Ek Rashtra-Ek Chunav
(0)
Author:
Anoop BaranwalPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
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एकसाथ चुनाव की अवधारणा के क्या-क्या सकारात्मक एवं नकारात्मक पहलू हैं; यह देश के आर्थिक-विकास एवं राजनैतिक-स्थिरता के लिए कितना उपयोगी है; इसे भारतीय संविधान में स्वीकृत संसदीय प्रणाली एवं संघीय ढाँचे के अन्तर्गत लागू करना कैसे सम्भव है; त्रिशंकु-विधायिका, अल्पमत-सरकार, अविश्वास-प्रस्ताव, राष्ट्रपति-शासन, आपातकाल इत्यादि से उपजने वाली चुनौतियों का समाधान क्या है, इन सवालों का जवाब देती ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ इस विषय पर एक प्रामाणिक पुस्तक है। पुस्तक में रामनाथ कोविन्द समिति की संस्तुतियों का गहन विश्लेषण करते हुए इन्हें और प्रभावशाली बनाने के उपाय सुझाए गए हैं। द्विचरण-निर्वाचन की संस्तुति को संघीय ढाँचे के अनुकूल बनाने, अविश्वास-प्रस्ताव, राष्ट्रपति-शासन, निर्वाचन-काल और निर्धारित-तिथि, स्थानीय इकाई निर्वाचन जैसे विषयों पर पुस्तक में दिए गए सुझाव संवैधानिक सुधार हेतु अतिमहत्त्वपूर्ण हैं। पुस्तक में उच्च स्तरीय समिति एवं विधि आयोग द्वारा व्यक्त विचारों व सुझावों का भी समालोचनात्मक विश्लेषण किया गया है। जनता द्वारा पाँच वर्ष के लिए निर्वाचित लोक सभा-विधान सभा को इतनी अवधि तक सुरक्षित बनाए रखने में और विशेष परिस्थिति में सेफ्टीवाल्व सरकार का गठन लोकतांत्रिक तरीके से करने में आर.वी.वी. प्रणाली कैसे उपयोगी है, और ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ की अवधारणा को कैसे अचूक एवं दोषरहित बनाया जा सकता है, इनपर इस पुस्तक में प्रस्तुत शोधकार्य राजनैतिक सुधार की दिशा में मील का पत्थर है।
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एकसाथ चुनाव की अवधारणा के क्या-क्या सकारात्मक एवं नकारात्मक पहलू हैं; यह देश के आर्थिक-विकास एवं राजनैतिक-स्थिरता के लिए कितना उपयोगी है; इसे भारतीय संविधान में स्वीकृत संसदीय प्रणाली एवं संघीय ढाँचे के अन्तर्गत लागू करना कैसे सम्भव है; त्रिशंकु-विधायिका, अल्पमत-सरकार, अविश्वास-प्रस्ताव, राष्ट्रपति-शासन, आपातकाल इत्यादि से उपजने वाली चुनौतियों का समाधान क्या है, इन सवालों का जवाब देती ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ इस विषय पर एक प्रामाणिक पुस्तक है।
पुस्तक में रामनाथ कोविन्द समिति की संस्तुतियों का गहन विश्लेषण करते हुए इन्हें और प्रभावशाली बनाने के उपाय सुझाए गए हैं। द्विचरण-निर्वाचन की संस्तुति को संघीय ढाँचे के अनुकूल बनाने, अविश्वास-प्रस्ताव, राष्ट्रपति-शासन, निर्वाचन-काल और निर्धारित-तिथि, स्थानीय इकाई निर्वाचन जैसे विषयों पर पुस्तक में दिए गए सुझाव संवैधानिक सुधार हेतु अतिमहत्त्वपूर्ण हैं। पुस्तक में उच्च स्तरीय समिति एवं विधि आयोग द्वारा व्यक्त विचारों व सुझावों का भी समालोचनात्मक विश्लेषण किया गया है।
जनता द्वारा पाँच वर्ष के लिए निर्वाचित लोक सभा-विधान सभा को इतनी अवधि तक सुरक्षित बनाए रखने में और विशेष परिस्थिति में सेफ्टीवाल्व सरकार का गठन लोकतांत्रिक तरीके से करने में आर.वी.वी. प्रणाली कैसे उपयोगी है, और ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ की अवधारणा को कैसे अचूक एवं दोषरहित बनाया जा सकता है, इनपर इस पुस्तक में प्रस्तुत शोधकार्य राजनैतिक सुधार की दिशा में मील का पत्थर है।
