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Author:
Gobind Prasad, TrilochanPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
2000
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Available
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जनसाधारण की दुख-प्रसूत स्थानिक संवेदना को कविता में ढालकर मनुष्यता की सार्वभौमिक चेतना से जोड़ने वाले, शास्त्र की सटीकता और जनजीवन के नित नवीन अनुभवों को कई-कई छन्दों में अंकित करनेवाले विद्वान कवि त्रिलोचन हिन्दी के विराट कविता-लोक में अपनी तरह के अनूठे हस्ताक्षर हैं। कई भाषाओं के ज्ञाता, संस्कृत के विद्वान और प्रगतिशील चेतना से सम्पन्न कवि त्रिलोचन ने रोला और बरवै जैसे प्राचीन छन्दों को भी साधा, गीत-ग़ज़ल भी लिखे और 'सॉनेट' जैसे विदेशी छन्द को हिन्दी का अपना बना दिया। मुक्त-छन्द भी लिखा और 'गद्य-वद्य' लिखते हुए आलोचना को भी एक आत्मीय रंग दिया। यह त्रिलोचन की रचनावली है, जिसकी ज़रूरत लम्बे समय से महसूस की जा रही थी। त्रिलोचन महज़ एक कवि नहीं, कविता के विद्यालय थे; मौज़ूदा और आनेवाले रचनाकार उनसे हमेशा ही सीख सकते हैं। प्रस्तुत रचनावली में त्रिलोचन का सम्पूर्ण संकलित है। कविताओं के साथ-साथ त्रिलोचन ने आलोचनात्मक गद्य भी लिखा। इस खंड में उनके द्वारा लिखित आलोचनात्मक लेखों, समीक्षाओं आदि को लिया गया है। कविता हो या गद्य उन्होंने बोलचाल की भाषा को ही प्राथमिकता दी। यह इन आलेखों से भी ज़ाहिर होता है। कुछ अप्रकाशित लेख भी यहाँ प्रस्तुत हैं। साथ में उनकी दैनन्दिनी भी।
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जनसाधारण की दुख-प्रसूत स्थानिक संवेदना को कविता में ढालकर मनुष्यता की सार्वभौमिक चेतना से जोड़ने वाले, शास्त्र की सटीकता और जनजीवन के नित नवीन अनुभवों को कई-कई छन्दों में अंकित करनेवाले विद्वान कवि त्रिलोचन हिन्दी के विराट कविता-लोक में अपनी तरह के अनूठे हस्ताक्षर हैं।
कई भाषाओं के ज्ञाता, संस्कृत के विद्वान और प्रगतिशील चेतना से सम्पन्न कवि त्रिलोचन ने रोला और बरवै जैसे प्राचीन छन्दों को भी साधा, गीत-ग़ज़ल भी लिखे और 'सॉनेट' जैसे विदेशी छन्द को हिन्दी का अपना बना दिया। मुक्त-छन्द भी लिखा और 'गद्य-वद्य' लिखते हुए आलोचना को भी एक आत्मीय रंग दिया।
यह त्रिलोचन की रचनावली है, जिसकी ज़रूरत लम्बे समय से महसूस की जा रही थी। त्रिलोचन महज़ एक कवि नहीं, कविता के विद्यालय थे; मौज़ूदा और आनेवाले रचनाकार उनसे हमेशा ही सीख सकते हैं। प्रस्तुत रचनावली में त्रिलोचन का सम्पूर्ण संकलित है।
कविताओं के साथ-साथ त्रिलोचन ने आलोचनात्मक गद्य भी लिखा। इस खंड में उनके द्वारा लिखित आलोचनात्मक लेखों, समीक्षाओं आदि को लिया गया है। कविता हो या गद्य उन्होंने बोलचाल की भाषा को ही प्राथमिकता दी। यह इन आलेखों से भी ज़ाहिर होता है। कुछ अप्रकाशित लेख भी यहाँ प्रस्तुत हैं। साथ में उनकी दैनन्दिनी भी।
Book Details
-
ISBN9789395737883
-
Pages1624
-
Avg Reading Time54 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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