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एक मज़ेदार दोहा सप्तक, जिसमे कुछ गुदगुदाने के साथ साथ कुछ गंभीर बातों पर भी ध्यानाकर्षण किया है रमेशराज ने। आशा है हिन्दी और English की मिली-जुली भाषा बोलने वालों को यह पसंद आयेगी।
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एक मज़ेदार दोहा सप्तक, जिसमे कुछ गुदगुदाने के साथ साथ कुछ गंभीर बातों पर भी ध्यानाकर्षण किया है रमेशराज ने। आशा है हिन्दी और English की मिली-जुली भाषा बोलने वालों को यह पसंद आयेगी।
Book Details
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ISBNRF-RR-DS1
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Pages9
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Avg Reading Time0 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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यह प्रवृत्ति महानगरीय कविता की मृत्युग्रस्त प्रवृत्ति पर चोट है। मृत्यु के प्रति एक सचेत एहसास के कारण जीवन के प्रति इसकी निष्ठा खोखली नहीं है, उसमें एक दृढ़ता है। इस तरह हमेशा अच्छी ज़िन्दगी पर मृत्यु का अंकुश तना होता है। इसलिए नेमाड़े जी की कविता मृत्यु के एहसास से ध्वनित विनाश तत्त्व को अनदेखा कर कोरे आशावाद की तरफ़ नहीं झुकती। वह महानगरीय कविता की तरह मृत्यु की प्रभुसत्ता को तटस्थता से स्वीकार नहीं करती, बल्कि इस प्रभुसत्ता को चुनौती देनेवाले जीवनदायी प्रेरणाओं के सन्दर्भ म़जबूती से खड़ी करती है। इस विनाश तत्त्व को मात देता जीवन के प्रति अदम्य उत्साह और उससे स्वभावत: प्राप्त जुझारूपन नेमाड़े जी का स्थायी भाव है। उनकी इसी विलक्षण जीवन-दृष्टि का दर्शन उनकी कविताओं में भी होता है।
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कविता अपने विचार बाहर से उधार नहीं लेती, बल्कि ख़ुद सोचती है, अपनी ही सहज-कठिन प्रक्रिया से अपना विचार अर्जित करती है—रघुवीर सहाय की कविताएँ कविता की वैचारिक सत्ता का बहुत सीधा और अकाट्य साक्ष्य हैं। हिन्दी के विचार-प्रमुख दौर में इस कविता-वैचारिकता का ऐतिहासिक महत्त्व है।
इस संग्रह में पहले के संग्रहों की छोड़ दी गई कुछ कविताएँ भी शामिल हैं और इस तरह यह संग्रह रघुवीर सहाय की कविता की यात्रा को पूर्ण करता है। अपनी मृत्यु के बाद भी रघुवीर सहाय लगातार तेजस्वी और विचारोत्तेजक उपस्थिति बने हुए हैं। उनका एक समय था पर आज ऐसे बहुत से हैं जो मानते हैं कि हिन्दी में सदा उनका समय रहेगा।
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विवेक ने बड़े अपनापे के साथ साधारण लोगों का चित्रण किया है। गहरी करुणा और प्रेम से उनके संघर्षों, जिजीविषा और जीवट को उद्घाटित किया है। विवेक की बहुत बड़ी ख़ूबी है उनके स्वर का सन्तुलन। अत्यन्त भावाविष्ट क्षणों में भी उनका स्वर संयत और उद्वेगहीन रहता है यानी तरंगें ताल में नहीं बल्कि पाठक के अन्तस में उठती हैं। ऐसा आत्म-नियंत्रण, वस्तुनिष्ठता और आसक्ति से भरी अनासक्ति दुर्लभ है।
