्ञान कभी भी विद्यार्थियों को सही से नहीं हो पाता और इसका ख़मियाज़ा टेलीविज़न पत्रकारिता को होता है।
टेलीविज़न की अपनी एक अलग ही दुनिया होती है। इसकी भाषा आम बोलचाल की भाषा होते हुए भी अलग है। इसकी भाषा मानकता के क़रीब रहते हुए भी इसके नियमों का पालन कभी नहीं करती। नए–नए शब्द समय और ज़रूरत के हिसाब से गढ़े जाते हैं तो कई शब्दों को हमेशा के लिए त्याग दिया जाता है। इस भाषा को अंग्रेज़ी, उर्दू और दूसरी भाषाओं से कोई परहेज़ नहीं। इसकी भाषा मीडिया के अन्य माध्यमों मसलन अख़बार या फिर रेडियो की भाषा से बेहद अलग है।
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