Shrinaresh Mehta Rachanawali : Vols. 1-11
(0)
Author:
Shri Naresh Mehta, Prabhakar ShrotriyaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
11000
8800 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
श्रीनरेश मेहता अपनी परम्परा के प्रति ‘आत्मविस्मृत आधुनिकों’ में नहीं, बल्कि उन आधुनिक कवियों में हैं, जो तमाम आयातित विचारों और प्रवृत्तियों के लिए खुले रहते हुए भी उनकी अधीनता स्वीकार नहीं करते। इतना ही नहीं, सतत एक आधुनिक भारतीय कवि की उपस्थिति भी दर्ज कराते हैं। वे निषेध नहीं करते, वरन् अपरिहार्य हो उठे आयातित विचारों और विचारधाराओं के बीचोबीच अपनी ही संस्कारगत प्रज्ञा से नई लपट उठाते हैं, अपने भीतर से विचारों और मूल्यों का सन्धान करते हैं, जो वैकल्पिक या ‘प्रति’ नहीं हैं, स्वयं संकल्प हैं, जिनकी सन्दर्भवत्ता भी है, प्रासंगिकता भी और सनातनता भी।</p> <p>भाषा के नए प्रयोगों और अन्वेषणों की दृष्टि से श्रीनरेश मेहता का आधुनिक युग में भी कोई सर्जक उल्लंघन नहीं कर सका है। उसका कारण उनका वैदिक, औपनिषदिक, सांस्कृतिक परम्परा में प्रयुक्त भाषा में नवार्थ भरना है; भागवत, वृन्दावन, प्रार्थना, ऋचा, मंत्र, गायत्री, अनुष्टुप, शिवत्व, उपनिषद्, वैष्णवता, उत्सव, यज्ञ, बिल्व–पत्र, यज्ञोपवीत, अश्वत्थ—जैसे पचासों शब्दों और उनके विभिन्न रूपों का सिर्फ़ प्रयोग ही नहीं, इनमें नया अर्थ भरना सर्वथा भाषा का मौलिक अन्वेषण है। इसके अलावा मालवा के लोक–शब्द, बांग्ला–शब्द आदि का भरपूर प्रयोग श्रीनरेश जी की भाषा में मिलता है; और कहना न होगा कि वह सर्जक वास्तव में बहुत बड़ा होता है जो भाषा का सन्धान करता है।</p> <p>श्रीनरेश मेहता के काव्य में प्रकृति की महत् भूमिका है। प्रकृति से उनका बड़ा घरोपा है। उनके भीतर के तार उससे जुड़े हैं। यहाँ तक कि उनका स्वयं का जीवन प्रकृत रहा—अकृत्रिम, सहज। प्रकृति के अनेक रूप, रंग, बिम्ब, सम्बन्ध श्रीनरेश मेहता के काव्य में आद्यन्त खिले हुए हैं। वह उनके सोच और अभिव्यक्ति की सहयात्री है।</p> <p>ग्यारह खंडों में प्रकाशित श्रीनरेश मेहता रचनावली का यह पहला खंड है। इस खंड में ‘बनपाखी! सुनो!!’, ‘बोलने दो चीड़ को’, ‘मेरा समर्पित एकान्त’, ‘उत्सवा’, ‘तुम मेरा मौन हो’, ‘अरण्या’, ‘आखिर समुद्र से तात्पर्य!’ शीर्षक काव्य–संकलन शामिल हैं।
Read moreYou pay ₹999/Year
You will be auto-charged ₹999 every year. Cancel auto-charge anytime.
Benefits with Rachnaye Prime Plus
Author-signed copy
25% off on all MRP of books
Book Recomendation Per Year
Delivery is free for the entire year
Format:
Piracy Free
Express Delivery
Secure Payment
About the Book
श्रीनरेश मेहता अपनी परम्परा के प्रति ‘आत्मविस्मृत आधुनिकों’ में नहीं, बल्कि उन आधुनिक कवियों में हैं, जो तमाम आयातित विचारों और प्रवृत्तियों के लिए खुले रहते हुए भी उनकी अधीनता स्वीकार नहीं करते। इतना ही नहीं, सतत एक आधुनिक भारतीय कवि की उपस्थिति भी दर्ज कराते हैं। वे निषेध नहीं करते, वरन् अपरिहार्य हो उठे आयातित विचारों और विचारधाराओं के बीचोबीच अपनी ही संस्कारगत प्रज्ञा से नई लपट उठाते हैं, अपने भीतर से विचारों और मूल्यों का सन्धान करते हैं, जो वैकल्पिक या ‘प्रति’ नहीं हैं, स्वयं संकल्प हैं, जिनकी सन्दर्भवत्ता भी है, प्रासंगिकता भी और सनातनता भी।</p>
<p>भाषा के नए प्रयोगों और अन्वेषणों की दृष्टि से श्रीनरेश मेहता का आधुनिक युग में भी कोई सर्जक उल्लंघन नहीं कर सका है। उसका कारण उनका वैदिक, औपनिषदिक, सांस्कृतिक परम्परा में प्रयुक्त भाषा में नवार्थ भरना है; भागवत, वृन्दावन, प्रार्थना, ऋचा, मंत्र, गायत्री, अनुष्टुप, शिवत्व, उपनिषद्, वैष्णवता, उत्सव, यज्ञ, बिल्व–पत्र, यज्ञोपवीत, अश्वत्थ—जैसे पचासों शब्दों और उनके विभिन्न रूपों का सिर्फ़ प्रयोग ही नहीं, इनमें नया अर्थ भरना सर्वथा भाषा का मौलिक अन्वेषण है। इसके अलावा मालवा के लोक–शब्द, बांग्ला–शब्द आदि का भरपूर प्रयोग श्रीनरेश जी की भाषा में मिलता है; और कहना न होगा कि वह सर्जक वास्तव में बहुत बड़ा होता है जो भाषा का सन्धान करता है।</p>
<p>श्रीनरेश मेहता के काव्य में प्रकृति की महत् भूमिका है। प्रकृति से उनका बड़ा घरोपा है। उनके भीतर के तार उससे जुड़े हैं। यहाँ तक कि उनका स्वयं का जीवन प्रकृत रहा—अकृत्रिम, सहज। प्रकृति के अनेक रूप, रंग, बिम्ब, सम्बन्ध श्रीनरेश मेहता के काव्य में आद्यन्त खिले हुए हैं। वह उनके सोच और अभिव्यक्ति की सहयात्री है।</p>
<p>ग्यारह खंडों में प्रकाशित श्रीनरेश मेहता रचनावली का यह पहला खंड है। इस खंड में ‘बनपाखी! सुनो!!’, ‘बोलने दो चीड़ को’, ‘मेरा समर्पित एकान्त’, ‘उत्सवा’, ‘तुम मेरा मौन हो’, ‘अरण्या’, ‘आखिर समुद्र से तात्पर्य!’ शीर्षक काव्य–संकलन शामिल हैं।
Book Details
-
ISBN9788180316531
-
Pages3564
-
Avg Reading Time119 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Jalsaghar
- Author Name:
Shri Naresh Mehta
- Book Type:

- Description:
...गोमती में जो लयात्मकता कभी-कभी विलीन हो जाती है, उसे कुमार गन्धर्व और बेगम अख़्तर बारम्बार आवाज़ देते हैं। ठाकुर ओंकारनाथ विद्यापति के पदों की भाँति, बीजों की भाँति धरती पर लोट-पोट जाते हैं...पर इस पिपासा-यात्रा का कहीं अन्त नहीं होता। विलास मुरझा जाता है, शृंगार बासी हो जाता है, कीन कंठों में ही विलीन हो जाता है और तब केवल गायक तथा वादक में से एक अनासक्त संन्यासी जन्म लेता दिखाई देता है...। ...मैं वादक को देख रहा था या उसके टेराकोटा को। किस काल का, युग का वह टेराकोटा था, मैं नहीं जानता। टेराकोटा की कोई लिपि नहीं होती और यदि कोई लिपि होती भी तो मेरे लिए वह व्यर्थ ही होती। मेरा उस संन्यासी से भाषाहीन अबाध परिचय हो चुका था। वीणा थी, सिद्ध वादक था, वादन की अप्रतिमता नि:सन्देह थी और था फाल्गुन रात्रि का वह जलसाघर, पर सब कुछ अपनी निर्मम यथार्थता में वैसा अविश्वसनीय था।... ...जीप भागती चली जा रही थी। जब हम बाँध पर चढ़ रहे थे तब भी वह वादन स्पष्ट था, यद्यपि अब उसकी परिसमाप्ति होने ही जा रही थी। मैं ऐसे वादन की परिसमाप्ति का साक्षात् नहीं कर सकता था। समाप्ति वैसे भी साक्षात् करने के लिए होती भी नहीं। मैं उस विहाग, उस वादन और उस संन्यासी वादक को गंगा-क्षेत्र के उस जलसाघर में छोड़ आया था, परन्तु मेरे साथ उसका टेराकोटा सदा के लिए चला आया। मुझमें निश्चय ही अपराध भाव था कि मैं बहुत बड़ा अपमान करके आ रहा हूँ। मैं इस अग्नितपे टेराकोटा को सम्भव है, जीवन-भर वहन कर सकूँ, पर उस वादन के बाद उस वादक का यदि साक्षात् करना पड़ता तो—तो कौन पार्थसारथी मुझे बचाता?
Sanshay Ki Ek Raat
- Author Name:
Shri Naresh Mehta
- Book Type:

- Description:
‘संशय की एक रात’ में कवि ने राम के भीतर युद्ध के प्रति संशय पैदा कर एक आधुनिक मनुष्य की चिन्ता प्रकट की है, राम के चरित्र की पुनर्रचना की है, जिसकी सम्भावना राम के चरित्र में है और निश्चय ही यह कृति हिन्दी साहित्य की उपलब्धि है। नरेशजी की दृष्टि में राम सनातन प्रज्ञा-पुरुष है, ऐसा पुरुष स्वयं तो इतिहास मुक्त होता है, पर इतिहास किसे मुक्त करता है? क्योंकि इतिहास किसी की व्यक्तिगत निर्मिति नहीं है। फिर भी वह अपने प्रश्नों का उत्तर हर युग में प्रज्ञा-पुरुष से माँगता है, यही अभूतपूर्व संकट नरेश मेहता के राम के सामने है, जो न वाल्मीकि के राम के सामने था, न तुलसी या अन्य कवि के राम के सम्मुख। राम के सामने संशय यह है कि सीता के लिए युद्ध करना सार्वत्रिक है या व्यक्तिगत? क्योंकि राम व्यक्तिगत युद्ध में सेना को, प्रजा को झोंकना नहीं चाहते। संशय राम का है, पर उत्तर उन्हें अकेले नहीं देना है, इतिहास-निर्माता के जो घटक हैं, उन्हें मिलकर समाधान निकालना है जिनमें से प्रत्येक इस प्रश्न के भीतर से अपना अर्थ खोजता है।
Sampoorna Kavitayen : Shrinaresh Mehta Vol. 1-2
- Author Name:
Shri Naresh Mehta
- Book Type:

- Description:
मनुष्य के भीतर जो नाना प्रकार के राग-विराग हैं, उनके बीच जब वह अपने अन्तस् में झाँकता है, उसे एक भारहीन दिगन्तव्यापी सौन्दर्य-चेतना का साक्षात्कार होता है। एक कवि अपनी काव्य-यात्रा में अपने अन्तस् की उस हिरण्यमयी सच्चाई को साक्षात्कृत करता है। सारी करुणताएँ उसकी दृष्टिक्षेत्र के बाहर चली जाती हैं। केवल सौन्दर्य, केवल मंगल, केवल प्रार्थना का ही अहसास बचा रहता है।
श्रीनरेश मेहता की काव्य-दृष्टि में प्रकृति को एक उदात्त रूप में ग्रहण किया गया है। प्रकृति उनकी समूची संस्कृति में एक केन्द्रीय सत्ता बनकर नई क्रान्ति और नया संस्कार प्रदान करती है। प्रकृति से इस प्रकार का साक्षात्कार पुरुष को अपने विकारों से मुक्त कराता है।
श्रीनरेश मेहता की कविताओं में हमें कवि की दृष्टि प्रकृति और पुरुष के उदात्त रूप पर ही गड़ी दिखती है। उनके यहाँ प्रतिस्पर्द्धा के स्थान पर आत्मदान का महत्त्व है। केवल धृति नहीं है, वह उल्लास है, सृजन है, आह्लाद है और एक निरन्तर जीवन्तता है। उसमें संकोच, तिरस्कार या अस्वीकृति नहीं है। वह मनुष्य को एक नव्य मानवीय संस्कार देती है। वह मनुष्य के भीतर जो आसुरी वृत्तियाँ हैं, उन्हें दैवी वृत्तियों में बदलती चलती है।
प्रस्तुत पुस्तक में श्रीनरेश मेहता की अद्यतन कृतियाँ सम्मिलित कर ली गई हैं, जो पूर्व प्रकाशित पुस्तक ‘समिधा’ में नहीं थीं।
Pratham Phalgun
- Author Name:
Shri Naresh Mehta
- Book Type:

- Description:
इसका कथानक उस प्रथम प्रेम की मार्मिकता को अभिव्यक्त करता है जिसका सम्मोहन सार्वकालिक तथा सार्वदेशिक होता है। इस उपन्यास में दो पात्र—गोपा और महिम। आज से तीस-चालीस वर्ष पहले का लखनऊ। परिपार्श्व की इस ऐकान्तिकता के साथ-साथ दो पात्रों का अपना निजपन, जहाँ किसी तीसरे का कोई अर्थ या महत्त्व नहीं। रागात्मकता के किन-किन और कैसे-कैसे प्रसंगों, स्थितियों तथा मुद्राओं से होकर गोपा और महिम यात्रा करते हैं, यह इस उपन्यास की बुनावट, भाषा तथा प्रतीकों के माध्यम से देखा जा सकता है। जिस प्रकार गोपा और महिम को किसी अन्य की अपेक्षा नहीं, वैसी ही तन्मयता इसे पढ़ते हुए मिलती हैं।
Do Ekant
- Author Name:
Shri Naresh Mehta
- Book Type:

