Vaishalinama : Loktrantra Ki Janamkatha
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Author:
Prabhat PranitPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Contemporary-fiction₹
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वैशालीनामा सुदूर अतीत की पृष्ठभूमि में ऐसी एक कथा प्रस्तुत करता है जो न केवल रोचक है बल्कि जिसमें निहित मूल्यबोध तत्कालीन देशकाल में जितना युग-परिवर्तक हो सकता था, उससे कम परिवर्तनकारी और प्रासंगिक वह आज भी नहीं है। वह मूल्यबोध है मनुष्यमात्र की समानता का। यह समानता ऐसी किसी व्यवस्था में सम्भव नहीं हो सकती जिसका आधार स्वयं असमानता पर टिका हो। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था ही यह सम्भव कर सकती है। वैशाली को लोकतंत्र की जन्मस्थली माना जाता है। इतिहास ही नहीं, इसके पौराणिक सन्दर्भ भी मिलते हैं। लेखक ने इस उपन्यास के लिए एक पौराणिक आख्यान को आधार बनाया है और वर्णों के श्रेणीक्रम में विभाजित समाज की सतह के नीचे खदबदाते उस लावे पर रोशनी डाली है जो मुट्ठीभर उच्चस्थों के वर्चस्व से उत्पीड़ित अधिसंख्य जनों के क्षोभ और क्रोध से निर्मित है। स्पष्टतः यह किसी पूर्ववर्णित आख्यान का औपन्यासिक रूपान्तर मात्र नहीं है। लेखकीय कल्पना का इसमें पर्याप्त निवेश हुआ है जिसके जरिये यह कृति राजतंत्र के प्राचीन युग में समाज में व्याप्त असमानता और उसके विरुद्ध हुई प्रतिक्रिया का उल्लेख कर लोकतंत्र के आदि रूप को रेखांकित करता है और किसी ऐतिहासिकता का दावा किये बिना एक समानता पर आधारित समाज का आह्वान करता है।
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वैशालीनामा सुदूर अतीत की पृष्ठभूमि में ऐसी एक कथा प्रस्तुत करता है जो न केवल रोचक है बल्कि जिसमें निहित मूल्यबोध तत्कालीन देशकाल में जितना युग-परिवर्तक हो सकता था, उससे कम परिवर्तनकारी और प्रासंगिक वह आज भी नहीं है। वह मूल्यबोध है मनुष्यमात्र की समानता का। यह समानता ऐसी किसी व्यवस्था में सम्भव नहीं हो सकती जिसका आधार स्वयं असमानता पर टिका हो। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था ही यह सम्भव कर सकती है।
वैशाली को लोकतंत्र की जन्मस्थली माना जाता है। इतिहास ही नहीं, इसके पौराणिक सन्दर्भ भी मिलते हैं। लेखक ने इस उपन्यास के लिए एक पौराणिक आख्यान को आधार बनाया है और वर्णों के श्रेणीक्रम में विभाजित समाज की सतह के नीचे खदबदाते उस लावे पर रोशनी डाली है जो मुट्ठीभर उच्चस्थों के वर्चस्व से उत्पीड़ित अधिसंख्य जनों के क्षोभ और क्रोध से निर्मित है। स्पष्टतः यह किसी पूर्ववर्णित आख्यान का औपन्यासिक रूपान्तर मात्र नहीं है। लेखकीय कल्पना का इसमें पर्याप्त निवेश हुआ है जिसके जरिये यह कृति राजतंत्र के प्राचीन युग में समाज में व्याप्त असमानता और उसके विरुद्ध हुई प्रतिक्रिया का उल्लेख कर लोकतंत्र के आदि रूप को रेखांकित करता है और किसी ऐतिहासिकता का दावा किये बिना एक समानता पर आधारित समाज का आह्वान करता है।
Book Details
-
ISBN9788119092796
-
Pages216
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Book Type:

- Description:
राहुल सांकृत्यायन की अत्यन्त चर्चित कृति ‘वोल्गा से गंगा’ ऐसी बीस ऐतिहासिक कहानियों का संकलन है जिनमें उन्होंने आर्यों के आठ हजार साल के इतिहास को कालानुक्रम से अंकित किया है। इन कहानियों में मातृसत्तात्मक समाज-व्यवस्था को पितृसत्तात्मक व्यवस्था में बदलने की प्रक्रिया भी दृष्टिगोचर होती है और आर्यों की यूरेशिया से वोल्गा तथा उसके बाद गंगा तक की यात्रा की रूपरेखा भी पता चलती है। ई.पू. 