Aaj Ki Kala
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About the book
देखते हम सब हैं, लेकिन देखने की कला सीखने और अभ्यास का विषय है। आज का जीवन कुछ ऐसा है कि वस्तुएँ, रंग और स्थितियाँ एक भागमभाग में हमारी आँखों के सामने आती हैं, और इससे पहले कि हम उन्हें ‘देख’ सकें लुप्त भी हो जाती हैं; न तो हम उन चीज़ों से, उनके फैलाव से, उनकी वास्तविकता से परिचित हो पाते हैं और न ही उन छवियों से अपने अनुभव-कोश को समृद्ध कर पाते हैं, जो वे चीज़ें हमारे सामने प्रस्तुत करती हैं। यह कैसी विडम्बना है कि इतनी तरह की और इतनी सारी वस्तुओं के बावजूद हमारी आँखें एक अजीब-सी अजनबीयत के बोझ तले दबी रहती हैं। वरिष्ठ कला-चिन्तक और कवि प्रयाग शुक्ल एक अरसे से कला और कला के आसपास बसे संसार को बहुत ग़ौर से, बहुत बारीक़ी और बहुविध कोणों से देखते रहे हैं, और लगातार हमें अपने देखे हुए से तथा देखने के अपने अनुभव और कलाओं के भीतर आने-जाने की अपनी पूरी प्रक्रिया से भी परिचित कराते रहे हैं। समकालीन कला-जगत की गतिविधियों, उपलब्धियों और कला-परिदृश्य में हो रहे प्रयोगों आदि पर उनकी बराबर नज़र रही है। और, सम्भवत: इस समय हिन्दी में वे ही अकेले हैं जिनके पास आज की कला-प्रवृत्तियों के विषय में कहने के लिए बहुत कुछ हमेशा रहता है। यह पुस्तक उसकी एक बानगी है, जिसमें उन्होंने कला के एक अहम पक्ष यानी ‘देखने के हुनर’ के अलावा समकालीन कला के अन्य अनेक पक्षों पर भी प्रकाश डाला है। कहने की आवश्यकता नहीं कि उनके गद्य की आत्मीयता अपने आप में एक अलग आकर्षण है, जिसके लिए इस पुस्तक को पढ़ा जाना चाहिए।
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देखते हम सब हैं, लेकिन देखने की कला सीखने और अभ्यास का विषय है। आज का जीवन कुछ ऐसा है कि वस्तुएँ, रंग और स्थितियाँ एक भागमभाग में हमारी आँखों के सामने आती हैं, और इससे पहले कि हम उन्हें ‘देख’ सकें लुप्त भी हो जाती हैं; न तो हम उन चीज़ों से, उनके फैलाव से, उनकी वास्तविकता से परिचित हो पाते हैं और न ही उन छवियों से अपने अनुभव-कोश को समृद्ध कर पाते हैं, जो वे चीज़ें हमारे सामने प्रस्तुत करती हैं। यह कैसी विडम्बना है कि इतनी तरह की और इतनी सारी वस्तुओं के बावजूद हमारी आँखें एक अजीब-सी अजनबीयत के बोझ तले दबी रहती हैं।
वरिष्ठ कला-चिन्तक और कवि प्रयाग शुक्ल एक अरसे से कला और कला के आसपास बसे संसार को बहुत ग़ौर से, बहुत बारीक़ी और बहुविध कोणों से देखते रहे हैं, और लगातार हमें अपने देखे हुए से तथा देखने के अपने अनुभव और कलाओं के भीतर आने-जाने की अपनी पूरी प्रक्रिया से भी परिचित कराते रहे हैं। समकालीन कला-जगत की गतिविधियों, उपलब्धियों और कला-परिदृश्य में हो रहे प्रयोगों आदि पर उनकी बराबर नज़र रही है। और, सम्भवत: इस समय हिन्दी में वे ही अकेले हैं जिनके पास आज की कला-प्रवृत्तियों के विषय में कहने के लिए बहुत कुछ हमेशा रहता है। यह पुस्तक उसकी एक बानगी है, जिसमें उन्होंने कला के एक अहम पक्ष यानी ‘देखने के हुनर’ के अलावा समकालीन कला के अन्य अनेक पक्षों पर भी प्रकाश डाला है।
कहने की आवश्यकता नहीं कि उनके गद्य की आत्मीयता अपने आप में एक अलग आकर्षण है, जिसके लिए इस पुस्तक को पढ़ा जाना चाहिए।
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 2nd
- Publication year
- 2007
- Weight
- 190 grams
- ISBN-13
- 9789360863784
