Mere Priya
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रज़ा साहब जब 2010 के अन्त में अपने जीवन का आख़िरी चरण बिताने दिल्ली आ गए तो अपने साथ पुस्तकों, कैटलॉगों व अन्य काग़ज़ात का एक बड़ा संग्रह भी लाए। इस सारी सामग्री को एकत्र और व्यवस्थित कर रज़ा अभिलेखागार बनाया जा रहा है। जो काग़ज़ात हमें मिले उनमें रज़ा के कलाकार-मित्रों के कई पत्र भी मिले हैं। इनमें मक़बूल फिदा हुसेन, फ्रांसिस न्यूटन सूज़ा, के.एच. आरा, रामकुमार, कृष्ण खन्ना और तैयब मेहता शामिल हैं। उनके पत्राचार में निजी, कलात्मक, सामाजिक आदि कई विषयों पर लिखा गया है और उन्हें पढ़ने से एक मूर्धन्य कलाकार की संघर्ष-गाथा के कई पहलू समझ में आते हैं। उस परिवेश, उन मित्रों और उनके सम्बन्धों पर भी रोशनी पड़ती है जिन्होंने रज़ा को एक व्यक्ति और कलाकार के रूप में विकसित होने में भूमिका निभाई। यह एक तरह का अनौपचारिक रिकॉर्ड भी है जो हमें बताता है कि हमारे कुछ कला-मूर्धन्य अपने समय कैसे देख-समझ रहे थे, उनकी उत्सुकताएँ और बेचैनियाँ क्या थीं और एक विकासशील सौन्दर्य-बोध कैसे आकार ले रहा था। इस पत्राचार को क्रमश: कुछ पुस्तकों में प्रकाशित करने का इरादा है। इस सीरीज़ में पहली पुस्तक रज़ा और कृष्ण खन्ना के पत्राचार की है। सौभाग्य से इन दोनों ने एक-दूसरे के पत्र सँभालकर रखे। दो मूर्धन्य कलाकारों के बीच यह पत्र-संवाद बिरला है और इसे हिन्दी अनुवाद में प्रकाशित करते हमें प्रसन्नता है। —अशोक वाजपेयी
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रज़ा साहब जब 2010 के अन्त में अपने जीवन का आख़िरी चरण बिताने दिल्ली आ गए तो अपने साथ पुस्तकों, कैटलॉगों व अन्य काग़ज़ात का एक बड़ा संग्रह भी लाए। इस सारी सामग्री को एकत्र और व्यवस्थित कर रज़ा अभिलेखागार बनाया जा रहा है। जो काग़ज़ात हमें मिले उनमें रज़ा के कलाकार-मित्रों के कई पत्र भी मिले हैं। इनमें मक़बूल फिदा हुसेन, फ्रांसिस न्यूटन सूज़ा, के.एच. आरा, रामकुमार, कृष्ण खन्ना और तैयब मेहता शामिल हैं। उनके पत्राचार में निजी, कलात्मक, सामाजिक आदि कई विषयों पर लिखा गया है और उन्हें पढ़ने से एक मूर्धन्य कलाकार की संघर्ष-गाथा के कई पहलू समझ में आते हैं। उस परिवेश, उन मित्रों और उनके सम्बन्धों पर भी रोशनी पड़ती है जिन्होंने रज़ा को एक व्यक्ति और कलाकार के रूप में विकसित होने में भूमिका निभाई। यह एक तरह का अनौपचारिक रिकॉर्ड भी है जो हमें बताता है कि हमारे कुछ कला-मूर्धन्य अपने समय कैसे देख-समझ रहे थे, उनकी उत्सुकताएँ और बेचैनियाँ क्या थीं और एक विकासशील सौन्दर्य-बोध कैसे आकार ले रहा था।
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—अशोक वाजपेयी
Book Details
-
ISBN9789388933360
-
Pages259
-
Avg Reading Time9 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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मनुष्य-मन की महीन पड़ताल और सामाजिक-राजनीतिक व मानवीय परिस्थितियों के बारीक तंतुजाल से जूझती भाषा, वह पहली चीज़ें हैं जो इस उपन्यास को एक यादगार अनुभव बनाती हैं। पात्रों और एक विस्तृत काल-खंड में फैली घटनाओं के सूक्ष्मतम घटकों तक पहुँचने की लेखक की साहसी आकांक्षा जो इस औपन्यासिक वितान की पंक्ति-पंक्ति में न्यस्त है वह इस अनुभव को और घनीभूत करती है। साथ ही आज़ादी के पहले और बाद के भारतीय समाज, और उसकी भावगत-मूल्यगत बनावट की संवेदनशील व सटीक समझ भी जो सहज ही इस पाठ को एक बड़ी रचना के रूप में स्थापित कर देती है।