- Description:
आधुनिकता सामाजिक ढाँचा ही नहीं है, बल्कि हमारी व्यक्तिगत मानसिक स्थिति और स्वत्व बन गई है। इसका नतीजा यह हुआ है कि प्रेम जैसी निजी अनुभूति पर भी इसका तनाव अनुभव होता है। इसलिए कभी-कभी तो आजीवन प्रेम के स्थान पर हम प्रेम के तनाव में ही रहते होते हैं। इस उपन्यास में वानीरा और विवेक के माध्यम से इस आधुनिक तनाव वाली घटना-हीन वास्तविकता को अत्यन्त सूक्ष्म शैली, चित्रों और मन:स्थितियों के द्वारा श्रीनरेश मेहता ने प्रस्तुत किया है।
Utsava
- Author Name:
Shri Naresh Mehta
- Book Type:

- Description:
कविता, सर्वत्र तथा सार्वकालिक भाव से नित्य उपस्थित है। अपनी अभिव्यक्ति के लिए इन कविताओं ने मुझे माध्यम चुना, तो इसका तात्पर्य भी यही है कि कविता का कोई कर्त्ता नहीं होता; और यदि कोई है, तो वह स्वयं अपनी आत्मकर्ता है, स्वयंसृष्टा है।
अनभिव्यक्त कविता भी परम सत्य या परात्पर-सत्ता की भाँति ही एक अविभक्त-चेतना है, बल्कि चेतना प्रवाह, जो सतत विद्यमान है। अनभिव्यक्त एक, अभिव्यक्त हो जाने पर अनेक हो जाता है, क्योंकि अभिव्यक्तकर्ता अनेक होते हैं। अभिव्यक्ति एक को अनेक बनाती है। कविता भी वस्तुतः एक ही है, उसका रचनात्मक स्वरूप अनेक का हो जाता है। रचना, अनभिव्यक्त कविता का सम्प्रेषित स्वरूप है। ऐसा भी कहा जा सकता है कि रचना, अनभिव्यक्त कविता की प्रतीक है। मूर्ति प्रभु नहीं, प्रभु की प्रतीक होती है। एक प्रकार से रचना, काव्य के महत्- प्रासाद का मात्र प्रवेश द्वार है। रचना, कविता की प्रतीति है, कविता नहीं। कविता का प्राप्य-रूप रचना ही हो सकता है। सर्वत्र, सार्वकालिक होने पर भी वह अप्राप्य है। समुद्र ही मेघ वर्षण का कारण होने पर भी हम समुद्र से सीधे जल नहीं ग्रहण कर सकते। रचना की गुणात्मकता, कविता की न होकर कवि की होती है। कविता जिस भाव, मुद्रा और स्वरूप में अभिव्यक्त होकर रचना कहलाती है, उससे मात्र इतना ही स्पष्ट होता है कि एक कवि विशेष ने कविता का साक्षात किस आनुभाविक स्तर पर किया था।
- श्रीनरेश मेहता
Shabri
- Author Name:
Shri Naresh Mehta
- Book Type:

- Description:
‘शबरी’ में कवि आधुनिकता के अधिक पास होते हैं। उन्होंने लिखा है—‘वाल्मीकि ने सामाजिक वर्ण-व्यवस्था से ऊपर व्यक्ति के आध्यात्मिक स्वत्व एवं असंग कर्म को प्रतिष्ठापित किया और शबरी वही बीज चरित्र है। चरित्र की दृष्टि से शबरी मंत्र चरित्र लगती है'—अपनी छोटी-सी उपस्थिति में सार-भूत। ‘शबरी’ काव्य विचारों की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। एक दलित स्त्री को अपने कर्म-श्रम के ज़रिए ऊपर उठाकर ऋषि मतंग जिस भूमि पर प्रतिष्ठित करते हैं, उससे पौराणिकता की रक्षा भी होती है और वर्ण-व्यवस्था के विरुद्ध उठती आज की आवाज़ को भी बल मिलता है।
Shabd Purush Agyey
- Author Name:
Shri Naresh Mehta
- Book Type:

- Description:
आधुनिक हिन्दी साहित्य के लिए यह एक ऐतिहासिक संयोग था कि उसे ‘अज्ञेय’ जैसा विशिष्ट व्यक्ति मिला, जो न केवल अपने निजी लेखन से ही महत्त्वपूर्ण था, बल्कि साहित्य के सभी क्षेत्रों और विषयों पर भी चिन्तातुर था। शायद भारतेन्दु के बाद ऐसी प्रामाणिक साहित्यिक चिन्ता वात्स्यायन में ही दिखलाई देती है। वस्तुत: यह आलेख उनके लेखन और व्यक्ति का आकलन नहीं, बल्कि स्मरण है, और वह भी संस्मरणात्मक आत्मीय भूमि पर से ही किया गया है। साथ ही एक अग्रज समकालीन को जिस सम्यकता से देखा जाना चाहिए, की चेष्टा है।
Doobte Mastool
- Author Name:
Shri Naresh Mehta
- Book Type:

