Gandhiwad Ki Shav Pariksha
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गांधी जी ने इस देश के सार्वजनिक जीवन में राजनैतिक नेता के रूप में प्रवेश किया था। गांधी जी ने देश की राजनैतिक मुक्ति के लिए जनता के सामने जो राजनैतिक कार्यक्रम रखा था, उसे गांधीदर्शन और गांधीवाद का नाम दिया गया था। गांधीवादी नीति पर चलने का दावा करनेवाली शासन व्यवस्था देश के सर्व-साधारण के जीवन से कठिनाई को दूर करने के लिए क्या कर सकी है, यह देश की जनता अपने अनुभव से जानती है। सर्वोदय को ध्येय माननेवाले दरिद्रनारायण के पुजारी गांधीवाद की इस विफलता का कारण समझने के लिए उनके सिद्धान्तों की परख आवश्यक है। जनता के लिए यह समझना आवश्यक है कि उनकी भौतिक समस्याओं और कठिनाइयों का उपाय, गांधीवाद अध्यात्म द्वारा सम्भव है या आर्थिक और राजनैतिक प्रयत्नों द्वारा? इस विचार के प्रयोजनों से ‘गांधीवाद की शव परीक्षा’ का यह संस्करण प्रस्तुत है।
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गांधी जी ने इस देश के सार्वजनिक जीवन में राजनैतिक नेता के रूप में प्रवेश किया था। गांधी जी ने देश की राजनैतिक मुक्ति के लिए जनता के सामने जो राजनैतिक कार्यक्रम रखा था, उसे गांधीदर्शन और गांधीवाद का नाम दिया गया था। गांधीवादी नीति पर चलने का दावा करनेवाली शासन व्यवस्था देश के सर्व-साधारण के जीवन से कठिनाई को दूर करने के लिए क्या कर सकी है, यह देश की जनता अपने अनुभव से जानती है। सर्वोदय को ध्येय माननेवाले दरिद्रनारायण के पुजारी गांधीवाद की इस विफलता का कारण समझने के लिए उनके सिद्धान्तों की परख आवश्यक है। जनता के लिए यह समझना आवश्यक है कि उनकी भौतिक समस्याओं और कठिनाइयों का उपाय, गांधीवाद अध्यात्म द्वारा सम्भव है या आर्थिक और राजनैतिक प्रयत्नों द्वारा? इस विचार के प्रयोजनों से ‘गांधीवाद की शव परीक्षा’ का यह संस्करण प्रस्तुत है।
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 4th
- Publication year
- 2014
- Weight
- 135 grams
- ISBN-13
- 9788180319501
- Pages
- 129
- Reading time
- ~4 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14 × 21 cm
- Language
- Hindi
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स्वातंत्र्योत्तर भारत के शिखरस्थ लेखकों में प्रमुख यशपाल ने अपने प्रत्येक उपन्यास को पाठक के मन-रंजन से हटाकर उसकी वैचारिक समृद्धि को लक्षित किया है। विचारधारा से उनकी प्रतिबद्धता ने उनकी रचनात्मकता को हर बार एक नया आयाम दिया, और उनकी हर रचना एक नए तेवर के साथ सामने आई ! ' अप्सरा का शाप' में उन्होंने दुष्यन्त-शकुन्तला के पौराणिक आख्यान को आधुनिक संवेदना और तर्कणा के आधार पर पुनराख्यायित किया है। यशपाल के शब्दों में : 'शकुन्तला की कथा पतिव्रत धर्म में निष्ठा की पौराणिक कथा है। ‘महाभारत’ के प्रणेता तथा कालिदास ने उस कथा का उपयोग अपने-अपने समय की भावनाओं, मान्यताओं तथा प्रयोजनों के अनुसार किया है। उन्हीं के अनुकरण में 'अप्सरा का शाप' के लेखक ने भी अपने युग की भावना तथा दृष्टि के अनुसार शकुन्तला के अनुभवों की कल्पना की है। उपन्यास की केन्द्रीय वस्तु दुष्यन्त का शकुन्तला से अपने प्रेम सम्बन्ध को भूल जाना है, इसी को अपने नज़रिए से देखते हुए लेखक ने इस उपन्यास में नायक 'दुष्यन्त' की पुनर्स्थापना की है और बताया है कि नायक ने जो किया, उसके आधार पर आज के युग में उसे धीरोदात्त की पदवी नहीं दी जा सकती।
Jhootha Sach : Desh Ka Bhavishya : Vol. 2
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Yashpal
