Pratinidhi Kahaniyan : Yashpal
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Author:
YashpalPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
199
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प्रेमचन्द की कथा-परम्परा को विकसित करनेवाले सुविख्यात कथाकार यशपाल के लिए साहित्य एक ऐसा शास्त्र था, जिससे उन्हें संस्कृति का पूरा युद्ध जितना था। और उन्होंने जीता। प्रत्येक स्तर पर वे सजग थे। विचार, तर्क, व्यंग्य, कलात्मक सौन्दर्य, मर्म-ग्राह्यता—हर स्तर पर उन्होंने अपनी प्रतिभा का प्रमाण दिया। समाज में जहाँ कहीं भी शोषण और उत्पीड़न था, जहाँ कहीं भी रूढ़ियों, परम्पराओं, नैतिकताओं, धर्म और संस्कारों की जकड़ में जीवन कसमसा रहा था, यशपाल की दृष्टि वहीं पड़ी और उन्होंने पूरी शक्ति से वहीं प्रहार किया। इसी दृष्टि को लेकर उन्होंने उस इतिहास-क्षेत्र में प्रवेश किया जहाँ के भीषण अनुभवों को भव्य और दिव्य कहा गया था। उन्होंने उस मानव-विरोधी इतिहास की धज्जियाँ उड़ा दीं। व्यंग्य उनकी रचना में तलवार की तरह रहा है और वे रहे हैं नए समाज की पुनर्रचना के लिए समर्पित एक योद्धा। मर्मभेदी दृष्टि, प्रौढ़ विचार और क्रन्तिकारी दर्शन ने उन्हें विश्व के महानतम रचनाकारों की श्रेणी में ला बिठाया है। ये कहानियाँ उनकी इसी तेजोमय यात्रा का प्रमाण जुटाती हैं।
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प्रेमचन्द की कथा-परम्परा को विकसित करनेवाले सुविख्यात कथाकार यशपाल के लिए साहित्य एक ऐसा शास्त्र था, जिससे उन्हें संस्कृति का पूरा युद्ध जितना था। और उन्होंने जीता। प्रत्येक स्तर पर वे सजग थे। विचार, तर्क, व्यंग्य, कलात्मक सौन्दर्य, मर्म-ग्राह्यता—हर स्तर पर उन्होंने अपनी प्रतिभा का प्रमाण दिया। समाज में जहाँ कहीं भी शोषण और उत्पीड़न था, जहाँ कहीं भी रूढ़ियों, परम्पराओं, नैतिकताओं, धर्म और संस्कारों की जकड़ में जीवन कसमसा रहा था, यशपाल की दृष्टि वहीं पड़ी और उन्होंने पूरी शक्ति से वहीं प्रहार किया। इसी दृष्टि को लेकर उन्होंने उस इतिहास-क्षेत्र में प्रवेश किया जहाँ के भीषण अनुभवों को भव्य और दिव्य कहा गया था। उन्होंने उस मानव-विरोधी इतिहास की धज्जियाँ उड़ा दीं। व्यंग्य उनकी रचना में तलवार की तरह रहा है और वे रहे हैं नए समाज की पुनर्रचना के लिए समर्पित एक योद्धा। मर्मभेदी दृष्टि, प्रौढ़ विचार और क्रन्तिकारी दर्शन ने उन्हें विश्व के महानतम रचनाकारों की श्रेणी में ला बिठाया है। ये कहानियाँ उनकी इसी तेजोमय यात्रा का प्रमाण जुटाती हैं।
Book Details
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ISBN9788171788262
-
Pages146
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Yashpal
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‘भस्मावृत्त चिंगारी’ कहानी-संग्रह में उनकी ये कहानियाँ शामिल हैं : ‘भस्मावृत्त चिंगारी’, ‘ग़ुलाम की वीरता’, ‘महादान’, ‘गवाही’, ‘वफ़ादारी की सनद’, ‘वान हिंडनबर्ग’, ‘भाग्य का चक्र’, ‘पुरुष भगवान’, ‘देवी का वरदान’, ‘इस टोपी को सलाम’, ‘सत्य का मूल्य’, ‘सआदत’, ‘साग’, ‘पहाड़ का छल’ और ‘घोड़ी की हाय’।
