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Rameshraaj - Satsai

In category

Poetry

Language

Hindi

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About the book

हिंदी साहित्य में 'सतसई परंपरा' का एक गौरवशाली इतिहास रहा है। सात सौ दोहों के गागर में सागर भरने की यह कला जितनी कठिन है, उतनी ही कालजयी भी है। कवि रमेशराज जी का rachnaye से नव-प्रकाशित संग्रह 'रमेशराज सतसई' इसी समृद्ध परंपरा की अगली और बेहद मज़बूत कड़ी है। यह संग्रह केवल दोहों का संकलन नहीं है, बल्कि यह हमारे समकालीन समाज, राजनीति, प्रेम और मानवीय विसंगतियों का एक जीवंत दस्तावेज़ है। रमेशराज जी के दोहे आज के समय की सबसे बड़ी विडंबनाओं पर सीधा प्रहार करते हैं। राजनीति और समाज में फैले पाखंड को उजागर करने में कवि की लेखनी अद्भुत धार का परिचय देती है। बगुला भगतों की आधुनिक परिभाषा गढ़ते हुए वे लिखते हैं: कर मे अपने थाम कर गीता वैद कुरान। मछली पालन पर दिया बगुले ने व्याखान। आज की व्यवस्था में 'सत्य' की जो दुर्दशा है, उसे कवि ने ईसा मसीह के प्रतीक से जोड़ा है: सच सूली लटका दिया, तन मे ठोकी कील। विजय धरम की हो गई देते लोग दलील। आज के दौर में जब 'दिखावा' ही योग्यता का पैमाना बन चुका है, तब रमेशराज कबीर की परंपरा को आगे बढ़ाते हैं। वे 'टैलेंट' और 'सेंट' (इत्र) जैसे आधुनिक शब्दों को दोहे के पारंपरिक ढांचे में इस तरह पिरोते हैं कि बात सीधे पाठक के मर्म को छूती है: कबिरा आज समाज में ढोंग बना टेलेंट। मृग की कुंडलि में बसे कस्तूरी कौ सेंट। दुष्टों और सत्ताधीशों के सामने याचक न बनने का स्वाभिमान भी इस सत्सई की एक बड़ी विशेषता है। 'चाकू और खरबूजे' के सटीक दृष्टांत अलंकार से वे नीति की शाश्वत बात कह जाते हैं: खल के सम्मुख क्यों करें बन याचक सम्बाद। करबूजे क़ी कब सुनी चाकू ने फरियाद। रमेशराज जी की दृष्टि केवल व्यवस्था के अंतर्विरोधों तक सीमित नहीं है; वे जीवन के रागात्मक पक्ष को भी उतनी ही शिद्दत से जीते हैं। प्रेम पर बढ़ती उम्र का कोई असर नहीं होता, इस शाश्वत सत्य को वे बेहद खूबसूरती से रेखांकित करते हैं: प्रिय क़ी चितवन आज भी दे पहले-सा नूर। कभी बुढ़ापा प्यार पर आता नहीं हुजूर। कवि ने भाषा के व्याकरण को ही प्रेम का माध्यम बना दिया है। हिंदी और संस्कृत व्याकरण के पारिभाषिक शब्दों (प्रत्यय, उपसर्ग, संधि, समास) का ऐसा काव्यात्मक उपयोग दुर्लभ है। यह दोहा इस संग्रह के भाषाई अधिकार और शिल्प-सौंदर्य की पराकाष्ठा है: तुम प्रत्त्यय उपसर्ग-सी, तुम ही सन्धि समास। शब्द-शब्द वक्रोक्ति-सा, बातों में अनुप्रास। निष्कर्ष यह है कि 'रमेशराज सतसई' के ये दोहे अपनी सहजता, गेयता (गाने योग्य) और मारकता के कारण पाठकों के कंठ का हार बनने की पूरी क्षमता रखते हैं। रमेशराज ने पारंपरिक छंद 'दोहा' को २१वीं सदी के सरोकारों से जोड़कर भाषा और समाज दोनों का बड़ा उपकार किया है। हिंदी जगत में इस कृति का स्वागत एक क्लासिक (कालजयी) रचना के रूप में होगा, ऐसा दृढ़ विश्वास है।

