Pratinidhi Kavitayen : Trilochan
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त्रिलोचन का काव्य-व्यक्तित्व लगभग पचास वर्षों के लम्बे काल-विस्तार में फैला हुआ है। वे हमारे समय के एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कवि हैं—लगभग एक अद्वितीय कवि। वे एक विषम धरातल वाले कवि हैं। साथ ही उनके रचनात्मक व्यक्तित्व में एक विचित्र विरोधाभास भी दिखाई पड़ता है। एक ओर यदि उनके यहाँ गाँव की धरती का-सा ऊबड़-खाबड़पन दिखाई पड़ेगा तो दूसरी ओर कला की दृष्टि से एक अद्भुत क्लासिकी कसाव या अनुशासन भी।</p> <p>त्रिलोचन की सहज-सरल-सी प्रतीत होनेवाली कविताओं को भी यदि ध्यान से देखा जाए तो उनकी तह में अनुभव की कई परतें खुलती दिखाई पड़ेंगी।</p> <p>त्रिलोचन के यहाँ आत्मपरक कविताओं की संख्या बहुत अधिक है। अपने बारे में हिन्दी के शायद ही किसी कवि ने इतने रंगों में और इतनी कविताएँ लिखी हों। पर त्रिलोचन की आत्मपरक कविताएँ किसी भी स्तर पर आत्मग्रस्त कविताएँ नहीं हैं और यह उनकी गहरी यथार्थ-दृष्टि और कलात्मक क्षमता का सबसे बड़ा प्रमाण है।</p> <p>भाषा के प्रति त्रिलोचन एक बेहद सजग कवि हैं। त्रिलोचन की कविता में बोली के अपरिचित शब्द जितनी सहजता से आते हैं, कई बार संस्कृत के कठिन और लगभग प्रवाहच्युत शब्द भी उतनी ही सहजता से कविता में प्रवेश करते हैं और चुपचाप अपनी जगह बना लेते हैं।
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त्रिलोचन का काव्य-व्यक्तित्व लगभग पचास वर्षों के लम्बे काल-विस्तार में फैला हुआ है। वे हमारे समय के एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कवि हैं—लगभग एक अद्वितीय कवि। वे एक विषम धरातल वाले कवि हैं। साथ ही उनके रचनात्मक व्यक्तित्व में एक विचित्र विरोधाभास भी दिखाई पड़ता है। एक ओर यदि उनके यहाँ गाँव की धरती का-सा ऊबड़-खाबड़पन दिखाई पड़ेगा तो दूसरी ओर कला की दृष्टि से एक अद्भुत क्लासिकी कसाव या अनुशासन भी।</p>
<p>त्रिलोचन की सहज-सरल-सी प्रतीत होनेवाली कविताओं को भी यदि ध्यान से देखा जाए तो उनकी तह में अनुभव की कई परतें खुलती दिखाई पड़ेंगी।</p>
<p>त्रिलोचन के यहाँ आत्मपरक कविताओं की संख्या बहुत अधिक है। अपने बारे में हिन्दी के शायद ही किसी कवि ने इतने रंगों में और इतनी कविताएँ लिखी हों। पर त्रिलोचन की आत्मपरक कविताएँ किसी भी स्तर पर आत्मग्रस्त कविताएँ नहीं हैं और यह उनकी गहरी यथार्थ-दृष्टि और कलात्मक क्षमता का सबसे बड़ा प्रमाण है।</p>
<p>भाषा के प्रति त्रिलोचन एक बेहद सजग कवि हैं। त्रिलोचन की कविता में बोली के अपरिचित शब्द जितनी सहजता से आते हैं, कई बार संस्कृत के कठिन और लगभग प्रवाहच्युत शब्द भी उतनी ही सहजता से कविता में प्रवेश करते हैं और चुपचाप अपनी जगह बना लेते हैं।
Book Details
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ISBN9788126702565
-
Pages132
-
Avg Reading Time4 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: निक हिन्दी कविता में राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना का शंखनाद करनेवाले विख्यात कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का एक महत्त्वपूर्ण संग्रह है 'मृत्ति-तिलक'। संग्रह की कविताओं में जहाँ देश के विराट व्यक्तियों के प्रति कवि का श्रद्धा-निवेदन है, वहीं कुछ कविताओं में उत्कट देश-प्रेम की ओजस्वी अभिव्यक्ति है। कुछ कविताएँ ख्यातनाम देशी-विदेशी कवियों की उत्कृष्ट रचनाओं का सरस अनुवाद हैं तो कुछ कविताओं में निसर्ग का सुन्दर चित्रण है। प्रांजल, प्रवाहमयी भाषा, उच्चकोटि का छन्द-विधान और सहज भाव-सम्प्रेषण इन कविताओं की अद्भुत विशेषता है। अपने सरोकार और संवेदना में हिन्दी साहित्य के लिए थाती हैं ये कविताएँ। 'मृत्ति-तिलक' को पढ़ना हिन्दी काव्य के स्वर्ण-युग की यात्रा करना ह
Laanat Ka Pyala
- Author Name:
Adnan Kafeel Darwesh
