Janjatiye Mithak : Udiya Aadivasiyon Ki Kahaniyan
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Author:
Niranjan Mahawar, Veriar ElwinPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
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यह पुस्तक हमें ओड़िया की जनजातियों की लगभग एक हज़ार लोककथाओं से परिचित कराती है। इसमें भतरा, बिंझवार, गदबा, गोंड और मुरिया, झोरिया और पेंगू, जुआंग, कमार, कोंड, परेंगा, साँवरा आदि की लोककथाओं को संगृहीत किया गया है।</p> <p>इन कहानियों के माध्यम से आदिवासियों के जीवन को सही परिप्रेक्ष्य में देखा-परखा जा सकता है। इन जनजातियों में आपस में अनेक समानताएँ हैं। उनकी दैनन्दिन जीवन-शैली, उनकी अर्थव्यवस्था, उनके सामाजिक संगठन, यहाँ तक कि उनके विश्वासों और आचार-व्यवहार में भी समानता पाई जाती है। जहाँ भी उनमें विभिन्नताएँ हैं, वह जातीय वैशिष्ट्य के कारण नहीं, वरन् परिवेश, शिक्षा और हिन्दू प्रभाव के फलस्वरूप आई हैं। तुलनात्मक दृष्टि से एक आदिम कोंड एक आदिम दिदयि से अधिक समानता रखता है बजाय उत्तर-पश्चिम पर्वतीय क्षेत्र के किसी कोंड के जो रसेलकोंडा मैदानी क्षेत्र के कोंड के अधिक समीप लगता है।</p> <p>इन रोचक कहानियों का क्रमवार व विषयवार संयोजन किया गया है, ताकि पाठक की तारतम्यता बनी रहे। सदियों से दबे आदिवासियों की ये कहानियाँ जहाँ सामान्य पाठक के लिए ज्ञानवर्द्धक हैं, वहीं शोधकर्त्ताओं को शोध के लिए एक नई ज़मीन भी मुहैया कराती हैं।
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यह पुस्तक हमें ओड़िया की जनजातियों की लगभग एक हज़ार लोककथाओं से परिचित कराती है। इसमें भतरा, बिंझवार, गदबा, गोंड और मुरिया, झोरिया और पेंगू, जुआंग, कमार, कोंड, परेंगा, साँवरा आदि की लोककथाओं को संगृहीत किया गया है।</p>
<p>इन कहानियों के माध्यम से आदिवासियों के जीवन को सही परिप्रेक्ष्य में देखा-परखा जा सकता है। इन जनजातियों में आपस में अनेक समानताएँ हैं। उनकी दैनन्दिन जीवन-शैली, उनकी अर्थव्यवस्था, उनके सामाजिक संगठन, यहाँ तक कि उनके विश्वासों और आचार-व्यवहार में भी समानता पाई जाती है। जहाँ भी उनमें विभिन्नताएँ हैं, वह जातीय वैशिष्ट्य के कारण नहीं, वरन् परिवेश, शिक्षा और हिन्दू प्रभाव के फलस्वरूप आई हैं। तुलनात्मक दृष्टि से एक आदिम कोंड एक आदिम दिदयि से अधिक समानता रखता है बजाय उत्तर-पश्चिम पर्वतीय क्षेत्र के किसी कोंड के जो रसेलकोंडा मैदानी क्षेत्र के कोंड के अधिक समीप लगता है।</p>
<p>इन रोचक कहानियों का क्रमवार व विषयवार संयोजन किया गया है, ताकि पाठक की तारतम्यता बनी रहे। सदियों से दबे आदिवासियों की ये कहानियाँ जहाँ सामान्य पाठक के लिए ज्ञानवर्द्धक हैं, वहीं शोधकर्त्ताओं को शोध के लिए एक नई ज़मीन भी मुहैया कराती हैं।
Book Details
-
ISBN9788126715473
-
Pages519
-
