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Author:
Srijan Pal Singh, G.S. Naveen KumarPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
350
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उत्तर प्रदेश—वह भूमि, जहाँ मानवीय कल्पनाएँ और दृढ निश्चय असाधारण कुशल श्रमिकों से लेकर किस्से बयान करते स्मारकों तथा विभिन्न धर्मों के संगम और भरपूर प्रकृति तक के विभिन्न रूप लेते हैं। ऐतिहासिक दस्तावेजों में उत्तर प्रदेश को मूल भारतीय सभ्यता का केंद्र बताया गया है। इसकी आध्यात्मिक प्राचीनता और अधिक गहरी है। बहुत से लोग इसे मनुष्य की उत्पत्ति के समय से पल्लवित होने पर विश्वास करते हैं। अपने प्रत्येक रूप में यह अनंत संभावनाओं की भूमि है। लखनऊ के निकट एक छोटा सा शहर अयोध्या, जो भगवान् विष्णु के अवतार श्रीराम की जन्म-स्थली है। पश्चिमी भाग में ताजमहल का शहर आगरा स्थित है। राजधानी दिल्ली तथा इसके उपनगर नोएडा व गाजियाबाद के निकट होने के चलते हाई-टेक उद्योग तथा आई.टी. व मीडिया कारोबार के पनपने से यहाँ भारतीयों की नई पीढ़ी की गहमागहमी रहती है। बनारस के गंगा घाट से पूर्व की ओर त्वरित गति से निर्मित हो रहे मॉल और पश्चिम की ओर सड़कों के ऊपर से लगभग उड़ती हुई शीघ्रगामी मेट्रो उत्तर प्रदेश में आधुनिकता व परंपरा की मिलन-स्थली का प्रतिनिधित्व करते हैं। आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे निर्विवाद रूप से देश का सबसे बेहतरीन सुपर हाई-वे है, जहाँ केवल कारें ही नहीं दौड़तीं, बल्कि लड़ाकू जेट विमान भी उतारे जा सकते हैं। उत्तर प्रदेश की विकास-गाथा है यह पुस्तक, जो इस प्रदेश के माहात्म्य और संभावनाओं को समग्रता में प्रस्तुत करती है।
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उत्तर प्रदेश—वह भूमि, जहाँ मानवीय कल्पनाएँ और दृढ निश्चय असाधारण कुशल श्रमिकों से लेकर किस्से बयान करते स्मारकों तथा विभिन्न धर्मों के संगम और भरपूर प्रकृति तक के विभिन्न रूप लेते हैं। ऐतिहासिक दस्तावेजों में उत्तर प्रदेश को मूल भारतीय सभ्यता का केंद्र बताया गया है। इसकी आध्यात्मिक प्राचीनता और अधिक गहरी है। बहुत से लोग इसे मनुष्य की उत्पत्ति के समय से पल्लवित होने पर विश्वास करते हैं। अपने प्रत्येक रूप में यह अनंत संभावनाओं की
भूमि है।
लखनऊ के निकट एक छोटा सा शहर अयोध्या, जो भगवान् विष्णु के अवतार श्रीराम की जन्म-स्थली है। पश्चिमी भाग में ताजमहल का शहर आगरा स्थित है। राजधानी दिल्ली तथा इसके उपनगर नोएडा व गाजियाबाद के निकट होने के चलते हाई-टेक उद्योग तथा आई.टी. व मीडिया कारोबार के पनपने से यहाँ भारतीयों की नई पीढ़ी की गहमागहमी रहती है। बनारस के गंगा घाट से पूर्व की ओर त्वरित गति से निर्मित हो रहे मॉल और पश्चिम की ओर सड़कों के ऊपर से लगभग उड़ती हुई शीघ्रगामी मेट्रो उत्तर प्रदेश में आधुनिकता व परंपरा की मिलन-स्थली का प्रतिनिधित्व करते हैं।
आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे निर्विवाद रूप से देश का सबसे बेहतरीन सुपर हाई-वे है, जहाँ केवल कारें ही नहीं दौड़तीं, बल्कि लड़ाकू जेट विमान भी उतारे जा सकते हैं।
उत्तर प्रदेश की विकास-गाथा है यह पुस्तक, जो इस प्रदेश के माहात्म्य और संभावनाओं को समग्रता में प्रस्तुत करती है।
Book Details
-
ISBN9789386300812
-
Pages232
-
