Pao Bhar Jeere Main Brahmbhoj
(0)
Author:
Ashok VajpeyiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
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समकालीन संस्कृति और हिन्दी साहित्य के पिछले दशकों के दृश्य में जो कुछ व्यक्ति बेहद सक्रिय और उतने ही विवादास्पद रहे हैं, उनमें अशोक वाजपेयी निश्चय ही एक हैं। जहाँ उनके जीवट, साहस, बेबाकी और अदम्यता की व्यापक सराहना होती रही है वहीं उन्हें समाज-विरोधी, नीचट कलावादी, अभिजात, आत्मकेन्द्रित आदि भी कहा जाता रहा है। अशोक वाजपेयी की कविता आज लिखी जा रही अधिकांश कविता का प्रतिपक्ष है, अपनी ज़िद पर अड़ी कविता। उनकी आलोचना का वितान बहुत व्यापक है : वे कविता, विश्व कविता, साहित्य-चिन्तन से लेकर शास्त्रीय और समकालीन कलाओं का साधिकार विश्लेषण और आकलन करने में समर्थ रहे हैं। युवा प्रतिभा का, फिर वह शास्त्रीय संगीत या नृत्य हो, ललित कलाएँ हों या रंगमंच या लोककलाएँ, अशोक वाजपेयी जैसा उन्नायक बिरला ही होगा लेकिन उन पर हिन्दी की युवतम प्रतिभा को दुर्लक्ष्य करने का आरोप लगता रहता है। अपने समय की सभी प्रमुख बहसों में उनकी हिस्सेदारी रही है और वे इस समय हिन्दी के सबसे प्रखर और विचारोत्तेजक वक्ता माने जाते हैं। उन पर कभी भी कटूक्ति करने से न चूकने का इल्ज़ाम लगता रहता है। हमेशा हँसमुख, मददगार अशोक वाजपेयी अपने गुट के अथक समर्थक माने जाते हैं। बेहद यारबाश होने के बावजूद अशोक वाजपेयी के व्यक्तित्व का दूसरा पक्ष यह है कि वे ऐकान्तिक अवसाद से घिरे रहते हैं। पिछली अधसदी में हिन्दी अंचल में सबसे अधिक संस्कृति सम्बन्धी संस्थाओं के निर्माता और उनमें से अनेक के सफल संचालक अशोक वाजपेयी को सांस्कृतिक ज़ार कहा जाता रहा है।</p> <p>यह पुस्तक अशोक वाजपेयी के अन्तरंग का आत्मीय, सटीक और मुखर दस्तावेज़ है। इसके गद्य में उनकी कविता की गरमाहट और आलोचना की तीक्ष्णता का ऐसा संयोग है जो उन्हें हमारे समय का समर्थ और साक्षी गद्यकार भी सिद्ध करता है।
Read moreAbout the Book
समकालीन संस्कृति और हिन्दी साहित्य के पिछले दशकों के दृश्य में जो कुछ व्यक्ति बेहद सक्रिय और उतने ही विवादास्पद रहे हैं, उनमें अशोक वाजपेयी निश्चय ही एक हैं। जहाँ उनके जीवट, साहस, बेबाकी और अदम्यता की व्यापक सराहना होती रही है वहीं उन्हें समाज-विरोधी, नीचट कलावादी, अभिजात, आत्मकेन्द्रित आदि भी कहा जाता रहा है। अशोक वाजपेयी की कविता आज लिखी जा रही अधिकांश कविता का प्रतिपक्ष है, अपनी ज़िद पर अड़ी कविता। उनकी आलोचना का वितान बहुत व्यापक है : वे कविता, विश्व कविता, साहित्य-चिन्तन से लेकर शास्त्रीय और समकालीन कलाओं का साधिकार विश्लेषण और आकलन करने में समर्थ रहे हैं। युवा प्रतिभा का, फिर वह शास्त्रीय संगीत या नृत्य हो, ललित कलाएँ हों या रंगमंच या लोककलाएँ, अशोक वाजपेयी जैसा उन्नायक बिरला ही होगा लेकिन उन पर हिन्दी की युवतम प्रतिभा को दुर्लक्ष्य करने का आरोप लगता रहता है। अपने समय की सभी प्रमुख बहसों में उनकी हिस्सेदारी रही है और वे इस समय हिन्दी के सबसे प्रखर और विचारोत्तेजक वक्ता माने जाते हैं। उन पर कभी भी कटूक्ति करने से न चूकने का इल्ज़ाम लगता रहता है। हमेशा हँसमुख, मददगार अशोक वाजपेयी अपने गुट के अथक समर्थक माने जाते हैं। बेहद यारबाश होने के बावजूद अशोक वाजपेयी के व्यक्तित्व का दूसरा पक्ष यह है कि वे ऐकान्तिक अवसाद से घिरे रहते हैं। पिछली अधसदी में हिन्दी अंचल में सबसे अधिक संस्कृति सम्बन्धी संस्थाओं के निर्माता और उनमें से अनेक के सफल संचालक अशोक वाजपेयी को सांस्कृतिक ज़ार कहा जाता रहा है।</p>
