Chitramay Bharat
(0)
Author:
Sudhakar Yadav, Gorakh ThoratPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Art-and-design₹
295
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भारतीय भाषाओं में कला-आलोचना के अभाव को किसी हद तक सुधाकर यादव की 'चित्रमय भारत’ दूर करने का एक ऐसा विस्तृत प्रयास है जो अब तक नहीं हुआ है। ...पाठक लक्ष्य करेंगे कि 'चित्रमय भारत’ में आधुनिक नागर चित्रकारों की कला को तो विषय बनाया ही गया है, पर साथ में हमारे आदिवासी अंचलों में काम कर रहे चित्रकारों की कला पर भी उतनी ही गम्भीरता से लिखा गया है। यह इस पुस्तक की विशिष्ट बात है। मसलन, सुधाकर के लिए मक़बूल फ़िदा हुसैन और जनगढ़ सिंह श्याम दोनों की ही चित्रकृतियाँ विचार योग्य हैं और वे दोनों ही भारत की चित्रकला संस्कृति को समृद्ध करती हैं। इस किताब को अन्तिम पृष्ठ तक पढ़ने के बाद पाठक को पिछले सौ वर्षों से अधिक की भारतीय चित्रकला की यात्रा का, उसमें आए नए-नए पड़ावों और प्रस्थानों का ज्ञान तो होगा ही, अनुभव भी बहुत हद तक हो सकेगा। 'चित्रमय भारत’ हमें भारतीय चित्रकला संस्कृति से आत्मीय होने का अवसर प्रदान करती है। इसे पढ़कर पाठक स्वयं को अपनी संस्कृति की चित्रकला से कहीं अधिक निकटता महसूस करेंगे और अपने भीतर इसे और इसके सहारे ख़ुद को अनुभव करने के मार्ग कहीं अधिक सुगमता से अन्वेषित कर सकेंगे। —उदयन वाजपेयी
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About the Book
भारतीय भाषाओं में कला-आलोचना के अभाव को किसी हद तक सुधाकर यादव की 'चित्रमय भारत’ दूर करने का एक ऐसा विस्तृत प्रयास है जो अब तक नहीं हुआ है। ...पाठक लक्ष्य करेंगे कि 'चित्रमय भारत’ में आधुनिक नागर चित्रकारों की कला को तो विषय बनाया ही गया है, पर साथ में हमारे आदिवासी अंचलों में काम कर रहे चित्रकारों की कला पर भी उतनी ही गम्भीरता से लिखा गया है। यह इस पुस्तक की विशिष्ट बात है। मसलन, सुधाकर के लिए मक़बूल फ़िदा हुसैन और जनगढ़ सिंह श्याम दोनों की ही चित्रकृतियाँ विचार योग्य हैं और वे दोनों ही भारत की चित्रकला संस्कृति को समृद्ध करती हैं। इस किताब को अन्तिम पृष्ठ तक पढ़ने के बाद पाठक को पिछले सौ वर्षों से अधिक की भारतीय चित्रकला की यात्रा का, उसमें आए नए-नए पड़ावों और प्रस्थानों का ज्ञान तो होगा ही, अनुभव भी बहुत हद तक हो सकेगा। 'चित्रमय भारत’ हमें भारतीय चित्रकला संस्कृति से आत्मीय होने का अवसर प्रदान करती है। इसे पढ़कर पाठक स्वयं को अपनी संस्कृति की चित्रकला से कहीं अधिक निकटता महसूस करेंगे और अपने भीतर इसे और इसके सहारे ख़ुद को अनुभव करने के मार्ग कहीं अधिक सुगमता से अन्वेषित कर सकेंगे।
—उदयन वाजपेयी
Book Details
-
ISBN9789389577365
-
Pages228
-
