Padhate Sunate Dekhate
(0)
Author:
Devendra Raj AnkurPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
995
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यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि हिन्दी परिदृश्य में देवेन्द्र राज अंकुर हमारे समय के सबसे विश्वसनीय और सक्रिय रंग-चिन्तक हैं। वे जिस दृष्टि से समकालीन रंगकर्म को देख रहे हैं, वह कहीं से उधार ली हुई नहीं, उनके अपने रंगानुभव से अर्जित की हुई है। अपनी बात को वे आम पाठक के, तक़रीबन बातचीत के, मुहावरे में कहते हैं। शायद यही कारण है कि रंगमंच के छात्र, रंगकर्मी, दर्शक और सामान्य पाठक—सभी उन्हें बड़े प्रेम और भरोसे के साथ पढ़ते रहे हैं। हिन्दी में रंगमंच विषयक अच्छी और समकालीन सरोकारों से लैस पुस्तकों के अभाव को भी उन्होंने काफ़ी हद तक पूरा किया है। यह पुस्तक नाटक के पाठ को पढ़ने, नाटककार की ज़बानी उसे सुनने और अन्त में निर्देशक के हाथों से गुज़रने के बाद देखने—इन तीनों चरणों से होकर गुज़रती है। कोई संवादपरक पाठ नाटक कैसे बनता है, अभिनेताओं द्वारा खेले गए किसी खेल को कब एक सफल प्रस्तुति कहा जाए, मंच के लिए अव्यावहारिक मानी जाती रही नाट्य रचनाएँ कैसे किसी कल्पनाशील निर्देशक के हाथों में आकर यादगार मंच रचनाएँ हो गईं और किन-किन व्यक्तियों ने बाक़ायदा संस्थाओं की हैसियत से भारतीय रंगमंच को नई पहचान व अस्मिता दी, उनकी रचना-प्रक्रिया क्या रही—यह सब पढ़ने-सुनने-देखने की विषयवस्तु है। कई विश्वविद्यालयों में थिएटर को एक विषय के रूप में पढ़ाया जाता है। इस लिहाज़ से यह पुस्तक ‘पढ़ते सुनते देखते’ विशेष महत्त्व रखती है। हमें पूरा विश्वास है कि सिद्धान्त और व्यवहार के बीच से अपना रास्ता तलाश करती यह पुस्तक उन सबके लिए उपादेय साबित होगी जो वर्तमान हिन्दी रंगमंच की सम्यक समझ हासिल करना चाहते हैं।
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यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि हिन्दी परिदृश्य में देवेन्द्र राज अंकुर हमारे समय के सबसे विश्वसनीय और सक्रिय रंग-चिन्तक हैं। वे जिस दृष्टि से समकालीन रंगकर्म को देख रहे हैं, वह कहीं से उधार ली हुई नहीं, उनके अपने रंगानुभव से अर्जित की हुई है। अपनी बात को वे आम पाठक के, तक़रीबन बातचीत के, मुहावरे में कहते हैं। शायद यही कारण है कि रंगमंच के छात्र, रंगकर्मी, दर्शक और सामान्य पाठक—सभी उन्हें बड़े प्रेम और भरोसे के साथ पढ़ते रहे हैं।
हिन्दी में रंगमंच विषयक अच्छी और समकालीन सरोकारों से लैस पुस्तकों के अभाव को भी उन्होंने काफ़ी हद तक पूरा किया है। यह पुस्तक नाटक के पाठ को पढ़ने, नाटककार की ज़बानी उसे सुनने और अन्त में निर्देशक के हाथों से गुज़रने के बाद देखने—इन तीनों चरणों से होकर गुज़रती है।
कोई संवादपरक पाठ नाटक कैसे बनता है, अभिनेताओं द्वारा खेले गए किसी खेल को कब एक सफल प्रस्तुति कहा जाए, मंच के लिए अव्यावहारिक मानी जाती रही नाट्य रचनाएँ कैसे किसी कल्पनाशील निर्देशक के हाथों में आकर यादगार मंच रचनाएँ हो गईं और किन-किन व्यक्तियों ने बाक़ायदा संस्थाओं की हैसियत से भारतीय रंगमंच को नई पहचान व अस्मिता दी, उनकी रचना-प्रक्रिया क्या रही—यह सब पढ़ने-सुनने-देखने की विषयवस्तु है। कई विश्वविद्यालयों में थिएटर को एक विषय के रूप में पढ़ाया जाता है। इस लिहाज़ से यह पुस्तक ‘पढ़ते सुनते देखते’ विशेष महत्त्व रखती है।