<p>यह पुस्तक अशोक वाजपेयी के अन्तरंग का आत्मीय, सटीक और मुखर दस्तावेज़ है। इसके गद्य में उनकी कविता की गरमाहट और आलोचना की तीक्ष्णता का ऐसा संयोग है जो उन्हें हमारे समय का समर्थ और साक्षी गद्यकार भी सिद्ध करता है।
Book Details
-
ISBN9788126705337
-
Pages287
-
Avg Reading Time10 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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यह पुस्तक लेखक द्वारा उसी समय लिए गए एक संकल्प का नतीजा है, जब वे धर्मनिरपेक्ष भारत की विकास-भूमि पर अपने लेखकीय और प्रशासनिक जीवन के सबसे जघन्य दृश्य के सम्मुख थे। साम्प्रदायिक दंगों की धार्मिक-प्रशासनिक संरचना पर गहरी निगाह रखनेवाले, और ‘शहर में कर्फ़्यू’ जैसे अत्यन्त संवेदनशील उपन्यास के लेखक विभूति जी ने इस घटना को भारतीय सत्ता-तंत्र और भारतवासियों के परस्पर सम्बन्धों के लिहाज़ से एक निर्णायक और उद्घाटनकारी घटना माना और इस पर प्रामाणिक तथ्यों के साथ लिखने का फ़ैसला लिया जिसका नतीजा यह पुस्तक है।
यह सिर्फ़ उस घटना का विवरण भर नहीं है, उसके कारणों और उसके बाद चले मुक़दमे और उसके फ़ैसले के नतीजों को जानने की कोशिश भी है। इसमें दु:ख है, चिन्ता है, आशंका है, और उस ख़तरे को पहचानने की इच्छा भी है जो इस तरह की घटनाओं के चलते हमारे समाज और देश की सामूहिकता के सामने आ सकता है—घृणा, अविश्वास और हिंसा का चहुँमुखी प्रसार।
उम्मीद करते हैं कि इस किताब को पढ़ने के बाद हम एक सभ्य नागरिक समाज के रूप में अपने आस-पास पसरते इस ख़तरे के प्रति सतर्क होंगे और इसे रोकने का संकल्प लेंगे, जिसके कारण हाशिमपुरा जैसे कांड वैधता पाते हैं।
Kareeb Se
- Author Name:
Johra Sehgal
- Book Type:

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ज़ोहरा सहगल की यह आत्मकथा मंच और फ़िल्मी पर्दे पर उनकी लगभग सौ साल लम्बी मौजूदगी का एक बड़ा फलक पेश करती है। भारत और इंग्लैंड दोनों जगह समान रूप से सक्रिय रहीं ज़ोहरा सहगल इसमें अपने बचपन से लेकर अब तक की ज़िन्दगी का दिलचस्प ख़ाका खींचती हैं।
1930 में ज़ोहरा आपा ड्रेस्डेन, जर्मनी में मैरी विगमैन के डांस-स्कूल में आधुनिक नृत्य का प्रशिक्षण लेने के लिए गईं। नवाबों की पारिवारिक पृष्ठभूमि से आईं एक भारतीय युवती के लिए यह फ़ैसला अस्वाभाविक था। लेकिन कुछ अलग हटकर करने का नाम ज़ोहरा सहगल है। 1933 में वे वापस आईं और 1935 में उदयशंकर की अल्मोड़ा स्थित प्रसिद्ध नाट्य दल से जुड़ीं। कामेश्वर सहगल भी इसी कम्पनी में थे जिनसे 1942 में उनकी शादी हुई।
