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Prabhat RanjanPublisher:
Shivna PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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कुछ अलग तरह का गद्य पढ़ने की खोज में लगे पाठकों की तलाश जिन लेखकों पर जाकर समाप्त होती है, उनमें एक नाम प्रभात रंजन है। कहानी और संस्मरण के बीच आवाजाही करता यह लेखक अपने पाठक को अपनी शैली के प्रवाह और भाषा की रवानगी के साथ बहाए ले जाता हैं। "जानकी पुल" यह नाम जैसे प्रभात रंजन का ही अब दुसरा नाम हो चुका है -पंकज सुबीर
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कुछ अलग तरह का गद्य पढ़ने की खोज में लगे पाठकों की तलाश जिन लेखकों पर जाकर समाप्त होती है, उनमें एक नाम प्रभात रंजन है। कहानी और संस्मरण के बीच आवाजाही करता यह लेखक अपने पाठक को अपनी शैली के प्रवाह और भाषा की रवानगी के साथ बहाए ले जाता हैं। "जानकी पुल" यह नाम जैसे प्रभात रंजन का ही अब दुसरा नाम हो चुका है -पंकज सुबीर
Book Details
-
ISBN9789390593316
-
Pages120
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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एक लड़की है जिसे उसके दीवानों ने और मुहल्ले-भर की भूखी नज़रों ने जवान और चतुर बना दिया; फिर एक चूहा है जो रोज़ रात में गृह-निवासी के सिरहाने तब तक सत्याग्रह करता रहा जब तक कि उसे नियमित खाना नहीं दिया जाने लगा; अकाल का उत्सव है जिसके लिए जमाखोर, मुनाफ़ाखोर और नौकरशाही सालभर अनुष्ठान कराते हैं कि कब अकाल पड़े, कब दिन फिरें...और फिर नाक है, एक नहीं कई-कई तरह की। कुछ कट जाती हैं, फिर बढ़ जाती हैं, कुछ ऐसी कि चाहे जो जतन करो, कटती ही नहीं; फिर एक आदमी है जिसके भीतर दो आदमी हैं; कभी एक ऊपर आ जाता है, कभी दूसरा हावी हो जाता है।
आगे सड़े हुए आलू प्रवेश करते हैं। वे सुबह से टोकरे में पड़े हैं, पर बिक नहीं पाए। उनसे पूछा गया कि अब तुम क्या करोगे तो बोले कि हम विद्रोह करेंगे। चाहे आधी रात तक टोकरे में पड़े रहें, बिकेंगे नहीं। हम भी आत्मसम्मान रखते हैं। देखने में वे कुछ बुद्धिजीवी मालूम पड़ रहे थे लेकिन एक सस्ते होटल वाला आया और उन्हें ख़रीद ले गया।
इनके अलावा भी इस किताब में कई पात्र और परिस्थितियाँ हैं जिन्हें परसाई जी की निर्मम लेखनी ने यहाँ संग्रहीत व्यंग्य-कथाओं में उनकी तमाम विडम्बनाओं और विकृतियों के साथ अंकित किया है।
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