विवेक गहरे और वास्तविक अर्थों में राजनीतिक कवि हैं। कई बार उनकी कविताएँ सपाट और मुँहफट भी लग सकती हैं लेकिन यह भी कवि की रणनीति ही है। वह जो कुछ करते हैं, वह सोची-समझी कला-नीति का परिणाम होता है। 'दिल्ली में एक दिन की राष्ट्रीय समस्या' एक अद्भुत राजनीतिक कविता है। इसका शिल्प भी बेजोड़ है। लेकिन शिल्प की दृष्टि से जो कविता स्वयं विवेक की पिछली सारी कविताओं को पीछे छोड़ देती है वह है ‘नई वर्णमाला’। सम्भवत: ऐसी कविता आज तक लिखी ही नहीं गई। इसी से लगता है कि विवेक कविता की नई वर्णमाला रच रहे हैं और कवि को सभी काव्य-रूपों पर अधिकार प्राप्त है। चाहे वह गद्य कविता हो या छन्दोबद्ध, चाहे लघुकाय हो अथवा लम्बी। ‘स्वर्णयुगों पर शोकगीत’ और ‘विरासत का सवाल’ काफ़ी लम्बी कविताएँ हैं और यहाँ भी कवि ने उसी नियंत्रण और शैल्पिक तथा वास्तु-प्रवीणता का परिचय दिया है।
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ग़ज़ल एक छन्द मात्र नहीं है। यह अभिव्यक्ति की एक अत्यन्त नाजुक विधा है जिसमें सपाटबयानी नहीं चलती। गुलाब खंडेलवाल का यह ग़ज़ल संग्रह ग़ज़ल की इस क्षमता को नए और पुराने के बीच सन्तुलन क़ायम रखते हुए नए सिरे से सिद्ध करता है।
गुलाब जी ने ग़ज़ल की दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बनाने की कोशिश की है और उनकी ग़ज़लों ने भी कवि और सहृदय, साहित्य और संगीत तथा हिन्दी और उर्दू के बीच की दूरी को कम करने में बड़ी भूमिका निभाई है।
प्रस्तुत ग़ज़लों में उर्दू की अभिव्यक्ति-भंगिमा के साथ हिन्दी कविता की रसदृष्टि और बिम्ब विधायकता का दुर्लभ संयोग देखने को मिलता है। उर्दू कविता के ठेठ पुराने माहौल और उसके अधिकांश रूढ़ प्रतीकों को छोड़कर परम्परित ग़ज़ल को उसके कृत्रिम परिवेश से निकालकर जीवन की सहज भावभूमि पर खड़ा करने का प्रयास इन ग़ज़लों में सहज ही दिखता है।
मन की मार्मिक अनुभूतियों के साथ-साथ अपने समय-समाज की तीखी चुनौतियों को स्वर देनेवाली ये ग़ज़लें अपनी गेयता और उद्धरणशीलता के कारण भी ध्यान खींचती हैं। जो पाठक इन्हें कवि के भावाकुल क्षणों की वाणी मानकर पढ़ेगा, उसे अपने हृदय की निगूढ़ झंकार इनमें सुनाई पड़ेगी।
Gule-E-Nagma
- Author Name:
Firak Gorakhpuri
- Book Type:

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Description:
‘आने वाली नस्लें तुम पर रश्क करेंगी हम-असरो
जब ये ध्यान आएगा उनको, तुमने ‘फ़िराक़’ को देखा था।’
‘फ़िराक़’ की शायरी इस धरती की सोंधी-सुगन्ध, नदियों की मदमाती चाल, हवाओं की नशे में डूबी मस्ती में ढूँढ़ी जा सकती है। ‘फ़िराक़’ प्रायः कहा करते थे कि कलाकार का मात्र भारतवासी होना पर्याप्त नहीं है, वरन् उसके भीतर भारत को निवास करना चाहिए।
भारत की शायरी की पहचान भारतीयता से होनी चाहिए। भारतीयता का एक विशिष्ट काव्य प्रतिमान है।
‘फ़िराक़’ की शायरी ने जीवन पर अमृत वर्षा कर दी और उसे ऐसा मधुर संगीत प्रदान किया, जिससे देवताओं के पवित्र नेत्र भीग जाएँ। ‘फ़िराक़’ की शायरी जीवन के लिए पाकीज़ा दुआ बन गई।