इस दौर के अपने सफ़र के बाद ज़ोहरा सहगल इस आत्मकथा में पृथ्वी थिएटर और पृथ्वीराज कपूर से जुड़े अपने लम्बे और गहरे अनुभव के दिनों का लेखा-जोखा देती हैं। पृथ्वी थिएटर में अपने चौदह साल उन्होंने भारतीय रंगमंच के एक महत्त्वपूर्ण अध्याय के बीचोबीच बिताए। इप्टा का बनना और फिर निष्क्रिय हो जाना भी उन्होंने नज़दीक से देखा। इस पूरे दौर का बहुत पास से लिया गया जायज़ा इस आत्मकथा में शामिल है।
इसके बाद इंग्लैंड में बीबीसी टेलीविज़न, ब्रिटिश ड्रामा लीग, और अनेक धारावाहिकों तथा फ़िल्मों के साथ अभिनेत्री के रूप में उनका जुड़ाव, और इस दौरान ब्रिटिश रंगमंच की महान हस्तियों से उनकी मुलाक़ातों के विवरण, ‘मुल्ला नसीरुद्दीन’ जैसे भारतीय धारावाहिकों में काम करने के अनुभव, इस आत्मकथा को एक ख़ास दिलचस्पी से पढ़े जाने की दावत देते हैं। साथ में ज़ोहरा आपा का चुटीला अन्दाज़, उसके तो कहने ही क्या!
Bhookh aur Bhoj ke Beech Vivekananda
- Author Name:
Sankar
- Book Type:

- Description: कभी राजभवन में सोने की थाली में राजसी भोजन, कभी झोंपड़ी में गरीबों का भोजन, कभी भूखे पेट, कभी सुनसान जंगल में आधे पेट खाकर भ्रमण करना स्वामी विवेकानंद के जीवन के अंतिम दो दशकों की आश्चर्यजनक जीवनगाथा। पिछले लगभग डेढ़ सौ वर्षों से कई देशों में स्वामीजी के पाककला प्रेम की चर्चा के साथ महासागर के उस पार अमेरिका में वेद, वेदांत के साथ-साथ बिरयानी-पुलाव-खिचड़ी से संबंधित कई अनजानी कहानियाँ प्रचलित हैं। भारतीय पाककला के प्रचार में सर्वत्यागी संन्यासी के असीम उत्साह वर्तमान के समाजतत्त्वविद् के लिए आश्चर्य की बात है, फिर भी पाकशास्त्री महाराज विवेकानंद को लेकर कोई संपूर्ण पुस्तक किसी भी भाषा में क्यों नहीं लिखी गई है, यह समझ से परे है। इस पुस्तक में स्वामी विवेकानंद के आहार के विषय में हजारों लोगों के मुँह से कही गई अनमोल बातों पर खोजी लेखक शंकर की अद्भुत प्रस्तुति है।
Nainitala Nainitala
- Author Name:
Pushpesh Pant
- Book Type:

- Description: आदमी ही शहर में नहीं बसता, शहर भी आदमियों में बसते हैं। दरअसल, हरेक आदमी की अपनी ज़मीन और जड़ें होती हैं, जिनसे वह ताउम्र आज़ाद नहीं होना चाहता; भले ही ज़िन्दगी की भागमभाग—उसकी मर्ज़ी से या उसके चाहे बिना—उसे उनसे कितना भी दूर कर दे। बेदख़ली के बावजूद वह अपनी ज़मीन को दिल में आबाद कर लेता है और इस तरह अपनी जड़ों को ज़िन्दा रखता है। ‘नैनीताला नैनीताला’ किताब इस सचाई का शिद्दत से अहसास कराती है, जिसमें पुष्पेश पन्त ने नैनीताल का ऐसा रससिक्त बखान किया है जो इस पहाड़ी शहर से उनके अपने रिश्ते का बयान तो है ही; अनगिनत लोगों, इमारतों, दुकानों, सड़कों, ढलानों, चढ़ाइयों, गाड़ियों, सूर्योदय, सूर्यास्त समेत तमाम तरह के नज़ारों के हवाले से उतना ही पुख़्ता शहरनामा भी है। उनका निजी भी इस किताब में जाने-देखे-सुने लोगों के क़िस्सों के साथ मिलकर एकमेक हो गया है। गागर में सागर की मानिन्द नैनीताल का भूगोल, इतिहास, संस्कृति, समाज, आर्थिकी सब कुछ अपने भीतर समेटे हुए; जितना संस्मरण उतनी ही शहरगाथा! ग़ौर से देखें तो इसमें एक झलक उस हिन्दुस्तान की भी दिख जाएगी जिसकी बुनियाद बेशक सुदूर अतीत में पड़ गई थी लेकिन जो आज़ादी के आसपास शक्ल ले रहा था और उसके बाद के एक-दो दशक में मुकम्मल हुआ। यादों का सफ़रनामा!