Book Details
-
ISBN9789377478506
-
Pages144
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIN
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‘गांधी का सैंतालीस’ यानी आज़ादी के साल में गांधी की कथा। वैसे तो यह कहानी गांधी के जीवन के आख़िरी साल की है, जो अक्टूबर, 1946 में उनकी नोआखाली यात्रा से शुरू होती है और वहाँ से बिहार, दिल्ली, कलकत्ता और फिर दिल्ली आकर जनवरी, 1948 में उनकी शहादत के साथ ख़त्म होती है। मगर यह उनके आख़िरी साल का रोज़नामचा नहीं है, यह उनकी आख़िरी लड़ाई की कहानी है। डायरेक्ट एक्शन के बाद भारत में साम्प्रदायिक दंगे शुरू हुए, जो बँटवारे के फ़ैसले पर मुहर लगने के बाद और बढ़ गए। इन दंगों ने लाखों की जान ली और करोड़ों को विस्थापित होने के लिए मजबूर कर दिया। उस समय एक गांधी ही थे, जो नफ़रत की इस आग को बुझाने में लगे थे। उन्हें बस एक ही चिन्ता थी कि इस देश की आत्मा कैसे बचे; वह देश जो पिछले तीस साल से अहिंसक तरीक़े से आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा था, आज़ादी के ठीक पहले हिंसा से भर उठा था। लोग अपने पड़ोसियों के ख़ून के प्यासे हो गए थे। इस लड़ाई में 77 साल के गांधी ने अपना सब कुछ झोंक दिया—नंगे पाँव यात्रा करते, पीड़ितों के ज़ख़्मों पर मरहम लगाते, उनके हृदय में साहस भरते और दंगाइयों को सच्चे हृदय से पश्चात्ताप करने के लिए प्रेरित करते हुए। उन्होंने संवाद, साहस और प्रेम के औज़ारों से यह लड़ाई लड़ी और अपने आख़िरी हथियार शहादत के ज़रिये इस महान लक्ष्य को हासिल किया। यह भी कहना ज़रूरी है कि यह कहानी गांधी के जीवन के इस सर्वश्रेष्ठ दौर की गौरवगाथा भर नहीं है। कोशिश की गई है कि यह कहानी हमारे सामने एक बोधपाठ की तरह खुले ताकि हम देख सकें कि क्या गांधी की इस आख़िरी लड़ाई के तौर-तरीक़ों में कुछ ऐसा भी है जिसे हम आज के भारत में प्रयोग कर सकें!
Prarthna-Pravachan : Vols. 1-2
- Author Name:
Mohandas Karamchand Gandhi
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महात्मा गांधी की हत्या दिल्ली में उनके प्रार्थना-सभा में जाते हुए हुई थी। लेकिन इस पर कम ध्यान दिया गया है कि गांधी जी ने प्रार्थना-सभा के रूप में अपने समय और स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान एक अनोखी नैतिक-आध्यात्मिक और राजनैतिक संस्था का आविष्कार किया था। थोड़े आश्चर्य की बात यह है कि आज भी यानी गांधी जी के सेवाग्राम छोड़े 70 से अधिक बरसों बाद भी वहाँ हर दिन सुबह-शाम प्रार्थना-सभा होती है : उसमें सभी धर्मों से पाठ होता है जिनमें हिन्दू, इस्लाम, ईसाइयत, बौद्ध, जैन, यहूदी, पारसी आदि शामिल हैं। दुनिया में, जहाँ धर्मों को लेकर इतनी हिंसा-दुराव-आतंक का माहौल है वहाँ कहीं और ऐसा धर्म-समभाव हर दिन नियमित रूप से होता हो, लगता या पता नहीं है। प्रार्थना-सभा में अन्त में गांधी जी बोलते थे। उनके अधिकांश विचार इसी अनौपचारिक रूप में व्यक्त होते थे। उनका वितान बहुत विस्तृत था। उन्हें दो खण्डों में प्रकाशित करना हमारे लिए गौरव की बात है। इसलिए भी रज़ा गांधी को भारत का बुद्ध के बाद दूसरा महामानव मानते थे। —अशोक वाजपेयी
Bharat Ka Samvidhan : Sankshipt Parichay
- Author Name:
Subhash Kashyap