Avg Reading Time8 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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एक चित्रकार की सुचिन्तित दृष्टि जब अपने समकालीन कला-समय पर पड़ती है, तब उससे पैदा होनेवाली एक व्यापक कला अवधारणा के तमाम सारे सीमान्त एकबारगी आलोकित हो उठते हैं। वर्तमान चित्रकला परिदृश्य पर अपने अनूठेपन एवं अमूर्त्तन के लिए समादृत रहे चित्रकार अखिलेश के निबन्धों की यह सारगर्भित अन्विति अपनी बसाहट, कला-अनुभव, अचूक प्रश्नाकुलता के चलते एक अविस्मरणीय गद्य पाठ बन पड़ी है। अखिलेश की यह ‘दरसपोथी’ एक हद तक कबीर का वह ‘रामझरोखा’ बन सकी है, जहाँ बैठकर रंगों की अत्यन्त सूक्ष्म व जटिल जवाबदेही का मुजरा वे पूरे संयत भाव से ले पाए हैं। इसी कारण इन निबन्धों के सम्बन्ध में यह देखना प्रीतिकर है कि निबन्धकार मूर्धन्य कलाकारों से संवाद, विमर्श एवं मीमांसा के उपक्रम में अपनी भूमिका एक सहज जिज्ञासु एवं कला अध्येता की बना सका है, जिसके कारण किसी प्रकार की नवधा-भक्ति में तिरोहित होने से यह सलोनी किताब बच सकी है।
एक अर्थ में यह पुस्तक शास्त्रीय संगीत के उस विलम्बित ख्याल की तरह लगती है, जिसमें उसके गानेवाले कलाकार के लिए भी सदैव एक चुनौती बनी रहती है कि वह कोई नया सुर लगाते वक़्त अथवा पुरानी सरगम की बढ़त करते हुए उसी क्षण एक नई ‘उपज’ को आकार दे रहा होता है। अखिलेश ने अपने इन उन्नीस निबन्धों में ठीक इसी विचार को बेहद रचनात्मक ढंग से बरतते हुए ढेरों उपजों का सुर-लोक बना डाला है। यह अकारण नहीं है कि अखिलेश अपने पूर्ववर्ती और समवर्ती कलाकारों पर लिखते हुए उसे ‘अचम्भे का रोना’ कहते हैं। वे रवीन्द्रनाथ टैगोर के चित्रकार मानस को पढ़ते हुए एक जगह लिखते हैं : ‘रवीन्द्र की स्याही संकोच से सत्य की तरफ़ जाती दीखती है। इसमें आत्म-सच का प्रकाश फैला है; इन रेखांकनों में दावा नहीं कवि का कातर भाव है।' तो दूसरी ओर जगदीश स्वामीनाथन के लिए उनका कथन क़ाबिलेग़ौर है : ‘वे लघु चित्रों की बात करते हैं आदिवासी नज़रिये से। वे रंगाकाश रचते हैं लोक चेतना से। स्वामी का लेखन इतिहास चेतना से भरा हुआ है। स्वामी के चित्र उससे मुक्त हैं। यह अखिलेश की कवि-दृष्टि है, जिसमें एक कलाकार या चित्रकार होने की सारी सम्भावना पूरी उदात्तता के साथ उस तरह सूर्याभिमुख है, स्वयं जिस तरह शाश्वत को खोजनेवाली एक सहृदय की निगाह सत्य की रश्मियों से चौंधियाती है, बार-बार अचम्भित होती है।
इन निबन्धों को पढ़ने से इस तथ्य को बल मिलता है कि अखिलेश जहाँ बेहद ग़ैर-पारम्परिक ढंग से अमूर्तन के धरातल पर स्वयं के चित्र बनाने की प्रक्रिया में बेहद आधुनिक और लीक से थोड़ा निर्बन्ध सर्जक का बाना अख्तियार करते हैं, वहीं वे एक निबन्धकार एवं कला-आलोचक के रूप में कहीं पारम्परिक सहृदय की तरह दृश्य पर नज़र आते हैं। उनकी कला-आलोचना दरअसल अपने रंगलोक के आदि प्रश्नों से अलग हटकर सांसारिक ऐन्द्रियता में पूरे लालित्य और प्रांजलता के साथ कुछ अतिरिक्त खोजती, बीनती, बुहारती आगे बढ़ती है।