कहानी लाला मोतीचंद और उसके तीन बेटों की है। बेटों में एक अपने पिता की तरह ही व्यावसायिक बुद्धि का धनी दीनानाथ है, दूसरा धन-संग्रह के प्रति नितांत उदासीन और कविहृदय दीवानचंद है और तीसरा मक्खन लाल जो आगरा में लाला के एजेंट किशोरी की पत्नी से हुआ है और विचारों से मार्क्स और भगतसिंह का अनुयायी है। इनकी कहानी के साथ ही जुड़ी है लाला मोतीचंद के सेवक मांगेराम और उसकी तीन पीढ़ियों की कहानी जिनका पुरुषार्थ लाला, उनकी हवेली और उनकी औलादों की सेवा के संदर्भ में साकार होता है। कथा
के इन दो छोरों के बीच एक कहानी पुरस्कारप्राप्त हिन्दी उपन्यासकार विश्वनाथ की भी है जो छोटे-छोटे टापुओं की तरह इस धारा के बीच-बीच में पत्रों की शक्ल में उभरती रहती है। अनुमान लगाया जा सकता है कि मुख्य कथा और उसके पात्र विश्वनाथ की ही रचना हैं और लेखक के रूप में उनके सफल और महत्वाकांक्षी लेकिन पिता और पति के रूप में उनके पश्चाताप-ग्रस्त जीवन का ही प्रतीकात्मक विस्तार हैं जो हिन्दी-उर्दू कविता के उद्धरणों के साथ इन पत्रों में खुलता चलता है।
इस गझिन परन्तु रोचक कथा-संकुल में हमें अपने समाज और देश का लगभग हर पहलू देखने को मिल जाता है। हमारा परिवार, उसकी सत्ता-संरचना, एक प्राचीन जातीय समूह के रूप में हमारी धार्मिक व नैतिक बुनावट, अलग-अलग तबकों के स्त्री-पुरुषों की नियति, संपत्ति की अवधारणा और उसके प्रति भारतीय मानस के विविधवर्णी और अंतर्विरोधी दृष्टिकोण, औपनिवेशिक भारत में व्यवसाय तथा उद्यमिता के स्वरूप और अंततः मनुष्य की नियति के लोमहर्षक आलेख, इन सबको हम इस उपन्यास के विराट कैनवस पर अपने तमाम संभव शेड्स के साथ चलते-फिरते देख पाते हैं। बिना किसी अतिरंजना के कहा जा सकता है कि यह एक परिपक्व भारतीय उपन्यास है।
Kahin Koi Darwaja
- Author Name:
Ashok Vajpeyi
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अशोक वाजपेयी की 2009 से 2012 के दौरान लिखी गई कविताओं का यह संग्रह फिर उनकी अथक जिजीविषा, सयानी और संयत परिवर्तनशीलता, कविता तथा शब्द की सम्भावना और सीमा को स्पष्टता और निर्भीकता से अंकित करने का सशक्त साक्ष्य है। उनका अदम्य जीवनोल्लास और उतना ही उनके अन्तर में बसा अवसाद फिर शब्द-प्रगट है।
वे अपनी लगभग अकेली और अद्वितीय राह नहीं छोड़ते। उस पर आत्मविश्वास से चलते हुए वे कई अप्रत्याशित मानवीय अभिप्राय और दृश्य उकेरते-खोजते हैं। हमारे समय में अन्तःकरण की विफलता, नागरिकों के लहू-रिसते घाव, सदियों से हिलगी हताश प्रार्थनाएँ, अपने निबिड़ शून्य में सिसकता ब्रह्मांड, चकाचौंध के फिसलन-भरे गलियारों में अनसुना विलाप आदि सभी उनकी कविता में दर्ज हैं पर यह उम्मीद भी कि कहीं कोई दरवाज़ा खुलता है। यह कविता नाउम्मीद अँधेरे से इनकार नहीं करती पर उम्मीद का दामन भी नहीं छोड़ती। यह संग्रह एक वरिष्ठ कवि की एक अधसदी से लम्बी कविता-यात्रा का एक नया और भरोसेमन्द मुकाम है।
Kavita : kya kahan kyon
- Author Name:
Ashok Vajpeyi
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यह पुस्तक विधिवत् लिखी गयी पुस्तक नहीं है : पिछले छह दशकों से कविता के बारे में समय-समय पर जो सोचा-गुना-लिखा, उसका संचयन है।
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स्वयं कवि होने के नाते मैंने कविता की, अल्पसंख्यकता के बावजूद, अपनी जगह खोजने-पाने की जद्दोजहद और उस पर बेजा क़ब्ज़ा न करने देने की सावधानी भरसक अलक्षित नहीं जाने दी है। कविता किसी बिल में नहीं दुबकी है और, सौभाग्य से, वह साहस-संघर्ष-सौन्दर्य-अन्त:करण का अवाँगार्द बनी हुई है। वह साहचर्य का स्थल है : कल्पना और स्वप्न की रंगभूमि भी। यह आरोप लग सकता है कि मैंने कविता से बहुत अधिक की उम्मीद लगा रखी है : मैं उसे स्वीकार करता हूँ क्योंकि मुझे कभी कविता के सिलसिले में कम-से-कम का ख़याल नहीं आया। एक कारण यह भी कि संसार की कविता कम-से-कम की नहीं अधिक-से-अधिक की भावना जगाती रही है। अगर पाठकों में कविता को लेकर कुछ उद्वेलन और उत्सुकता यह संचयन जगा पाये तो उसकी मेरी लम्बी और निस्संकोच पक्षधरता अकारथ नहीं जायेगी।