6000 से लेकर 1942 ई. तक के कालखंड को कड़ी-दर-कड़ी प्रस्तुत करनेवाली ये कहानियाँ एक तरफ जहाँ राहुल सांकृत्यायन के असीम अध्ययन का पता देती हैं, वहीं भारोपीय मानव-इतिहास के प्रति हमें एक व्यापक समझ भी देती हैं। इन कहानियों में इतिहास भी है, और कथा भी। सम्बन्धित काल खंडों की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों की स्पष्ट रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए ये कहानियाँ कथा-रस को भी कहीं भंग नहीं होने देतीं। भारतीय साहित्य में एक क्लासिक का दर्जा हासिल कर चुकी इस पुस्तक का अनुवाद असमिया, मराठी, बांग्ला, कन्नड़, तमिल, मलयालय, तेलुगु, पंजाबी आदि भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेजी, चेक तथा पोलिश भाषाओं में भी हो चुका है।
Pratinidhi Kahaniyan : Bhisham Sahni
- Author Name:
Bhisham Sahni
- Book Type:

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भीष्म साहनी के कथा-साहित्य से गुज़रना अपने समय को बेधते हुए गुज़रना है। हिन्दी के प्रगतिशील कहानीकारों में उनका स्थान बहुत ऊँचा है। यहाँ उनके सात कहानी-संग्रहों से प्राय: सभी प्रतिनिधि कहानियों को संकलित कर लिया गया है। युग-सापेक्ष सामाजिक यथार्थ, मूल्यपरक अर्थवत्ता और रचनात्मक सादगी इन कहानियों के कुछ ऐसे पहलू हैं, जो हमारे लिए किसी भी काल्पनिक और मनोरंजक दुनिया को ग़ैर-ज़रूरी ठहराते हैं। विभिन्न जीवन-स्थितियों में पड़े इनके असंख्य पात्र आधुनिक भारतीय समाज की अनेक जटिल परतों को पाठकों पर खोलते हैं। उनकी बुराइयाँ, उनका अज्ञान और उनके हालत व्यक्तिगत नहीं, सार्वजनीन और व्यवस्थाजन्य हैं। इसके साथ ही इन कहानियों में ऐसे चरित्रों की भी कमी नहीं, जो गहन मानवीय संवेदना से भरे हुए हैं और अपने-अपने यथास्थितिवाद से उबरते हुए एक सार्थक सामाजिक बदलाव के लिए संघर्षरत शक्तियों से जुड़कर नया अर्थ ग्रहण करते हैं। वे न तो अपनी भयावह और दारुण दशा से आक्रान्त होते हैं न निराश, बल्कि अपने साथ-साथ पाठकों को भी संघर्ष की एक नई उर्जा से भर जाते हैं।
Sansad Se Sarak Tak
- Author Name:
Sudama Pandey Dhoomil
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धूमिल मात्र अनुभूति के नहीं, विचार के भी कवि हैं। उनके यहाँ अनुभूतिपरकता और विचारशीलता, इतिहास और समझ, एक-दूसरे से घुले-मिले हैं और उनकी कविता केवल भावात्मक स्तर पर नहीं बल्कि बौद्धिक स्तर पर भी सक्रिय होती है। धूमिल ऐसे युवा कवि हैं जो उत्तरदायी ढंग से अपनी भाषा और फ़ार्म को संयोजित करते हैं। धूमिल की दायित्व-भावना का एक और पक्ष उनका स्त्री की भयावह लेकिन समकालीन रूढि़ से मुक्त रहना है। मसलन, स्त्री को लेकर लिखी गई उनकी कविता ‘उस औरत की बग़ल में लेटकर’ में किसी तरह का आत्मप्रदर्शन, जो इस ढंग से युवा कविताओं की लगभग एकमात्र चारित्रिक विशेषता है, नहीं है बल्कि एक ठोस मानव स्थिति की जटिल गहराइयों में खोज और टटोल है जिसमें दिखाऊ आत्महीनता के बजाय अपनी ऐसी पहचान है जिसे आत्म-साक्षात्कार कहा जा सकता है। उत्तरदायी होने के साथ धूमिल में गहरा आत्मविश्वास भी है जो रचनात्मक उत्तेजना और समझ के घुले-मिले रहने से आता है और जिसके रहते वे रचनात्मक सामग्री का स्फूर्त लेकिन सार्थक नियंत्रण कर पाते हैं। यह आत्मविश्वास उन अछूते विषयों के चुनाव में भी प्रकट होता है जो धूमिल अपनी कविताओं के लिए चुनते हैं। ‘मोचीराम’, ‘राजकमल चौधरी के लिए’, ‘अकाल-दर्शन’, ‘गाँव’, ‘प्रौढ़ शिक्षा’ आदि कविताएँ, जैसा कि शीर्षकों से भी आभास मिलता है, युवा कविता के सन्दर्भ में एकदम ताज़ा बल्कि कभी-कभी तो अप्रत्याशित भी लगती हैं। इन विषयों में धूमिल जो काव्य-संसार बसाते हैं, वह हाशिए की दुनिया नहीं, बीच की दुनिया है। यह दुनिया जीवित और पहचाने जा सकनेवाले समकालीन मानव-चरित्रों की दुनिया है जो अपने ठोस रूप-रंगों और अपने चारित्रिक मुहावरों में धूमिल के यहाँ उजागर होती है।
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