Avg Reading Time17 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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सर्वप्रथम हमें पूर्वोत्तर के इतिहास में जाना ज़रूरी है, जिससे यह पता चलता है कि वे अंग्रेज़ों, ज़ुल्मी राजाओं या किसी भी अन्याय के ख़िलाफ़ लड़े। इस पुस्तक में हमने अलग-अलग भाषा व राज्यों के वीर नायकों व नायिकाओं की कथाओं के अतिरिक्त पूर्वोत्तर के भिन्न राज्यों में हुए विद्रोहों, प्रतिरोधात्मक आन्दोलनों पर शोधपरक गाथाएँ व सामग्री प्रस्तुत की है। ये सभी गाथाएँ—लिजिन्द्रियाँ, लोककथाएँ या लोकगीत व टिप्पणियाँ पूर्वोत्तर के ही लेखकों द्वारा लिखी गई हैं। हमने इनका चयन कर हिन्दी में अनूदित कर प्रस्तुत किया है। इनके चयन और सम्पादन में काफ़ी समय लगा। चूँकि अनूदित सामग्री की भाषा को परिष्कृत भी करना पड़ा। हमने हिन्दी में कुछ गाथाएँ पूर्वोत्तर में उपलब्ध भिन्न ग्रन्थों व दस्तावेज़ों में दर्ज टिप्पणियों के आधार पर तैयार करके भी प्रस्तुत की गई हैं। एक ही नायक पर भिन्न-भिन्न लेखकों ने अपने-अपने क्षेत्र में उपलब्ध सामग्री (लोकगीत, किंवदंतियों, लोककथाएँ, ऐतिहासिक दस्तावेज आदि) से लेकर अपने-अपने दृष्टिकोण से प्रस्तुत की है। हमने सभी को सम्मानित करने का प्रयास किया है, ताकि पूर्वोत्तर में घटित इस इतिहास को गहराई तक समझा और जाना जा सके और शेष भारत उनसे अपना दर्द का रिश्ता जोड़ कर संवाद क़ायम करे। —‘सम्पादकीय’ से
Jharkhand : Disum Muktigatha Aur Srijan Ke Sapne
- Author Name:
Harivansh
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झारखण्ड एक सांस्कृतिक-सामाजिक अवधारणा है। आन्दोलन के दीर्घकालिक इतिहास ने इसे विशिष्ट पहचान दी है। देशज सृजन एवं विचारों के सपने। जिन्दगी की सादगी। व्यवहार की सरलता। जिस तरह झरने पहाड़ों-जंगलों में गुनगुनाते हैं, उसी तरह झारखंडी आकांक्षाएँ प्राकृतिक साहचर्य का जीवन्त संवाद प्रेषित करती हैं। झारखंडी दिसुम की मुक्तिगाथा इन्हीं बोधों का दस्तावेज है। मानवीय सम्मान, देशज जनज्ञान और स्वशासन की अपराजेय चेतना झारखंड का मूल स्वर हैं। झारखण्ड स्त्री-पुरुष समानता, स्वशासी ग्राम-परम्परा, सामुदायिक जीवन, सम्पत्ति पर सामूहिक हक और सर्वानुमति मूलक जनतंत्र का जीवन्त जनबोध है। मानवीय सरोकारों की आदिम चेतना निरन्तर गतिशील व नवीनीकरण की प्रक्रिया से गुजरती भावी दुनिया के लिए अनेक उपहारों को सँजोए है और इनसे संघर्ष और निर्माण की दोहरी प्रक्रिया स्वाभाविक जीवन बनकर उभरती है। झारखण्ड प्रतिरोध संस्कृति का वह दिसुम (इलाका) है, जहाँ अस्मिता एवं स्वशासन एक गम्भीर विमर्श के रूप में सामूहिक चेतना का अभिन्न हिस्सा हैं। रचनात्मकता का एक नया क्षितिज दिखता है। श्रम की प्रतिष्ठा का अद्भुत केन्द्र। इस पुस्तक में झारखंडी दर्शन को व्यापक सन्दर्भ में देखने-समझने की कोशिश की गयी है। आदिवासी संस्कृति के मिथक एवं यथार्थ के विमर्श का विस्तृत फलक यहाँ प्रस्तुत है। समकालीन चुनौतियों एवं संकटों के बीच झारखंडी जनसमाज में अन्तर्निहित देशज विकल्प उम्मीदों से भरे रोशनदान हैं और अद्यतन विमर्श में एक नए अध्याय की तरह उपस्थिति दर्ज कराते हैं।
Aadivasi Prem Kahaniyan
- Author Name:
Ashwini Kumar Pankaj
