Vyangyaya Ke Rang
About the book
व्यंग्य के रंग—अशोक गुजराती मोबाइल पर धुन बजी—‘हैलो!’ उधर से तीर चला—‘मोहन है क्या?’ मैं चौंका—‘मोहन... यहाँ कोई मोहन नहीं है!’ उन पर कोई असर नहीं—‘आपका फोन नंबर क्या है?’ मुझे गुस्सा आ गया—‘राँग नंबर!’ लेकिन वे पीछा छोड़ने को तैयार नहीं—‘आप कौन बोल रहे हैं?’ मन हुआ, कहूँ—‘तेरा बाप!’ परंतु सभ्यता का तकाजा था, फोन बंद कर दिया। अब मैंने प्रिंटिंग प्रेस को लगाया। घंटी बजती रही तो घर पर मिलाया। पूछा, ‘प्रकाशजी हैं क्या?’ स्वर उभरा—‘कहिए क्या काम है, मैं उनका भाई बोल रहा हूँ।’ मेरी जिज्ञासा—‘मेरे कार्ड छप गए क्या?’ उनकी प्रतिजिज्ञासा—‘आपको कौन सी तारीख बताई थी?’ मैंने खुलासा किया—‘तारीख तो कल हो गई।’ उन्होंने आश्चर्य जताया—‘ऐसा क्या! फिर छप गए होंगे।’ मुझे खुशी हुई—‘तो मैं लेने आ जाऊँ?’ उन्होंने पानी फेर दिया—‘भई, यह तो आपको प्रकाश से ही पूछना पड़ेगा। वह मुंबई गया है। मेरी अलग दुकान है कपड़ों की।’—इसी संग्रह से सात्त्विक, जीवंत एवं रोचक शैली में लिखे अशोक गुजराती के ये व्यंग्य लेख बड़ी-से-बड़ी बात को सहज एवं मारक रूप में कह देने की क्षमता रखते हैं। ये व्यंग्य पाठक को गुदगुदाते ही नहीं, भरपूर मनोरंजन भी करते हैं।
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About the Book
व्यंग्य के रंग—अशोक गुजराती
मोबाइल पर धुन बजी—‘हैलो!’ उधर से तीर चला—‘मोहन है क्या?’ मैं चौंका—‘मोहन... यहाँ कोई मोहन नहीं है!’ उन पर कोई असर नहीं—‘आपका फोन नंबर क्या है?’ मुझे गुस्सा आ गया—‘राँग नंबर!’ लेकिन वे पीछा छोड़ने को तैयार नहीं—‘आप कौन बोल रहे हैं?’ मन हुआ, कहूँ—‘तेरा बाप!’ परंतु सभ्यता का तकाजा था, फोन बंद कर दिया। अब मैंने प्रिंटिंग प्रेस को लगाया। घंटी बजती रही तो घर पर मिलाया। पूछा, ‘प्रकाशजी हैं क्या?’ स्वर उभरा—‘कहिए क्या काम है, मैं उनका भाई बोल रहा हूँ।’ मेरी जिज्ञासा—‘मेरे कार्ड छप गए क्या?’ उनकी प्रतिजिज्ञासा—‘आपको कौन सी तारीख बताई थी?’ मैंने खुलासा किया—‘तारीख तो कल हो गई।’ उन्होंने आश्चर्य जताया—‘ऐसा क्या! फिर छप गए होंगे।’ मुझे खुशी हुई—‘तो मैं लेने आ जाऊँ?’ उन्होंने पानी फेर दिया—‘भई, यह तो आपको प्रकाश से ही पूछना पड़ेगा। वह मुंबई गया है। मेरी अलग दुकान है कपड़ों की।’—इसी संग्रह से
सात्त्विक, जीवंत एवं रोचक शैली में लिखे अशोक गुजराती के ये व्यंग्य लेख बड़ी-से-बड़ी बात को सहज एवं मारक रूप में कह देने की क्षमता रखते हैं। ये व्यंग्य पाठक को गुदगुदाते ही नहीं, भरपूर मनोरंजन भी करते हैं।
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Prabhat Prakashan
- Weight
- 200 grams
- ISBN-13
- 9788177211238
- Pages
- 160
- Reading time
- ~5 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14 × 21.5 cm
- Language
- Hindi
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Vyangyaya Ke Rang opens with a wrong number—an irritant that balloons into existential farce. Ashok Gujarati, one of Hindi literature's most incisive satirists, transforms the trivial into the telling: the stranger who refuses to hang up becomes a metaphor for the intrusions, evasions, and misconnections that define modern Indian middle-class existence. Through essays that observe misdirected phone calls, bureaucratic rituals, and social charades with forensic precision, Gujarati exposes not just bad manners but the contradictions of a society torn between aspiration and apathy. His prose is economical, his wit surgical—never merely funny, always diagnostic. Each piece in this collection begins in the recognizable and ends in revelation, making Vyangyaya Ke Rang essential reading for anyone who has ever laughed at India, only to realize the joke was on them.