Avg Reading Time8 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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तानाशाही एक व्यक्ति की महत्वाकांक्षा का नतीजा होती है या कुछ सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक परिस्थितियाँ होती हैं जो किसी एक व्यक्ति के रूप में खुद को प्रकट करती हैं? क्या समाजों और राष्ट्रों के जीवन में कोई ऐसा क्षण आता है जब जन-गण स्वयं आत्मघाती हो उठता है और आँख मूँदकर किसी अधिनायक के पीछे चल पड़ता है? आज इक्कीसवीं सदी के इतने पारदर्शी समय में तानाशाही क्या किसी नए रूप की तलाश करेगी; और इन सवालों की रोशनी में हम, जो दुनिया के लोकतान्त्रिक देशों में अग्रणी रहे हैं, खुद को कहाँ देखते हैं! ‘बीसवीं सदी के तानाशाह’ मोटे तौर पर इन्हीं सवालों के जवाब तलाश करती है; कहने की जरूरत नहीं कि आज हमारे सामने मौजूद सबसे अहम सवाल भी यही है। हिटलर, स्तालिन, मुसोलिनी, उत्तरी कोरिया के किम इल-सुंग, चिली के ऑगस्तो पिनोशे और युगांडा के ईदी अमीन पर केन्द्रित इस पुस्तक का हर अध्याय इन नेताओं के समय की आन्तरिक और विश्व-राजनीति के निर्णायक आयामों पर रोशनी डालते हुए बताता है कि ये लोग कैसे उठे, कैसे गिरे और दुनिया ने, दुनिया के विचारकों ने उन्हें कैसे देखा-समझा। इतिहास अध्येता के रूप में अशोक कुमार पाडेय इतिहास के उन अध्यायों को हिन्दी पाठक के समक्ष लाते रहे हैं जिनका सीधा सम्बन्ध हमारी मौजूदा और आवश्यक प्रश्नाकुलताओं से है। इस प्रक्रिया में विचार उनका सहगामी रहा है। यह किताब इस यात्रा का एक और पड़ाव है और पाठकों को निश्चय ही अपने समय को लेकर सोचने और अपना पक्ष चुनने में मदद करेगी।
Chandragupta Maurya Aur Uska Kaal
- Author Name:
Radhakumud Mukherji
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प्रो. राधाकुमुद मुखर्जी की गणना देश के शीर्षस्थ इतिहासकारों में होती है और परम्परागत दृष्टि से इतिहास लिखनेवालों में उनका महत्त्वपूर्ण स्थान है। प्रस्तुत पुस्तक में प्रो. मुखर्जी के वे भाषण हैं, जो उन्होंने सर विलियम मेयर भाषणमाला के अन्तर्गत मद्रास विश्वविद्यालय में दिए थे। इन निबन्धों में भारत के प्रथम सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के जन्म तथा प्रारम्भिक जीवन और उसके विजय-अभियानों की चर्चा करते हुए उन सारे कारकों का गहराई से अध्ययन किया गया है जो एक शक्तिशाली राज्य के निर्माण में और फिर उसे स्थायित्व प्रदान करने में सहायक हुए। चन्द्रगुप्त के कुशल प्रशासन और उसकी सुविचारित आर्थिक नीतियों की परम्परा अशोक के काल तक अक्षुण्ण रहती है। आर्थिक जीवन का राज्य द्वारा नियंत्रण तथा उद्योगों का राष्ट्रीयकरण मौर्यकाल की विशेषता थी। प्रो. मुखर्जी का यह अध्ययन चौथी शताब्दी ई.पू. की भारतीय सभ्यता के विवेचन-विश्लेषण के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इसमें कौटिल्य के अर्थशास्त्र की बहुत सारी ऐसी सामग्री का समुचित उपयोग किया गया है, जिसके सम्बन्ध में या तो काफ़ी जानकारी नहीं थी या जिसकी तरफ़ काफ़ी ध्यान नहीं दिया गया था। साथ ही, शास्त्रीय रचनाओं—संस्कृत, बौद्ध एवं जैन ग्रन्थों के मूल पाठों और अशोक के शिलालेखों—जैसे विभिन्न स्रोतों से लिए गए प्रमाणों का सम्पादन और तुलनात्मक अध्ययन भी यहाँ मौजूद है। भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति के अन्वेषक विद्वानों ने इस पुस्तक को बहुत ऊँचा स्थान दिया है और यह आज तक इतिहास के विद्यार्थियों, शोधार्थियों और प्राध्यापकों के लिए एक मानक ग्रन्थ के रूप में मान्य है।
Gandhi aur Nehru
- Author Name:
Deepak Malik