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भारत-पाकिस्तान विभाजन भारतीय राज्य के इतिहास का वह अध्याय है जो एक विराट त्रासदी के रूप में अनेक भारतीयों के मन पर आज भी जस-का-तस अंकित है। अपनी ज़मीनों-घरों से विस्थापित, असंख्य लोग जब नक़्शे में खींच दी गई एक रेखा के इधर और उधर की यात्रा पर निकल पड़े थे, यह न सिर्फ़ मनुष्य के जीवट की बल्कि भारतवर्ष के उन शाश्वत मूल्यों की भी परीक्षा थी जिनके दम पर सदियों से हमारी हस्ती मिटती नहीं थी। यशपाल का यह कालजयी उपन्यास उसी ऐतिहासिक कालखंड का महाआख्यान है। स्वयं यशपाल के शब्दों में यह इतिहास नहीं है, ‘कथानक में कुछ ऐतिहासिक घटनाएँ अथवा प्रसंग अवश्य हैं परन्तु सम्पूर्ण कथानक कल्पना के आधार पर उपन्यास है, इतिहास नहीं।’ अर्थात् यह उस ज़िन्दगी का आख्यान है जो अक्सर इतिहास के स्थूल ब्योरों में कहीं खो जाती है। ‘झूठा सच’ के इस दूसरे भाग ‘देश का भविष्य’ के केन्द्र में पाकिस्तान से आए शरणार्थियों की समस्याएँ और उनके सामने उपस्थित नए सांस्कृतिक, नैतिक, सामाजिक और आर्थिक संकट हैं। नई राजनीतिक परिस्थितियों में कुछ लोग अपने साहस और जीवटता के बल पर जम जाते हैं, तो कुछ टूट भी जाते हैं।
Divya
- Author Name:
Yashpal
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मार्क्सवादी चिन्तक और वैचारिक प्रतिबद्धता को बुद्धि का सर्वश्रेष्ठ अनुशासन माननेवाले कथाकार यशपाल के सरोकारों में भारतीय सामाजिक संरचना में स्त्री की यातना और व्यक्तित्व का प्रश्न हमेशा प्रमुख रहा है। ‘दिव्या’ (1945) में यशपाल ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में स्त्री की पीड़ा के सामाजिक कारणों की तलाश करते हैं। उनका मानना है कि ‘इतिहास विश्वास की नहीं, विश्लेषण की वस्तु है।...अतीत में अपनी रचनात्मक सामर्थ्य और परिस्थितियों के सुलझाव और रचना के लिए निर्देश पाती हैं।’ ‘दिव्या’ में लेखक सागल के गणसमाज को केन्द्र में रखकर पृथुसेन, मारिश और दिव्या के माध्यम से तत्कालीन सामाजिक अन्तर्विरोधों की गहन पड़ताल करता है। न तो वर्णाश्रम व्यवस्था पर आधारित सामन्ती समाज ही स्त्री को सम्मान और सुरक्षा दे सकता है और न बौद्ध धर्म जो स्त्री के स्वतंत्र व्यक्तित्व को ही शंका की निगाह से देखता है। अपनी प्रदत्त ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में ‘दिव्या’ सामाजिक संरचना के मूल अन्तर्विरोधों को रेखांकित करते हुए अपनी तेजस्विता से परिवर्तन के लिए निर्णायक संघर्ष भी करती है। अपनी सन्तुलित सोच के साथ वह हमारे समकालीन नारी-विमर्श के लिहाज़ से भी एक विचारणीय प्रस्ताव लेकर आती है।
Meri Jail Diary
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Yashpal +1
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अपनी क्रान्तिकारी एवं साम्राज्य विरोधी गतिविधियों के लिए पुलिस-मुठभेड़ के बाद यशपाल 23 जनवरी, 1932 को इलाहाबाद में गिरफ़्तार हुए। इसके लिए उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा हुई। अपने कारावास के दौर में वे नैनी, सुल्तानपुर, बरेली, फतेहपुर आदि विभिन्न जेलों में रहे। राजनीतिक बन्दी होने से बी क्लास की सुविधाओं के कारण, जीवन की कोई विशेष आशा न होने पर भी, उन्होंने अपने इस समय को पढ़ने-लिखने और विभिन्न भाषाएँ सीखने में लगाया। उन्होंने कहानियाँ लिखीं और पढ़ी गई सामग्री के विस्तृत नोट्स लिए। दोस्तोवस्की, जुलियस फ्युचिक, ग्राम्शी और भगत सिंह आदि की तरह जेल-जीवन में एक तरह से उनका अधिकतर समय इस रचनात्मक उद्यम में ही बीता। जेल-प्रवास का दौर यशपाल के लिए वस्तुतः ढेर सारे फ़ैसलों का दौर भी था। जीवित बाहर निकलने के बाद भविष्य की चिन्ता तो थी ही, यह भी तय करना था कि अब करना क्या है। यशपाल की यह डायरी उनकी रचनात्मक तैयारी का साक्ष्य है। इसमें उन अनेक कहानियों का पहला ड्राफ़्ट मिलता है जो बाद में ‘पिंजरे की उड़ान’ और ‘वो दुनिया’ में संकलित की गई। इस सामग्री में महात्मा गांधी की अहिंसा और सत्याग्रह, लेनिन की राजनीतिक पद्धति और फ़्रायड के मनोविश्लेषण जैसे परस्पर-विरोधी विचार-सरणियों तक पहुँचने और चीज़ों को देखने, समझने की यशपाल की चिन्ता को देखा जा सकता है। कुल मिलाकर यह सारी सामग्री उनकी उस रचनात्मक बेचैनी का साक्ष्य है जिससे उबरकर ही वे एक पत्रकार और लेखक के रूप में अपना रूपान्तरण करते हैं। इन्हें उनके जीवन के समान्तर रखकर पढ़ा जा सकता है। ये सिर्फ़ कुछ उदाहरण हैं कि यशपाल की यह जेल-डायरी उन्हें कैसे एक बेहतर रूप में समझने का अवसर देती है।
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