Chakravyuh
(0)
Author:
Jagdish Prasad SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Historical-fiction₹
995
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“महाराज, जब मैं सुदेश की प्रजा को मिट्टी और फूस के मकानों में रहते देखती हूँ तो मुझे यह संगमरमर का महल काट खाने को दौड़ता है; जब मैं उन्हें सूखी रोटियाँ खाते देखती हूँ तो सोलह प्रकार के व्यंजन मुझे विषतुल्य लगते हैं। मैं भगवान शंकर से हमेशा यही प्राथना करती हूँ कि वह हमारी प्रजा को हर तरह से समृद्धि दें। महाराज, प्रजा की चिन्ता अक्सर रातों को मेरी नींद चुरा लेती है। राजधानी देवल के उत्तर देवदार वृक्षों के जंगल के बीच मैंने इसी उद्देश्य से एक तंत्रगृह बनवाया है कि मैं गुणियों और सिद्धों से उचित परामर्श कर सुदेश की जनता के कल्याण के लिए उचित उपाय ढूँढ़ सके। मैं जानती हूँ कि मेरे दुश्मन मेरे विरुद्ध गन्दे प्रचार करते रहते हैं। वे मुझे, एक साधारण को जो न बहुत लम्बी है और न बहुत नाटी, न बहुत मोटी है और न पतली, न बहुत गोरी है और न बहुत काली, अपने अमर्ष का शिकार बनाने पर तुले हैं। लेकिन मैं अपने सुख-दुख की चिन्ता कभी नहीं करती, और न इस बात की परवाह करती हूँ कि मेरे दुश्मन मेरे बारे में क्या सोचते हैं और कहते हैं। मैं या तो अपने अन्तःकरण की आवाज सुनती हूँ या सुदेश की साधारण जनता की, क्योंकि मैं जानती हूँ कि लोक-मंगल से बढ़कर अन्य कोई सुकर्म नहीं है।” —इसी पुस्तक से
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“महाराज, जब मैं सुदेश की प्रजा को मिट्टी और फूस के मकानों में रहते देखती हूँ तो मुझे यह संगमरमर का महल काट खाने को दौड़ता है; जब मैं उन्हें सूखी रोटियाँ खाते देखती हूँ तो सोलह प्रकार के व्यंजन मुझे विषतुल्य लगते हैं। मैं भगवान शंकर से हमेशा यही प्राथना करती हूँ कि वह हमारी प्रजा को हर तरह से समृद्धि दें। महाराज, प्रजा की चिन्ता अक्सर रातों को मेरी नींद चुरा लेती है। राजधानी देवल के उत्तर देवदार वृक्षों के जंगल के बीच मैंने इसी उद्देश्य से एक तंत्रगृह बनवाया है कि मैं गुणियों और सिद्धों से उचित परामर्श कर सुदेश की जनता के कल्याण के लिए उचित उपाय ढूँढ़ सके। मैं जानती हूँ कि मेरे दुश्मन मेरे विरुद्ध गन्दे प्रचार करते रहते हैं। वे मुझे, एक साधारण को जो न बहुत लम्बी है और न बहुत नाटी, न बहुत मोटी है और न पतली, न बहुत गोरी है और न बहुत काली, अपने अमर्ष का शिकार बनाने पर तुले हैं। लेकिन मैं अपने सुख-दुख की चिन्ता कभी नहीं करती, और न इस बात की परवाह करती हूँ कि मेरे दुश्मन मेरे बारे में क्या सोचते हैं और कहते हैं। मैं या तो अपने अन्तःकरण की आवाज सुनती हूँ या सुदेश की साधारण जनता की, क्योंकि मैं जानती हूँ कि लोक-मंगल से बढ़कर अन्य कोई सुकर्म नहीं है।”
—इसी पुस्तक से
Book Details
-
ISBN9788197834691
-
Pages344
-
Avg Reading Time11 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: ‘क्रान्तिवीर भगत सिंह : ‘अभ्युदय’ और ‘भविष्य’’ आज़ादी की लड़ाई, ख़ासकर इन्क़लाबी नौजवानों के संघर्ष की हक़ीक़त तलाशती कोशिश का नतीजा है। पुस्तक में शामिल पत्रिकाओं ‘अभ्युदय’ और ‘भविष्य’ की सामग्री हिन्दुस्तान की आज़ादी के संग्राम को ठीक से समझने के लिए बेहद ज़रूरी है। ‘अभ्युदय’ ने भगत सिंह के मुक़दमे और फाँसी के हालात पर भरपूर सामग्री छापी और 8 मई, 1931 को प्रकाशित उसका ‘भगत सिंह विशेषांक’ ब्रिटिश सरकार द्वारा ज़ब्त कर लिया गया। भगत सिंह के जीवन, व्यक्तित्व और परिवार को लेकर जो सामग्री ‘अभ्युदय’ व ‘भविष्य’ में छापी गई—विशेषतः भगत सिंह व उनके परिवार के चित्र—उसी से पूरे देश में भगत सिंह की विशेष छवि निर्मित हुई। ‘भविष्य’ साप्ताहिक इलाहाबाद से रामरख सिंह सहगल के सम्पादन में निकलता था। पहले पं. सुन्दरलाल के सम्पादन में ‘भविष्य’ निकलता था, जिसमें रामरख सिंह सहगल काम करते थे। 2 अक्टूबर, 1930 को गांधी जयन्ती पर रामरख सिंह सहगल ने, जो स्वयं युक्तप्रान्त कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य थे, ‘भविष्य’ साप्ताहिक का प्रकाशन शुरू किया। पहले अंक से ही भगत सिंह आदि पर सामग्री प्रकाशित कर, ‘भविष्य’ ने सनसनी फैला दी। ‘भविष्य’ में भगत सिंह की फाँसी के बाद के हालात का जीवन्त चित्रण हुआ है। ‘भविष्य’ और ‘अभ्युदय’ से कुछ चुनिन्दा चित्र इस किताब में शामिल किए गए हैं। सम्पादक प्रो. चमन लाल ने विलुप्तप्राय तथ्यों को इस पुस्तक में सँजोकर ऐतिहासिक कार्य किया है। वस्तुतः इस इन्क़लाबी वृत्तान्त को पढ़ना स्वतंत्रता की अदम्य जिजीविषा से साक्षात्कार करना है।
Varun te Bahirjee
- Author Name:
Ravi Amale
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- Description: हा शोध आहे बहिर्जी नाईक यांचा. छत्रपती शिवाजी महाराजांच्या हेरप्रमुखाचा आणि त्याच बरोबर शिवरायांच्या हेरसंस्थेचा. शिवरायांची ही हेरव्यवस्था कशी होती? तिचे स्वरूप कसे होते, तिची व्याप्ती किती होती? मुख्य म्हणजे त्यामागील विचार कोणता होता? अनेक प्रश्न. त्यांची उत्तरे शोधताना आपल्याला जावे लागते भारतीय राजनीतिच्या प्राचीन इतिहासात, हेरगिरीच्या प्राचीन परंपरांकडे, ऋग्वेद, रामायण, महाभारत, कौटिल्य, कामंदक, संत तिरुवळ्ळुवर, कृष्णदेवराय आणि अगदी कुराण आणि पैगंबरांकडेही. ‘वरुण ते बहिर्जी’ आख्यायिका, दंतकथा, फेककथा यापलीकडे जाऊन घेतलेला हा हेरगिरीच्या विचारप्रवाहाचा वेध. Varun te Bahirjee | Ravi Amale वरुण ते बहिर्जी । रवि आमले
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