Priya Pash
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"...सम्भव है यह उमर जेल में ही कट जानी हो। आखिर चौदह साल है लेकिन फिर भी आकांक्षा यह ही है कि जीवन को कुछ उपयोगी ज़रूर बनाऊँ। लिखने का यह हाल है कि यहाँ आये ढाई महीने हो गये। इतने समय में अगर कुछ लिखा है तो तुम्हें पत्र ही लिखे हैं। लिखने में अब उतनी गति और स्फूर्ति अनुभव नहीं होती। अभ्यास न रहने से ऐसा होना स्वाभाविक ही है। सोचता हूँ किसी हद तक मनुष्य के लिए एकान्त ज़रूरी है नहीं तो चिन्तन की प्रवृत्ति लुप्त हो जाती है। दिन भर बकते रहने से उद्गार संचित ही नहीं पाते। फिर उनका उद्रेक कहाँ से होगा? और लिखने की प्रवृत्ति कहाँ से जागेगी? हाँ जिस रोज़ मि. बैनर्जी मिलने आये थे, उस रोज़ उसीं समय एक दूसरे राजनैतिक कैदी निगम से 'प्रताप' कानपुर के सम्पादक हरिशंकर विद्यार्थी मुलाकात कर रहे थे। उनसे बातचीत होने पर उन्होंने अपने पत्र में मेरी लिखी कहानियों को प्रकाशित करने के लिए बड़ी तत्परता दिखायी थी। शायद उन्होंने तुम्हें पत्र भी लिखा हो। यदि न लिखा हो तो तुम उन्हें एक पत्र लिखना और उनके माँगने पर एक कहानी भेजना। जो मैंने 21 कहानियाँ भेजी थीं। उनमें से तुम पहले 'प्रेम का सार' भेजना उसके बाद 'मृत्युंजय' भेजना। प्रत्येक अंक जिसमें गल्प छपें उसकी कापी तुम्हें भेज देने को लिख देना। उनका जो उत्तर आये या जो कुछ भी परिणाम इसका हो उससे मुझे सूचित कर देना। तीसरे नम्बर पर 'कौमार्य व्रत' भेजना। अभी बहुत-सी कहानियाँ मेरे पास पड़ी हैं। उन्हें fair करना आरम्भ करूँगा। इससे सम्भव है लिखने की पुरानी प्रवृत्ति जाग उठे..." (जेल से लिखे एक पत्र से)
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"...सम्भव है यह उमर जेल में ही कट जानी हो। आखिर चौदह साल है लेकिन फिर भी आकांक्षा यह ही है कि जीवन को कुछ उपयोगी ज़रूर बनाऊँ। लिखने का यह हाल है कि यहाँ आये ढाई महीने हो गये। इतने समय में अगर कुछ लिखा है तो तुम्हें पत्र ही लिखे हैं। लिखने में अब उतनी गति और स्फूर्ति अनुभव नहीं होती। अभ्यास न रहने से ऐसा होना स्वाभाविक ही है। सोचता हूँ किसी हद तक मनुष्य के लिए एकान्त ज़रूरी है नहीं तो चिन्तन की प्रवृत्ति लुप्त हो जाती है। दिन भर बकते रहने से उद्गार संचित ही नहीं पाते। फिर उनका उद्रेक कहाँ से होगा? और लिखने की प्रवृत्ति कहाँ से जागेगी? हाँ जिस रोज़ मि. बैनर्जी मिलने आये थे, उस रोज़ उसीं समय एक दूसरे राजनैतिक कैदी निगम से 'प्रताप' कानपुर के सम्पादक हरिशंकर विद्यार्थी मुलाकात कर रहे थे। उनसे बातचीत होने पर उन्होंने अपने पत्र में मेरी लिखी कहानियों को प्रकाशित करने के लिए बड़ी तत्परता दिखायी थी। शायद उन्होंने तुम्हें पत्र भी लिखा हो। यदि न लिखा हो तो तुम उन्हें एक पत्र लिखना और उनके माँगने पर एक कहानी भेजना। जो मैंने 21 कहानियाँ भेजी थीं। उनमें से तुम पहले 'प्रेम का सार' भेजना उसके बाद 'मृत्युंजय' भेजना। प्रत्येक अंक जिसमें गल्प छपें उसकी कापी तुम्हें भेज देने को लिख देना। उनका जो उत्तर आये या जो कुछ भी परिणाम इसका हो उससे मुझे सूचित कर देना। तीसरे नम्बर पर 'कौमार्य व्रत' भेजना। अभी बहुत-सी कहानियाँ मेरे पास पड़ी हैं। उन्हें fair करना आरम्भ करूँगा। इससे सम्भव है लिखने की पुरानी प्रवृत्ति जाग उठे..."
