Kamini Kay Kantare Vol-I

(0)

Author:

Mahesh Katare

Language:

Hindi

830

680.6 (18% off)

Available

Ships within 48 Hours

Free Shipping in India on orders above Rs. 1100


कामिनी काय कांतारे’ अर्थात कामिनी काया के जंगल में! राजा भर्तृहरि, गृहस्थ भर्तृहरि, प्रेमी भर्तृहरि, कवि भर्तृहरि, वैयाकरण भर्तृहरि, योगी भर्तृहरि! बहुमखी प्रतिभा के धनी विविध रूप-गुणों से संपन्न भर्तृहरि के जीवन पर आधारित यह उपन्यास कामिनी कंचन के बीच से ही नहीं गुजरता, कामिनी काया के जंगल से भी गुजरता है और कथा, इतिहास, मिथक के बल पर एक महान क्लासिक रचना वरिष्ठ कथाकार-उपन्यासकार महेश कटारे की कलम से पूर्णता को प्राप्त करती है। यह उपन्यास न मात्र बेहद पठनीय और रोचकता के लिहाज से महत्त्वपूर्ण है, ज्ञान को दीप्त करने वाली विशिष्ट कृति है। भारतीय परंपरा की थाती। उपन्यासकार के शब्दों में, ''भरथरी गाने वालों की कथा में बीवी की बेवफाई से दुखी राजा भरथरी जोगी बनकर महल, हवेली, राजपाट छोड़कर निकल गए। गुरु गोरखनाथ के कहने पर वह अपनी उसी पत्नी रानी पिंगला से भीख माँगने द्वार पर पहुँचे तो राजा को जोगी के भेष में देख रानी पछाड़ खाकर गिर पड़ी। 'भरथरी’ सुनती स्त्रियों की भीड़ राजा के घर से निकलते ही आँसू बहाने लगती और रानी के पछाड़ खा गिरने पर तो अनेक की 'कीक’ फूट जाती। इस भर्तृहरि से मेरा बचपन का परिचय था। बाद में सरसरी दृष्टि से शतकत्रय भी पढ़े थे तो उस रात मैंने मित्रों को दो-तीन श्लोक सुना डाले। उन्होंने प्रस्ताव रखा कि भर्तृहरि बहुत बड़ा कवि है। हमारे यहाँ ऐसे लोगों पर बहुत कम काम हुआ है, सो मैं एक उपन्यास लिखूँ।...’’ और अब यह उपन्यास दो खण्डों में आपके सामने है। हिंदी की एक अनमोल कृति के रूप में!...

Read more

ISBN
N/A
Pages
N/A
Avg Reading Time
16 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

Format:

Piracy Free

Express Delivery

Secure Payment

About the Book

कामिनी काय कांतारे’ अर्थात कामिनी काया के जंगल में! राजा भर्तृहरि, गृहस्थ भर्तृहरि, प्रेमी भर्तृहरि, कवि भर्तृहरि, वैयाकरण भर्तृहरि, योगी भर्तृहरि! बहुमखी प्रतिभा के धनी विविध रूप-गुणों से संपन्न भर्तृहरि के जीवन पर आधारित यह उपन्यास कामिनी कंचन के बीच से ही नहीं गुजरता, कामिनी काया के जंगल से भी गुजरता है और कथा, इतिहास, मिथक के बल पर एक महान क्लासिक रचना वरिष्ठ कथाकार-उपन्यासकार महेश कटारे की कलम से पूर्णता को प्राप्त करती है। यह उपन्यास न मात्र बेहद पठनीय और रोचकता के लिहाज से महत्त्वपूर्ण है, ज्ञान को दीप्त करने वाली विशिष्ट कृति है। भारतीय परंपरा की थाती। उपन्यासकार के शब्दों में, ''भरथरी गाने वालों की कथा में बीवी की बेवफाई से दुखी राजा भरथरी जोगी बनकर महल, हवेली, राजपाट छोड़कर निकल गए। गुरु गोरखनाथ के कहने पर वह अपनी उसी पत्नी रानी पिंगला से भीख माँगने द्वार पर पहुँचे तो राजा को जोगी के भेष में देख रानी पछाड़ खाकर गिर पड़ी। 'भरथरी’ सुनती स्त्रियों की भीड़ राजा के घर से निकलते ही आँसू बहाने लगती और रानी के पछाड़ खा गिरने पर तो अनेक की 'कीक’ फूट जाती। इस भर्तृहरि से मेरा बचपन का परिचय था। बाद में सरसरी दृष्टि से शतकत्रय भी पढ़े थे तो उस रात मैंने मित्रों को दो-तीन श्लोक सुना डाले। उन्होंने प्रस्ताव रखा कि भर्तृहरि बहुत बड़ा कवि है। हमारे यहाँ ऐसे लोगों पर बहुत कम काम हुआ है, सो मैं एक उपन्यास लिखूँ।...’’ और अब यह उपन्यास दो खण्डों में आपके सामने है। हिंदी की एक अनमोल कृति के रूप में!...

Book Details

  • ISBN
    9789381923146
  • Pages
    488
  • Avg Reading Time
    16 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

Recommended For You

Customer Reviews

Be the first to write a review...

0 out of 5

Book

Hurry! Limited-Time Coupon Code

WORDPOWER
* Terms and Conditions applied.

Offers

Best Deal

Lorem ipsum dolor sit amet, consectetur adipiscing elit, sed do eiusmod tempor incididunt ut labore et dolore magna aliqua

Lorem ipsum dolor sit amet, consectetur adipiscing elit, sed do eiusmod tempor incididunt ut labore et dolore magna aliqua. Ut enim ad minim veniam, quis nostrud exercitation ullamco laboris nisi ut aliquip ex ea commodo consequat.

whatsapp