वे इतिहास के सन्दर्भों, सांस्कृतिक स्थापनाओं के गह्वर सम्मोहन, समय और भूगोल की एकतान जुगलबन्दी, स्मृतियों की धूप-छाँही रंगोली तथा कला के निर्मम सत्य की आत्यन्तिक पड़ताल से अपने निबन्धों की भाषा अर्जित करते हैं। यह देखना भी अधिकांश लेखों में इस अर्थ में बेहद प्रासंगिक है कि कई बार आप जैसे ही किसी कलाकार की गहरी मीमांसा में मुब्तिला रहते हैं, अखिलेश हाथ पकड़कर अचानक ही निहायत भौतिक समय में आपको ले जाते हैं और महत्त्वपूर्ण या ग़ैर-इरादतन महत्त्वपूर्ण बन रही किसी तिथि या घटना का साक्षी बना डालते हैं। कई दफ़े वह अपने ढंग से कलाकार की फ़ितरत और उसके द्वारा उत्पन्न उस दृश्यावली को टटोल रहे होते हैं, जहाँ स्वयं वह कलाकार जा नहीं पाया है; तभी एकाएक वह सिलसिला टूटता है और अखिलेश उस व्यक्ति की कला सम्भावना को व्यापक परिप्रेक्ष्य में सन्दर्भित करते हुए किसी दूसरे महान चित्रकार, लेखक या कलाकार का उद्धरण देकर हमारे आस्वाद में एक नए क़िस्म की मिठास घोल देते हैं। कहने का आशय इतना है कि अखिलेश स्वयं कौतुक पर विश्वास करते हैं और गाहे-ब-गाहे हमें ऐसी परिस्थिति में डालने में भी संकोच नहीं करते, जिसके अदम्य मोह से निकलकर वापस अपनी दुनिया में आना जल्दी सम्भव नहीं हो पाता।
इन निबन्धों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि अखिलेश ने अपने इस कलात्मक विमर्श की पुस्तक में एक ऐसे समानान्तर संसार की पुनर्रचना की है, जो अब तक अपने सबसे शाश्वत एवं उदात्त अर्थों में सिर्फ़ मिथकीय एवं पौराणिक अवधारणाओं में बसती रही है। मगर इसी क्षण यह भी कहने का मन होता है कि एक चित्रकार की मौलिक विचार सम्पदा ने कलाओं पर विमर्श के बहाने, एक ऐसे मिथकीय संसार का सृजन कर दिया है जो आज के भौतिकवादी और बाज़ार आक्रान्त समय में उसका एक निहायत दिलचस्प और मननशील प्रतिरूपक बन गया है। हम इस तरह की शब्दावली को पढ़ते हुए अपने लिए उस नई सभ्यता का थोड़ी देर के लिए वरण भी कर पा रहे हैं जो सौभाग्य से अभी भी साहित्य और कलाओं के संसार में साँस ले रही है। क्या यह नहीं लगता कि रवीन्द्रनाथ टैगोर, नारायण श्रीधर बेन्द्रे, मक़बूल फ़िदा हुसेन, जगदीश स्वामीनाथन, के.जी. सुब्रमण्यम, भूपेन खख्खर, जनगण सिंह श्याम, नीलमणि देवी, जेराम पटेल, किशोर उमरेकर, अमृतलाल वेगड़ एवं मनोग्राही कला-मनन के बहाने अखिलेश रंग-शिखर पर दीया बार रहे हैं।
—यतीन्द्र मिश्र
Dhatu Shilpi Dr. Jaidev Baghel : Ek Shikhar Yatra
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छत्तीसगढ़ का बस्तर अंचल देशवासियों को ही नहीं, अपितु विदेशियों को भी अपनी विशिष्ट एवं समृद्ध आदिवासी एवं लोक-संस्कृति के कारण आरम्भ से ही आकर्षित करता रहा है। यहाँ की आदिवासी एवं लोक-संस्कृति में साहित्य कला के अन्तर्गत वाचिक परम्परा के सहारे न जाने कब से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक संचरित होती आ रही लोककथाएँ, गीति कथाएँ, गाथाएँ, महागाथा, लोकगीत, कहावतें, मुहावरे, पहेलियाँ, मिथ-कथाएँ आदि लोक-साहित्य एवं प्रदर्शनकारी कलाओं के अन्तर्गत नृत्य, संगीत, नाट्य तथा रूपंकर कलाओं के अन्तर्गत मूर्तिकला, लोक-चित्रकला एवं वास्तु-कला का भी प्रमुख स्थान