Pratinidhi Vyang : Manohar Shyam Joshi
Author:
Manohar Shyam JoshiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Satire0 Ratings
Price: ₹ 159.2
₹
199
Available
मनोहर श्याम जोशी ने अगर उपन्यास न भी लिखे होते तो भी व्यंग्यकार के रूप में हिन्दी में उनका बहुत आला मुक़ाम रहा होता। लेकिन अस्सी के दशक में अपने उपन्यासों के माध्यम से उन्होंने व्यंग्य विधा का पुनराविष्कार किया। वे एक बौद्धिक व्यंग्यकार थे जिनके व्यंग्य में वह फूहड़ता और छिछलापन नहीं मिलता जो समकालीन व्यंग्य की विशेषता मानी जाती है। इस तरह देखें तो वे व्यंग्य की एक समृद्ध परम्परा के सशक्त हस्ताक्षर की तरह लगते हैं तो कई बार अपने फ़न में अकेले भी जिनकी नक़ल करना आसान नहीं है। उनकी रचनाओं के इस प्रतिनिधि संकलन में उनकी यह ख़ासियत उभरकर आती है। इसमें उनके उपन्यासों के अंश, कुछ संस्मरणों के हिस्से हैं और उनके स्वतंत्र व्यंग्य लेख भी शामिल हैं जो उनके व्यंग्य की रेंज को दिखाते हैं।</p>
<p>एक इंटरव्यू में जोशी जी ने कहा था कि हमारा समाज विद्रूप के मामले में बहुत आगे है, ऐसे में व्यंग्य विधा उससे बहुत पीछे दिखाई देती है। बीबीसी से अपनी आख़िरी बातचीत में उन्होंने यह भी कहा था कि आज हम एक बेशर्म समय में रहते हैं। व्यंग्य हमारे भीतर की शर्म को जाग्रत करने का सशक्त माध्यम रहा है। इस संकलन में संकलित सामग्री से व्यंग्य की यह शक्ति ही सामने नहीं आती, बतौर व्यंग्यकार जोशी जी की ताक़त का भी पता चलता है।
ISBN: 9788126728350
Pages: 140
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: रवीन्द्रनाथ त्यागी ने न तो शुद्ध हास्य लिखा, न शुद्ध व्यंग्य और न शुद्ध ललित-निबन्ध। तीनों की मिली-जुली विशेषताओं को लेकर उन्होंने अपने ख़ास रंग को शोख़ व चटख बनाया। उनके लेखन से जो आनन्द मिलता है, वह इधर के बहुत सारे लेखन से नहीं मिलता। जो लेखन एक ‘ज्वॉय’ दे, एक ‘एक्सटेसी’ दे, उसकी अहमियत से इनकार नहीं किया जा सकता। वैसे भी जितना वैविध्य रवीन्द्रनाथ त्यागी में है, उतना उनके समकालीन किसी भी व्यंग्यकार के पास नहीं है। —डॉ. धनंजय वर्मा रवीन्द्रनाथ त्यागी को पढ़ना मुश्किल है क्योंकि बीच-बीच में हँसना पड़ता है। मुझे हँसते देखकर घर के सयाने बच्चे और विद्वान् अनुसन्धित्सु मेरी हँसी उड़ाते हैं और पुस्तक को मेरे हाथ से छीनकर पढ़ने लगते हैं। जब वे भी हँसने लगते हैं तो मैं इस शून्यकाल का फ़ायदा उठाकर पुस्तक फिर पढ़ने लगता हूँ। त्यागी जी की भाषा नटखट, प्रभावशाली व सुखकारी है। मैं उनके साहित्य को व्यंजना-कौशल की बारीकियों की दृष्टि से ‘व्यंग्य’ कहता हूँ। उन्होंने साहित्य का गम्भीर अध्ययन किया है और बुहमुखी सन्दर्भशीलता भी उनके साहित्य में है। ‘व्यंग्य’ का मूलतत्त्व है भाषा में अभिव्यंजना की एक विशेष शक्ति पैदा करना। रवीन्द्रनाथ त्यागी तथा श्रीलाल .शुक्ल के अतिरिक्त किसी और हिन्दी-व्यंग्यकार के पास अध्ययन-गर्भित प्रजातीय संस्कृति की भाषा-संश्लिष्टता और बहुविद्या के साथ-साथ शब्द-मुद्रा में विशेष प्रकार की ध्वनि उत्पन्न करते हुए कथन-काक के द्वारा व्यंग्य उत्पन्न करने की क्षमता नहीं है। —डॉ. शुकदेव सिंह रवीन्द्रनाथ त्यागी का गद्य मुझे अच्छा ही नहीं, वरन् बहुत अच्छा लगता है। उनके लेखन में व्यंग्य व लालित्य—दोनों हैं। उनके अनुभव का आयाम बहुत विस्तृत है। मैं तो चाहता हूँ कि इसी शैली में वे अपनी आत्मकथा लिखें। —डॉ. कुबेरनाथ राय
Vaishnav Ki Phislan
- Author Name:
Harishankar Parsai
- Book Type:

- Description: ‘वैष्णव की फिसलन’ प्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की श्रेष्ठ रचनाओं का संकलन है। इस संग्रह की व्यंग्य रचनाएँ यह स्थापित करने में कामयाब हैं कि जीवन की श्रेष्ठ आलोचना की संज्ञा व्यंग्य है। सहज ढंग से चुभती हुई भाषा में ये व्यंग्य रचनाएँ अपनी बात कहते हुए गहरी चोट कर जाती हैं। इस व्यंग्य-संग्रह की रचनाओं की सफलता के पीछे जो सबसे बड़ी चीज़ है वह है - लेखक की पैनी दृष्टि, जिससे छुपकर भी कुछ भी छुपा नहीं रह जाता और अव्यक्त भी व्यक्त होने लगता है। यह संग्रह चिन्ताओं का नहीं चिन्तन का संग्रह है, और यह लेखक की कुशलता ही है कि इसे वह विचार और संवेदना के सामंजस्य से कर पाया है। ‘वैष्णव की फिसलन’ में संकलित रचनाएँ हमारे आसपास की ज़िन्दगी को उघाड़कर इस प्रकार सामने रख देती हैं कि ऊपर से सीधी-सादी दिखनेवाली घटनाएँ और स्थितियाँ नए अर्थ देने लगती हैं, उनके अन्तर्निहित आशय उजागर हो उठते हैं। इस संग्रह की रचनाएँ आज के जीवन की विसंगतियों और विरूपताओं, अवरोधों और कुंठाओं पर चोट करती हैं और बताती हैं कि विसंगति के विरुद्ध क़लम कैसे तलवार का काम करती है।
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