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Nirvaat Ke Liye Koi Jagah Nahin

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कविता में भाषा की देशजता अगर बतौर रूढ़ि प्रयुक्त नहीं हुई है तो वह अपनी अवस्थिति को खाँटीपन या कहें उसकी बू-बास के साथ उद्घाटित करती है। एक कवि फूल पर कविता लिखते समय कमल, गुलाब या सूरजमुखी जैसे फूलों के ऊपर ‘घेवड़ा के फूल’ को वरीयता देते हुए कविता लिखे तो उसकी चयन-प्राथमिकता और सौन्दर्य-बोध को समझा जा सकता है। यह न सर्वविदित फूल है और न ही अलौकिक सौन्दर्य वाला। यह एक अलक्षित देशज फूल है ‘गुमशुदा कुल-ख़ानदान का’। दरअसल सन्तोष कुमार चतुर्वेदी की कविता अलक्षित, उपेक्षित और नगण्य अस्मिताओं को काव्य-वृत्त में लाने का उपक्रम करती है। एक तरह से सन्तोष कुमार चतुर्वेदी की कविताई की यह केन्द्रीय प्रवृत्ति है। पूर्व में भी उनकी कविताओं में उपेक्षितों और अलक्षितों को प्रमुखता से जगह मिली है। ‘बथुआ’, ‘पासंग’, ‘खाट बीनने वाले’ जैसी कविताओं को भुलाया नहीं जा सकता। ‘घेवड़ा के फूल’ और ‘स्टेपनी’ जैसी कविताएँ, कविता के रूप में इन्हीं सरोकारों का विस्तार है। ‘निर्वात के लिए कोई जगह नहीं’ संग्रह की कविताएँ बेहतर मनुष्य गढ़ने की सदिच्छाएँ और चिन्ताएँ लिए हुए हैं। कवि को मनुष्यता को बचाए रखने का भरोसा अपनी ही दुनिया में मस्त-व्यस्त रहने वालों पर न होकर उन पर है जिनमें ‘पागलपन की हद तक जाने का जज़्बा है’। ऐसी ही मनुष्यता के साँचों की निर्मिति का रूपक है ‘ब्लैक बोर्ड’ कविता। नई पौध को अनवरत पानी देते रहने सा। इन कविताओं में विषय विविधता है। इनमें मृत्यु के बाद निर्वात समय को, अपने अवदान से पूरते नामवर व्यक्तित्व हैं तो युवा लेखक विजय गौड़ की वह असामयिक मृत्यु भी है जो जीवन-मृत्यु के फ़लसफ़े को व्याख्यायित करती है। सन्तोष भाषा के जटिल विन्यास से विरत रहते हुए सहज सम्प्रेषण की भाषा का प्रयोग करते हैं। इन कविताओं में समय सापेक्षता के साथ-साथ समाज सापेक्षता है। यह कविता-संग्रह उनकी काव्य यात्रा में एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव सिद्ध होगा। —हरीश चन्द्र पाण्डे

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कविता में भाषा की देशजता अगर बतौर रूढ़ि प्रयुक्त नहीं हुई है तो वह अपनी अवस्थिति को खाँटीपन या कहें उसकी बू-बास के साथ उद्घाटित करती है। एक कवि फूल पर कविता लिखते समय कमल, गुलाब या सूरजमुखी जैसे फूलों के ऊपर ‘घेवड़ा के फूल’ को वरीयता देते हुए कविता लिखे तो उसकी चयन-प्राथमिकता और सौन्दर्य-बोध को समझा जा सकता है। यह न सर्वविदित फूल है और न ही अलौकिक सौन्दर्य वाला। यह एक अलक्षित देशज फूल है ‘गुमशुदा कुल-ख़ानदान का’। दरअसल सन्तोष कुमार चतुर्वेदी की कविता अलक्षित, उपेक्षित और नगण्य अस्मिताओं को काव्य-वृत्त में लाने का उपक्रम करती है। एक तरह से सन्तोष कुमार चतुर्वेदी की कविताई की यह केन्द्रीय प्रवृत्ति है। पूर्व में भी उनकी कविताओं में उपेक्षितों और अलक्षितों को प्रमुखता से जगह मिली है। ‘बथुआ’, ‘पासंग’, ‘खाट बीनने वाले’ जैसी कविताओं को भुलाया नहीं जा सकता। ‘घेवड़ा के फूल’ और ‘स्टेपनी’ जैसी कविताएँ, कविता के रूप में इन्हीं सरोकारों का विस्तार है।
‘निर्वात के लिए कोई जगह नहीं’ संग्रह की कविताएँ बेहतर मनुष्य गढ़ने की सदिच्छाएँ और चिन्ताएँ लिए हुए हैं। कवि को मनुष्यता को बचाए रखने का भरोसा अपनी ही दुनिया में मस्त-व्यस्त रहने वालों पर न होकर उन पर है जिनमें ‘पागलपन की हद तक जाने का जज़्बा है’। ऐसी ही मनुष्यता के साँचों की निर्मिति का रूपक है ‘ब्लैक बोर्ड’ कविता। नई पौध को अनवरत पानी देते रहने सा। इन कविताओं में विषय विविधता है। इनमें मृत्यु के बाद निर्वात समय को, अपने अवदान से पूरते नामवर व्यक्तित्व हैं तो युवा लेखक विजय गौड़ की वह असामयिक मृत्यु भी है जो जीवन-मृत्यु के फ़लसफ़े को व्याख्यायित करती है। सन्तोष भाषा के जटिल विन्यास से विरत रहते हुए सहज सम्प्रेषण की भाषा का प्रयोग करते हैं। इन कविताओं में समय सापेक्षता के साथ-साथ समाज सापेक्षता है। यह कविता-संग्रह उनकी काव्य यात्रा में एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव सिद्ध होगा।
—हरीश चन्द्र पाण्डे

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2026
ISBN-13
9789377373900
Pages
151
Reading time
~5 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
12.5 × 20 cm
Language
Hindi

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