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लोकतंत्र में हर नागरिक को अपने देश के संविधान को जानना चाहिए और समझना चाहिए कि वह किस प्रकार शासित हो रहा है। संविधान के मूल कर्तव्य सम्बन्धी भाग के अनुसार हर नागरिक का सबसे पहला कर्तव्य है संविधान का पालन करना। परन्तु उसका पालन करने के लिए संविधान को जानना ज़रूरी है। दुर्भाग्यवश हमारे देश में आज भी भयंकर संवैधानिक निरक्षरता है। ऐसी स्थिति में संविधान के बारे में जानकारी के प्रचार-प्रसार के लिए जो भी किया जा सके देश हित में होगा। इसी भावना के साथ सरल और सुगम शब्दों में लिखी गई यह संक्षिप्त पुस्तिका हमारे संविधान का संक्षिप्त परिचय देती है।
Vidrohi Mahatma
- Author Name:
Nandkishore Acharya
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गाँधी के लिए नैतिक ही आध्यात्मिक है, मनुष्य ईश्वर की साकार प्रतिच्छवि है और जीवन की दैनन्दिनी ही ईश्वर का कार्यकलाप। यही वह चीज है जो गाँधी की आध्यात्मिकता को धार्मिक पाखंड से अलग करके उसे व्यक्ति के नैतिक व आंतरिक उत्तरदायित्व से जोड़ देती है। लौकिक सन्दर्भों में उसे मानवसुलभ और व्यापक बना देती है। इस पुस्तक में नन्दकिशोर आचार्य गाँधी विषयक उन धारणाओं का उन्मूलन करते हैं जो गाँधी-विरोधियों के लिए लगभग फ़ैशन हो चली है। वे आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि कबीर को उनकी आध्यात्मिकता के बावजूद क्रान्तिकारी या विद्रोही मानने वाले विद्वान कबीर के समकक्ष, बल्कि अधिक व्यापक गाँधी की आध्यात्मिकता के चरित्र को क्यों नहीं समझ पाते? इसी तरह मार्क्स समेत अनेक विचारकों द्वारा हिंसा को स्वीकार्य मान लिए जाने के बावजूद, गाँधी द्वारा अहिंसा को एक अस्त्र के ही रूप में प्रस्तुत करना, उसे साधना खुद में एक क्रांतिकारी घटना थी जिसने मनुष्य के निज विवेक को समूह के अचिंतित आवेगों-उद्वेगों से ऊपर और अपेक्षाकृत ज़्यादा शक्तिशाली बताया, जो मानव के रचनात्मक पक्ष की उत्तरजीविता की ज्यादा भरोसेमंद गारंटी देता है। साध्य के मुक़ाबले साधन की पवित्रता पर ज़ोर देना, निर्बलतम के कल्याण को सभ्यता की कसौटी मानना और किसी भी विचार की पहली प्रयोग स्थली अपने ही जीवन और देह को बनाना—इन सबको भले ही आज वाचल और अर्थ-क्षरित जुमलेबाजियों ने घिस-घिसकर बेअसर कर दिया हो, लेकिन अपने मस्तिष्क की सफाई करके देखें तो ये सचमुच ही बड़े और क्रान्तिधर्मी विचार हैं जो हमारी जीवन तथा विश्वदृष्टि को आमूल बदल सकते हैं। गाँधी को एक नए सिरे से जानने के लिए इस पुस्तक को अवश्य पढ़ें।
Bisaveen Sadi Ke Tanashah
- Author Name:
Ashok Kumar Pandey
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तानाशाही एक व्यक्ति की महत्वाकांक्षा का नतीजा होती है या कुछ सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक परिस्थितियाँ होती हैं जो किसी एक व्यक्ति के रूप में खुद को प्रकट करती हैं? क्या समाजों और राष्ट्रों के जीवन में कोई ऐसा क्षण आता है जब जन-गण स्वयं आत्मघाती हो उठता है और आँख मूँदकर किसी अधिनायक के पीछे चल पड़ता है? आज इक्कीसवीं सदी के इतने पारदर्शी समय में तानाशाही क्या किसी नए रूप की तलाश करेगी; और इन सवालों की रोशनी में हम, जो दुनिया के लोकतान्त्रिक देशों में अग्रणी रहे हैं, खुद को कहाँ देखते हैं! ‘बीसवीं सदी के तानाशाह’ मोटे तौर पर इन्हीं सवालों के जवाब तलाश करती है; कहने की जरूरत नहीं कि आज हमारे सामने मौजूद सबसे अहम