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‘आदिवासी प्रेम कहानियाँ' में इतिहास के अमर पात्रों के प्रेम और संघर्ष को रोचकता और प्रमाण के साथ प्रस्तुत किया गया है। इन कहानियों में झारखंड का आदिवासी परिवेश, प्रकृति, परिस्थितियाँ, आदिवासियों का जीवन, उनकी सहज प्रवृत्तियाँ और स्वतंत्रता-संग्राम में अंग्रेज़ी सत्ता के साथ उनके द्वारा किया गया संघर्ष उभरकर आया है।
ग़ौरतलब है कि औपनिवेशिक काल में अंग्रेज़ी समाज शोषण और सुन्दरता के लिए प्रसिद्ध था। अंग्रेज़ों के शोषण और अन्याय से मुक्ति के लिए आदिवासियों ने संघर्ष की ज़मीन रची और विद्रोह किए। आदिवासियों के न्याय-प्रेम और सुन्दरता की ओर अंग्रेज़ी समाज आकर्षित भी हुआ। और यही प्रेम की उत्स-भूमि है। चाहे वह सिदो और जेली हो, चाहे बुन्दी और सन्दु हो, चाहे बीरबन्ता बजल और जेलर को बेटी हो, चाहे मँगरी और रोजवेलगुड हो, चाहे बादल और मैग्नोलिया हो; सबके प्रेम की उत्स-भूमि न्याय-प्रेम और संघर्ष है। इसलिए इन नौ कहानियों में प्रेम के सच्चे स्वरूप के दर्शन होते हैं। जहाँ बहुत सहजता के साथ प्रेम जीवन में प्रवेश करता है और उसी के प्रति पूर्ण समर्पण भाव है। इन प्रेम कहानियों में कुछ का अन्त सुखान्त है तो कुछ का दुखान्त।
पाठक पाएँगे कि इन कहानियों के माध्यम से अपनी जातीय संस्कृति और अपनी भूमि के प्रति मर मिटने के अद्भुत ज़ज्बे से लैस आदिवासियों के प्रेम और संघर्ष का जो चित्रण है, वह हमें नए तरीक़े से देश के इतिहास को समझने के लिए बाध्य करता है।
Madhya Prant Aur Barar Mein Adivasi Samsyayen
- Author Name:
W.V. Grigson +1
- Book Type:

- Description:
जनजातीय समाज की अवहेलना सदियों से की जाती रही है और मौजूदा समय में भी बरकरार है, जिनकी अनगिनत समस्याओं को दरकिनार कर उनकी ज़मीनों के मालिकाना हक़ों को उनसे सरकारी या ग़ैर-सरकारी तरीक़ों से हड़पा जाता रहा है। उनकी कठिनाइयों और समस्याओं का सूक्ष्म दृष्टि से आकलन करता यह दस्तावेज़ हमारे सम्मुख उस जीवन-दृश्य को प्रस्तुत करता है, जो नारकीय है। प्रस्तुत पुस्तक मध्यप्रान्त और बरार में रहनेवाले जनजातीय समाज की उन विषम समस्याओं से हमें अवगत कराती है कि कैसे समय-समय पर उनकी ज़मीनों, परम्पराओं, भाषाओं से अलग-थलग करके उन्हें ‘निम्न’ जाँचा गया है और कैसे उन्हें साहूकारी के पंजों में फँसाकर बँधुआ मज़दूरी के लिए बाध्य किया गया है। यहाँ उनकी समस्याओं का एक गम्भीर विश्लेषण है। शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, पशु-चिकित्सा आदि के नाम पर उन पर जबरन एक ‘सिस्टम’ थोपा गया जिससे उनकी समस्याएँ कम होने के बजाय और बढ़ी हैं। डब्ल्यू.वी. ग्रिग्सन की अंग्रेज़ी पुस्तक से अनूदित यह पुस्तक जहाँ एक तरफ़ जनजातीय समस्याओं पर केन्द्रित हिन्दी पुस्तकों के अभाव को दूर करती है, वहीं दूसरी ओर शोधकर्ताओं और समाज के उत्थान में जुटे कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन भी करती है।
Vaachikata : Aadivasi Darshan, Sahitya Aur Saundaryabodh
- Author Name:
Vandana Tete