रहा है। कोंडागाँव, बस्तर (छत्तीसगढ़) के धातु-शिल्पी जयदेव बघेल का सम्बन्ध इन्हीं में से एक, मूर्तिकला से है। पारम्परिक मूर्तिकला से, जो 'घड़वा-कला' के नाम से विख्यात है और शासकीय तौर पर 'ढोकरा-कला' के नाम से जानी जाती है। इस विशुद्ध लोककला को बस्तर जैसे अंचल, जो सदा से पिछड़ा कहे जाने के लिए अभिशप्त रहा है, से उठाकर देश ही नहीं अपितु विदेशों में भी लोककला के साथ-साथ समकालीन कला के समतुल्य सम्मानजनक स्थान दिलाने में जयदेव बघेल का योगदान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यह कहने में कोई संशय नहीं कि 'घड़वा-कला' और श्री जयदेव बघेल एक-दूसरे के पर्याय हैं। इतना ही नहीं, श्री बघेल के ही प्रयासों से कोंडागाँव और इसके आसपास न केवल 'घड़वा-कला' अपितु अन्य आदिवासी एवं लोककलाओं का भी विस्तार एवं विकास हुआ। यही कारण है कि पहले से ही बस्तर सम्भाग की 'संस्कार-धानी' के नाम से अभिहित कोंडागाँव को अब 'शिल्प-नगरी' भी कहा जाता है। जयदेव बघेल का यह प्रामाणिक जीवन वृत्त पठनीय बन पड़ा है। उम्मीद है पाठकों को यह पुस्तक रुचिकर लगेगी।
Performing Arts Of Chhattisgarh
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Aaj Ki Kala
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देखते हम सब हैं, लेकिन देखने की कला सीखने और अभ्यास का विषय है। आज का जीवन कुछ ऐसा है कि वस्तुएँ, रंग और स्थितियाँ एक भागमभाग में हमारी आँखों के सामने आती हैं, और इससे पहले कि हम उन्हें 'देख' सकें, लुप्त भी हो जाती हैं; न तो हम उन चीजों से, उनके फैलाव से, उनकी वास्तविकता से परिचित हो पाते हैं, और न ही उन छवियों से अपने अनुभव-कोश को समृद्ध कर पाते हैं, जो वे चीज़ें हमारे सामने प्रस्तुत करती हैं। यह कैसी विडम्बना है कि इतनी आँखें एक अजीब-सी अजनबीयत के बोझ तले दबी रहती हैं। वरिष्ठ कला चिन्तक और कवि प्रयाग शुक्ल एक अरसे से कला और कला के आसपास बसे संसार को बहुत ग़ौर से, बहुत बारीकी और बहुविध कोणों से देखते रहे हैं, और लगातार हमें अपने देखे हुए से तथा देखने के अपने अनुभव और कलाओं के भीतर आने-जाने की अपनी पूरी प्रक्रिया से भी परिचित कराते रहे हैं। समकालीन कला-जगत की गतिविधियों, उपलब्धियों और कला-परिदृश्य में हो रहे प्रयोगों आदि पर उनकी बराबर नज़र रही है। और, सम्भवतः इस समय हिन्दी में वे ही अकेले हैं जिनके पास आज की कला-प्रवृत्तियों के विषय में कहने के लिए बहुत कुछ हमेशा रहता है। यह पुस्तक उसकी एक बानगी है, जिसमें उन्होंने कला के एक अहम् पक्ष यानी 'देखने के हुनर' के अलावा समकालीन कला के दूसरे अनेक पक्षों पर भी प्रकाश डाला है। कहने की आवश्यकता नहीं कि उनके गद्य की आत्मीयता अपने आप में एक अलग आकर्षण है, जिसके लिए इस पुस्तक को पढ़ा जाना चाहिए ।
Dekhne Ke Tareeke