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भारत का राष्ट्रीय आन्दोलन वस्तुत: आम सहमतियों और व्यापक संयुक्त मोर्चों एवं सम्मिलित जन-आन्दोलन को लेकर राजनीतिशास्त्र की दुनिया में एक ‘नई गतिकी’ को निर्मित करता है, यह विश्व इतिहास में एक नई कड़ी है। गांधी विमर्श तो न केवल भारत में अपितु पूरे विश्व में बड़े दमख़म के साथ चल रहा है, पर जवाहरलाल के बारे में इस दौर में कुछ ही पुस्तकें बाज़ार में आ रही हैं, गांधी-नेहरू साझा विमर्श एक देर से ही सही लेकिन निहायत ही मौज़ूँ सिलसिला है। वैश्वीकरण के आक्रामक दौर में नेहरू जो एक स्वतंत्र वैकल्पिक अर्थतंत्र और राज्य सत्ता के स्थपति थे, उन्हें भुला देना अस्वाभाविक नहीं लगता है। इस दौर में मौजूदा राज्य सत्ता से लेकर प्रमुख विपक्ष तक ने वैश्वीकरण और उदारीकरण को स्वीकार कर लिया है। साम्प्रदायिकता की तस्वीर में भी 1992 और 2002 के बाद शताब्दियों से चल रही मुश्तरका संस्कृति में दीमक लग गई है। गांधी को तो वैश्वीकरण के स्टीमरोलर ने बेरहमी से ज़मींदोज़ कर दिया है। ऐसे दौर में गांधी-नेहरू के ऐतिहासिक साझा और उनके कृतित्व पर पुन: रोशनी पड़नी चाहिए। प्रस्तुत पुस्तक दो महान स्वप्नद्रष्टाओं की यथार्थसम्मत विचारधारा को सप्रमाण रेखांकित करती है।
Pracheen Bharat Ka Samajik Evam Arthik Itihas
- Author Name:
Om Prakash Prasad +1
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परम्परागत इतिहास लेखन राजनीतिक उथल-पुथल तक ही सीमित था। परन्तु पिछले कुछ दशकों से अतीत के समाज में झाँकने की कोशिशें तेज़ हुई हैं। राजा-महाराजाओं की जगह वंचितजनों को केन्द्र में रखकर इतिहास लिखने के जो प्रयत्न इधर हो रहे हैं, उनमें ओम् प्रकाश प्रसाद का योगदान भी उल्लेखनीय है। इस पुस्तक में उन्होंने प्राचीन भारत की सामाजिक स्थिति, आर्थिक दशा और सांस्कृतिक उपलब्धियों पर व्यापक रूप से प्रकाश डाला है। लेखक ने वर्णव्यवस्था और ब्राह्मण-क्षत्रिय संघर्ष के साथ-साथ प्राचीन भारत में शूद्रों की दशा पर भी विचार किया है और नगरीकरण तथा भारत-रोम व्यापार आदि के माध्यम से तत्कालीन आर्थिक हालात को सामने लाने का प्रयत्न किया है। लेखक ने इतिहास के विपुल स्रोतों और शोध-सन्दर्भों का उपयोग करते हुए ‘प्राचीन भारत का सामाजिक और आर्थिक इतिहास’ को व्यापक जानकारियों वाला बहुपयोगी ग्रन्थ बनाने का प्रयत्न किया है। कोई दो हज़ार वर्षों के भारतीय जनजीवन को जानने-समझने के लिए यह एक ज़रूरी पुस्तक है।
Kisan Aandolan : Dasha Aur Disha
- Author Name:
Kishan Patnayak +1
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किशन पटनायक की यह पुस्तक भारत के किसान आन्दोलन का उसके सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक और कुछ हद तक सांस्कृतिक आयामों में गहराई से विश्लेषण और मूल्यांकन प्रस्तुत करती है। लेखक की प्रतिष्ठा एक ऐसे समाजवादी चिन्तक और नेता के रूप में है जिसने उदारीकरण-ग्लोबीकरण यानी पूँजीवादी साम्राज्यवाद की सुचिन्तित समीक्षा तथा सतत विरोध किया है। इस पुस्तक में भी किसान आन्दोलन का विश्लेषण मुख्यतः उदारीकरण-ग्लोबीकरण की नीतियों के सन्दर्भ में किया गया है, जिनके चलते भारत की खेती-किसानी तबाही के कगार पर पहुँच गई है और लाखों किसान आत्महत्या कर चुके हैं। किसान जीवन पर आए इस अभूतपूर्व संकट के दौर में लेखक ने साम्राज्यवादी पूँजीवाद का प्रतिकार करने के लिए देश में एक स्वतंत्र किसान राजनीति के निर्माण, विकास और संगठन की ज़रूरत पर बल दिया है। किसान राजनीति के अभ्युदय के लिए ज़रूरी वैकल्पिक विचारधारा के सूत्र और संघर्ष के तरीके भी सुझाए हैं। पुस्तक की यह महत्त्वपूर्ण विशेषता है कि इसमें समाजवादी क्रान्ति के सन्दर्भ में किसान वर्ग की क्रान्तिकारी भूमिका स्वीकार की गई है, जो परम्परागत मार्क्सवादी सिद्धान्त के विपरीत मान्यता है। लेखक का इस विषय का निरूपण पर्याप्त ताज़गी-भरा, प्रेरणाप्रद और प्रामाणिक है, जिससे अध्ययन और शोध की नई ज़मीन तैयार होगी। उदारीकरण-ग्लोबीकरण की सबसे ज़्यादा मार झेल रहे किसानों के पक्ष में जूझनेवाले किसान नेताओं, अन्य परिवर्तनकारी आन्दोलनकारियों और बुद्धिजीवियों के लिए यह एक ज़रूरी किताब है।
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