Marxvad
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यशपाल की मान्यता थी कि भारतीय जनता की असली आज़ादी अंग्रेज़ी राज से मुक्ति तक सीमित नहीं है, असली आज़ादी सामन्ती मूल्यों, तत्त्वों और प्रवृत्तियों की समाप्ति तथा उभरते हुए पूँजीवाद के ख़ात्मे पर ही सम्भव है और इसके लिए उन्हें एक ऐसी विचारधारा की ज़रूरत महसूस होती थी जो इतिहास की संरचना को वैज्ञानिक ढंग से समझाने के साथ-साथ जनसाधारण को समग्र रूपान्तरण के लिए प्रेरित भी कर सके। मार्क्सवाद उनकी दृष्टि में ऐसी ही सम्पूर्ण विचारधारा थी और यह पुस्तक मार्क्सवाद की भारत के धुर आम आदमी को समझ में आने लायक़ उनकी व्याख्या है। इसमें समाजवादी विचारों की आवश्यकता और विकास-क्रम को सहज और सुबोध भाषा में इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है कि साधारण शिक्षित जन भी उन विचारों को समझकर आत्मसात् कर सकें। यह पुस्तक उन लोगों के लिए उपयोगी है जो मार्क्सवाद को समझे बिना ही समाजवादी सपनों में खोए रहते हैं और उन लोगों के लिए एक चुनौती जो इसी तरह बिना उसे समझे, मार्क्सवाद का विरोध करते रहते हैं। मार्क्सवाद सम्बन्धी यशपाल के चिन्तन का निःसन्देह एक ऐतिहासिक सन्दर्भ भी है, लेकिन यह पुस्तक आज भी उतनी ही सार्थक और प्रासंगिक है जितनी अपने प्रकाशन के समय थी। मार्क्सवाद सम्बन्धी उनकी जानकारी और भारतीय समाज के जटिल यथार्थ की उनकी विश्वसनीय समझदारी के लिहाज़ से यह पुस्तक अप्रतिम है।
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यशपाल की मान्यता थी कि भारतीय जनता की असली आज़ादी अंग्रेज़ी राज से मुक्ति तक सीमित नहीं है, असली आज़ादी सामन्ती मूल्यों, तत्त्वों और प्रवृत्तियों की समाप्ति तथा उभरते हुए पूँजीवाद के ख़ात्मे पर ही सम्भव है और इसके लिए उन्हें एक ऐसी विचारधारा की ज़रूरत महसूस होती थी जो इतिहास की संरचना को वैज्ञानिक ढंग से समझाने के साथ-साथ जनसाधारण को समग्र रूपान्तरण के लिए प्रेरित भी कर सके।
मार्क्सवाद उनकी दृष्टि में ऐसी ही सम्पूर्ण विचारधारा थी और यह पुस्तक मार्क्सवाद की भारत के धुर आम आदमी को समझ में आने लायक़ उनकी व्याख्या है। इसमें समाजवादी विचारों की आवश्यकता और विकास-क्रम को सहज और सुबोध भाषा में इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है कि साधारण शिक्षित जन भी उन विचारों को समझकर आत्मसात् कर सकें। यह पुस्तक उन लोगों के लिए उपयोगी है जो मार्क्सवाद को समझे बिना ही समाजवादी सपनों में खोए रहते हैं और उन लोगों के लिए एक चुनौती जो इसी तरह बिना उसे समझे, मार्क्सवाद का विरोध करते रहते हैं।
मार्क्सवाद सम्बन्धी यशपाल के चिन्तन का निःसन्देह एक ऐतिहासिक सन्दर्भ भी है, लेकिन यह पुस्तक आज भी उतनी ही सार्थक और प्रासंगिक है जितनी अपने प्रकाशन के समय थी। मार्क्सवाद सम्बन्धी उनकी जानकारी और भारतीय समाज के जटिल यथार्थ की उनकी विश्वसनीय समझदारी के लिहाज़ से यह पुस्तक अप्रतिम है।
Book Details
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ISBN9788180315428
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Pages131
-
