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Jaag Piyari Ab Ka Sovai

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स्त्री समस्या या व्यवस्था को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखना आवश्यक है। ऐतिहासिक दृष्टि देश, समाज, परिवार का बोध है। यह समझना आवश्यक है कि हमारे देश का पुराना ढाँचा किस तरह का था, वर्तमान में उसमें किस तरह का बद‌लाव आ रहा है। समाज के प्रतिनिधि स्त्री और पुरुष हैं। ये एक-दूसरे के पूरक, भिन्न और स्वायत्त हैं। स्त्री हाशिये पर है, जीवन जगत का पर्याय पुरुष है, स्त्री को प्रकृति का पर्याय बना दिया गया। लिंगभेदीय असमानता, स्त्री की चौतरफा अनुपस्थिति के परिवेश को आज स्त्री ने अपने संघर्ष, जिजीविषा और परिवर्तन के प्रति गहरी आस्था के जरिये तोड़ा। उसकी स्वतंत्र अस्मिता है। वह अपने जीवन के अन्तर्विरोधों को मौखिक ढंग से हल करती है। उसे किसी कार्य की जल्दी नहीं है और न ही वह अपने कार्यों को शॉर्टकट में हल करती है। वह दृढ़ प्रतिज्ञ और धैर्य के बल पर अपनी राह बनाती रहती है। अपने अन्तर्विरोधों को मौलिक ढंग से हल करने की अपनी विशिष्ट क्षमता से वह विपरीत परिस्थितियों में जीने, स्वयं को बचाए रखने और निरन्तर आगे बढ़ते जाने की दिशा में अग्रसर है। इन्हीं तत्त्वों के गर्भ से अहिंसा और धैर्य तत्त्व उदय हुआ, यही उसके प्रतिरोध के दो प्रधान तत्त्व (शस्त्र) हैं। स्त्री के प्रतिरोध का अध्ययन करना हो तो उसके धैर्य का अध्ययन करें। उसका धैर्य ऐतिहासिक विकास का परिणाम है। स्त्री ने अपने जीवन की बेड़ी को धीरे-धीरे खोल दिया है।

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स्त्री समस्या या व्यवस्था को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखना आवश्यक है। ऐतिहासिक दृष्टि देश, समाज, परिवार का बोध है। यह समझना आवश्यक है कि हमारे देश का पुराना ढाँचा किस तरह का था, वर्तमान में उसमें किस तरह का बद‌लाव आ रहा है। समाज के प्रतिनिधि स्त्री और पुरुष हैं। ये एक-दूसरे के पूरक, भिन्न और स्वायत्त हैं। स्त्री हाशिये पर है, जीवन जगत का पर्याय पुरुष है, स्त्री को प्रकृति का पर्याय बना दिया गया। लिंगभेदीय असमानता, स्त्री की चौतरफा अनुपस्थिति के परिवेश को आज स्त्री ने अपने संघर्ष, जिजीविषा और परिवर्तन के प्रति गहरी आस्था के जरिये तोड़ा। उसकी स्वतंत्र अस्मिता है। वह अपने जीवन के अन्तर्विरोधों को मौखिक ढंग से हल करती है। उसे किसी कार्य की जल्दी नहीं है और न ही वह अपने कार्यों को शॉर्टकट में हल करती है। वह दृढ़ प्रतिज्ञ और धैर्य के बल पर अपनी राह बनाती रहती है। अपने अन्तर्विरोधों को मौलिक ढंग से हल करने की अपनी विशिष्ट क्षमता से वह विपरीत परिस्थितियों में जीने, स्वयं को बचाए रखने और निरन्तर आगे बढ़ते जाने की दिशा में अग्रसर है। इन्हीं तत्त्वों के गर्भ से अहिंसा और धैर्य तत्त्व उदय हुआ, यही उसके प्रतिरोध के दो प्रधान तत्त्व (शस्त्र) हैं। स्त्री के प्रतिरोध का अध्ययन करना हो तो उसके धैर्य का अध्ययन करें। उसका धैर्य ऐतिहासिक विकास का परिणाम है। स्त्री ने अपने जीवन की बेड़ी को धीरे-धीरे खोल दिया है।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2026
Weight
235 grams
ISBN-13
9789377470043
Pages
232
Reading time
~8 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 21.5 cm
Language
Hindi

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