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‘तर्क का तूफ़ान’ कहानी-संग्रह में उनकी ये कहानियाँ शामिल हैं : ‘निर्वासिता’, ‘अपनी करनी’, ‘तर्क का तूफ़ान’, ‘मेरी जीत’, ‘जन सेवक’, ‘उतरा नशा डायन’, ‘सोम का साहस’, ‘होली नहीं खेलता’, ‘क़ानून’, ‘जादू के चावल’, ‘औरत’, ‘भाषा’, ‘पर्दा’, ‘रजा’ और ‘तर्क का फल’।
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यशपाल के लेखकीय सरोकारों का उत्स सामाजिक परिवर्तन की उनकी आकांक्षा, वैचारिक प्रतिबद्धता और परिष्कृत न्याय-बुद्धि है। यह आधारभूत प्रस्थान बिन्दु उनके उपन्यासों में जितनी स्पष्टता के साथ व्यक्त हुए हैं, उनकी कहानियों में वह ज़्यादा तरल रूप में, ज़्यादा गहराई के साथ कथानक की शिल्प और शैली में न्यस्त होकर आते हैं। उनकी कहानियों का रचनाकाल चालीस वर्षों में फैला हुआ है। प्रेमचन्द के जीवनकाल में ही वे कथा-यात्रा आरम्भ कर चुके थे, यह अलग बात है कि उनकी कहानियों का प्रकाशन किंचित् विलम्ब से आरम्भ हुआ। कहानीकार के रूप में उनकी विशिष्टता यह है कि उन्होंने प्रेमचन्द के प्रभाव से मुक्त और अछूते रहते हुए अपनी कहानी-कला का विकास किया। उनकी कहानियों में संस्कारगत जड़ता और नए विचारों का द्वन्द्व जितनी प्रखरता के साथ उभरकर आता है, उसने भविष्य के कथाकारों के लिए एक नई लीक बनाई, जो आज तक चली आती है। वैचारिक निष्ठा, निषेधों और वर्जनाओं से मुक्त न्याय तथा तर्क की कसौटियों पर खरा जीवन—ये कुछ ऐसे मूल्य हैं जिनके लिए हिन्दी कहानी यशपाल की ऋणी है। ‘अभिशप्त’ कहानी संग्रह में उनकी ये कहानियाँ शामिल हैं—‘दास धर्म’, ‘अभिशप्त’, ‘काला आदमी’, ‘समाधि की धूल’, ‘रोटी का मोल’, ‘छलिया नारी’, ‘चार आने’, ‘चूक गयी’, ‘आदमी का बच्चा’, ‘पुलिस की दफा’, ‘रिजक’, ‘भगवान किसके?’, ‘नमक हलाल’, ‘पुनिया की होली’, ‘हवाखोर’ और ‘शम्बूक’।
Marxvad
- Author Name:
Yashpal
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यशपाल की मान्यता थी कि भारतीय जनता की असली आज़ादी अंग्रेज़ी राज से मुक्ति तक सीमित नहीं है, असली आज़ादी सामन्ती मूल्यों, तत्त्वों और प्रवृत्तियों की समाप्ति तथा उभरते हुए पूँजीवाद के ख़ात्मे पर ही सम्भव है और इसके लिए उन्हें एक ऐसी विचारधारा की ज़रूरत महसूस होती थी जो इतिहास की संरचना को वैज्ञानिक ढंग से समझाने के साथ-साथ जनसाधारण को समग्र रूपान्तरण के लिए प्रेरित भी कर सके। मार्क्सवाद उनकी दृष्टि में ऐसी ही सम्पूर्ण विचारधारा थी और यह पुस्तक मार्क्सवाद की भारत के धुर आम आदमी को समझ में आने लायक़ उनकी व्याख्या है। इसमें समाजवादी विचारों की आवश्यकता और विकास-क्रम को सहज और सुबोध भाषा में इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है कि साधारण शिक्षित जन भी उन विचारों को समझकर आत्मसात् कर सकें। यह पुस्तक उन लोगों के लिए उपयोगी है जो मार्क्सवाद को समझे बिना ही समाजवादी सपनों में खोए रहते हैं और उन लोगों के लिए एक चुनौती जो इसी तरह बिना उसे समझे, मार्क्सवाद का विरोध करते रहते हैं। मार्क्सवाद सम्बन्धी यशपाल के चिन्तन का निःसन्देह एक ऐतिहासिक सन्दर्भ भी है, लेकिन यह पुस्तक आज भी उतनी ही सार्थक और प्रासंगिक है जितनी अपने प्रकाशन के समय थी। मार्क्सवाद सम्बन्धी उनकी जानकारी और भारतीय समाज के जटिल यथार्थ की उनकी विश्वसनीय समझदारी के लिहाज़ से यह पुस्तक अप्रतिम है।