- Pages
- 180
- Reading time
- ~6 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14 × 21.5 cm
- Language
- Hindi
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कला और संस्कृति' समय-समय पर लिखे हुए मेरे कुछ निबन्धों का संग्रह है। 'संस्कृति' मानव जीवन की प्रेरक शक्ति और राष्ट्रीय जीवन की आवश्यकता है। वह मानवी जीवन को अध्यात्म प्रेरणा प्रदान करती है। उसे बुद्धि का कुतूहल मात्र नहीं कहा जा सकता। संस्कृति के विषय में भारतीय दृष्टिकोण की इस विशेषता का प्रस्तुत लेखों में विशद वर्णन किया गया है। लोक का जो प्रत्यक्ष जीवन है, उसको जाने बिना हम मानव जीवन को पूरी तरह नहीं समझ सकते। कारण भारतीय संस्कृति में सब भूतों में व्याप्त एक अन्तर्यामी अध्यात्म तत्त्व को जानने पर अधिक बल दिया गया है। हमारी संस्कृति उन समस्त रूपों का समुदाय है जिनकी सृष्टि ही मानवीय प्रयत्नों में यहाँ की गई है। उनकी उदात्त प्रेरणाओं को लेकर ही हमें आगे बढ़ना होगा। स्थूल जीवन में संस्कृति की अभिव्यक्ति ‘कला' को जन्म देती है। कला का सम्बन्ध जीवन के मूर्त रूप से है। कला मानवीय जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है। वह कुछ व्यक्तियों के विलास साधन के लिए नहीं होती। वह शिक्षण, आनन्द और अध्यात्म साधना के उद्देश्य से आगे बढ़ती है। इसी से जहाँ जो सौन्दर्य की परम्परा बची है, उसे सहानुभूति के साथ समझ कर पुन: विकसित करना होगा। भारतीय कला न केवल रूप विधान की दृष्टि से समृद्ध है, वरन् उसकी शब्दावली भी अत्यन्त विकसित है। समय रहते कला की पारिभाषिक शब्दावली की रक्षा करना भी हमारा आवश्यक कर्त्तव्य है। अन्त में यह कहा जा सकता है कि पूर्व मानव के जीवन में जो महत्त्व धर्म और अध्यात्म का था, वही अपने वाले युग में कला और संस्कृति को प्राप्त होगा। —भूमिका से
Kala Ke Samajik Udgam
- Author Name:
Georgi Plekhanov +1
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कला-साहित्य-संस्कृति के प्रश्नों पर प्लेखानोव की कृतियों में सर्वोपरि और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं ‘असम्बोधित पात्र’ और ‘कला और सामाजिक जीवन’। कला और साहित्य पर प्लेखानोव की ज़्यादातर कृतियों का मुख्य उद्देश्य कला और इसकी सामाजिक भूमिका को भौतिकवादी दृष्टि से प्रमाणित करना था। इन कृतियों में ‘बेलिस्की की साहित्यिक दृष्टि’ (1897), ‘चेर्निशेव्स्की का सौन्दर्यशास्त्रीय सिद्धान्त’ (1897), ‘असम्बोधित पात्र’ (1890-1900), ‘अठारहवीं सदी के फ्रेंच नाटक और चित्रकला पर समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से एक नज़र’ (1905) तथा ‘कला और सामाजिक जीवन’ (1912) प्रमुख हैं। कलात्मक सृजन को वस्तुगत जगत से स्वतंत्र माननेवाले और कला को मानवात्मा की अन्तर्भूत अभिव्यक्ति बतानेवाले प्रत्ययवादी सौन्दर्यशास्त्रियों के विपरीत प्लेखानोव ने दर्शाया कि कला की जड़ें वास्तविक जीवन में होती हैं और यह सामाजिक जीवन से ही निःसृत होती है। कला और साहित्य की एक वैज्ञानिक, मार्क्सवादी समझ विकसित करने का प्रयास उनकी सभी कृतियों की विशिष्टता है। ‘कला, कला के लिए’ के विचार को प्लेखानोव ने तीखी आलोचना की। उन्होंने दर्शाया कि यह विचार उन्हीं दौरों में उभरकर आता है जब लेखक और कलाकार अपने इर्द-गिर्द की सामाजिक दशाओं से कट जाते हैं। यह विचार हमेशा ही प्रतिक्रियावादी शासक वर्गों की सेवा करता है लेकिन जब समाज में वर्ग-संघर्ष तीखा होता है तो शासक वर्ग और उसके विचारक ख़ुद ही इस विचार को छोड़ देते हैं और कला को अपने बचाव के एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश करने लगते हैं।