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- Description: अदनान ‘शाम के पृष्ठ पर एक असम्भव की तरफ़’ खुलते कवि हैं। कविता में ऐसी डूब विरल है। समकालीन संकटों के साये में यह कवि सिर्फ़ अपने देस, मुलुक और अपनी ज़बान का नहीं—अचम्भित और दबी-सहमी मनुष्यता का गहन पर्यवेक्षक और उसकी मरम्मत में मुस्तैद कारीगर भी है। अपने सन्ताप और अपनी घुटन को अदनान ने इतना कसा, इतना भुगता, इतना तपाया है कि उसकी निष्पत्ति में ही ऐसी कविता पैदा हो सकती है जिसमें ‘झाड़ियों सी जलती है रात।’ उस्ताद अमीर ख़ान कहते थे कि नग़्मा वही नग़्मा है जिसे रूह सुने और रूह सुनाए। अपने मर्म में संगीत का रुख़ करने वाली अदनान की कविता भी सच्चाई की इस असाधारण कसौटी पर खरा उतरती महसूस होती है। ‘लानत का प्याला’ संग्रह की कविताओं का शीर्षक—क्रम देखो तो वो भी मानो दूर तक खिंची चली आती एक लम्बी कविता है या अलग-अलग कविताओं की लड़ी। प्रेम और उदासियों से रची-बिंधी और नये-नये चक्कर बनाती कविताओं में नागरिक जीवन के तहस-नहस होने का दर्दनाक, ऐतिहासिक सिलसिला इस कदर बेकली और रुंधी हुई ख़ामोशी में दर्ज हुआ है कि पढ़ते हुए एक गहरी टूट, एक तीखी शर्मिंदगी दिल में पैबस्त हुई जाती हैं। उनकी चोटें हमारी याददिहानी हैं। आने वाली पीढ़ियाँ पढ़कर जानेंगी कि उनका कवि सिर्फ़ कविता नहीं कर रहा था। वह प्रकांडता और पांडित्य की धज से फूटने वाला कवि नहीं, सुदूर स्मृति के देहातों से टूटा-निकला एक कवि है जो यातना और दुष्चक्र का एक असाधारण बिंब बना रहा है, जिसे मालूम है प्रचंड आँधियाँ चल रही हैं और नयी गर्जनाएँ उसकी ओर लपकती आ रही हैं, वह कुछ-कुछ ‘वन हंड्रेड इयर्स ऑफ़ सॉल्टियूड’ उपन्यास के आत्मनिर्वासित और अकेले, बूढ़े जिप्सी कीमियागर मेल्केदिएस जैसा है जिसे दुनिया के विकट यथार्थों जितना ही यक़ीन अपनी नाज़ुक, अपार कल्पनाओं पर है लेकिन वो अवश्यंभाविता के लिए नहीं मानवीय प्रयत्न और जिजीविषा के लिए खड़ा है। अदनान को यक़ीनन कविता से किसी सर्वकालिक महानता का तोहफ़ा नहीं चाहिए, जो चाहिए वो यहाँ पेश है! —शिवप्रसाद जोशी
Tulsidas "Nirala"
- Author Name:
Suryakant Tripathi 'Nirala'
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Description:
“तुलसीदास में स्वाधीनता की भावना का पूर्ण प्रस्फुटन हुआ है। भारत के सांस्कृतिक सूर्य के अस्त होने पर देश में किस तरह अन्धकार छाया हुआ है, इसका मार्मिक चित्रण करते हुए निराला ने दिखलाया है कि किस प्रकार एक कवि इस अन्धकार को दूर करने की चेष्टा करता है। तुलसीदास के रूप में निराला ने आधुनिक कवि के स्वाधीनता-सम्बन्धी भावों के उद्गम और विकास का चित्रण किया है। छायावादी कवि की तरह निराला के तुलसीदास को भी देश की पराधीनता का बोध प्रकृति की पाठशाला में ही होता है; किन्तु छायावादी कवि की तरह वे भी कुछ दिनों के लिए नारी-मोह में पड़कर उस भाव को भूल जाते हैं। अन्त में जो ज्ञान प्रकृति की पाठशाला में मिला था, उसका दीक्षांत भाषण उसी नारी के विश्वविद्यालय में सुनने को मिलता है, और भविष्यवाणी होती है कि :
देश-काल के शर से बिंधकर
यह जागा कवि अशेष छविधर
इसके स्वर से भारती मुखर होंगी।
इस तरह हिन्दी जाति के सबसे बड़े जातीय कवि की जीवन-कथा के द्वारा निराला ने अपनी समसामयिक परिस्थितियों में रास्ता निकालने का संकेत दिया है।”
—नामवर सिंह
Dharati Aaba Birsa Munda
- Author Name:
Joydev Das
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- Description: बिरसा मुंडा का दृष्टांत बना व्यक्तित्व सहज ही प्रेरित और प्रभावित करता है। इस व्यक्तित्व, इसकी क्रांतिधर्मी चेतना और संघर्षों की प्रेरणा नाटक विधा में उतर कर दूरगामी प्रभाव रच सकती है। बिरसा मुंडा के जीवन की प्रमुख घटनाओं पर आधारित रंगकर्मी जयदेव दास द्वारा रचित नाटक ‘धरती आबा-बिरसा मुंडा’ एक ऐतिहासिक क्रांतिकारी चरित्र को उसकी पूरी संघर्षशीलता के साथ सामने लाता है। ‘धरती आबा’ यानी धरती का पिता-बिरसा मुंडा को यह समान सहज ही प्राप्त नहीं हुआ। अंग्रेजों की आदिवासी विरोधी आर्थिक नीतियों के विरुद्ध लामबंद होने और ब्रिटिश साम्राय की सामंतशाही के तमाम उत्पीन झेलने के साथ आदिवासी और स्त्री केंद्रित मुद्दों के प्रति व्यापक समाज में अपनी अस्मिता की लाई को धारदार बनाने का काम बिरसा मुंडा ने किया। जिसके लिए अन्यायी शासन ने उन्हें कैद किया और धोखे से पककर जहर देकर मौत के घाट उतारा। निश्चय ही एक अति पठनीय नाटक।
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