Andha Ullu
Author:
Sadegh HedayatPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 159.2
₹
199
Unavailable
ईरान के ही नहीं, विश्व के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में गिने जाने वाले उपन्यास ‘अन्धा उल्लू’ का लेखन इसके लेखक ने बम्बई में अपने भारत प्रवास के दौरान किया था।</p>
<p>एक हताश व्यक्ति के भीतरी अँधेरे और उसे चारों तरफ़ से भींचकर रखे रहने वाली दुनिया के प्रति उसका क्षोभ इस उपन्यास के शब्द-शब्द में बिंधा है जिसे सुपरिचित कथाकार नासिरा शर्मा ने बड़े मनोयोग से मूल फ़ारसी से हिन्दी में प्रस्तुत किया है।</p>
<p>अपने असंगत अतियथार्थ में यह उपन्यास जहाँ हमें ख़ुद से दूर की कोई चीज़ लगता है, वहीं अपने उन्हीं विवरणों और प्रतिक्रियाओं में अपने बहुत क़रीब भी लगता है। संवेदनहीन ज्यामितिक आकृतियों से घिरे हमारे आधुनिक मनोजगत का वह स्याह विस्तार इसमें अंकित हुआ है, जहाँ पाँव रखने का साहस हम अक्सर नहीं कर पाते।</p>
<p>अथाह निराशा, भयावह दुःस्वप्नों, घोर अकेलेपन और मृत्युबोध के हौलनाक चित्रण के चलते ईरान में इस उपन्यास पर प्रतिबन्ध भी लगा जिसका एक कारण यह भी बताया जाता है कि इसे पढ़ने के बाद कुछ पाठकों ने अपना जीवन समाप्त करने के प्रयास भी किए। लेकिन इस उपन्यास में अभिव्यक्त सचाई को नकार पाना कभी सम्भव नहीं हुआ और समय के साथ ‘अन्धा उल्लू’ हरेक सजग संवेदनशील व्यक्ति के लिए एक अपरिहार्य पाठ के तौर पर अधिक से अधिक मान्य होता गया।
ISBN: 9789393603500
Pages: 120
Avg Reading Time: 4 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: अश्वत्थामा के माथे पर के सदा बहते घाव की तरह मनुष्य की पेशानी पर भी प्रकृति ने एकाकीपन का एक ज़ख़्म बड़ा है। इस ज़ख़्म को भरने के सफल-असफल प्रयासों का नाम जीवन है। सामाजिक क्षेत्र में, महत्त्वाकांक्षा का दामन थाम, कुछ कर गुज़रने की ललक इस घाव को किन्हीं अंशों में भरने में सहायक होती है। परन्तु मन के एकाकीपन का ज़ख़्म सदा रिसता रहता है। पारसी पृष्ठभूमि पर लिखे इस उपन्यास की नायिका खोर्शेद की छोटी-सी दुनिया कमज़ोर दिमाग़ माँ, प्यारे पेसी अंकल, आया मेरी तथा इब्राहीम पॉववाले तक सीमित है, जहाँ प्रेम एवं विश्वास से घिरी, वह अपने छोटे-छोटे सुखों को लेकर सन्तोष से जी रही है। जिस स्कूल में वह पढ़ी है, वहीं नौकरी पा जाना उसके सुख की पराकाष्ठा है। यहाँ उसका सम्पर्क होता है दो भाइयों से। केखुशरू यानी केकी, जो दफ़्तर में उसका बॉस है, और मीनोचेहेर या मीनू जो उसकी इच्छा, आकांक्षाओं का केन्द्र बिन्दु है। वक़्त आने पर उसे अपने जन्म की हक़ीक़त से अवगत कराया जाता है। यह जानकारी उसकी छोटी-सी दुनिया को क्षत-विक्षत कर देती है। जब वह कुछ सँभलती है तो पाती है कि अब न उसके पास कोई भूतकाल बचा है, न आगे कहीं भविष्य ही दिखाई देता है। पेसी अंकल, आया मेरी, इब्राहीम पॉववाला, सभी का साथ छूट जाता है। माँ को वह स्वयं अलग करती है। फिर एक दौर आता है जिसमें ज़िद और हिम्मत के बल पर वह नियति द्वारा, अपने हिस्से में बाँटी गई, इस असमानबाजी में, बाहरी पहलू पर तो विजय हासिल कर लेती है, पर आन्तरिक पहलू पर, प्राप्त अनुभव को ही लक्ष्य मानकर उसे अन्तत: समझौता करने के लिए विवश होना पड़ता है।
Dada Kamred
- Author Name:
Yashpal
- Book Type:

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Description:
