Mrigtrishna
(0)
Author:
Jagdish Prasad SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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वह खिल-खिलाकर हँस पड़ी। रात के उस शांत वातावरण में उसकी हँसी मूर्त संगीत की तरह गंगा की लहरों पर फैल गयी। वह बोली—“उदय, तुम इतने भोले हो कि कभी-कभी मुझे अपने आप से घृणा होने लगती है। तुम भोले ही नहीं, अंधे भी हो। आखिर तुमने मेरे अन्दर क्या पाया है कि मुझसे प्रेम करने लगे हो ? मैं तुम्हारे योग्य नहीं हूँ, मेरे प्यारे। मैं तुम्हारे आदर्शों के सामने टिक नहीं सकती। मैं एक साधारण औरत हूँ। प्रयत्न करके भी मैं उस ऊँचाई पर नहीं पहुँच सकती जहाँ मुझे उठाने की कोशिश तुम करते हो। तुम्हें शायद यह जानकर आश्चर्य होगा कि मैं उस ऊँचाई तक पहुँचना चाहती भी नहीं। मुझे सिर्फ जीवन का आनन्द चाहिए, प्रेम का आदर्श नहीं। मैं यह नहीं कहती कि कोई गन्दगी के ढेर पर लोटे। मिस जोन्स के लिए मेरे हृदय में स्नेह है, आदर नहीं लेकिन एक आदर्श के लिए, एक ऐसी वस्तु के लिए जो अन्त में सिर्फ एक भ्रम भी साबित हो सकती है, मैं जिन्दगी के सुखों का बलिदान करने के लिए तैयार नहीं। सम्भव है उस आदर्श में कोई तथ्य हो; लेकिन इसकी भी उतनी ही सम्भावना है कि वह एक प्रवंचना-मात्र ही हो।"
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वह खिल-खिलाकर हँस पड़ी। रात के उस शांत वातावरण में उसकी हँसी मूर्त संगीत की तरह गंगा की लहरों पर फैल गयी। वह बोली—“उदय, तुम इतने भोले हो कि कभी-कभी मुझे अपने आप से घृणा होने लगती है। तुम भोले ही नहीं, अंधे भी हो। आखिर तुमने मेरे अन्दर क्या पाया है कि मुझसे प्रेम करने लगे हो ? मैं तुम्हारे योग्य नहीं हूँ, मेरे प्यारे। मैं तुम्हारे आदर्शों के सामने टिक नहीं सकती। मैं एक साधारण औरत हूँ। प्रयत्न करके भी मैं उस ऊँचाई पर नहीं पहुँच सकती जहाँ मुझे उठाने की कोशिश तुम करते हो। तुम्हें शायद यह जानकर आश्चर्य होगा कि मैं उस ऊँचाई तक पहुँचना चाहती भी नहीं। मुझे सिर्फ जीवन का आनन्द चाहिए, प्रेम का आदर्श नहीं। मैं यह नहीं कहती कि कोई गन्दगी के ढेर पर लोटे। मिस जोन्स के लिए मेरे हृदय में स्नेह है, आदर नहीं लेकिन एक आदर्श के लिए, एक ऐसी वस्तु के लिए जो अन्त में सिर्फ एक भ्रम भी साबित हो सकती है, मैं जिन्दगी के सुखों का बलिदान करने के लिए तैयार नहीं। सम्भव है उस आदर्श में कोई तथ्य हो; लेकिन इसकी भी उतनी ही सम्भावना है कि वह एक प्रवंचना-मात्र ही हो।"
Book Details
-
ISBN9788197834608
-
Pages168
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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आधुनिक भारतीय कथा - साहित्य में कहानी कहना बंगाल की कला है । प्रस्तुत रचना इस मान्यता का एक अच्छा उदाहरण है । धीरोदात्त नायक यहाँ नहीं है । है तो ढोड़ाय , जैसा मामूली नाम तैसा चरित , ततमा लोगों के पूरे सामाजिक संदर्भ में , जहाँ ' पक्की ' ( यानी पक्की सड़क ) आधुनिक जीवन और बाहरी तत्त्व को प्रतिकित करती है । यह ' पक्की ' ही पूरे उपन्यास को आदि से अंत तक जोड़े हुए है । जिस समाज में महज पक्की सड़क नयी रोशनी का प्रतीक हो , उसे आधुनिक संदर्भों में जोड़ना रचनात्मक और वैचारिक दोनों स्तरों पर ' कितना कठिन है , यह आसानी से समझा जा सकता है । पर प्रख्यात बंगला कथा - शिल्पी सतीनाथ भादुड़ी ने कलात्मक धीरज के साथ इस जोड़ को साधा है । यों एक बड़े कालगत अंतराल को कथाकार ने अपनी संवेदना से पूरा किया है । प्रसिद्ध बंगला उपन्यास ' ढोड़ाय चरितमानस ' हिंन्दी में प्रकाशित होने के पूर्व ही यहाँ विस्तृत चर्चा का विषय बना रहा है । तब हिंदी पाठक के मन में उसको लेकर अतिरिक्त उत्सुकता का होना स्वाभाविक है । ' मैला आँचल ' हिंदी के समकालीन क्लैसिकों में है । उसका मूल नक्शा यहाँ देखा जा सकता है , जिसे हिंदी के उपन्यासकार ने अपने ढंग से समृद्धतर किया है । यों हिंदी की आंचलिक कथा - धारा का एक स्रोत है । ' ढोड़ाय चरितमानस ' । इस दृष्टि से सामान्य से सामान्य पाठक और विशिष्ट से विशिष्ट शोधकर्ता के लिए यह कथा - कृति रोचक और उपयोगी सिद्ध होगी ।
Umrao Jaan Ada
- Author Name:
Mirza Hadi Ruswa
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उन्नीसवीं सदी की मशहूर तवायफ़ उमराव जान ‘अदा’ लखनऊ और आस-पास के इलाक़ों की ख़ास महफ़िलों की रौनक़ हुआ करती थी। उसकी ख़ूबसूरती, शोख़ अदाओं, नाच-गाने और शायरी के मद्दाहों में उस ज़माने के ख़ानदानी रईस, जोशीले नवाबज़ादे और नामी ग़ुण्डे तक शामिल थे। लेकिन फ़ैज़ाबाद के एक जमादार की बेटी अमीरन के मशहूर तवायफ़ उमराव जान बनने की कहानी काफ़ी अफ़सोसनाक है और पढ़ने वाले इसे पढ़ते हुए जज़्बाती हो उठते हैं। इस कहानी को मिर्ज़ा हादी रुस्वा ने इस तरह से बयान किया है कि उमराव जान की ज़िन्दगी के सफ़र का हर मंज़र हमारी आँखों के सामने ज़िन्दा हो उठता है। इस किताब को पहली बार 1899 में छापा गया था और उसके बाद से इस कहानी को कई बार किताबों और फ़िल्मों की शक्ल में सामने लाया जा चुका है मगर लोगों में इसकी दिलचस्पी आज भी बरक़रार है।
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