Sinhavlokan
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Author:
YashpalPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
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स्वाधीनता-संग्राम के लिए क्रान्तिकारियों के अवदान का इतिहास लिखने की बात एक लम्बे अरसे से उठ रही थी। कुछ प्रयत्न भी हुए लेकिन वे उन लोगों के द्वारा किए गए थे जो बाहर के लोग थे। उन्हें इस आन्दोलन के आन्तरिक परिप्रेक्ष्य का इस कारण भी पता नहीं था कि क्रान्तिकारियों ने अपनी गतिविधि का कोई लिखित विवरण अथवा डायरी प्रकाशित नहीं की थी। उनमें घटनाएँ तो थीं लेकिन अन्त: प्रसंगों के अभाव में वे प्राय: बेजान और अधूरे रह गए थे। ‘सिंहावलोकन’ के प्रकाशन ने इस कमी को पूरा किया पर यशपाल इसे इतिहास नहीं मानते। उनका कहना था कि क्रान्तिकारियों के कृतित्व और व्यक्तित्व के आन्तरिक प्रत्यक्षीकरण के बिना इस महान आन्दोलन का आकलन सम्भव नहीं है। निश्चय ही इसे सम्पन्न करने के लिए एक ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत थी जो इस आन्दोलन के वैचारिक एवं भावात्मक आयामों से वैयक्तिक रूप से जुड़ा हो। ‘सिंहावलोकन' द्वारा यशपाल ने इस महत्तम कार्य को अपनी रचनात्मक ऊर्जा देकर एक महाकाव्यात्मक रूप प्रदान कर दिया है जो इतिहास होने के साथ-साथ समूचे स्वाधीनता-आन्दोलन की समीक्षा और उनकी वैयक्तिक सम्पृक्ति का सृजनात्मक विवरण भी है।</p> <p>‘सिंहावलोकन' के तीनों खंडों को एक जिल्द में प्रकाशित करने का महत्त्व इस कारण बहुत बढ़ जाता है कि इसमें चौथे खंड का वह अप्रकाशित हिस्सा भी दिया जा रहा है जो उनके जीवन-काल में प्रकाशित नहीं हो सका था।
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स्वाधीनता-संग्राम के लिए क्रान्तिकारियों के अवदान का इतिहास लिखने की बात एक लम्बे अरसे से उठ रही थी। कुछ प्रयत्न भी हुए लेकिन वे उन लोगों के द्वारा किए गए थे जो बाहर के लोग थे। उन्हें इस आन्दोलन के आन्तरिक परिप्रेक्ष्य का इस कारण भी पता नहीं था कि क्रान्तिकारियों ने अपनी गतिविधि का कोई लिखित विवरण अथवा डायरी प्रकाशित नहीं की थी। उनमें घटनाएँ तो थीं लेकिन अन्त: प्रसंगों के अभाव में वे प्राय: बेजान और अधूरे रह गए थे। ‘सिंहावलोकन’ के प्रकाशन ने इस कमी को पूरा किया पर यशपाल इसे इतिहास नहीं मानते। उनका कहना था कि क्रान्तिकारियों के कृतित्व और व्यक्तित्व के आन्तरिक प्रत्यक्षीकरण के बिना इस महान आन्दोलन का आकलन सम्भव नहीं है। निश्चय ही इसे सम्पन्न करने के लिए एक ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत थी जो इस आन्दोलन के वैचारिक एवं भावात्मक आयामों से वैयक्तिक रूप से जुड़ा हो। ‘सिंहावलोकन' द्वारा यशपाल ने इस महत्तम कार्य को अपनी रचनात्मक ऊर्जा देकर एक महाकाव्यात्मक रूप प्रदान कर दिया है जो इतिहास होने के साथ-साथ समूचे स्वाधीनता-आन्दोलन की समीक्षा और उनकी वैयक्तिक सम्पृक्ति का सृजनात्मक विवरण भी है।</p>
<p>‘सिंहावलोकन' के तीनों खंडों को एक जिल्द में प्रकाशित करने का महत्त्व इस कारण बहुत बढ़ जाता है कि इसमें चौथे खंड का वह अप्रकाशित हिस्सा भी दिया जा रहा है जो उनके जीवन-काल में प्रकाशित नहीं हो सका था।
Book Details
-
ISBN9789386863317
-
Pages520
-
Avg Reading Time17 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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यशपाल की यह डायरी उनकी रचनात्मक तैयारी का साक्ष्य है। इसमें उन अनेक कहानियों का पहला ड्राफ़्ट मिलता है जो बाद में ‘पिंजरे की उड़ान’ और ‘वो दुनिया’ में संकलित की गई। इस सामग्री में महात्मा गांधी की अहिंसा और सत्याग्रह, लेनिन की राजनीतिक पद्धति और फ़्रायड के मनोविश्लेषण जैसे परस्पर-विरोधी विचार-सरणियों तक पहुँचने और चीज़ों को देखने, समझने की यशपाल की चिन्ता को देखा जा सकता है। कुल मिलाकर यह सारी सामग्री उनकी उस रचनात्मक बेचैनी का साक्ष्य है जिससे उबरकर ही वे एक पत्रकार और लेखक के रूप में अपना रूपान्तरण करते हैं। इन्हें उनके जीवन के समान्तर रखकर पढ़ा जा सकता है। ये सिर्फ़ कुछ उदाहरण हैं कि यशपाल की यह जेल-डायरी उन्हें कैसे एक बेहतर रूप में समझने का अवसर देती है।
