Yeh Kothewaliya
Author:
Amritlal NagarPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction1 Ratings
Price: ₹ 140
₹
175
Unavailable
आज के भारतीय समाज में वेश्याओं के जीवन का हिन्दी या किसी भी अन्य भारतीय भाषा में, यह पहला विश्लेषणात्मक अध्ययन है। श्री अमृतलाल नागर ने बहुत समीप से और बहुत ही सहानुभूति से इस जीवन को देखा है, जिसे आम तौर पर रंगीन और ऐयाशी से पूर्ण समझा जाता है, लेकिन जो संघर्ष और निराशाओं से वैसे ही भरा है, जैसे कि अन्य सामान्य जीवन। इस अध्ययन में किसी उपन्यास से भी अधिक रोचकता है और सत्य पर आधारित होने के करण इसकी प्रमाणिकता अद्धितीय है। भारतीय समाज के अध्येताओं के लिए एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पुस्तक।
ISBN: 9788180313134
Pages: 168
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: ‘सूरदास’ एक चरित्र नहीं, नायक है और इसी नायकत्व की सृष्टि के लिए सूरदास और ज्ञानसेवक ने उपन्यास में अपनी-अपनी भूमिकाएँ अदा की हैं। ‘सूरदास’ चौतरफ़ा भौतिक दृष्टि से पराजित होने के बाद भी सदा सुखी रहता है। उसके मन में कभी भी मैल नहीं आता। जीत-हार में भी, इस समान स्थिति में कोई अन्तर नहीं आता। उसने नीति का मार्ग कभी भी नहीं छोड़ा। अपने प्रतिद्वन्द्वी पर कभी भी धोखे से वार नहीं किया। इतना दीन-हीन होते हुए भी उसमें क्षमाशीलता और उदारता सदा बनी रहती है। स्पष्ट लगता है कि प्रेमचन्द अपने समय के संग्राम के लिए शलाका पुरुष की सृष्टि कर रहे हैं जो लोगों के लिए एक आदर्श नायक बन सकेगा। यह भी स्पष्ट है कि प्रेमचन्द तत्कालीन परिस्थिति में अपने देश की जनता के जीवन की एक ऐसी व्याख्या प्रस्तुत कर रहे थे जो देश को आज़ाद करने का सही मार्ग था। वस्तुत: देश की आज़ादी के लिए उस समय चल रहे क्रान्तिकारी मार्ग के स्थान पर देश को सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह के मार्ग पर ले जाना चाहते थे। यही कारण है कि उन्होंने ‘रंगभूमि' को यह महाकाव्यात्मक रूप प्रदान किया। यही कारण है कि सूरदास किसान दृष्टि का प्रतिनिधि होने के बावजूद एक चरित्र नहीं वरन् प्रेमचन्द द्वारा सृजित उनकी आदर्शवादी दृष्टि का महानायक है। कथावाचन से लेकर चरित्रांकन तक रंगभूमि का सृजन जैसे एक लेखक का आत्मसंवाद है। प्रेमचन्द ने बड़ी महारत के साथ गांधी जी के सत्याग्रह और अहिंसा सम्बन्ध सोच को औपचारिक रूप देकर सचमुच एक महान सृजन किया है। ऐसा वही कथाकार कर सकता है जिसके प्राणों में उसके देश की धरती और आदर्श समाए हुए हों।
Tajmahal Ke Ansu
- Author Name:
Sunil Vikram Singh
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Description:
ताजमहल के आँसू प्रेम का मार्मिक आख्यान है। उपन्यास की कथा दो स्तरों पर चलती है। एक स्तर पर है पूर्णेन्दु शेखर और मधुरिमा चटर्जी की प्रेम कहानी और दूसरा स्तर है पूर्णेन्दु शेखर, शेखर द्वारा रचित उपन्यास ‘ताजमहल’ के किरदारों का संसार। उपन्यास की कहानी दोनों स्तरों पर समानान्तर चलती है और पाठकों को कभी मुगल काल में ले जाती है तो कभी वर्तमान समय से साक्षात्कार कराती है। अतीत और वर्तमान के विस्तृत कैनवास पर रचित इस उपन्यास में पाठकों को बाँधे रखने की अद्भुत क्षमता है। इस लिहाज से यह उपन्यास पठनीयता को सुरक्षित रखते हुए शिल्पगत प्रयोग का अनूठा उदाहरण है।
अतीत से वर्तमान और इतिहास से कल्पना के बीच आवाजाही करता यह उपन्यास गहरे सामाजिक सरोकार और जनप्रतिबद्धता का भी परिचायक है। ताजमहल का डिजाइन बनाने वाले उस्ताद ईसा और शाहजहाँ की बेटी जहाँआरा की प्रेम कहानी को इस तरह प्रस्तुत किया गया है कि इसमें एक कलाकार का अन्तर्द्वन्द्व और उसकी पीड़ा भी अभिव्यक्त हो जाती है। प्रेम-कथा के आवरण में सामाजिक यथार्थ को उजागर करने वाला यह उपन्यास निश्चय ही पाठकों को पसन्द आयेगा।
—डॉ. दिनेश कुमार
Shakuntala
- Author Name:
Shantanu Kumar Aacharya
- Book Type:

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Description:
