Geet-Farosh

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दूसरा सप्तक के प्रथम कवि, भवानी प्रसाद मिश्र की यह पहली पुस्तक थी जिसका प्रकाशन 1956 में हुआ था। भाषा की सादगी और जीवन-जगत से जुड़ी सहज भावनाओं की छन्दबद्ध अभिव्यक्ति के चलते इस संग्रह ने अपने समय की हिन्दी कविता को एक नया मोड़ दिया था। इस संग्रह में शामिल शीर्षक कविता ‘गीत-फ़रोश’ आज तक उतनी ही लोकप्रिय है जितनी उस समय थी। विचार से गांधीवादी भवानी प्रसाद मिश्र मानते थे कि कविता की रचना उसी भाषा में होनी चाहिए जिस भाषा का प्रयोग आम जनजीवन में जनसाधारण करता है। ‘जिस तरह तू बोलता है उस तरह तू लिख’ कहने वाले इस कवि ने अपनी पूरी रचना-यात्रा में इस संकल्प का निर्वाह किया। ‘गीत-फ़रोश’ की कविताओं में प्रकृति और जीवन का प्राकृतिक उदात्त भाव बिना किसी अवरोध के जल-धारा की तरह प्रवाहित होता है; लेकिन वह जीवन के जटिल भावबोध को, आशा-निराशा-असमंजस को अनदेखा नहीं करता। किसान-जीवन के दुख, निर्बल जन की नाउम्मीदी और पीड़ा का आख्यान भी इन कविताओं में अपने पूरे आवेग के साथ आता है। लेकिन ये कविताएँ उम्मीद को हाथ से नहीं जाने देतीं, यही इनकी शक्ति है जो आज तक इन्हें जीवित रखे हुए हैं— मुझे विश्वास है, शाश्वत नहीं है वेदना कोई, उसे फिर प्राण मिलते हैं कि जिसने चेतना खोई।

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ISBN
9789377373757
Pages
200
Avg Reading Time
7 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

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दूसरा सप्तक के प्रथम कवि, भवानी प्रसाद मिश्र की यह पहली पुस्तक थी जिसका प्रकाशन 1956 में हुआ था। भाषा की सादगी और जीवन-जगत से जुड़ी सहज भावनाओं की छन्दबद्ध अभिव्यक्ति के चलते इस संग्रह ने अपने समय की हिन्दी कविता को एक नया मोड़ दिया था।
इस संग्रह में शामिल शीर्षक कविता ‘गीत-फ़रोश’ आज तक उतनी ही लोकप्रिय है जितनी उस समय थी।
विचार से गांधीवादी भवानी प्रसाद मिश्र मानते थे कि कविता की रचना उसी भाषा में होनी चाहिए जिस भाषा का प्रयोग आम जनजीवन में जनसाधारण करता है। ‘जिस तरह तू बोलता है उस तरह तू लिख’ कहने वाले इस कवि ने अपनी पूरी रचना-यात्रा में इस संकल्प का निर्वाह किया।
‘गीत-फ़रोश’ की कविताओं में प्रकृति और जीवन का प्राकृतिक उदात्त भाव बिना किसी अवरोध के जल-धारा की तरह प्रवाहित होता है; लेकिन वह जीवन के जटिल भावबोध को, आशा-निराशा-असमंजस को अनदेखा नहीं करता। किसान-जीवन के दुख, निर्बल जन की नाउम्मीदी और पीड़ा का आख्यान भी इन कविताओं में अपने पूरे आवेग के साथ आता है। लेकिन ये कविताएँ उम्मीद को हाथ से नहीं जाने देतीं, यही इनकी शक्ति है जो आज तक इन्हें जीवित रखे हुए हैं—
मुझे विश्वास है, शाश्वत नहीं है वेदना कोई,
उसे फिर प्राण मिलते हैं कि जिसने चेतना खोई।

Book Details

  • ISBN
    9789377373757
  • Pages
    200
  • Avg Reading Time
    7 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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