Shankh-Nad
(0)
Author:
Jagdish Prasad SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
695
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Available
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‘शंख-नाद’ संग्रह की कहानियों की रचना किसी एक काल-खंड में नहीं हुई। लेकिन कतिपय विशेषताएँ इनमें समान रूप से विद्यमान हैं, और ये विशेषताएँ इन्हें हिन्दी के अन्य कथाकारों की कहानियों से अलग करती हैं। इनकी एक विशेषता यह है कि यद्यपि इनमें भारतीय समाज के एक युग की तसवीर है, यह तसवीर देश और काल की सीमाओं को पार कर सार्वभौमिक और सर्वयुगीन हो जाती है। हर कहानी का एक अलग कथ्य है, जो पूरी तरह से भारतीय समाज के यथार्थ को प्रतिच्छवित करता है; लेकिन पात्रों का जो व्यक्तित्व उभरता है, वह मानव-चरित्र के उस यथार्थ को प्रतिच्छवित करता है जो हर भूमि और हर काल में अपरिवर्तित रहता है।</p> <p>इन पात्रों के चित्रण में कहानीकार उतना ही तथ्यपरक है जितना ईश्वर अपनी सृष्टि में है। इससे पाठक पर स्वयमेव एक दायित्व आ जाता है; वह अपने-आपको आनन्द की तलाश करने वाले एक दर्शक के साथ-साथ उचित-अनुचित में भेद करने वाले न्यायाधीश की भूमिका में पाता है। हिन्दी में ऐसी कहानियाँ कम हैं, और यह संग्रह कहानीकारों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बनेगा।
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‘शंख-नाद’ संग्रह की कहानियों की रचना किसी एक काल-खंड में नहीं हुई। लेकिन कतिपय विशेषताएँ इनमें समान रूप से विद्यमान हैं, और ये विशेषताएँ इन्हें हिन्दी के अन्य कथाकारों की कहानियों से अलग करती हैं। इनकी एक विशेषता यह है कि यद्यपि इनमें भारतीय समाज के एक युग की तसवीर है, यह तसवीर देश और काल की सीमाओं को पार कर सार्वभौमिक और सर्वयुगीन हो जाती है। हर कहानी का एक अलग कथ्य है, जो पूरी तरह से भारतीय समाज के यथार्थ को प्रतिच्छवित करता है; लेकिन पात्रों का जो व्यक्तित्व उभरता है, वह मानव-चरित्र के उस यथार्थ को प्रतिच्छवित करता है जो हर भूमि और हर काल में अपरिवर्तित रहता है।</p>
<p>इन पात्रों के चित्रण में कहानीकार उतना ही तथ्यपरक है जितना ईश्वर अपनी सृष्टि में है। इससे पाठक पर स्वयमेव एक दायित्व आ जाता है; वह अपने-आपको आनन्द की तलाश करने वाले एक दर्शक के साथ-साथ उचित-अनुचित में भेद करने वाले न्यायाधीश की भूमिका में पाता है। हिन्दी में ऐसी कहानियाँ कम हैं, और यह संग्रह कहानीकारों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बनेगा।
Book Details
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ISBN9788197802201
-
Pages152
-
Avg Reading Time5 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: ज़िन्दगी दो चीज़ों की मोहताज होती है - एक रोटी का कौर और दूसरा सही दौर। जहां रोटी की अहमियत रोज़ महसूस होती है, वहीं दौर को समय की सुई इतना भगाती है कि बैठकर उसको महसूस करने या उसकी अहमियत समझने का वक़्त ही नहीं मिलता।इसी तरह हम अक्सर खुद से पूछते हैं कि कोई बात, कोई याद, कहीं हुआ एक वाकया या घटना मामूली सा तो था पर मुझे क्यों याद है। ऐसा क्या खास था इसमें? कुछ भी नहीं!यह शायद आपके दिमाग का आपसे बदला लेने का तरीका है कि मन को सुकून देने वाली ज़िन्दगी की अहम बातों को याद नहीं रखोगे, तो फिर भुगतो! या शायद उसकी नम्र अर्जी है कि साहब जी/मैडम जी, बहुत भाग लिए ज़िन्दगी में, कभी तो ठहरकर अपनी संजोई यादों को निहारो!इन कहानियों में ऐसे बारीक लम्हों को पिरोने की कोशिश की है। मुझे नहीं पता कि आपकी ज़िन्दगी में कौनसा दौर चल रहा है पर मैं उम्मीद करता हूं कि इन कहानियों को पढ़ने के बाद आप ऐसे लम्हों की डोर पकड़े, हर दौर में अपने दिल को दिलासा देंगे - मोहित शर्मा
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