‘दादा कामरेड’...यह उपन्यास लेखक की पहली रचना थी जिसने हिन्दी में रोमांस और राजनीति के मिश्रण का आरम्भ किया। यह उपन्यास बांग्ला उपन्यास सम्राट शरत् बाबू के प्रमुख राजनैतिक उपन्यास ‘पथेरदावी’ द्वारा क्रान्तिकारियों के जीवन और आदर्श के सम्बन्ध में उत्पन्न हुई भ्रामक धारणाओं का निराकरण करने के लिए लिखा गया था, परन्तु इतना ही नहीं यह श्री जैनेन्द्र की आदर्श नारी पुरुष की खिलौना ‘सुनीता’ का भी उत्तर है।
यशपाल के इस उपन्यास से चुटिया कर रूढ़िवाद के अन्ध अनुयायियों ने लेखक को क़त्ल की धमकी दी थी, परन्तु देश की प्रगतिशील जनता की रुचि के कारण ‘दादा कामरेड’ के न केवल हिन्दी में कई संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं बल्कि गुजराती, मराठी, सिन्धी और मलयालम में भी यह उपन्यास अनुवादित हो चुका है।
Tedhi Lakeer
- Author Name:
Ismat Chugtai
- Book Type:

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Description:
इस्मत चुग़ताई का यह उपन्यास कई अर्थों में बहुत महत्त्व रखता है। पहला तो ये कि यह उपन्यास इस्मत के और सभी उपन्यासों में सबसे सशक्त है। दूसरे, इस्मत को क़रीब से जाननेवाले, इसे उनकी आपबीती भी मानते हैं। स्वयं इस्मत चुग़ताई ने भी इस बात को माना है। वह स्वयं लिखती हैं, ‘‘कुछ लोगों ने ये भी कहा कि ‘टेढ़ी लकीर’ मेरी आपबीती है—मुझे ख़ुद आपबीती लगती है। मैंने इस नाविल को लिखते वक़्त बहुत कुछ महसूस किया है। मैंने शम्मन के दिल में उतरने की कोशिश की है, इसके साथ आँसू बहाए हैं और क़हक़हे लगाए हैं। इसकी कमज़ोरियों से जल भी उठी हूँ। इसकी हिम्मत की दाद भी दी है। इसकी नादानियों पर रहम भी आया है, और शरारतों पर प्यार भी आया है। इसके इश्क़–मुहब्बत के कारनामों पर चटखारे भी लिए हैं, और हसरतों पर दु:ख भी हुआ है। ऐसी हालत में अगर मैं कहूँ कि मेरी आपबीती है तो कुछ ज़्यादा मुबालग़ा तो नहीं...’’
‘टेढ़ी लकीर’ एक किरदारी उपन्यास है जैसे ‘उमरावजान अदा’। ‘टेढ़ी लकीर’ की कहानी शम्मन के इर्द–गिर्द घूमती नज़र आती है। शम्मन को चूँकि अच्छा माहौल और अच्छी तरबीयत नहीं मिली, इसी वजह से उसके अन्दर इतना टेढ़ापन पैदा हो गया जहाँ उसकी नज़र में मुहब्बत मुहब्बत नहीं रही, रिश्ते रिश्ते नहीं रहे, जीवन जीवन नहीं रहा। सब कुछ मज़ाक़ बनकर रह गया। शम्मन के किरदार का विश्लेषण किया जाए तो वह मनोविकारों का गुलदस्ता नज़र आएगी। इस किरदार के बारे में इस्मत ने एक इंटरव्यू में कहा था ‘‘...ये नाविल जब मैंने लिखा तो बहुत बीमार थी, घर में पड़ी रहा करती थी। इस नाविल की हीरोइन ‘शम्मन’ क़रीब–क़रीब मैं ही हूँ। बहुत–सी बातें इसमें मेरी हैं। वैसे आठ–दस लड़कियों को मैंने इस किरदार में जमा किया है, और एक लड़की को ऊपर से डाल दिया है। जो मैं हूँ। इस नाविल के हिस्सों के बारे में मैं सिर्फ़ इतना बता सकती हूँ कि कौन–से हिस्से मेरे हैं और कौन–से दूसरों के !...’’
इस उपन्यास को इस्मत चुग़ताई ने उन यतीम बच्चों के नाम समर्पित किया है जिनके अभिभावक जीवित हैं। दरअसल यह व्यंग्य है उन माता–पिताओं पर जो बच्चे तो पैदा कर लेते हैं पर पालन–पोषण ठीक से नहीं करते। इन्हीं कारणों से यह उपन्यास उर्दू भाषा में जितना लोकप्रिय हुआ, उम्मीद है हिन्दी के पाठकों में भी लोकप्रिय होगा।
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