उड़िया के प्रख्यात कथाकार शांतनु कुमार आचार्य की कालजयी कृति है—‘शकुन्तला’। इसमें लेखक ने तेलंगाना की कृषक क्रांति की असफलता के कारणों के साथ-साथ उस क्षेत्र की तत्कालीन भौगोलिक, सामाजिक, राजनीतिक स्थितियों का बेबाकी से खुलासा किया है। “तेलंगाना में स्थित कौनुआँ एक पुराना गाँव है। संभव है यह गाँव उस प्राचीन ‘कण्वाश्रम’ से भी अधिक पुराना हो। क्या पता कौनुआँ का कण्व होने से पहले यहाँ मनुष्य के भाग्य-मंच पर हजारों-लाखों बार ‘शकुन्तला’ नाटक का अभिनय हुआ हो!” किंतु जिस समय का यह इतिहास है, उस समय कौनुआँ गाँव नक्सलियों का अड्डा बन चुका था। नक्सलियों की धर-पकड़, मार-काट, लूट-खसोट—पूरा माहौल रक्तरंजित था। बिना तहकीकात किए, शक के आधार पर ही निर्दोषों को सजा देने की जैसे पुलिस ने कसम खा ली थी! ऐसे समय में एक औरत नदी को पार कर, एकदम अकेली कौनुआँ गाँव में आ पहुँची ‘अप्सरा’ बनकर। उसी नगरी में जहाँ कभी ‘कण्व ऋषि’ का आश्रम था। वह अप्सरा कोई और नहीं, शकुन्तला ही थी, जो अपने पीहर आई थी।
लेकिन आज सबके सामने वह एक मुजरिम की तरह खड़ी थी—बेबस, गुमसुम ! नक्सलियों के निर्मम आत्मसमर्पण के लिए वह अप्सरा अपने-आपको जिम्मेदार ठहरा रही थी। उसे अच्छी तरह मालूम था कि आगे की दुर्घटना का क्या मतलब है। स्वयं उसने नक्सलियों को उकसाया था। जनता का मुकाबला करने को। “यह गुरिल्ला युद्ध छोड़ो। जैसे भी हो, हमें आखिरकार जनता का सामना तो करना पड़ेगा न। दुनिया में आज तक ऐसी कोई सामाजिक क्रांति सफल नहीं हो पाई, जो समाज से छिपकर संघटित हुई।” नक्सलियों को यही तर्क देकर अप्सरा हरा सकी थी। किंतु आज, अंतिम क्षण में उसके नेतृत्व और निर्देशन के कारण यह दुर्घटना हो रही है—यह सोचकर अप्सरा स्वयं को मुजरिम मान लेती है। ...अब वह अप्सरा नहीं रह गई। वह सिर्फ असीमा उपाध्याय है—एक सर्वोदय कार्यकर्ता।
तत्कालीन परिवेश को अपने जीवंत रूप में प्रस्तुत करनेवाली एक महान कथाकृति—‘शकुन्तला’।
Mukhara Kya Dekhe
- Author Name:
Abdul Bismillah
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Description:
‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ (1986) के प्रकाशन के ठीक दस वर्षों बाद आनेवाला अब्दुल बिस्मिल्लाह का यह उपन्यास अपनी महाकाव्यात्मक गरिमा के साथ एक ऐसे मुखड़े का रहस्योद्घाटन कर रहा है जो बाहर से बहुत भव्य है, पर भीतर से अत्यन्त कुरूप। ‘मुखड़ा क्या देखे’ की कथा भारतीय स्वाधीनता के कुछ बाद से लेकर इमरजेंसी तक फैली हुई है। इस पूरे दौर में देश के भीतर घटित सारी घटनाओं की छाप ग्रामीण जीवन पर किस रूप में पड़ी, उपन्यास की नींव इसी प्रश्न पर डाली गई है। लेखक यह स्पष्ट करता है कि देश-दुनिया में घटनेवाली बड़ी-बड़ी घटनाओं को बुद्धिजीवी और इतिहासकार जिस रूप में देखते हैं, गाँव के सामान्य लोग उसी रूप में नहीं देखते। उनके विचार और निष्कर्ष भले ही ग़लत होते हों, पर होते हैं ठोस। निस्सन्देह ‘मुखड़ा क्या देखे’ ऐतिहासिक उपन्यास नहीं है, लेकिन इसमें भारतीय इतिहास के अनेक बिन्दुओं की ऐसी व्याख्या है, जो इतिहास की पुस्तकों में नहीं मिलेगी।
‘मुखड़ा क्या देखे’ उपन्यास किसी विशेष गाँव या विशेष पात्रों की कथा न होकर सामान्य भारतीय जनमानस की कथा है। इस उपन्यास को बहुसंख्यक अथवा अल्पसंख्यक समाज की दृष्टि से भी नहीं देखा जा सकता। भारतवर्ष बहुजातीय, बहुधार्मिक और बहुभाषायी देश है। हिन्दी में ऐसे अनेक उपन्यास आए हैं, जो या तो बहुसंख्यक समाज की कहानी कहते हैं या फिर अल्पसंख्यक समाज की, लेकिन ‘मुखड़ा क्या देखे’ समग्र भारतीय समाज की कहानी कहता है, जिसमें सम्पन्न वर्ग के हिन्दू और मुसलमान दोनों मिलकर हिन्दू ‘परजा’ और मुसलमान ‘परजा’ का शोषण करते हैं।
अब्दुल बिस्मिल्लाह के लेखन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे जिस विषय पर लिखते हैं, उसमें आकंठ डूब जाते हैं। यही कारण है कि इस उपन्यास में जिस प्रामाणिकता के साथ उन्होंने मुसलमान रीति-रिवाज़ों का चित्रण किया है, उसी प्रामाणिकता के साथ हिन्दू और ईसाई समुदाय के रीति-रिवाज़ों का भी। अर्थात् पिछले बीस वर्षों में आए हिन्दी उपन्यासों में शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि हिन्दी में लिखा गया यह उपन्यास समूचे भारतीय समाज का प्रतिनिधित्व करता है। इसकी अन्तर्वस्तु और शिल्प पर ठेठ देसी रंगों एवं संस्कारों की गहरी छाप है।
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