Rang Kolaj
Author:
Devendra Raj AnkurPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Plays0 Ratings
Price: ₹ 476
₹
595
Available
रंग कोलाज रंगमंच के कुछ अनिवार्य सवालों पर उत्तेजक बहस छेड़ती है। इसमें अभिनेता, निर्देशक, नाट्य रचना, नुक्कड़ नाटक, कहानी मंचन के बहाने रंगमंच के बदलते स्वरूप और समीकरणों को कई स्तरों पर परखने की कोशिश की गई है। कुछ सैद्धान्तिक सवाल उठाए गए हैं तो दूसरी ओर प्रयोग के धरातल पर भी संवाद बनाने की शुरुआत की गई है।</p>
<p>साहित्य के अध्येता और सक्रिय रंगकर्मी देवेन्द्र राज अंकुर का यह अध्ययन हिन्दी रंगकर्म के विद्यार्थियों और सुधी पाठकों के लिए समान रूप से महत्त्वपूर्ण है। अभिनेता की रचना प्रक्रिया, भारतीय रंगमंच में एकल अभिनय, अभिनेता और दर्शक के आपसी सम्बन्ध, नुक्कड़ नाटकों के व्याकरण, उनकी परम्परा तथा नाटककार और निर्देशक के अन्तर्सम्बन्धों पर अपने अनुभवों के परिप्रेक्ष्य में प्रकाश डालने के अलावा इस पुस्तक में लेखक ने कृष्ण बलदेव वैद और काशीनाथ सिंह की रचनात्मकता पर भी एक रंगकर्मी-आलोचक की हैसियत से पर्याप्त प्रकाश डाला है।</p>
<p>विवेचनात्मक आलेखों के साथ-साथ इस पुस्तक में दो नाटकों के अनुवाद भी शामिल हैं, और, साथ ही महेश आनन्द द्वारा अंकुर जी से लिया गया एक साक्षात्कार भी जो इस पुस्तक की उपयोगिता को और ज़्यादा बढ़ा देता है।
ISBN: 9788126700110
Pages: 159
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Description:
style="font-weight: 400;">नई शताब्दी में बांग्ला नाट्याकाश में जिन नवीन नक्षत्रों का उदय हुआ है, व्रात्य बासु उनमें श्रेष्ठतम हैं। नाटककार, निर्देशक एवं अभिनेता—इन तीनों रूपों में उन्होंने आम जनता एवं बुद्धिजीवियों के मन-मस्तिष्क पर अपने चिन्तन एवं बुद्धिमत्ता की गहरी और स्थायी छाप छोड़ी है। व्रात्य का परिचय बांग्ला थिएटर के एकनिष्ठ संस्कृतिकर्मी के रूप में है। वे इस समय के जनसमादृत नाटककार हैं। राजनीतिक फैंटेसी, प्रकृति एवं मनुष्य तथा मनुष्य और मनुष्य के बीच के सम्बन्ध, कला और जीवन के मध्य का सम्बन्ध मूल्यबोधहीनता, क्रान्ति और प्रेम के बीच का द्वन्द्व, समय, सभ्यता एवं संस्कृति के बीच का द्वन्द्व आदि विविध समकालीन विषयों पर रचित व्रात्य बासु के नाटक जिस प्रकार एक के बाद एक सफलता के साथ मंचस्थ हुए हैं, उसी प्रकार उन्होंने आलोचकों के मन में भी जगह बनाई है।
इस पुस्तक में चार नाटक हैं, जिनमें आज का समय एवं मनुष्य के भीतर का अन्तर्द्वन्द्व मुखर हुआ है। यह समय अपनी सारी कुटिलताओं और अच्छाइयों के साथ इन नाटकों में उपस्थित है। व्रात्य बासु के ये नाटक निःसन्देह आज के समय की अमूल्य निधि हैं।
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