Sinhavlokan
- Author Name:
Yashpal
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स्वाधीनता-संग्राम के लिए क्रान्तिकारियों के अवदान का इतिहास लिखने की बात एक लम्बे अरसे से उठ रही थी। कुछ प्रयत्न भी हुए लेकिन वे उन लोगों के द्वारा किए गए थे जो बाहर के लोग थे। उन्हें इस आन्दोलन के आन्तरिक परिप्रेक्ष्य का इस कारण भी पता नहीं था कि क्रान्तिकारियों ने अपनी गतिविधि का कोई लिखित विवरण अथवा डायरी प्रकाशित नहीं की थी। उनमें घटनाएँ तो थीं लेकिन अन्त: प्रसंगों के अभाव में वे प्राय: बेजान और अधूरे रह गए थे। ‘सिंहावलोकन’ के प्रकाशन ने इस कमी को पूरा किया पर यशपाल इसे इतिहास नहीं मानते। उनका कहना था कि क्रान्तिकारियों के कृतित्व और व्यक्तित्व के आन्तरिक प्रत्यक्षीकरण के बिना इस महान आन्दोलन का आकलन सम्भव नहीं है। निश्चय ही इसे सम्पन्न करने के लिए एक ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत थी जो इस आन्दोलन के वैचारिक एवं भावात्मक आयामों से वैयक्तिक रूप से जुड़ा हो। ‘सिंहावलोकन' द्वारा यशपाल ने इस महत्तम कार्य को अपनी रचनात्मक ऊर्जा देकर एक महाकाव्यात्मक रूप प्रदान कर दिया है जो इतिहास होने के साथ-साथ समूचे स्वाधीनता-आन्दोलन की समीक्षा और उनकी वैयक्तिक सम्पृक्ति का सृजनात्मक विवरण भी है।
‘सिंहावलोकन' के तीनों खंडों को एक जिल्द में प्रकाशित करने का महत्त्व इस कारण बहुत बढ़ जाता है कि इसमें चौथे खंड का वह अप्रकाशित हिस्सा भी दिया जा रहा है जो उनके जीवन-काल में प्रकाशित नहीं हो सका था।
Amita
- Author Name:
Yashpal
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इस उपन्यास के प्राक्कथन में यशपाल स्वयं इसके मूल मन्तव्य की ओर इशारा करते हैं—‘विश्वशान्ति के प्रयत्नों में सहयोग देने के लिए मुझे भी तीन वर्ष में दो बार यूरोप जाना पड़ा है। स्वभावत: इस समय (1954–1956) में लिखे मेरे इस उपन्यास में, मुद्दों द्वारा लक्ष्यों को प्राप्त करने अथवा समस्याओं को सुलझाने की नीति की विफलता का विचार कहानी का मेरुदंड बन गया है।’ ‘अमिता’ ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में कल्पना को आधार बनाकर लिखा गया उपन्यास है। कलिंग पर अशोक के आक्रमण की घटना में परिवर्तन करके यशपाल ने इस उपन्यास का केन्द्र कलिंग की बालिका राजकुमारी अमिता को बनाया है। उपन्यास के माध्यम से वे जो सन्देश युद्ध–त्रस्त संसार को देना चाहते हैं, वह उन्हीं के शब्दों में ‘मनुष्य ने अपने अनुभव और विकास से शान्ति की रक्षा का अधिक विश्वास योग्य उपाय खोज लिया है। यह सत्य बहुत सरल है। मनुष्य अन्तरराष्ट्रीय रूप में दूसरों की भावना और सदिच्छा पर विश्वास करे, दूसरों के लिए भी अपने समान ही जीवित रहने और आत्म–निर्णय से सह–अस्तित्व के अधिकार को स्वीकार करे। सभी राष्ट्र और समाज अपने राष्ट्रों की सीमाओं में, अपने सिद्धान्तों और विश्वासों के अनुसार व्यवस्था रखने में स्वतंत्र हों। जीवन में समृद्धि और सन्तोष पाने का मार्ग अपनी शक्ति को उत्पादन में लगाना है, दूसरों को डराकर और मारकर छीन लेने की इच्छा करना नहीं है।’