हमें पूरा विश्वास है कि सिद्धान्त और व्यवहार के बीच से अपना रास्ता तलाश करती यह पुस्तक उन सबके लिए उपादेय साबित होगी जो वर्तमान हिन्दी रंगमंच की सम्यक समझ हासिल करना चाहते हैं।
Book Details
-
ISBN9788126715978
-
Pages308
-
Avg Reading Time10 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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काव्य-भाषा सम्बन्धी चिन्तन समकालीन आलोचना के केन्द्र में आ गया है। हिन्दी में, इस विषय पर मौलिक दृष्टि से लिखी गई पुस्तकें बहुत कम हैं। प्रख्यात आलोचक डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी के आलोचनात्मक चिन्तन का प्रमुख प्रतिमान काव्य-भाषा रही है। इस पुस्तक में उन्हीं के लिखे हुए तीन निबन्ध संकलित हैं जिनकी हिन्दी आलोचना में प्रशंसा होती रही है।
इस विषय पर इन निबन्धों का ऐतिहासिक और वैचारिक महत्त्व है।
Meghdoot : Ek Adhyayan
- Author Name:
Kalidas +1
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महाकवि कालिदास की कालजयी कृति ‘मेघदूत’ सदियों से प्रेम और विरह की श्रेष्ठ अभिव्यक्ति के रूप में समादृत रही है।
संस्कृत साहित्य में ‘उपमा कालिदासस्य’ प्रसिद्ध उक्ति है ही और इस कृति में कालिदास की रचनात्मकता शिखर पर है। इसीलिए ‘मेघदूत’ शताब्दियों से काव्य का प्रतिमान रहा है। रसिकों-विज्ञजनों में महान कृतियों के विशेष अध्ययन की सुस्थापित परम्परा रही है ताकि कृतियों में निहित विशेष भावों, सन्दर्भों, उक्तियों-अन्योक्तियों, कथाओं-अन्तर्कथाओं का खुलासा कर रचना का पूरा आनन्द लिया जा सके, और यदि यह अध्ययन डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल जैसे इतिहास-संस्कृति-मर्मज्ञ का हो तो पाठक रचना-रस से आप्लावित हो उठेंगे।
डॉ. अग्रवाल ने स्वयं लिखा : ‘‘यह अध्ययन ‘मेघदूत मीमांसा’ के नाम से 1927 की शरद ऋतु में लिखा गया था। उस समय मैं यौवन के ललाम भाव से परिचित ही हुआ था और मेरा मन उसके अतिरेक सुखों की उस भावभूमि के लिए उन्मुक्त था, जो ‘मेघदूत’ काव्य का सनातन धरातल है। न जाने किस पूर्व पुण्य से काशी विश्वविद्यालय में जब मैं बी.ए. की शिक्षा प्राप्त कर रहा था, तब किसी एकान्त दिवस में स्वर्गिक ज्योति की कोई किरण मेरे मानस में वह अभिज्ञान ले आई, जिसने मेरे लिए इस काव्य का अर्थ ही बदल डाला और इसके स्थूल रूप को सूक्ष्म बाण से बेध दिया। उसने एक साथ ही अध्यात्म और श्रृंगार के नील-लोहित धनुष से ‘मेघदूत’ के भावलोक को जीतकर मुझे भी उसका नागरिक बना लिया।’’
अरसे से अनुपलब्ध इस कृति का प्रकाशन हमारा गौरव है और काव्य-रसिकों के लिए उल्लास का अवसर भी।
Hindi Sahitya : Ek Saral Parichay
- Author Name:
Suraiyya Sheikh
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इतिहास ग्रन्थों के अतिरिक्त हिन्दी साहित्य के विभिन्न कालखंडों, काल-रूपों और धाराओं पर अनेक शोध-प्रबन्ध एवं समीक्षात्मक ग्रन्थ प्रकाश में आए हैं। इनमें साहित्य के अनेक अज्ञात तथ्यों और अनिर्णीत प्रश्नों को नवीन दृष्टिकोण से नवालोक में प्रस्तुत किया गया है, किन्तु हिन्दी अनुसन्धान-जगत के इन नवीन निष्कर्षों और परिणामों का अतीव सतर्कतापूर्वक समन्वय एवं समाहितीकरण इतिहास-लेखन की दिशा में अभी शेष है। अतः नवीन शोध-परिणामों और विकसित साहित्य-चेतना के आलोक में हिन्दी साहित्य के इतिहास का पुनर्गठन और लेखन आवश्यक है। निस्सन्देह आज हिन्दी साहित्य के इतिहास में सम्बन्धित शताब्दिक पुस्तकें उपलब्ध हैं, किन्तु अभी तक इस दिशा में उचित व सन्तोषजनक प्रगति नहीं हुई है। हमने उस अभाव को दृष्टि में रखकर इस ग्रन्थ का प्रणयन किया है।