- Description:
परिस्थितियों के संघात से टूटती-बनती एक अप्रतिम सुन्दर नारी की विवश-गाथा का प्रतीक नाम है—‘डूबते मस्तूल’। वस्तुत: नारी की यह विवशता किसी भी युग में कम नहीं हुई है। उसका विन्यास परिवेश के बदलने के साथ कुछ परिवर्तित भले ही लगे, पर पुरुष कभी उसे वही स्थान और मान्यता नहीं देता जो वह किसी अन्य पुरुष को देता है। स्वयं नारी को अपने इस भोग्या स्वरूप से कितना विद्रोह है पर प्रकृति के विधान का उल्लंघन कर पाना एक सनातन समस्या है। अपने इस प्रथम उपन्यास ‘डूबते मस्तूल’ में नरेश जी ने नारी के एक प्रखर स्वरूप को भावनाओं और घटनाओं, के माध्यम से जब प्रस्तुत किया था सन् 1954 में, तभी से इसकी नायिका रंजना हिन्दी-उपन्यास के पाठकों की स्मृति बन गई।
Uttarkatha : Vol. 1-2
- Author Name:
Shri Naresh Mehta
- Book Type:

- Description:
कालजयी उपन्यास यह ‘पथ बन्धु था’ के बाद भारतीय जीवन का सर्वांगीण परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करनेवाला यह उपन्यास ‘उत्तरकथा’ आधुनिक कथा-साहित्य की न केवल निष्णात ही, बल्कि सम्पूर्ण सांस्कृतिक औपन्यासिक कृति है। स्वरूप का नहीं, प्रयोजन का नाम है महाकाव्य। आज उपन्यास ही महाकाव्य है, एतदर्थ ‘उत्तरकथा' महाकाव्य भी है। देश और काल के विशाल फलक पर चलते साधारण मनुष्य की बड़ी-छोटी परछाइयाँ ही यह संसार है। जब इसी मानवीय संसार की यथार्थता को प्रयोजन-दृष्टि प्राप्त हो जाती है तब मनुष्य सृष्टि मात्र, प्राणि मात्र का प्रतिनिधित्व करनेवाला 'पुरुष' हो जाता है। बड़ी रचनात्मकता कभी भी केवल यथार्थ को ही अन्तिम नहीं मान सकती, क्योंकि मनुष्य की रचना उदात्तता के लिए ही हुई है। इस प्रथम खंड के सारे साधारण एवं अनाम पात्र कोई बड़ा कार्य नहीं करते परन्तु रोज का तपता हुआ जीवन जीते हैं। यह साधारण उदात्तता प्रकारान्तर से हमें भी पूर्ण बनाती है। दूसरे खंड में जब परिवेश का दबाव और अधिक गहराएगा तब मानवीय विवशता तथा व्यवहार के जल का परिवृत्त और भी सुदूर के तटों तक लहराएगा। यह शती मनुष्य की परीक्षा की शती रही है जिसमें अनाम लोगों की साधारणता, विश्वास खंडित एवं क्षत-विक्षत हुए हैं। इस मानवीय जय-पराजय की गाथा से बड़ी कौन-सी भागवत है?
Mahaprashthan
- Author Name:
Shri Naresh Mehta
- Book Type:

- Description:
‘महाप्रस्थान’ का स्रोत ‘महाभारत’ है। सहस्रों वर्षों से भारतीय साहित्य इस महागाथा के अखूट स्रोत से अभिनव सृष्टि करता रहा है। कवि ने अपने आधुनिक चिन्तन के लिए इनका आश्रय लिया है। पुस्तक का विषय पांडवों का ‘स्वर्गारोहण’ है, जिसमें युधिष्ठिर के माध्यम से कवि ने राज्य-व्यवस्था की अकूत शक्ति से उत्पन्न संकट और उसके बरक्स व्यक्ति की रक्षा जैसे प्रश्न उठाए हैं, जो चिरन्तन हैं, परन्तु आपात्काल के सन्दर्भ में प्रासंगिक प्रश्न भी हो गए हैं।
Pravad Parva
- Author Name:
Shri Naresh Mehta
- Book Type:

- Description:
‘प्रवाद पर्व’ में सीता के चरित्र पर धोबी द्वारा लांच्छन लगाने पर उसे दंड देने के मंत्रि-परिषद् के प्रस्ताव और पूर्व में ली गई अग्नि-परीक्षा जैसे अनुचित कार्य का औचित्य सिद्ध करने के लिए राम जिस तरह 'साधारण मनुष्य' की प्रतिष्ठा का तर्क देते हैं और सीता को राजसत्ता से जोड़ते हैं, उसे राष्ट्र-राज्य की तमाम व्याख्याओं, आपात्काल से उठनेवाले तमाम प्रश्नों, सत्ता के विरुद्ध साधारण मनुष्य की सत्ता को महत्त्व देने के तमाम तर्कों के बावजूद आधुनिक नहीं कहा जा सकता। यहाँ तक तो ठीक है कि सीता पर उँगली उठाना राजद्रोह नहीं है और राम के इस प्रश्न का कि 'क्या मैं या सीता राष्ट्र है?' निश्चित ही उत्तर नकारात्मक होगा। ‘प्रवाद पर्व’ की आधुनिकता वास्तव में मूल कथा की परिणति और (राम के) चरित्र की महत्ता से आक्रान्त है।
Uttarkatha : Vol. 2
- Author Name:
Shri Naresh Mehta
- Book Type:

- Description:
‘उत्तरकथा’ के प्रथम खंड को पढ़ते हुए महसूस होता है कि जैसे लेखक, लूसिएँ गोल्डमान के उत्पत्तिमूलक संघटनात्मक समाजशास्त्र के सहारे पुराने मालवा के ख़ौफ़नाक अँधेरे को एक विशिष्ट सामाजिक स्थिति में एक निश्चित वरण की अनिवार्यता का सामना करते हुए उभार रहा है और उजाले में समस्याओं की एक शृंखला प्रस्तुत करते हुए आलोचनात्मक चित्र और चरित्र उकेरते हुए सार्थक समाधान की सम्भावना तक आना चाहता है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह कि पूरा उपन्यास आध्यात्मिक सरोकारों से विच्छिन्न नहीं है। उपन्यास का नायक शिवशंकर आचार्य दुःख-भोग और दायित्व वहन के क्रम में करुणा का अकलंक पुरुष है। ...त्रयम्बक और दुर्गा भारतीय दम्पति के शिवपार्वती जैसे आदर्श हैं। शिवशंकर आचार्य, भारतीय मनीषा की चारित्रिक स्थिति का नाम है। यह चरित्र नहीं है। यह बीज-चरित्र को गोद लेकर वृक्षत्व प्रदान करते हैं...लेखक ने केवल कथा नहीं कही है, बल्कि...उनके बीच से चेतना के अनिवार्य नैरन्तर्य को तलाशा है...तभी तो यह केवल कथा नहीं है, उत्तरकालीन कथा नहीं है, बल्कि प्रश्नों के समाधान की, उत्तर की भी कथा है। —श्री श्रीराम वर्मा (जनपक्ष)
Yah Path Bandhu Tha
- Author Name:
Shri Naresh Mehta
- Book Type:

- Description:
भारतीय स्वाधीनता संग्राम-काल के एक साधारण व्यक्ति श्रीधर ठाकुर की असाधारण-कथा का यह बृहत् उपन्यास श्रीनरेश मेहता के विवादास्पद प्रथम उपन्यास ‘डूबते मस्तूल’ से बिलकुल भिन्न भावभूमि, संस्कार तथा शैली को प्रस्तुत करता है।
कथा-नायक श्रीधर बाबू एक व्यक्ति न रहकर प्रतीक बन गए हैं, उन सब अज्ञात छोटे-छोटे लोगों के जो उस काल के राष्ट्रीय संघर्ष, परम्परागत-निष्ठा तथा वैष्णव-मूल्यों के लिए चुपचाप होम हो गए। इतिहास ऐसे साधारण-जनों को नहीं देखता है, लेकिन उपन्यासकार किसी एक साधारण-जन को इतिहास का महत्त्व दे देता है। लेखक की परिपक्व जीवनी-दृष्टि, जीवनानुभव और कलात्मक-शक्ति ने एक साधारण-जन को सारी मानवीय संवेदना देकर अनुपम बना दिया है।
श्रीनरेश मेहता अपनी भाषा, संस्कार तथा शिल्प के लिए कवियों और गद्यकारों में सर्वथा विशिष्ट माने जाते हैं और यह महत्त्वपूर्ण उपन्यास हमारे इस कथन की पुष्टि करता है।
Meghdoot : Ek Antaryatra
- Author Name:
Prabhakar Shrotriya
- Book Type:

- Description:
‘मेघदूत’ एक कालजयी कृति ही नहीं प्रेम, प्रकृति और निसर्ग के प्रति कालिदास की अनन्य प्रपत्ति भी है। अपने विशिष्ट स्वर, स्वरूप और न्यास में यह काव्य एक अप्रतिम एवं इन्द्रधनुषी भाव-वितान है, जिसमें कृतिकार की अपूर्व परिकल्पना, मौलिक उद्भावना तथा बिम्बों और वर्णों की जीवन्त छवियाँ सहज ही देखी जा सकती हैं। कालिदास ने अपनी यशस्वी कृति ‘मेघदूत’ के द्वारा जिस रूपक-राज्य का निर्माण किया था—पिछली दो सहस्राब्दियों से उसका निरन्तर विकास और विस्तार होता रहा है। विरही यक्ष के मनोजगत में विद्यमान एक आर्तप्रेमी के प्रणयोत्सुक प्रार्थी भाव को अनुषंग बनाकर—अपनी प्राण-प्रियतमा को भेजे जानेवाले विरहातुर सन्देश को कई रचनाकारों, भाष्यकारों और रूपान्तरकारों और चित्रकारों ने अपने-अपने ढंग से, अलग-अलग शैलियों में निरूपित किया है। प्रसंगानुरूप और प्रसंगान्तर परिदृश्य को अपने विरहकातर निवेदन से मुखर करनेवाली इस कालातीत रचना का अनुगायन और अनुकीर्तन न केवल सदियों से होता रहा है, बल्कि आधुनिक और समकालीन पीढ़ियाँ भी इसमें अपनी रचनात्मक भावांजलि लिए खड़ी रही हैं। अपनी सर्जनात्मक समग्रता के नाते और ‘क्लासिकी’ के गुणों से समृद्ध एवं समादृत ‘मेघदूत’ ने काव्य और काव्येतर माध्मयों के द्वारा सहृदय पाठकों, प्रेक्षकों, गायकों और समीक्षकों की क्षमता और आकांक्षाओं के अनुरूप सुदीर्घ रचना-प्रकिया एवं परम्परा को जीवित रखा है। इसी अनुक्रम में हिन्दी के सुपरिचित विद्वान, आलोचक, कवि एवं रचनाकार प्रभाकर श्रोत्रिय ने ‘मेघदूत’ के मार्मिक प्रसंगों, अछूते अनुषंगों—और सबसे बढ़कर—रचनाकार की विराट मनोभूमि का स्पर्श एवं अनुभावन अपनी विदग्ध रचना मनीषा के द्वारा किया है। ‘मेघदूत : एक अन्तर्यात्रा’ पुस्तक प्रेमी और प्रकृति के शाश्वत एवं चिरन्तन आधान को सुललित और सर्जनात्मक आयाम प्रदान करेगी—इसमें सन्देह नहीं।
Phir se Jahanpanah
- Author Name:
Prabhakar Shrotriya
- Book Type:

- Description:
Awating description for this book
Shreshth Bharatiya Ekanki : Vol. 1
- Author Name:
Prabhakar Shrotriya
- Book Type:

- Description:
आज रंगमंच के उपयुक्त सशक्त नाटकों की शायद सबसे अधिक आवश्यकता है। क्योंकि टी.वी. और फ़िल्मों द्वारा फैलाए गए प्रदूषण को सशक्त नाटक ही सही चुनौती दे सकते हैं, परन्तु इस दृष्टि से वर्तमान परिदृश्य बहुत आशाजनक दिखाई नहीं पड़ता। विभिन्न भारतीय भाषाओं में अच्छे नाटकों का लगातार अभाव होता जा रहा है। ऐसी स्थिति में यह बहुत आवश्यक है कि भारतीय भाषाओं में रंगमंच के योग्य उत्कृष्ट नाटकों का परस्पर आदान-प्रदान हो। इसी उद्देश्य से इस पुस्तक के रूप में एक प्रयत्न भारतीय भाषा परिषद् द्वारा किया गया।
दो खंडों में प्रकाशित ‘श्रेष्ठ भारतीय एकांकी : खंड एक’ में ओड़िया, बांग्ला, कन्नड़, मराठी और हिन्दी के श्रेष्ठ एकांकी संकलित हैं। इसमें रंगमंच के उपयुक्त एकांकी ही प्रायः चुने गए
हैं। विभिन्न विभागों का सम्पादन सम्बन्धित भाषाओं के अधिकारी विद्वानों द्वारा किया गया है। उन्होंने भूमिकाओं में अपनी-अपनी भाषा के नाटक और एकांकी साहित्य के विकास और विशिष्टताओं का गहरा विवेचन किया है। इनसे पाठकों को सम्बन्धित भाषाओं के अवदान की पर्याप्त जानकारी मिल सकेगी। एकांकियों के हिन्दी अनुवाद अत्यन्त प्रामाणिक अनुवादकों द्वारा करवाए गए हैं, ताकि नाटक के कथ्य और नाट्य-भाषा दोनों की रक्षा की जा सके।
‘एकांकी’ विधा एक तरह से वर्तमान युग का अवदान और आन्दोलन है। अपने समय की ज्वलन्त समस्याएँ और चिन्ताएँ इनके मूल में होती हैं। ऐसी कृतियाँ एक बड़े पाठक और दर्शक समाज के सम्मुख प्रस्तुत करना आज हमारे समय की माँग है।
आशा है, यह संकलन इस अर्थ में भी उपादेय होगा।
Shreshth Bharatiya Ekanki : Vol. 2
- Author Name:
Prabhakar Shrotriya
- Book Type:

- Description:
आज रंगमंच के उपयुक्त सशक्त नाटकों की शायद सबसे अधिक आवश्यकता है। क्योंकि टी.वी. और फ़िल्मों द्वारा फैलाए गए प्रदूषण को सशक्त नाटक ही सही चुनौती दे सकते हैं, परन्तु इस दृष्टि से वर्तमान परिदृश्य बहुत आशाजनक दिखाई नहीं पड़ता। विभिन्न भारतीय भाषाओं में अच्छे नाटकों का लगातार अभाव होता जा रहा है। ऐसी स्थिति में यह बहुत आवश्यक है कि भारतीय भाषाओं में रंगमंच के योग्य उत्कृष्ट नाटकों का परस्पर आदान-प्रदान हो। इस तरह का एक प्रयत्न भारतीय भाषा परिषद् द्वारा किया गया है।
दो खंडों में प्रकाशित 'श्रेष्ठ भारतीय एकांकी’ के खंड—दो में असमिया, उर्दू, गुजराती, तमिल, तेलुगू तथा मलयालम के श्रेष्ठ एकांकी संकलित हैं। इसमें रंगमंच के उपयुक्त एकांकी ही प्रायः चुने गए हैं। विभिन्न विभागों का सम्पादन सम्बन्धित भाषाओं के अधिकारी विद्वानों द्वारा किया गया है।
उन्होंने भूमिकाओं में अपनी-अपनी भाषा के नाटक और एकांकी साहित्य के विकास और विशिष्टताओं का गहरा विवेचन किया है। इनसे पाठकों को सम्बन्धित भाषाओं के अवदान की पर्याप्त जानकारी मिल सकेगी। एकांकियों के हिन्दी अनुवाद अत्यन्त प्रामाणिक अनुवादकों द्वारा करवाए गए हैं, ताकि नाटक के कथ्य और नाट्य-भाषा दोनों की रक्षा की जा सके।
'एकांकी' विधा एक तरह से वर्तमान युग का अवदान और आन्दोलन है। अपने समय की ज्वलन्त समस्याएँ और चिन्ताएँ इनके मूल में होती हैं। ऐसी कृतियाँ एक बड़े पाठक और दर्शक समाज के सम्मुख प्रस्तुत करना आज हमारे समय की माँग है।
आशा है, यह संकलन इन अर्थ में भी उपादेय होगा।
Kaalyatri Hai Kavita
- Author Name:
Prabhakar Shrotriya
- Book Type:

- Description:
सुपरिचित आलोचक डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय द्वारा हिन्दी कविता की यह काल-यात्रा विशेष महत्त्व रखती है। कोई रचना इतिहास के दौर में क्या रूप लेती है और मानवीय संवेदन की अन्तर्धारा उसमें किन माध्यमों से परिचालित होती है, इसकी प्रामाणिक और गहरी समझ डॉ. श्रोत्रिय को थी। अक्सर इतिहास के कालबोध की परवर्ती दृष्टि के दौर में लोग अतीत की परिस्थितियों और कवि-सीमाओं को उपेक्षित कर जाते हैं। इस पुस्तक में ऐसा आवश्यक लचीलापन है, जिससे यह अतीत को जहाँ आधुनिकता की सार्थकता में देख सकी है, वहीं युग और कवि सीमा को भी संवेदित परकाय-प्रवेश की भाँति अपने मौलिक स्वरूप में प्रतिष्ठित कर सकी है। इससे कविता इतिवृत्त नहीं रहती, बल्कि वह आगामी काल-प्रवाह में सक्रिय और प्रेरक साझीदार प्रतीत होती है। अपने समय की नवीनतम काव्य-प्रवृत्तियों को भी लेखक ने गहराई से पकड़ा है, तभी वह आदिकाल से लेकर सातवें, आठवें और नवें दशक तक के विभिन्न कविता-दौरों पर समान रूप से विचार कर सका है। यही नहीं, इस संस्करण के लिए पुस्तक को संशोधित करते हुए डॉ. श्रोत्रिय ने दो नए अध्याय भी जोड़े थे। इनमें से एक है ‘भारतीय साहित्य की परम्परा’ और दूसरा, ‘नवाँ दशक : बदलाव की नई पहल’। लम्बी कविता और हिन्दी-नवगीत पर पहले से ही दो अध्याय पुस्तक में हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि डॉ. श्रोत्रिय की यह आलोचना-कृति हिन्दी कविता का एक व्यापक और मूल्यवान अध्ययन है और मनुष्यता के चिर उपेक्षित हिस्से की पीड़ाओं को काव्य-साहित्य की प्रमुख मानवीय चिन्ताओं में शामिल करने का आग्रह करती है।
Prem Ke Pahle Basant Me
- Author Name:
Rashmi Bhardwaj
- Book Type:


- Description:
ख़ुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वा की धार। जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार।।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book