Vyangyaya Ke Rang किताब को पढ़ते समय पाठक को कैसा अनुभव होता है?
यह किताब पढ़ते समय पाठक खुद को एक दर्पण के सामने पाता है—हँसी के साथ-साथ असहजता भी होती है। अशोक गुजराती की व्यंग्य शैली छोटी-छोटी घटनाओं को बड़े सामाजिक सवालों में बदल देती है। हर निबंध जहाँ शुरू होता है वहाँ खत्म नहीं होता; यह सोच को उकसाता है। पाठक रोजमर्रा की बेतुकी स्थितियों में गहरा अर्थ खोजना सीख जाता है।
Vyangyaya Ke Rang किताब किस तरह के पाठकों के लिए सबसे उपयुक्त है?
- जो पाठक सतही हास्य से आगे बौद्धिक व्यंग्य की तलाश में हैं
- जो आधुनिक भारतीय समाज की विसंगतियों को समझना चाहते हैं
- जिन्हें साहित्यिक व्यंग्य परंपरा में रुचि है
- जो मध्यवर्गीय जीवन की विडंबनाओं को पहचान सकते हैं
आज के भारतीय पाठकों के लिए इस किताब की सांस्कृतिक प्रासंगिकता क्या है?
गलत नंबर पर फोन करने वाला अजनबी आज भी उतना ही परिचित है जितना इस निबंध में। अशोक गुजराती की रचनाएँ यह दिखाती हैं कि तकनीक और शहरीकरण के बावजूद हमारे सामाजिक व्यवहार की जड़ें नहीं बदलीं। यह किताब समकालीन भारत की नकली शिष्टता, ढोंग और अव्यवस्था को उसी तीखेपन से उजागर करती है जो आज भी हमारे चारों ओर दिखता है।
Vyangyaya Ke Rang विषय पर अशोक गुजराती का दृष्टिकोण अन्य व्यंग्यकारों से कैसे अलग है?
अशोक गुजराती अतिशयोक्ति में नहीं, सूक्ष्म निरीक्षण में विश्वास रखते हैं। वे रोजमर्रा की एक छोटी घटना—जैसे गलत फोन कॉल—को इतनी बारीकी से खोलते हैं कि उसमें पूरा समाज दिखने लगता है। उनकी भाषा सरल लेकिन तीक्ष्ण है, और वे पाठक को हँसाते हुए सोचने पर मजबूर करते हैं। यह चीखकर आलोचना नहीं, बल्कि फुसफुसाकर सच कहने की कला है।
"Vyangyaya Ke Rang" किताब पढ़ने के बाद पाठक के मन में क्या रह जाता है?
पाठक के पास एक नई निगाह रह जाती है—रोजमर्रा की बेतुकी बातों में समाज की सच्चाई देखने की। हँसी के बाद एक हल्की बेचैनी बची रहती है जो आत्मनिरीक्षण की माँग करती है। यह किताब सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक समझ का एक उपकरण बन जाती है जो लंबे समय तक पाठक के साथ चलता है।