Sheershak Nahin
- Author Name:
Akhilesh 'Bhopal' +1
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यह पुस्तक चित्रकारों पर लिखे गए लेखों का संग्रह है और साथ ही मेरा यात्रा-वृत्तान्त जो उन्नीस सौ सत्तासी में कारन्त महोत्सव जापान के लिए कलाकृति संग्रह अभियान था जिसमें मैंने और अर्चना ने हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान का दौरा किया था। पुस्तक में संगृहीत बाक़ी लेख पिछले पाँच सालों में लिखे गए हैं। —‘आरम्भिक’ से
Bhartiya Kala
- Author Name:
Uday Narayan Rai +1
- Book Type:

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कला संस्कृति की वाहिका है। भारतीय संस्कृति के विविध आयामों में व्याप्त मानवीय एवं रसात्मक तत्त्व उसके कला-रूपों में प्रकट हुए हैं। कला का प्राण है रसात्मकता। रस अथवा आनन्द अथवा आस्वाद्य हमें स्थूल से चेतन सत्ता तक एकरूप कर देता है। मानवीय सम्बन्धों और स्थितियों की विविध भावलीलाओं और उसके माध्यम से चेतना को कला उजागर करती है। अस्तु चेतना का मूल ‘रस’ है। वही आस्वाद्य एवं आनन्द है, जिसे कला उद्घाटित करती है। भारतीय कला जहाँ एक ओर वैज्ञानिक और तकनीकी आधार रखती है, वहीं दूसरी ओर भाव एवं रस को सदैव प्राणतत्त्व बनाकर रखती है। प्रस्तुत ग्रन्थ में अद्यतन पुरातात्त्विक अन्वेषणों एवं निष्कर्षों के साथ-साथ कला के आधारगत शास्त्रों के आलोक में प्राचीन भारतीय कला का समग्र अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। हड़प्पा काल से लेकर पूर्वमध्य काल तक की समस्त कला शैलियों का क्रमागत विकास एवं उनमें निहित प्रतीकों, भाषाओं एवं विलक्षणताओं की गहन समीक्षात्मक व्याख्या प्रस्तुत की गई है। अब तक प्राचीन भारतीय कला का सरल हिन्दी भाषा के माध्यम से समग्र एवं मानक अध्ययन नहीं हो सका था। यह ग्रन्थ सुधी पाठकों, शोधार्थियों एवं कला के विद्यार्थियों के लिए अधुनातन सूचनाओं एवं समीक्षाओं से पूरित होने के कारण बहुत उपयोगी है।
Chhattisgarh Ki Shilpkala
- Author Name:
Niranjan Mahawar
- Book Type:

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छत्तीसगढ़ अपनी पुरासम्पदा की दृष्टि से अत्यन्त समृद्ध है और यहाँ अनेक पुरातात्त्विक महत्त्व के स्थल मौजूद हैं। यहाँ का पुरातात्त्विक इतिहास पूर्व गुप्तकाल से ही उपलब्ध होने लगता है। छत्तीसगढ़ में ऐतिहासिक काल की सभ्यता का विकास आरम्भिक काल से हो गया था, जिसका प्रमाण यहाँ से प्राप्त हुई मुद्राएँ, शिलालेख, ताम्रपत्र एवं पुरासम्पदा हैं। यहाँ अनेक स्थानों से प्राचीन मुद्राएँ (सिक्के) प्राप्त हुई हैं। नारापुर, उदेला, ठठारी (अकलतरा) आदि स्थानों से पञ्च मार्क मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं। प्रदेश में धातु-शिल्प का प्रचलन था और अत्यन्त उच्चकोटि की प्रतिमाएँ यहाँ ढाली जाती थीं। इस प्रदेश में लौह शिल्प की भी प्राचीन परम्परा विद्यमान है। अगरिया जनजाति लौह बनाती थी। इस लोहे से वे लोग खेती के औज़ार तथा दैनंदिन उपयोग में आनेवाली वस्तुएँ तैयार करते थे। छत्तीसगढ़ में ईंटों द्वारा निर्मित मन्दिर शैली भी प्राचीन