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इस देश की जनता ने ब्रिटिश साम्राज्यशाही के शोषण और दासता से मुक्ति के लिए बहुत लम्बे समय तक संघर्ष किया है। भारत की जनता के इस संघर्ष का नेतृत्व भारतीय मुख्यतः राष्ट्रीय कांग्रेस के हाथ में था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का नेतृत्व प्रकट तौर पर गांधी जी के हाथ में था, इसलिए कांग्रेस की नीति गांधीवाद के सत्य-अहिंसा के सिद्धान्तों के अनुकूल रही है। भारतीय जनता के संघर्ष का उद्देश्य कांग्रेसी राज बना देने के लिए गांधी जी ने उसे 'रामराज्य' का नाम दे दिया था। कांग्रेस के राज्य को रामराज्य का नाम देने का प्रयोजन था—भगवान राम को सत्य, न्याय और अहिंसा द्वारा अपने सभी दफ़्तरों, अदालतों और जेलों में ‘अहिंसा के अवतार’ गांधी जी के चित्र लटकाकर इन चित्रों के ही नीचे निराकुश और निस्संकोच रूप में धाँधली और दमन करना।
सम्भवतः कांग्रेसी सरकार गांधीवाद को सत्य प्रमाणित करने के लिए संसार को यह दिखाना चाहती रही कि रामराज्य की व्यक्तिगत स्वामित्व की और स्वामी वर्ग द्वारा दास वर्ग पर दया कर उसका पालन करने की नीति समाजवाद की अपेक्षा अधिक सत्य है।
Phoolo Ka kurta
- Author Name:
Yashpal
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यशपाल के लेखकीय सरोकारों का उत्स सामाजिक परिवर्तन की उनकी आकांक्षा, वैचारिक प्रतिबद्धता और परिष्कृत न्याय-बुद्धि है। यह आधारभूत प्रस्थान बिन्दु उनके उपन्यासों में जितनी स्पष्टता के साथ व्यक्त हुए हैं, उनकी कहानियों में वह ज़्यादा तरल रूप में, ज़्यादा गहराई के साथ कथानक की शिल्प और शैली में न्यस्त होकर आते हैं। उनकी कहानियों का रचनाकाल चालीस वर्षों में फैला हुआ है। प्रेमचन्द के जीवनकाल में ही वे कथा-यात्रा आरम्भ कर चुके थे, यह अलग बात है कि उनकी कहानियों का प्रकाशन किंचित् विलम्ब से आरम्भ हुआ। कहानीकार के रूप में उनकी विशिष्टता यह है कि उन्होंने प्रेमचन्द के प्रभाव से मुक्त और अछूते रहते हुए अपनी कहानी-कला का विकास किया। उनकी कहानियों में संस्कारगत जड़ता और नए विचारों का द्वन्द्व जितनी प्रखरता के साथ उभरकर आता है, उसने भविष्य के कथाकारों के लिए एक नई लीक बनाई, जो आज तक चली आ रही है। वैचारिक निष्ठा, निषेधों और वर्जनाओं से मुक्त न्याय तथा तर्क की कसौटियों पर खरा जीवन—ये कुछ ऐसे मूल्य हैं जिनके लिए हिन्दी कहानी यशपाल की ऋणी है।
‘फूलो का कुर्ता’ कहानी-संग्रह में उनकी ये कहानियाँ शामिल हैं : ‘आतिथ्य’, ‘भवानी माता की जय’, ‘शिव-पार्वती’, ‘ख़ुदा की मदद’, ‘प्रतिष्ठा का बोझ’, ‘डरपोक कश्मीरी’, ‘धर्मरक्षा और ज़िम्मेवारी’।
O Bhairvi
- Author Name:
Yashpal
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यशपाल के लेखकीय सरोकारों का उत्स सामाजिक परिवर्तन की उनकी आकांक्षा, वैचारिक प्रतिबद्धता और परिष्कृत न्याय-बुद्धि है। यह आधारभूत प्रस्थान बिन्दु उनके उपन्यासों में जितनी स्पष्टता के साथ व्यक्त हुए हैं, उनकी कहानियों में वह ज़्यादा तरल रूप में, ज़्यादा गहराई के साथ कथानक की शिल्प और शैली में न्यस्त होकर आते हैं। उनकी कहानियों का रचनाकाल चालीस वर्षों में फैला हुआ है। प्रेमचन्द के जीवनकाल में ही वे कथा-यात्रा आरम्भ कर चुके थे, यह अलग बात है कि उनकी कहानियों का प्रकाशन किंचित् विलम्ब से आरम्भ हुआ। कहानीकार के रूप में उनकी विशिष्टता यह है कि उन्होंने प्रेमचन्द के प्रभाव से मुक्त और अछूते रहते हुए अपनी कहानी-कला का विकास किया। उनकी कहानियों में संस्कारगत जड़ता और नए विचारों का द्वन्द्व जितनी प्रखरता के साथ उभरकर आता है, उसने भविष्य के कथाकारों के लिए एक नई लीक बनाई, जो आज तक चली आ रही है। वैचारिक निष्ठा, निषेधों और वर्जनाओं से मुक्त न्याय तथा तर्क की कसौटियों पर खरा जीवन—ये कुछ ऐसे मूल्य हैं जिनके लिए हिन्दी कहानी यशपाल की ऋणी है।
‘ओ भैरवी!’ कहानी-संग्रह में उनकी ये कहानियाँ शामिल हैं : ‘ओ भैरवी!’, ‘वर्दी’, ‘नकारा’, ‘सामन्ती कृपा’, ‘देवी की लीला’, ‘गौ माता’, ‘महाराजा का इलाज’, ‘मूर्ख क्रोध’, ‘सब की इज़्ज़त’, ‘न्याय और दंड’, ‘मन की पुकार’ और ‘देखा-सुना आदमी’।
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