Avg Reading Time4 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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“लेखक को कला की महानता इसमें है कि उसने उपन्यास में यथार्थ से ही सन्तोष किया है। अर्थ और काम की प्रेरणाओं की विगर्हणा उसने स्पष्ट कर दी है। अर्थ की समस्या जिस प्रकार वर्ग और श्रेणी के स्वरूप को लेकर खड़ी हुई है, उसमें उपन्यासकार ने अपने पक्ष का कोई कल्पित उपलब्ध स्वरूप एक स्वर्ग, प्रस्तुत नहीं किया...अर्थ सिद्धान्त की किसी अयथार्थ स्थिति की कल्पना उसमें नहीं। समस्त उपन्यास का वातावरण बौद्धिक है। अत: आदि से अन्त तक यह यथार्थवादी है।...मनुष्यों की यथार्थ मनोवृत्ति का चित्रांकन करने की लेखक ने सजग चेष्टा की है।...यह उपन्यास लेखक के इस विश्वास को सिद्ध करता है कि परिस्थितियों से विवश होकर मनुष्य के रूप बदल जाते हैं।
‘मनुष्य के रूप' में मनुष्य की हीनता और महानता के यथार्थ चित्रण का एक विशद प्रयत्न किया गया है।”
—डॉ० सत्येन्द्र
Apsara Ka Shap
- Author Name:
Yashpal
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स्वातंत्र्योत्तर भारत के शिखरस्थ लेखकों में प्रमुख यशपाल ने अपने प्रत्येक उपन्यास को पाठक के मन-रंजन से हटाकर उसकी वैचारिक समृद्धि को लक्षित किया है। विचारधारा से उनकी प्रतिबद्धता ने उनकी रचनात्मकता को हर बार एक नया आयाम दिया, और उनकी हर रचना एक नए तेवर के साथ सामने आई ! 'अप्सरा का शाप' में उन्होंने दुष्यन्त-शकुन्तला के पौराणिक आख्यान को आधुनिक संवेदना और तर्कणा के आधार पर पुनराख्यायित किया है।
यशपाल के शब्दों में : 'शकुन्तला की कथा पतिव्रत धर्म में निष्ठा की पौराणिक कथा है। ‘महाभारत’ के प्रणेता तथा कालिदास ने उस कथा का उपयोग अपने-अपने समय की भावनाओं, मान्यताओं तथा प्रयोजनों के अनुसार किया है। उन्हीं के अनुकरण में 'अप्सरा का शाप' के लेखक ने भी अपने युग की भावना तथा दृष्टि के अनुसार शकुन्तला के अनुभवों की कल्पना की है। उपन्यास की केन्द्रीय वस्तु दुष्यन्त का शकुन्तला से अपने प्रेम सम्बन्ध को भूल जाना है, इसी को अपने नज़रिए से देखते हुए लेखक ने इस उपन्यास में नायक 'दुष्यन्त' की पुनर्स्थापना की है और बताया है कि नायक ने जो किया, उसके आधार पर आज के युग में उसे धीरोदात्त की पदवी नहीं दी जा सकती।
Abhishapt
- Author Name:
Yashpal
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यशपाल के लेखकीय सरोकारों का उत्स सामाजिक परिवर्तन की उनकी आकांक्षा, वैचारिक प्रतिबद्धता और परिष्कृत न्याय-बुद्धि है। यह आधारभूत प्रस्थान बिन्दु उनके उपन्यासों में जितनी स्पष्टता के साथ व्यक्त हुए हैं, उनकी कहानियों में वह ज़्यादा तरल रूप में, ज़्यादा गहराई के साथ कथानक की शिल्प और शैली में न्यस्त होकर आते हैं। उनकी कहानियों का रचनाकाल चालीस वर्षों में फैला हुआ है। प्रेमचन्द के जीवनकाल में ही वे कथा-यात्रा आरम्भ कर चुके थे, यह अलग बात है कि उनकी कहानियों का प्रकाशन किंचित् विलम्ब से आरम्भ हुआ। कहानीकार के रूप में उनकी विशिष्टता यह है कि उन्होंने प्रेमचन्द के प्रभाव से मुक्त और अछूते रहते हुए अपनी कहानी-कला का विकास किया। उनकी कहानियों में संस्कारगत जड़ता और नए विचारों का द्वन्द्व जितनी प्रखरता के साथ उभरकर आता है, उसने भविष्य के कथाकारों के लिए एक नई लीक बनाई, जो आज तक चली आती है। वैचारिक निष्ठा, निषेधों और वर्जनाओं से मुक्त न्याय तथा तर्क की कसौटियों पर खरा जीवन—ये कुछ ऐसे मूल्य हैं जिनके लिए हिन्दी कहानी यशपाल की ऋणी है। ‘अभिशप्त’ कहानी संग्रह में उनकी ये कहानियाँ शामिल हैं—‘दास धर्म’, ‘अभिशप्त’, ‘काला आदमी’, ‘समाधि की धूल’, ‘रोटी का मोल’, ‘छलिया नारी’, ‘चार आने’, ‘चूक गयी’, ‘आदमी का बच्चा’, ‘पुलिस की दफा’, ‘रिजक’, ‘भगवान किसके?’, ‘नमक हलाल’, ‘पुनिया की होली’, ‘हवाखोर’ और ‘शम्बूक’।
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