काल से विद्यमान है। सिरपुर का लक्ष्मण मन्दिर इस शैली की पकाई हुई ईंटों से निर्मित एक विशाल एवं भव्य इमारत है। मृणमूर्तियों की कलाकृतियाँ छत्तीसगढ़ के अनेक पुरातात्त्विक स्थलों से प्राप्त होती हैं। मृणमूर्तियों में खिलौने, मुद्राएँ, पशु आकृतियाँ प्रमुख हैं। ये मृणमूर्तियाँ भी उतनी ही प्राचीन हैं जितनी कि पुरास्थलों से प्राप्त होनेवाली अन्य कलाकृतियाँ व सामग्री। इस पुस्तक में विद्वान लेखक ने छत्तीसगढ़ के सभी पारम्परिक शिल्प-रूपों का प्रामाणिक परिचय देते हुए प्रदेश की बहुमूल्य थाती को सँजोया है। आशा है, पाठक इस ग्रन्थ को उपयोगी पाएँगे और अपनी महान सांस्कृतिक धरोहर से परिचित होंगे।
Dekhne Ke Tareeke
- Author Name:
John Berger +1
- Book Type:

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जॉन बर्जर की इस किताब ने पेंटिंग और कला-आलोचना के बारे में सोचने का तरीक़ा बदल दिया। यह शब्दों और चित्रों के ज़रिए दिखाती है कि हम जो कुछ भी देखते हैं, वह हमेशा सुन्दरता, सत्य, सभ्यता, रूप, स्वाद, वर्ग और लिंग सम्बन्धी हमारे अनेक पूर्वग्रहों से प्रभावित होता है। जॉन बर्जर ऑयल पेंटिंग्स, फ़ोटोग्राफ़्स और ग्राफ़िक कला में छिपे अर्थों की तहदारी की पड़ताल करते हैं और यह तर्क देते हैं कि जब हम देखते हैं, तो हम केवल देख नहीं रहे होते— हम छवियों की भाषा को पढ़ रहे होते हैं। हमारे समय के सबसे प्रभावशाली बुद्धिजीवियों में से एक —ऑब्ज़र्वर कला जगत के मुँह पर एक तमाचा... इस किताब ने ललित कला को पढ़ने और समझने के तरीके में क्रांति ला दी —गार्जियन बर्जर विचारों को उसी तरह सँभालते हैं जैसे एक कलाकार रंगों को सँभालता है’ —जेनेट विंटरसन हम अपने चारों ओर की दुनिया को कैसे देखते हैं? यह उन कुछ निर्णायक कृतियों में से एक है, जिनके रचनात्मक विचारों ने कला, डिज़ाइन और मीडिया पर लेखन के ज़रिए हमारी दृष्टि को हमेशा के लिए बदल दिया।
Sebastian & Sons : A Brief History Of Mrdangam Makers
- Author Name:
T.M. Krishna +1
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संगीत-साधक और सामाजिक कार्यकर्ता टी.एम. कृष्णा की कलम से कर्नाटिक संगीत के प्राथमिक तालवाद्य के इतिहास की तहक़ीक़ात मृदंग के अदृश्य परम्परावाहकों अर्थात उसे बनानेवाले कारीगरों का अब तक अनदेखा रहा वृत्तान्त मृदंग कर्नाटिक संगीत के मंच का अभिन्न हिस्सा है। हालाँकि ये यक़ीन करना मुश्किल है कि इस साज को जिस तरह से अब हम जानते हैं, वह सौ से कुछ ही साल पुराना है। जिन बहुतेरे मृदंग वादकों को इस साज के विकास का श्रेय दिया जाता रहा है, उनमें से कोई भी उसकी कारीगरी के बुनियादी तत्व से परिचित नहीं था। यानी जानवरों का चमड़ा, उसकी प्रकृति और वह किस तरह से साज की ताल, गहराई और आवाज़ को प्रभावित करता है। बनाने की प्रक्रिया शिल्प, मानसिक और शारीरिक तौर पर थकाने वाली है। गोल सिरों पर बांधे जाने वाले चमड़े के टुकड़े और उन्हें बाँधने के लिए पट्टियों के साथ सही लकड़ी जुटाना, फिर उसे सही तरह से तराशना, तैयार करना, अंतिम रूप देना और आख़िर में ये तसल्ली करना कि सही थाप और ताल निकल रही है, मृदंग बनाना हर स्तर पर गहरे और बारीक काम की माँग करता है। मृदंग कलाकार के अमूर्त ख़यालों को एक भौतिक सचाई में बदलने के लिए सुन पाने की बहुत महीन क़ाबिलियत चाहिए होती है। मृदंग की कला की जब भी बात की जाती है, कारीगर