(जेल से लिखे एक पत्र से)
Book Details
-
ISBN9789352210435
-
Pages232
-
Avg Reading Time8 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘दादा कामरेड’...यह उपन्यास लेखक की पहली रचना थी जिसने हिन्दी में रोमांस और राजनीति के मिश्रण का आरम्भ किया। यह उपन्यास बांग्ला उपन्यास सम्राट शरत् बाबू के प्रमुख राजनैतिक उपन्यास ‘पथेरदावी’ द्वारा क्रान्तिकारियों के जीवन और आदर्श के सम्बन्ध में उत्पन्न हुई भ्रामक धारणाओं का निराकरण करने के लिए लिखा गया था, परन्तु इतना ही नहीं यह श्री जैनेन्द्र की आदर्श नारी पुरुष की खिलौना ‘सुनीता’ का भी उत्तर है।
यशपाल के इस उपन्यास से चुटिया कर रूढ़िवाद के अन्ध अनुयायियों ने लेखक को क़त्ल की धमकी दी थी, परन्तु देश की प्रगतिशील जनता की रुचि के कारण ‘दादा कामरेड’ के न केवल हिन्दी में कई संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं बल्कि गुजराती, मराठी, सिन्धी और मलयालम में भी यह उपन्यास अनुवादित हो चुका है।
O Bhairvi
- Author Name:
Yashpal
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यशपाल के लेखकीय सरोकारों का उत्स सामाजिक परिवर्तन की उनकी आकांक्षा, वैचारिक प्रतिबद्धता और परिष्कृत न्याय-बुद्धि है। यह आधारभूत प्रस्थान बिन्दु उनके उपन्यासों में जितनी स्पष्टता के साथ व्यक्त हुए हैं, उनकी कहानियों में वह ज़्यादा तरल रूप में, ज़्यादा गहराई के साथ कथानक की शिल्प और शैली में न्यस्त होकर आते हैं। उनकी कहानियों का रचनाकाल चालीस वर्षों में फैला हुआ है। प्रेमचन्द के जीवनकाल में ही वे कथा-यात्रा आरम्भ कर चुके थे, यह अलग बात है कि उनकी कहानियों का प्रकाशन किंचित् विलम्ब से आरम्भ हुआ। कहानीकार के रूप में उनकी विशिष्टता यह है कि उन्होंने प्रेमचन्द के प्रभाव से मुक्त और अछूते रहते हुए अपनी कहानी-कला का विकास किया। उनकी कहानियों में संस्कारगत जड़ता और नए विचारों का द्वन्द्व जितनी प्रखरता के साथ उभरकर आता है, उसने भविष्य के कथाकारों के लिए एक नई लीक बनाई, जो आज तक चली आ रही है। वैचारिक निष्ठा, निषेधों और वर्जनाओं से मुक्त न्याय तथा तर्क की कसौटियों पर खरा जीवन—ये कुछ ऐसे मूल्य हैं जिनके लिए हिन्दी कहानी यशपाल की ऋणी है।
‘ओ भैरवी!’ कहानी-संग्रह में उनकी ये कहानियाँ शामिल हैं : ‘ओ भैरवी!’, ‘वर्दी’, ‘नकारा’, ‘सामन्ती कृपा’, ‘देवी की लीला’, ‘गौ माता’, ‘महाराजा का इलाज’, ‘मूर्ख क्रोध’, ‘सब की इज़्ज़त’, ‘न्याय और दंड’, ‘मन की पुकार’ और ‘देखा-सुना आदमी’।
Chitra Ka Shirshak
- Author Name:
Yashpal
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यशपाल के लेखकीय सरोकारों का उत्स सामाजिक परिवर्तन की उनकी आकांक्षा, वैचारिक प्रतिबद्धता और परिष्कृत न्याय-बुद्धि है। यह आधारभूत प्रस्थान बिन्दु उनके उपन्यासों में जितनी स्पष्टता के साथ व्यक्त हुए हैं, उनकी कहानियों में वह ज़्यादा तरल रूप में, ज़्यादा गहराई के साथ कथानक की शिल्प और शैली में न्यस्त होकर आते हैं। उनकी कहानियों का रचनाकाल चालीस वर्षों में फैला हुआ है। प्रेमचन्द के जीवनकाल में ही वे कथा-यात्रा आरम्भ कर चुके थे, यह अलग बात है कि उनकी कहानियों का प्रकाशन किंचित् विलम्ब से आरम्भ हुआ। कहानीकार के रूप में उनकी विशिष्टता यह है कि उन्होंने प्रेमचन्द के प्रभाव से मुक्त और अछूते रहते हुए अपनी कहानी-कला का विकास किया। उनकी कहानियों में संस्कारगत जड़ता और नए विचारों का द्वन्द्व जितनी प्रखरता के साथ उभरकर आता है, उसने भविष्य के कथाकारों के लिए एक नई लीक बनाई, जो आज तक चली आ रही है। वैचारिक निष्ठा, निषेधों और वर्जनाओं से मुक्त न्याय तथा तर्क की कसौटियों पर खरा जीवन—ये कुछ ऐसे मूल्य हैं जिनके लिए हिन्दी कहानी यशपाल की ऋणी है। ‘चित्रा का शीर्षक’ कहानी-संग्रह में उनकी ये कहानियाँ शामिल हैं : ‘चित्रा का शीर्षक’, ‘हाय राम!...ये बच्चे!!’, ‘आदमी या पैसा?’, ‘प्रधानमंत्री से भेंट’, ‘मार का मोल’, ‘शहंशाह का न्याय’, ‘स्थायी नशा’, ‘एक सिगरेट’, ‘फूल की चोरी’, ‘अनुभव की पुस्तक’, ‘पाँव तले की डाल’, ‘साहू और चोर’ तथा ‘इसी सुराज के लिए’?
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