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जॉन बर्जर की इस किताब ने पेंटिंग और कला-आलोचना के बारे में सोचने का तरीक़ा बदल दिया। यह शब्दों और चित्रों के ज़रिए दिखाती है कि हम जो कुछ भी देखते हैं, वह हमेशा सुन्दरता, सत्य, सभ्यता, रूप, स्वाद, वर्ग और लिंग सम्बन्धी हमारे अनेक पूर्वग्रहों से प्रभावित होता है। जॉन बर्जर ऑयल पेंटिंग्स, फ़ोटोग्राफ़्स और ग्राफ़िक कला में छिपे अर्थों की तहदारी की पड़ताल करते हैं और यह तर्क देते हैं कि जब हम देखते हैं, तो हम केवल देख नहीं रहे होते— हम छवियों की भाषा को पढ़ रहे होते हैं। हमारे समय के सबसे प्रभावशाली बुद्धिजीवियों में से एक —ऑब्ज़र्वर कला जगत के मुँह पर एक तमाचा... इस किताब ने ललित कला को पढ़ने और समझने के तरीके में क्रांति ला दी —गार्जियन बर्जर विचारों को उसी तरह सँभालते हैं जैसे एक कलाकार रंगों को सँभालता है’ —जेनेट विंटरसन हम अपने चारों ओर की दुनिया को कैसे देखते हैं? यह उन कुछ निर्णायक कृतियों में से एक है, जिनके रचनात्मक विचारों ने कला, डिज़ाइन और मीडिया पर लेखन के ज़रिए हमारी दृष्टि को हमेशा के लिए बदल दिया।
Sebastian & Sons : A Brief History Of Mrdangam Makers
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संगीत-साधक और सामाजिक कार्यकर्ता टी.एम. कृष्णा की कलम से कर्नाटिक संगीत के प्राथमिक तालवाद्य के इतिहास की तहक़ीक़ात मृदंग के अदृश्य परम्परावाहकों अर्थात उसे बनानेवाले कारीगरों का अब तक अनदेखा रहा वृत्तान्त मृदंग कर्नाटिक संगीत के मंच का अभिन्न हिस्सा है। हालाँकि ये यक़ीन करना मुश्किल है कि इस साज को जिस तरह से अब हम जानते हैं, वह सौ से कुछ ही साल पुराना है। जिन बहुतेरे मृदंग वादकों को इस साज के विकास का श्रेय दिया जाता रहा है, उनमें से कोई भी उसकी कारीगरी के बुनियादी तत्व से परिचित नहीं था। यानी जानवरों का चमड़ा, उसकी प्रकृति और वह किस तरह से साज की ताल, गहराई और आवाज़ को प्रभावित करता है। बनाने की प्रक्रिया शिल्प, मानसिक और शारीरिक तौर पर थकाने वाली है। गोल सिरों पर बांधे जाने वाले चमड़े के टुकड़े और उन्हें बाँधने के लिए पट्टियों के साथ सही लकड़ी जुटाना, फिर उसे सही तरह से तराशना, तैयार करना, अंतिम रूप देना और आख़िर में ये तसल्ली करना कि सही थाप और ताल निकल रही है, मृदंग बनाना हर स्तर पर गहरे और बारीक काम की माँग करता है। मृदंग कलाकार के अमूर्त ख़यालों को एक भौतिक सचाई में बदलने के लिए सुन पाने की बहुत महीन क़ाबिलियत चाहिए होती है। मृदंग की कला की जब भी बात की जाती है, कारीगर के योगदान को ख़ारिज कर दिया जाता है, सिर्फ़ मज़दूर या मरम्मत करने वाला बता कर। यह सच है कि महान मृदंग वादक हुए हैं, यह भी सच है कि मृदंग बनाने वाले शानदार कारीगर भी हुए हैं, ज़्यादातर दलित और वे हमेशा कर्नाटिक संगीत समुदाय के हाशिये पर रहे हैं। ‘सेबस्टियन एंड संस’ इन कलाकारों की दुनिया, उनके इतिहास, जिये गये अनुभवों, कथाओं की एक खोज है, जिससे मृदंग से आ रही आवाज़ को लेकर हमारी समझ पहले से ज़्यादा जैविक और पूरी हो पाती है।
Kala Ke Samajik Udgam