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हिंदी साहित्य में 'सतसई परंपरा' का एक गौरवशाली इतिहास रहा है। सात सौ दोहों के गागर में सागर भरने की यह कला जितनी कठिन है, उतनी ही कालजयी भी है। कवि रमेशराज जी का rachnaye से नव-प्रकाशित संग्रह 'रमेशराज सतसई' इसी समृद्ध परंपरा की अगली और बेहद मज़बूत कड़ी है। यह संग्रह केवल दोहों का संकलन नहीं है, बल्कि यह हमारे समकालीन समाज, राजनीति, प्रेम और मानवीय विसंगतियों का एक जीवंत दस्तावेज़ है।
रमेशराज जी के दोहे आज के समय की सबसे बड़ी विडंबनाओं पर सीधा प्रहार करते हैं। राजनीति और समाज में फैले पाखंड को उजागर करने में कवि की लेखनी अद्भुत धार का परिचय देती है। बगुला भगतों की आधुनिक परिभाषा गढ़ते हुए वे लिखते हैं:
कर मे अपने थाम कर गीता वैद कुरान।
मछली पालन पर दिया बगुले ने व्याखान।
आज की व्यवस्था में 'सत्य' की जो दुर्दशा है, उसे कवि ने ईसा मसीह के प्रतीक से जोड़ा है:
सच सूली लटका दिया, तन मे ठोकी कील।
विजय धरम की हो गई देते लोग दलील।
आज के दौर में जब 'दिखावा' ही योग्यता का पैमाना बन चुका है, तब रमेशराज कबीर की परंपरा को आगे बढ़ाते हैं। वे 'टैलेंट' और 'सेंट' (इत्र) जैसे आधुनिक शब्दों को दोहे के पारंपरिक ढांचे में इस तरह पिरोते हैं कि बात सीधे पाठक के मर्म को छूती है:
कबिरा आज समाज में ढोंग बना टेलेंट।
मृग की कुंडलि में बसे कस्तूरी कौ सेंट।
दुष्टों और सत्ताधीशों के सामने याचक न बनने का स्वाभिमान भी इस सत्सई की एक बड़ी विशेषता है। 'चाकू और खरबूजे' के सटीक दृष्टांत अलंकार से वे नीति की शाश्वत बात कह जाते हैं:
खल के सम्मुख क्यों करें बन याचक सम्बाद।
करबूजे क़ी कब सुनी चाकू ने फरियाद।
रमेशराज जी की दृष्टि केवल व्यवस्था के अंतर्विरोधों तक सीमित नहीं है; वे जीवन के रागात्मक पक्ष को भी उतनी ही शिद्दत से जीते हैं। प्रेम पर बढ़ती उम्र का कोई असर नहीं होता, इस शाश्वत सत्य को वे बेहद खूबसूरती से रेखांकित करते हैं:
प्रिय क़ी चितवन आज भी दे पहले-सा नूर।
कभी बुढ़ापा प्यार पर आता नहीं हुजूर।
कवि ने भाषा के व्याकरण को ही प्रेम का माध्यम बना दिया है। हिंदी और संस्कृत व्याकरण के पारिभाषिक शब्दों (प्रत्यय, उपसर्ग, संधि, समास) का ऐसा काव्यात्मक उपयोग दुर्लभ है। यह दोहा इस संग्रह के भाषाई अधिकार और शिल्प-सौंदर्य की पराकाष्ठा है:
तुम प्रत्त्यय उपसर्ग-सी, तुम ही सन्धि समास।
शब्द-शब्द वक्रोक्ति-सा, बातों में अनुप्रास।
निष्कर्ष यह है कि 'रमेशराज सतसई' के ये दोहे अपनी सहजता, गेयता (गाने योग्य) और मारकता के कारण पाठकों के कंठ का हार बनने की पूरी क्षमता रखते हैं। रमेशराज ने पारंपरिक छंद 'दोहा' को २१वीं सदी के सरोकारों से जोड़कर भाषा और समाज दोनों का बड़ा उपकार किया है। हिंदी जगत में इस कृति का स्वागत एक क्लासिक (कालजयी) रचना के रूप में होगा, ऐसा दृढ़ विश्वास है।

Book details

100% OriginalGenuine copy from Rachnaye Fulfilled
Format
Digital book
Publisher
Rachnaye Fulfilled
ISBN-13
RFRRSS
Pages
99
Reading time
~3 hrs
Age
18+
Country of origin
IN
Language
Hindi

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