सवाल भी यही है। हिटलर, स्तालिन, मुसोलिनी, उत्तरी कोरिया के किम इल-सुंग, चिली के ऑगस्तो पिनोशे और युगांडा के ईदी अमीन पर केन्द्रित इस पुस्तक का हर अध्याय इन नेताओं के समय की आन्तरिक और विश्व-राजनीति के निर्णायक आयामों पर रोशनी डालते हुए बताता है कि ये लोग कैसे उठे, कैसे गिरे और दुनिया ने, दुनिया के विचारकों ने उन्हें कैसे देखा-समझा। इतिहास अध्येता के रूप में अशोक कुमार पाडेय इतिहास के उन अध्यायों को हिन्दी पाठक के समक्ष लाते रहे हैं जिनका सीधा सम्बन्ध हमारी मौजूदा और आवश्यक प्रश्नाकुलताओं से है। इस प्रक्रिया में विचार उनका सहगामी रहा है। यह किताब इस यात्रा का एक और पड़ाव है और पाठकों को निश्चय ही अपने समय को लेकर सोचने और अपना पक्ष चुनने में मदद करेगी।
Pracheen Bharat Ka Samajik Evam Arthik Itihas
- Author Name:
Om Prakash Prasad +1
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परम्परागत इतिहास लेखन राजनीतिक उथल-पुथल तक ही सीमित था। परन्तु पिछले कुछ दशकों से अतीत के समाज में झाँकने की कोशिशें तेज़ हुई हैं। राजा-महाराजाओं की जगह वंचितजनों को केन्द्र में रखकर इतिहास लिखने के जो प्रयत्न इधर हो रहे हैं, उनमें ओम् प्रकाश प्रसाद का योगदान भी उल्लेखनीय है। इस पुस्तक में उन्होंने प्राचीन भारत की सामाजिक स्थिति, आर्थिक दशा और सांस्कृतिक उपलब्धियों पर व्यापक रूप से प्रकाश डाला है। लेखक ने वर्णव्यवस्था और ब्राह्मण-क्षत्रिय संघर्ष के साथ-साथ प्राचीन भारत में शूद्रों की दशा पर भी विचार किया है और नगरीकरण तथा भारत-रोम व्यापार आदि के माध्यम से तत्कालीन आर्थिक हालात को सामने लाने का प्रयत्न किया है। लेखक ने इतिहास के विपुल स्रोतों और शोध-सन्दर्भों का उपयोग करते हुए ‘प्राचीन भारत का सामाजिक और आर्थिक इतिहास’ को व्यापक जानकारियों वाला बहुपयोगी ग्रन्थ बनाने का प्रयत्न किया है। कोई दो हज़ार वर्षों के भारतीय जनजीवन को जानने-समझने के लिए यह एक ज़रूरी पुस्तक है।
Gandhi aur Nehru
- Author Name:
Deepak Malik
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भारत का राष्ट्रीय आन्दोलन वस्तुत: आम सहमतियों और व्यापक संयुक्त मोर्चों एवं सम्मिलित जन-आन्दोलन को लेकर राजनीतिशास्त्र की दुनिया में एक ‘नई गतिकी’ को निर्मित करता है, यह विश्व इतिहास में एक नई कड़ी है। गांधी विमर्श तो न केवल भारत में अपितु पूरे विश्व में बड़े दमख़म के साथ चल रहा है, पर जवाहरलाल के बारे में इस दौर में कुछ ही पुस्तकें बाज़ार में आ रही हैं, गांधी-नेहरू साझा विमर्श एक देर से ही सही लेकिन निहायत ही मौज़ूँ सिलसिला है। वैश्वीकरण के आक्रामक दौर में नेहरू जो एक स्वतंत्र वैकल्पिक अर्थतंत्र और राज्य सत्ता के स्थपति थे, उन्हें भुला देना अस्वाभाविक नहीं लगता है। इस दौर में मौजूदा राज्य सत्ता से लेकर प्रमुख विपक्ष तक ने वैश्वीकरण और उदारीकरण को स्वीकार कर लिया है। साम्प्रदायिकता की तस्वीर में भी 1992 और 2002 के बाद शताब्दियों से चल रही मुश्तरका संस्कृति में दीमक लग गई है। गांधी को तो वैश्वीकरण के स्टीमरोलर ने बेरहमी से ज़मींदोज़ कर दिया है। ऐसे दौर में गांधी-नेहरू के ऐतिहासिक साझा और उनके कृतित्व पर पुन: रोशनी पड़नी चाहिए। प्रस्तुत पुस्तक दो महान स्वप्नद्रष्टाओं की यथार्थसम्मत विचारधारा को सप्रमाण रेखांकित करती है।
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