Chhani-Kharikon Mein
About the book
‘अस्कोट-आराकोट अभियान’ एक ऐसी यात्रा है जो हर दस साल बाद आयोजित की जाती है और जिसका उद्देश्य उत्तराखंड के भौगोलिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय परिवर्तनों का अध्ययन करना होता है। पहाड़ संस्था के बैनर तले होने वाली इस यात्रा के दौरान अनेक विद्यार्थी, वैज्ञानिक, लेखक, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्त्ता लगभग 1150 किलोमीटर पैदल चलते हैं। ‘छानी-खरीकों में’ इसी यात्रा में शामिल लेखक की लगभग एक माह की भागीदारी का जीवन्त, चित्रोमय और विश्लेषणपरक वृत्तान्त है। यह यात्रावृत्त भी है और पहाड़ का सामाजिक अध्ययन भी, जिसमें लेखक ख़ासतौर पर उत्तराखंड के उन ग्रामीण अंचलों पर अपना ध्यान केन्द्रित करता है, जिनके बारे में न हम जानते हैं, न सुनते हैं। अनेक अनजाने गाँवों से गुज़रते और कुमाऊँ और गढ़वाल मंडल के प्राकृतिक सौन्दर्य से साक्षात्कार करते हुए इस यात्रा में शामिल लोग अपने सहयात्रियों के साथ पहाड़ की उन तमाम समस्याओं पर विचार-विमर्श भी करते चलते हैं जो जिन्हें यहाँ रहने वाले लोग जीवन के एक हिस्से के रूप में जीते हैं और जो अन्ततः पलायन का कारण बनती हैं। उत्तराखंड के भीतरी अंचलों, लगभग 15 नदियों, नदी-घाटियों, कालामूनी और पंवाली कांठा जैसे उच्च हिमालयी बुग्यालों से गुज़रती हुई यह यात्रा-कथा केवल सफ़र का सुख नहीं देती, सोचने के लिए ढेर सारी सामग्री और विचारने के लिए कई सवाल भी देती है।
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About the Book
‘अस्कोट-आराकोट अभियान’ एक ऐसी यात्रा है जो हर दस साल बाद आयोजित की जाती है और जिसका उद्देश्य उत्तराखंड के भौगोलिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय परिवर्तनों का अध्ययन करना होता है। पहाड़ संस्था के बैनर तले होने वाली इस यात्रा के दौरान अनेक विद्यार्थी, वैज्ञानिक, लेखक, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्त्ता लगभग 1150 किलोमीटर पैदल चलते हैं।
‘छानी-खरीकों में’ इसी यात्रा में शामिल लेखक की लगभग एक माह की भागीदारी का जीवन्त, चित्रोमय और विश्लेषणपरक वृत्तान्त है। यह यात्रावृत्त भी है और पहाड़ का सामाजिक अध्ययन भी, जिसमें लेखक ख़ासतौर पर उत्तराखंड के उन ग्रामीण अंचलों पर अपना ध्यान केन्द्रित करता है, जिनके बारे में न हम जानते हैं, न सुनते हैं। अनेक अनजाने गाँवों से गुज़रते और कुमाऊँ और गढ़वाल मंडल के प्राकृतिक सौन्दर्य से साक्षात्कार करते हुए इस यात्रा में शामिल लोग अपने सहयात्रियों के साथ पहाड़ की उन तमाम समस्याओं पर विचार-विमर्श भी करते चलते हैं जो जिन्हें यहाँ रहने वाले लोग जीवन के एक हिस्से के रूप में जीते हैं और जो अन्ततः पलायन का कारण बनती हैं।
उत्तराखंड के भीतरी अंचलों, लगभग 15 नदियों, नदी-घाटियों, कालामूनी और पंवाली कांठा जैसे उच्च हिमालयी बुग्यालों से गुज़रती हुई यह यात्रा-कथा केवल सफ़र का सुख नहीं देती, सोचने के लिए ढेर सारी सामग्री और विचारने के लिए कई सवाल भी देती है।
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 1st
- Publication year
- 2026
- Weight
- 260 grams
- ISBN-13
- 9789360868208
- Pages
- 256
- Reading time
- ~9 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 13 × 20 cm
- Language
- Hindi
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