Apsara Ka Shap
- Author Name:
Yashpal
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स्वातंत्र्योत्तर भारत के शिखरस्थ लेखकों में प्रमुख यशपाल ने अपने प्रत्येक उपन्यास को पाठक के मन-रंजन से हटाकर उसकी वैचारिक समृद्धि को लक्षित किया है। विचारधारा से उनकी प्रतिबद्धता ने उनकी रचनात्मकता को हर बार एक नया आयाम दिया, और उनकी हर रचना एक नए तेवर के साथ सामने आई ! 'अप्सरा का शाप' में उन्होंने दुष्यन्त-शकुन्तला के पौराणिक आख्यान को आधुनिक संवेदना और तर्कणा के आधार पर पुनराख्यायित किया है।
यशपाल के शब्दों में : 'शकुन्तला की कथा पतिव्रत धर्म में निष्ठा की पौराणिक कथा है। ‘महाभारत’ के प्रणेता तथा कालिदास ने उस कथा का उपयोग अपने-अपने समय की भावनाओं, मान्यताओं तथा प्रयोजनों के अनुसार किया है। उन्हीं के अनुकरण में 'अप्सरा का शाप' के लेखक ने भी अपने युग की भावना तथा दृष्टि के अनुसार शकुन्तला के अनुभवों की कल्पना की है। उपन्यास की केन्द्रीय वस्तु दुष्यन्त का शकुन्तला से अपने प्रेम सम्बन्ध को भूल जाना है, इसी को अपने नज़रिए से देखते हुए लेखक ने इस उपन्यास में नायक 'दुष्यन्त' की पुनर्स्थापना की है और बताया है कि नायक ने जो किया, उसके आधार पर आज के युग में उसे धीरोदात्त की पदवी नहीं दी जा सकती।
Gita
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Yashpal
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‘गीता’ शीर्षक यह उपन्यास पहले ‘पार्टी कामरेड’ नाम से प्रकाशित हुआ था। इसके केन्द्र में गीता नामक एक कम्युनिस्ट युवती है जो पार्टी के प्रचार के लिए उसका अख़बार बम्बई की सड़कों पर बेचती है और पार्टी के लिए फंड इकट्ठा करती है। पार्टी के प्रति समर्पित निष्ठावान गीता पार्टी के काम के सिलसिले में अनेक लोगों के सम्पर्क में आती है। इन्हीं में से एक पदमलाल भावरिया भी है जो पैसे के बल पर युवतियों को फँसाता है। उसके साथी एक दिन उसे अख़बार बेचती गीता को दिखाकर फँसाने की चुनौती देते हैं। गीता और भावरिया का लम्बा सम्पर्क अन्ततः भावरिया को ही बदल देता है।
अपने अन्य उपन्यासों की तरह इस उपन्यास में भी यशपाल देश की राजनीति और उसके नेताओं के चारित्रिक अन्तर्विरोधों को व्यंग्यात्मक शैली में उद्घाटित करते हैं। उपन्यास में कम्यून जीवन का बड़ा विश्वसनीय अंकन हुआ है जिसके कारण इस उपन्यास का ऐतिहासिक महत्त्व है। इसके लिए काफ़ी समय तक यशपाल मुम्बई में स्वयं कम्यून में रहे थे। अपने ऊपर लगाए गए प्रचार के आरोप का उत्तर देते हुए यशपाल उपन्यास की भूमिका में संकेत करते हैं कि वास्तविकता को दर्पण दिखाना भी प्रचार के अन्तर्गत आ सकता है या नहीं, यह विचारणीय है।
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