DIDDA : Kashmir Ki Yoddha Rani | दिद्दा : कश्मीर की योद्धा रानी
- Author Name:
Ashish Kaul
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यह कहानी इतिहास के मलबे में करीब 1200 सालों से दबी हुई थी। यह एक ऐसी कहानी है, जिसमें वीरता, पराक्रम, त्याग जैसे शब्द एक ऐसी स्त्री के साथ जुड़े हुए हैं, जिसने अपनी शारीरिक अपंगता को धता बताकर मध्यकालीन विश्व में इतिहास में सबसे लंबे समय तक राज किया, को महान् रानी के रूप में याद किया जाता है। यह कहानी है कश्मीर की योद्धा रानी ‘दिद्दा’ की, जिन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान कश्मीर को ऊँचाइयों तक पहुँचाया और मध्यकालीन एशिया का सबसे सशक्त राज्य बनाकर स्थापित किया। भगवान् ने दिद्दा को अलौकिक दिव्य शक्तियाँ प्रदान की थीं, वे बहुत बुद्धिमान थीं और एक असाधारण वक्ता भी। दिद्दा ने न सिर्फ अपनी विकलांगता पर विजय पाई, बल्कि अपने बिखरते साम्राज्य को एकजुट करके भी रखा। अपने 79 वर्ष के जीवनकाल में दिद्दा एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में निखरकर आईं, जिनके नाममात्र से ही दुश्मन काँपने लगते थे। दिद्दा कोई साधारण महिला नहीं थीं, पर इस बात में कोई शक नहीं कि उनका पूरा जीवनकाल असाधारणता की मिसाल रहा। ‘दिद्दा’ एक नाम भर नहीं है, बल्कि यह पर्याय है भारतीय नारी की अस्मिता का, गौरव का, संघर्ष का, त्याग का, पराक्रम का। ‘दिद्दा’ एक प्रेरणापुंज है जिससे हमारी आज की मातृशक्ति का भविष्य प्रकाशमान होगा।
DIDDA : Kashmir Ki Yoddha Rani | दिद्दा : कश्मीर की योद्धा रानी
Ashish Kaul
20% off₹ 300
₹ 240
Available
KASHMIR : Bharat-Pakistan Sambandhon ke Aaine Mein
- Author Name:
Sisir Gupta
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अगस्त-सितंबर 1965 में हुए भारत-पाकिस्तान युद्ध की मुख्य सीख यह थी कि प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देनेवाली अराजकता की पृष्ठभूमि में आज एक अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक व्यवस्था कार्यरत है, जो मँझली एवं छोटी शक्तियों को बल प्रयोग द्वारा मुद्दों के समाधान की अनुमति प्रदान नहीं करती है। आज की दुनिया में ऐसी अवस्था को दृष्टिगत करना कठिन है, जहाँ शत्रु को सफलतापूर्वक परास्त करने के उपरांत भारत अथवा पाकिस्तान में से किसी के भी द्वारा शांति की शर्तों का निर्धारण किया जाए। प्रस्तुत पुस्तक में भारत के विभाजन-काल की परिस्थितियों, जम्मू-कश्मीर राज्य के भारत में विलय मामले पर संयुक्त राष्ट्र में चर्चा, द्विपक्षीय वार्त्ताओं और इस मुद्दे पर महाशक्तियों के रुख तथा जम्मू-कश्मीर से धारा-370 हटने के बाद की बदली परिस्थिति, विकास कार्य एवं जम्मू- कश्मीर पुनरुत्थान आदि का विस्तृत और निष्पक्ष विवरण है। संबंधित पक्षों पर नेताओं, विशेषज्ञों की टिप्पणियाँ और प्रेस के उद्धरण पुस्तक को और भी पठनीय बनाते हैं। कश्मीर में रुचि रखने वाले शोधकर्ताओं, प्राध्यापकों के साथ-साथ अन्य पाठकों के लिए भी यह पुस्तक रोचक और ज्ञानवर्धक है।
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