Pratinidhi Kahaniyan : Shiv Kumar 'Shiv'
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Author:
Shiv Kumar 'Shiv', Mahesh KatarePublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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शिव कुमार ‘शिव’ गहरी ऐन्द्रिकता के किस्सागो हैं। स्त्री, देह और प्रेम का त्रिकोण या त्रिभुज उनकी कथा-यात्रा का पाथेय है। शरीर की आदिम भूख और तपिश को उनका कथाकार बखूबी पहचानता है, तभी तो दूध की हँड़िया-सी खदबदाकर उफनती देह को वे कहानी में इतनी कुशलता से साध पाते हैं कि देह का खुलापन उनके यहाँ कामोत्तेजना का कारण नहीं बनता, बल्कि कथ्य में रचे जीवन की वास्तविकता से मुठभेड़ का प्रेरक बनकर सामने आता है। शिव कुमार ‘शिव’ अपनी रचना को किसी वैचारिक, राजनीतिक या विमर्शवादी माप के कपड़े नहीं पहनाते। वे जीवन की भट्टी से तपकर पके यथार्थ से ही अपने कथ्य को अन्वेषित करते हैं और ऐसा सच सामने लाते हैं जिससे लोग बचकर निकल लेना ही श्रेयस्कर मानते हैं। इस संग्रह में शामिल कहानियों से गुजरते हुए आप खामोश चीखों, उदासियों और हाहाकार की एक भीषण दुनिया के बीच पहुँचते हैं और ऐसी असहायता महसूस करते हैं कि वापस अपने संसार में लौटकर सहज रह पाना आसान नहीं रह जाता। उनकी कहानियों में आप कुछ ऐसे चरित्रों के रूबरू होते हैं जो किसी और कथाकार के यहाँ शायद ही मिलें। कहीं लगेगा कि आप गोर्की के किसी विश्वविद्यालय आ पहुँचे हैं तो कहीं आपका सामना सआदत हसन मंटो से होगा; कभी आप चार्ल्स डिकेन्स की अँधेरी, बदबूदार, अपराध-ग्रस्त गली के आसपास होंगे तो कभी अलेक्सान्द्र कुप्रिन के कटरे में। हिन्दी के एक अहम लेकिन लगभग अलक्षित कथाकार की प्रतिनिधि रचनाओं की यह प्रस्तुति पाठकों को निश्चय ही एक नया अनुभव प्रदान करेगी।
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शिव कुमार ‘शिव’ गहरी ऐन्द्रिकता के किस्सागो हैं। स्त्री, देह और प्रेम का त्रिकोण या त्रिभुज उनकी कथा-यात्रा का पाथेय है। शरीर की आदिम भूख और तपिश को उनका कथाकार बखूबी पहचानता है, तभी तो दूध की हँड़िया-सी खदबदाकर उफनती देह को वे कहानी में इतनी कुशलता से साध पाते हैं कि देह का खुलापन उनके यहाँ कामोत्तेजना का कारण नहीं बनता, बल्कि कथ्य में रचे जीवन की वास्तविकता से मुठभेड़ का प्रेरक बनकर सामने आता है।
शिव कुमार ‘शिव’ अपनी रचना को किसी वैचारिक, राजनीतिक या विमर्शवादी माप के कपड़े नहीं पहनाते। वे जीवन की भट्टी से तपकर पके यथार्थ से ही अपने कथ्य को अन्वेषित करते हैं और ऐसा सच सामने लाते हैं जिससे लोग बचकर निकल लेना ही श्रेयस्कर मानते हैं।
इस संग्रह में शामिल कहानियों से गुजरते हुए आप खामोश चीखों, उदासियों और हाहाकार की एक भीषण दुनिया के बीच पहुँचते हैं और ऐसी असहायता महसूस करते हैं कि वापस अपने संसार में लौटकर सहज रह पाना आसान नहीं रह जाता। उनकी कहानियों में आप कुछ ऐसे चरित्रों के रूबरू होते हैं जो किसी और कथाकार के यहाँ शायद ही मिलें। कहीं लगेगा कि आप गोर्की के किसी विश्वविद्यालय आ पहुँचे हैं तो कहीं आपका सामना सआदत हसन मंटो से होगा; कभी आप चार्ल्स डिकेन्स की अँधेरी, बदबूदार, अपराध-ग्रस्त गली के आसपास होंगे तो कभी अलेक्सान्द्र कुप्रिन के कटरे में।
हिन्दी के एक अहम लेकिन लगभग अलक्षित कथाकार की प्रतिनिधि रचनाओं की यह प्रस्तुति पाठकों को निश्चय ही एक नया अनुभव प्रदान करेगी।
Book Details
-
ISBN9789377370145
-
Pages152
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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