Bhagirathi
(0)
Author:
Jagdish Prasad SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Contemporary-fiction₹
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“हर दस-पन्द्रह मिनटों में पचास-सौ लोगों की भीड़ जमा हो जाती। तब प्रेमशंकर कुर्मी से खड़ा हो जाता और उन्हें सम्बोधित करता- भाइयो और बहनो, आज हमारा देश एक महान् संकट में पड़ा है। हमारा पवित्र हिमालय आज घायल है, और उत्तर दिशा से पापी दुश्मन हमारी मातृभूमि को कैद करने का प्रयास कर रहा है। भाइयो और बहनो, हम यह कदापि नहीं होने देंगे। हम दुर्योधन की बाँहें काटकर द्रौपदी की मर्यादा की रक्षा करेंगे। हम अपना सर्वस्व देकर दुश्मनों को मातृभूमि से खदेड़ेंगे। आज हमारे सैनिकों को हथियार की जरूरत है। उन्हें बन्दूक चाहिए, तोप चाहिए, बम चाहिए, टैंक और हवाई जहाज चाहिए। हम अपने सारे गहने, सारा सोना-चाँदी, बेचकर अपने सैनिकों के लिए अच्छे-से-अच्छे हथियार खरीदेंगे ताकि वे विदेशियों को अपनी पवित्र मातृभूमि की सीमा से बाहर खदेड़ सकें। आप के बीच एक वीरांगना ने प्रण किया है कि वह तब तक प्रतिदिन सिर्फ एक शाम खाना खाएगी जब तक एक-एक विदेशी इस देश की धरती से खदेड़ नहीं दिया जाता। ” —इसी पुस्तक से
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“हर दस-पन्द्रह मिनटों में पचास-सौ लोगों की भीड़ जमा हो जाती। तब प्रेमशंकर कुर्मी से खड़ा हो जाता और उन्हें सम्बोधित करता- भाइयो और बहनो, आज हमारा देश एक महान् संकट में पड़ा है। हमारा पवित्र हिमालय आज घायल है, और उत्तर दिशा से पापी दुश्मन हमारी मातृभूमि को कैद करने का प्रयास कर रहा है। भाइयो और बहनो, हम यह कदापि नहीं होने देंगे। हम दुर्योधन की बाँहें काटकर द्रौपदी की मर्यादा की रक्षा करेंगे। हम अपना सर्वस्व देकर दुश्मनों को मातृभूमि से खदेड़ेंगे। आज हमारे सैनिकों को हथियार की जरूरत है। उन्हें बन्दूक चाहिए, तोप चाहिए, बम चाहिए, टैंक और हवाई जहाज चाहिए। हम अपने सारे गहने, सारा सोना-चाँदी, बेचकर अपने सैनिकों के लिए अच्छे-से-अच्छे हथियार खरीदेंगे ताकि वे विदेशियों को अपनी पवित्र मातृभूमि की सीमा से बाहर खदेड़ सकें। आप के बीच एक वीरांगना ने प्रण किया है कि वह तब तक प्रतिदिन सिर्फ एक शाम खाना खाएगी जब तक एक-एक विदेशी इस देश की धरती से खदेड़ नहीं दिया जाता। ”
—इसी पुस्तक से
Book Details
-
ISBN9788197802256
-
Pages128
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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राजू शर्मा मन:स्थितियों की महीन डिटेल्स से अपने कथा-पात्रों का व्यक्तित्व रचते हैं। कहानी को सरपट इतिसिद्धम तक ले आनेवाले कथाकारों से अलग उनकी कहानी एक पूरा वातावरण बुनती हुई चलती है, असंख्य सच्चाइयों का एक विस्तृत ताना-बाना जिसका हर रेशा किसी साधारण कथाकार के लिए एक अलग कहानी या उपन्यास का विषय बन जाए। इसी गझिन बुनावट में उनका कथा-रस निवास करता है जिसमें पाठक उनके पात्रों के साथ अपने ख़ुद के मन की कई परतों को भी आकार लेते महसूस करता है। यह कथा जतिन की है जिसके साथ कथावाचक राघव का रिश्ता कुछ इस तरह से जटिल है: 'एक क्षण के लिए कल्पना कीजिए कि अचानक एक अजनबी सामने प्रकट होता है, जो तीस साल पहले तुम्हारा कॉलेज का सहपाठी था, आम दोस्ती थी...स्वाभाविक था तुम उसे भूल गए। अब वह सामने खड़ा है और एक निरीह नग्नता से अपना नाम, पता बतला रहा है। जैसे ही तुमने उसे पहचाना, एक स्मरण ने तुम्हें बाँध लिया : एक तस्वीर, अधखुले दरवाज़े का एक फ्रेम, जिसके पीछे यही शख़्स तुम्हारी प्रेमिका को बाँहों में बाँधे चूम रहा था।’ सालों बाद हुई इस मुलाक़ात के बाद धीरे-धीरे उसका एक नया रूप सामने आता है। वह बताता है कि उसे कहानी लिखने का वायरस लग गया। वह कहानियाँ लिखता है जो सच हो जाती हैं। वह उसे अपनी कहानियाँ सुनाता है और फिर कहता है... ‘डॉ. राघव रे, प्लीज़ सेव मी, आई एम सिंकिंग।’ ‘उसकी मनोदशा सामान्य नहीं थी, वह बीमार था और नहीं भी था। पर उसका स्वास्थ्य बिगड़ता चला गया...अन्त में एक वक़्त आया जब जतिन गम्भीर हालत में अस्पताल में भरती हुआ।’ लेकिन फिर एक दिन वह अस्पताल से ग़ायब हो गया...
Poorva Sandhya
- Author Name:
Dinesh Kapoor
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अमित बोला, ‘‘कुछ खास नहीं। अभी तक तो रजाई में ही था। अब सोच रहा था, क्या करूँ!’’ विधू ने पूछा, ‘‘कॉलेज नहीं आना?’’ अमित बोला, ‘‘मन नहीं कर रहा।’’ विधू ने पूछा, ‘‘क्यों?’’ अमित बोला, ‘‘यूँ ही।’’ विधू ने पूछा, ‘‘मन क्या कर रहा है?’’ अमित बोला, ‘‘कुछ नहीं। पता नहीं क्या करने को मन कर रहा है! लगता है, आई नीड एन आऊटिंग बैडली।’’ विधू ने कहा, ‘‘दैन व्हाई डोंट यू गो?’’ अमित बोला, ‘‘आई थिंक, आई विल...।’’ फिर सहसा बोला, ‘‘तुम्हारी क्लासिस कब तक हैं?’’ विधू ने कहा, ‘‘क्लासिस का क्या है, खत्म हो जाएँगी।’’ अमित ने जिद की, ‘‘बताओ न!’’ विधू ने कहा, ‘‘एक बजे तक।’’ अमित बोला, ‘‘अभी 11.30 बजे हैं। डेढ़ घंटा है।’’ फिर कुछ सोचकर बोला, ‘‘क्लासिज के बाद चलो चलते हैं।’’ विधू ने पूछा, ‘‘कहाँ?’’ अमित बोला, ‘‘पता नहीं। आई रियली डोंट नो। लैट अस सी। अभी तैयार होने में एक-डेढ़ घंटा लगेगा, फिर देखते हैं। लेकिन मैं कॉलेज नहीं आऊँगा।’’ इसी उपन्यास से वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों तथा आज के परिवेश पर दृष्टि डालना पठनीय उपन्यास, जो पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के बीच एक तादात्म्य स्थापित करने की पहल करेगा। "
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