Samarnanjali
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

-
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युगदृष्टा रामधारी सिंह ‘दिनकर’ अपने समकालीनों की चर्चा करना बहुत नाजुक काम मानते थे, लेकिन समकालीनों पर लिखने पर उनको सुखद अनुभूति भी होती थी।
‘स्मरणांजलि’ दिनकर जी के मित्रों और समकालीन महापुरुषों, जिन्होंने उनके हृदय पर अमिट छाप छोड़ी, के विषय में निबन्धों और यात्रा–संस्मरणों की अनूठी कृति है।
इस पुस्तक में देश के प्रख्यात विद्वानों–साहित्यकारों और राजनेताओं के अन्तरंग जीवन की झाँकियाँ हैं तथा उनके अनजाने रूप, देश की राजनीति को प्रभावित करनेवाले प्रसंगों और उन मानवीय गुणों का भी इसमें उद्घाटन हुआ है जिन्होंने इन विभूतियों को सबका श्रद्धास्पद बना दिया।
यह पुस्तक जहाँ एक तरफ़—राजर्षि टंडन, राजेन्द्र प्रसाद, काका साहब कालेलकर, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन्, लालबहादुर शास्त्री, लोहिया साहब, डॉ. जाकिर हुसेन, श्रीकृष्ण सिंह, पुण्यश्लोक जायसवाल, राहुल सांकृत्यायन, पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी, आचार्य रघुवीर, पंडित किशोरीदास वाजपेयी, आचार्य शिवपूजन सहाय, रामवृक्ष बेनीपुरी, डॉ. लक्ष्मीनारायण ‘सुधांशु’, पंडित वंशीधर विद्यालंकार, नलिन विलोचन शर्मा, मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, सुमित्रानन्दन पंत, महादेवी वर्मा, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, हरिवंश राय ‘बच्चन’—इन विभूतियों का परिचय देती है, वहीं राष्ट्रकवि दिनकर की यूरोप, जर्मनी, चीन और मॉरिशस यात्रा का रोचक वर्णन भी करती है।
संस्मरणात्मक निबन्धों और महत्त्वपूर्ण यात्रा–वृत्तान्तों से सुसज्जित, सरस भाषा–शैली में लिखित यह पुस्तक अमूल्य है।
Path
- Author Name:
Rajesh Maheshwari
- Book Type:

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आत्मकथा सिर्फ़ ज़िन्दगी के क़िस्सों का बयान ही नहीं, वह अपने आपसे मिलने की एक ईमानदार कोशिश भी होती है। इस कोशिश में राजेश माहेश्वरी की यह कृति ‘पथ’ सचमुच पथ-प्रदर्शक का काम करती है।
जीवन मनुष्य के ख़ुद बनाए से बनता है, पैतृक सम्पदा कुछ दूर और देर तक ही साथ दे सकती है। राजेश जी इस कड़वे सच के स्वीकार के साथ अपने जीवन में वंचनाओं और प्रपंचों से जूझते हुए विवेक एवं परिश्रम के बलबूते ऐसी बुलन्दी अर्जित करते हैं जो असम्भव हरगिज़ नहीं लगती, बल्कि यह भरोसा जगाती है कि विपरीत परिस्थितियाँ हों तो अपने विवेक की पतवार को सकारात्मक सोच के साथ हर पल थामे रहने से सब सँभल जाता है।
ज़िन्दगी में अकसर ऐसे पल आते हैं, जब हम दोराहे पर खड़े होते हैं। ऐसे में ‘पथ’ के ये शब्द—‘जीवन में कठिनाइयों के आने पर चिन्ता नहीं करनी चाहिए। दुनिया में ऐसी कोई कठिनाई या समस्या नहीं है जिसका निदान सम्भव न हो’—एक दोस्त की तरह सम्बल देनेवाले हैं।
संघर्ष के पथ पर चलते हुए विश्वास की लौ को जगाए रखने की प्रेरणा से भरपूर है यह ‘पथ’।
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