'फ़िराक़' ने उर्दू शायरी को एक बिलकुल नया आशिक़ दिया है और उसी तरह बिलकुल नया माशूक़ भी। इस नए आशिक़ की एक बड़ी स्पष्ट विशेषता यह है कि इसके भीतर एक ऐसी गम्भीरता पाई जाती है जो उर्दू शायरी में पहले नज़र नहीं आती थी।
‘फ़िराक़’ के काव्य में मानवता की वही आधारभूमि है और उसी स्तर की है जैसे ‘मीर’ के यहाँ उनके काव्य में ऐसी तीव्र प्रबुद्धता है, जो उर्दू के किसी शायर से दब के नहीं रहती। अतएव, उनके आशिक़ में एक तरफ़ तो आत्मनिष्ठ मानव की गम्भीरता है, दूसरी तरफ़ प्रबुद्ध मानव की गरिमा है।
Thartharahat
- Author Name:
Aasteek Vajpeyi
- Book Type:

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Description:
‘कविता वह समय है जिसे इतिहास देख भले ले पर दुहरा नहीं सकता’—
ये कुछ शब्द नए कवि आस्तीक वाजपेयी की कविता के हैं जो तुमुल कोलाहल-कलह के बीच कवि की आवाज़ में बचे रह गए उस समय की याद दिलाते हैं जिसमें पुराण और पुरखों की स्मृति बसी हुई है। इस कविता को पढ़ते हुए उस अग्रज समय का अहसास होता है जो जल्दी नहीं बीतता, स्मृति बनकर साथ-साथ चलता है और थर-थर काँपते वर्तमान में उस कवि-धीरज की तरह स्थिर बना रहता है जिसके सहारे कवि आस्तीक अपने काव्यारम्भ की देहरी पर यह पहचान लेते हैं कि मैं उसी से बना हूँ जो ढह जाता है। आस्तीक की कविता हमें फिर याद दिला रही है कि—‘जीत नहीं हार बचा लेती है अस्तित्व के छोर पर’। यह प्रश्नाकुल कविता है जो हमसे फिर पूछ रही है कि—‘इस दुनिया के राज़ कौन जानता है और यह दुनिया है किसकी?’ यह कविता इस प्रश्न से फिर सामना कर रही है कि—‘हमें क्यों इच्छाएँ इतनी अधिक मिलीं और कौशल इतना कम।’
इस नई कवि-व्यथा में डूबा साधते हुए संसार का सामना इस तरह होता है कि जैसे—बारिश के आँसू सूख चुके हैं, वे धरती को गीला नहीं करते। जैसे—गुस्सा, अहंकार और हठ ताल पर चन्द्रमा की प्रतिमा की तरह जगमगा रहे हैं। जैसे—यत्न, हिम्मत और सादगी की हवा आसमान में खो गई है—कवि आस्तीक अपनी कविता के समय के आईने में नए बाज़ार से घिरते जाते संसार का चेहरा दिखाते हुए हमसे कह रहे हैं कि जैसे—दूसरों की कल्पना के बाग़ीचे में उनकी इच्छाओं की दूब उखाड़कर अपनी इच्छाओं के पेड़ लगाए जा रहे हों। कवि आस्तीक दूसरों से कुछ कहना चाहते हैं पर इस समझ के साथ कि ये दूसरे कौन हैं। यह नया कवि हमें एक बार फिर सचेत कर रहा है कि ख़ुद की पैरवी करते हुए हम थक गए हैं और सब अकेले घूम रहे हैं भाषा की भीड़ में, अर्थ भाग गए हैं, शब्द ही हैं जो नए बन सकते हैं।
आस्तीक की कविता में बिना पाए खोने का दु:ख बार-बार करवट लेता है। इन कविताओं को पढ़ते हुए यह अनुभव होता है कि यह नया कवि दु:ख के भार से शब्दों पर पड़ गई सलवटों को अपनी अनुभूतियों के ताप से इस तरह सँवार लेता है कि शब्द नए लगने लगते हैं। आस्तीक अपनी एक कविता में कहते हैं कि मृत्यु ही पिछली शताब्दी की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि है। ये कविताएँ पढ़ते हुए पाठकगण अनुभव करेंगे कि शब्दों को नया करके ही मृत्यु को टाला जा सकता है।
—ध्रुव शुक्ल
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