के योगदान को ख़ारिज कर दिया जाता है, सिर्फ़ मज़दूर या मरम्मत करने वाला बता कर। यह सच है कि महान मृदंग वादक हुए हैं, यह भी सच है कि मृदंग बनाने वाले शानदार कारीगर भी हुए हैं, ज़्यादातर दलित और वे हमेशा कर्नाटिक संगीत समुदाय के हाशिये पर रहे हैं। ‘सेबस्टियन एंड संस’ इन कलाकारों की दुनिया, उनके इतिहास, जिये गये अनुभवों, कथाओं की एक खोज है, जिससे मृदंग से आ रही आवाज़ को लेकर हमारी समझ पहले से ज़्यादा जैविक और पूरी हो पाती है।
Performing Arts Of Chhattisgarh
- Author Name:
Niranjan Mahawar
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Book Description Awaited
Nirkhe Vahi Nazar
- Author Name:
Gulammohammed Sheikh +4
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इस समय भारतीय-कला जगत् में जो मूर्धन्य सक्रिय हैं उनमें गुलाममोहम्मद शेख़ ऊँचा स्थान रखते हैं। वे कला-मूर्धन्य होने के साथ-साथ गुजराती में एक बहुमान्य कवि और कला-चिन्तक भी हैं। बरसों उन्होंने वडोदरा विश्वविद्यालय के कलासंकाय में कला-इतिहास का लोकप्रिय और प्रभावशील अध्यापन भी किया है। इसलिए भी उनकी दृष्टि गहरे इतिहास-बोध में रसी-पगी है। इस पुस्तक में उन्होंने एक बड़े वितान पर गहरा विचार किया है। कला के बारे में गुलाम शेख के लेखक में चित्रकार-मन, कवि-मन और इतिहासकार सब एकमेक हैं और इस रसायन से जो अन्तर्दृष्टि वे रचते हैं वह हमें कला के इतिहास, स्वयं कला और उसके विभिन्न पहलुओं पर, कई मूर्धन्य कलाकारों पर साफ़ दिमाग़ और खुली नज़र से सोचने की उत्तेजना देती है। परम्परा, आधुनिकता, भारतीय बहुलता, सृजन-प्रकिया, जीवन, यात्रा, कला से आशा आदि के बारे में यह ऐसी नज़र है जो निरखती है और उस निरखन को हम आत्मसात् कर स्वयं अपनी नज़र गढ़ें इसके लिए उत्साहित करती है। कला पर इस अनूठी पुस्तक को हिन्दी अनुवाद में रज़ा फ़ाउंडेशन उत्साहपूर्वक प्रस्तुत करने में प्रसन्नता महसूस कर रहा है। —अशोक वाजपेयी
Chitramay Bharat
- Author Name:
Sudhakar Yadav +1
- Book Type:

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भारतीय भाषाओं में कला-आलोचना के अभाव को किसी हद तक सुधाकर यादव की 'चित्रमय भारत’ दूर करने का एक ऐसा विस्तृत प्रयास है जो अब तक नहीं हुआ है। ...पाठक लक्ष्य करेंगे कि 'चित्रमय भारत’ में आधुनिक नागर चित्रकारों की कला को तो विषय बनाया ही गया है, पर साथ में हमारे आदिवासी अंचलों में काम कर रहे चित्रकारों की कला पर भी उतनी ही गम्भीरता से लिखा गया है। यह इस पुस्तक की विशिष्ट बात है। मसलन, सुधाकर के लिए मक़बूल फ़िदा हुसैन और जनगढ़ सिंह श्याम दोनों की ही चित्रकृतियाँ विचार योग्य हैं और वे दोनों ही भारत की चित्रकला संस्कृति को समृद्ध करती हैं। इस किताब को अन्तिम पृष्ठ तक पढ़ने के बाद पाठक को पिछले सौ वर्षों से अधिक की भारतीय चित्रकला की यात्रा का, उसमें आए नए-नए पड़ावों और प्रस्थानों का ज्ञान तो होगा ही, अनुभव भी बहुत हद तक हो सकेगा। 'चित्रमय भारत’ हमें भारतीय चित्रकला संस्कृति से आत्मीय होने का अवसर प्रदान करती है। इसे पढ़कर पाठक स्वयं को अपनी संस्कृति की चित्रकला से कहीं अधिक निकटता महसूस करेंगे और अपने भीतर इसे और इसके सहारे ख़ुद को अनुभव करने के मार्ग कहीं अधिक सुगमता से अन्वेषित कर सकेंगे। —उदयन वाजपेयी
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