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आदिवासी दर्शन प्रकृतिवादी है। आदिवासी समाज धरती, प्रकृति और सृष्टि के ज्ञात-अज्ञात निर्देश, अनुशासन और विधान को सर्वोच्च स्थान देता है। उसके दर्शन में सत्य-असत्य, सुन्दर-असुन्दर, मनुष्य-अमनुष्य जैसी कोई अवधारणा नहीं है, न ही वह मनुष्य को उसके बुद्धि-विवेक अथवा ‘मनुष्यता’ के कारण 'महान' मानता है। उसका दृढ़ विश्वास है कि सृष्टि में जो कुछ भी सजीव और निर्जीव है, सब समान है। न कोई बड़ा है, न कोई छोटा है। न कोई दलित है, न कोई ब्राह्मण। सब अर्थवान है एवं सबका अस्तित्व एकसमान है—चाहे वह एक कीड़ा हो, पौधा हो, पत्थर हो या कि मनुष्य हो। वह ज्ञान, तर्क, अनुभव और भौतिकता को प्रकृति के अनुशासन की सीमा के भीतर ही स्वीकार करता है, उसके विरुद्ध नहीं। अन्वेषण, परीक्षण और ज्ञान को आदिवासी दर्शन सुविधा और उपयोगिता की दृष्टि से नहीं देखता, बल्कि धरती, प्रकृति और समस्त जीव-जगत के साथ सहजीवी सामंजस्य और अस्तित्वपूर्ण संगति के बतौर देखता है। मानव की सभी गतिविधियों और व्यवहारों को, समूची विकासात्मक प्रक्रिया को प्रकृति व समष्टि के विरुद्ध नहीं, बल्कि उसके पूरक के रूप में देखता है। उन सबका उपयोग वह वहीं तक करता है, जहाँ तक समष्टि के किसी भी वस्तु अथवा जीव को, प्रकृति और धरती को कोई गम्भीर क्षति नहीं पहुँचती हो। जीवन का क्षरण अथवा क्षय नहीं होता हो। आदिवासी साहित्य इसी दर्शन को लेकर चलता है।
Vaachikata : Aadivasi Darshan, Sahitya Aur Saundaryabodh
Vandana Tete
20% off₹ 199
₹ 159.2
Available
Kavi Man Jani Man :Aadivasi Stri Kavitayen
- Author Name:
Vandana Tete
- Book Type:

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वासी जनी (स्त्री) मन का धरातल बिलकुल दूसरी तरह का है। आदिवासियत के दर्शन पर खड़ा। समभाव जिसकी मूल प्रकृति है। प्राकृतिक विभेद के अलावा जहाँ इनसान अथवा सत्ता द्वारा कृत्रिम रूप से थोपा हुआ कोई दूसरा भेद नहीं है। हालाँकि कुछ बन्दिशें हैं, परन्तु सामन्ती क्रूरता और धार्मिक आडम्बरों के क़िले में आदिवासी स्त्री बिलकुल क़ैद नहीं है। ‘कवि मन जनी मन’ संकलन में वृहत्तर झारखंड के आदिवासी समुदायों की स्त्री-रचनाकारों की कविताएँ शामिल हैं। कवियों में से एक या दो को छोड़कर प्राय: सभी अपनी-अपनी आदिवासी मातृभाषाओं में लिखती हैं। परन्तु संकलन में शामिल कविताएँ मूल रूप से हिन्दी में रची गई हैं। कुछ का हिन्दी अनुवाद है जिसे कवयित्रियों ने स्वयं किया है। हिन्दी में आदिवासी स्त्री-कविताओं का मूल या अनुवाद लाना इसलिए ज़रूरी लगा कि यह समझ बिलकुल साफ़ हो जाए कि नसों में दौड़नेवाला लहू चाहे कितनी पीढ़ियों का सफ़र तय कर ले, अपना मूल स्वभाव नहीं छोड़ता। यानी रचने का, गढ़ने का और बचाने का स्वभाव। अपने लिए ही नहीं बल्कि सबके लिए सम्पूर्ण समष्टि की चिन्ता का स्वभाव। पहाड़ी नदी की तरह चंचल, पोखरे की तरह गम्भीर, घर के बीचोंबीच खड़ा मज़बूत स्तम्भ या कि आर्थिक-सांस्कृतिक पौष्टिकता लिये महुआ-सी महिलाएँ अपने समुदाय की रीढ़ हैं। ठीक वैसे ही उनका लेखन है। वे अपनी कविताओं से विमर्श करती हैं। उनके विमर्श में वर्चस्व की आक्रामकता नहीं बचाव के युद्धगीत हैं। और है रचने का दुर्दम्य आग्रह जिसका सबूत यह संकलन
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