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कला-साहित्य-संस्कृति के प्रश्नों पर प्लेखानोव की कृतियों में सर्वोपरि और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं ‘असम्बोधित पात्र’ और ‘कला और सामाजिक जीवन’। कला और साहित्य पर प्लेखानोव की ज़्यादातर कृतियों का मुख्य उद्देश्य कला और इसकी सामाजिक भूमिका को भौतिकवादी दृष्टि से प्रमाणित करना था। इन कृतियों में ‘बेलिस्की की साहित्यिक दृष्टि’ (1897), ‘चेर्निशेव्स्की का सौन्दर्यशास्त्रीय सिद्धान्त’ (1897), ‘असम्बोधित पात्र’ (1890-1900), ‘अठारहवीं सदी के फ्रेंच नाटक और चित्रकला पर समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से एक नज़र’ (1905) तथा ‘कला और सामाजिक जीवन’ (1912) प्रमुख हैं।
कलात्मक सृजन को वस्तुगत जगत से स्वतंत्र माननेवाले और कला को मानवात्मा की अन्तर्भूत अभिव्यक्ति बतानेवाले प्रत्ययवादी सौन्दर्यशास्त्रियों के विपरीत प्लेखानोव ने दर्शाया कि कला की जड़ें वास्तविक जीवन में होती हैं और यह सामाजिक जीवन से ही निःसृत होती है। कला और साहित्य की एक वैज्ञानिक, मार्क्सवादी समझ विकसित करने का प्रयास उनकी सभी कृतियों की विशिष्टता है। ‘कला, कला के लिए’ के विचार को प्लेखानोव ने तीखी आलोचना की। उन्होंने दर्शाया कि यह विचार उन्हीं दौरों में उभरकर आता है जब लेखक और कलाकार अपने इर्द-गिर्द की सामाजिक दशाओं से कट जाते हैं। यह विचार हमेशा ही प्रतिक्रियावादी शासक वर्गों की सेवा करता है लेकिन जब समाज में वर्ग-संघर्ष तीखा होता है तो शासक वर्ग और उसके विचारक ख़ुद ही इस विचार को छोड़ देते हैं और कला को अपने बचाव के एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश करने लगते हैं।
Nirkhe Vahi Nazar
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इस समय भारतीय-कला जगत् में जो मूर्धन्य सक्रिय हैं उनमें गुलाममोहम्मद शेख़ ऊँचा स्थान रखते हैं। वे कला-मूर्धन्य होने के साथ-साथ गुजराती में एक बहुमान्य कवि और कला-चिन्तक भी हैं। बरसों उन्होंने वडोदरा विश्वविद्यालय के कलासंकाय में कला-इतिहास का लोकप्रिय और प्रभावशील अध्यापन भी किया है। इसलिए भी उनकी दृष्टि गहरे इतिहास-बोध में रसी-पगी है। इस पुस्तक में उन्होंने एक बड़े वितान पर गहरा विचार किया है। कला के बारे में गुलाम शेख के लेखक में चित्रकार-मन, कवि-मन और इतिहासकार सब एकमेक हैं और इस रसायन से जो अन्तर्दृष्टि वे रचते हैं वह हमें कला के इतिहास, स्वयं कला और उसके विभिन्न पहलुओं पर, कई मूर्धन्य कलाकारों पर साफ़ दिमाग़ और खुली नज़र से सोचने की उत्तेजना देती है। परम्परा, आधुनिकता, भारतीय बहुलता, सृजन-प्रकिया, जीवन, यात्रा, कला से आशा आदि के बारे में यह ऐसी नज़र है जो निरखती है और उस निरखन को हम आत्मसात् कर स्वयं अपनी नज़र गढ़ें इसके लिए उत्साहित करती है। कला पर इस अनूठी पुस्तक को हिन्दी अनुवाद में रज़ा फ़ाउंडेशन उत्साहपूर्वक प्रस्तुत करने में प्रसन्नता महसूस कर रहा है। —अशोक वाजपेयी
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