Kavita Ka Janpad
- Author Name:
Ashok Vajpeyi
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इस संचयन में कविता के समाज के साथ अन्तर्सम्बन्ध, उसका आत्म-संघर्ष, अमानवीयीकरण, मध्यवर्गीय चेतना, एशियाई अस्मिता, शब्दप्रयोग, बिम्ब आदि पर विचार है। इसके अतिरिक्त अज्ञेय, शमशेर बहादुर सिंह, गजानन माधव मुक्तिबोध, त्रिलोचन, कुँवर नारायण, विजय देव नारायण साही, रघुवीर सहाय, श्रीकान्त वर्मा, धूमिल, कमलेश और विनोद कुमार शुक्ल की कविता का विश्लेषण है।
हमारा विश्वास है कि यह सामग्री और इसके लेखक पिछले एक दशक में इस क्षेत्र में जो गम्भीर और विचारोत्तेजक हुआ है, उसमें शामिल हैं। उनके माध्यम से हमारी कविता की समझ और कवियों के संघर्ष की हमारी पहचान और परख गहरी होती है। हम उन अकारथ हो रहे पदों और अवधारणाओं से मुक्त होकर, जिनसे आज की ज़्यादातर आलोचना ग्रस्त है, नई ताज़गी और विचारोत्तेजना से अपने समय की मूल्यवान कविता, उसकी अपने समाज में जगह और शब्द के विराट् अवमूल्यन के इस क्रूर समय में कविता की भाषा के अनेकार्थी और बहु-स्तरीय जीवट और संघर्ष को समझ सकते हैं। यह आलोचना कविता के साथ है...उससे युगपत है। जैसे हमारी कविता में जीवन, अनुभव और भाषा को समझने और विन्यस्त करने के अनेक स्तर और प्रक्रियाएँ हैं, हमारी आलोचना में भी कविता और उसके माध्यम से अपने समय और उसकी उलझनों तक पहुँचने और उन्हें परिप्रेक्ष्य देने के अनेक स्तर और दृष्टियाँ सक्रिय हैं। जैसे कि कविता में वैसे ही, सौभाग्य से, आलोचना में रुचि और दृष्टि का प्रजातंत्र है।
हम इस प्रसन्न विश्वास के साथ यह संचयन प्रस्तुत कर रहे हैं कि यहाँ एकत्र आलोचना कवितादर्शी और जीवनदर्शी है : अख़बारी सतहीपन और सनसनीखेजी, वैचारिक एकरसता के आत्मतुष्ट समय में वह हमें अपनी सूक्ष्मता और जटिलता से विचलित कर कविता की अर्थसमृद्ध और गहरी समझ की ओर ले जाने में समर्थ आलोचना है।
—भमिका से
Television Lekhan
- Author Name:
Asghar Wajahat +1
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उपन्यासकारों और कहानीकारों के लिए फ़िल्म व टेलीविज़न जैसे अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यमों के लिए लेखन-कार्य चुनौतीपूर्ण रहा है। उपन्यास और कहानी से सम्पृक्ति बनाए रखने के बावजूद पटकथा-लेखन थोड़ा अलग है। यहाँ ‘दो आँखों को चार’ बनाने की ज़रूरत पड़ती है। रचनात्मक प्रतिभा, बुनियादी जानकारी, अभ्यास और अनुशासन ही सफल पटकथा का राज़ है। यह पुस्तक विषयगत प्राथमिक जानकारियाँ देने के साथ उक्त सभी गुर बनाती है और प्रेरित भी करती है।
टेलीविज़न लेखन में व्यावहारिक पक्षों को सोदाहरण मित्रवत् शिक्षक की तरह समझाया गया है। पुस्तक हमें बताती है कि बुद्धि, विचार, संवेदना तथा प्रतिक्रिया को किस तरह गुंफित कर उसे ‘विजुलाइज’ करना है। यहाँ पृष्ठभूमि सम्बन्धित तमाम वांछित जानकारियाँ हैं। टेलीविज़न लेखन की संरचना और उसके निर्माण की सभी प्रविधियों के उल्लेख के साथ महत्त्पूर्ण और चर्चित पटकथाओं के अंश भी दिए गए हैं। जिनकी पटकथाएँ आज मानक की हैसियत अख़्तियार कर चुकी हैं, ऐसे नामचीन पटकथा लेखकों—कमलेश्वर, मनोहर श्याम जोशी, अशोक चक्रधर और अरुण प्रकाश से लिए गया साक्षात्कार विषयगत कई बारीकियाँ खोलता है। अन्त में दी गई तकनीकी शब्दावली पुस्तक को महत्त्पूर्ण बनाती है।
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