Jalsaghar
(0)
Author:
Shri Naresh MehtaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
120
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Available
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...गोमती में जो लयात्मकता कभी-कभी विलीन हो जाती है, उसे कुमार गन्धर्व और बेगम अख़्तर बारम्बार आवाज़ देते हैं। ठाकुर ओंकारनाथ विद्यापति के पदों की भाँति, बीजों की भाँति धरती पर लोट-पोट जाते हैं...पर इस पिपासा-यात्रा का कहीं अन्त नहीं होता। विलास मुरझा जाता है, शृंगार बासी हो जाता है, कीन कंठों में ही विलीन हो जाता है और तब केवल गायक तथा वादक में से एक अनासक्त संन्यासी जन्म लेता दिखाई देता है...। ...मैं वादक को देख रहा था या उसके टेराकोटा को। किस काल का, युग का वह टेराकोटा था, मैं नहीं जानता। टेराकोटा की कोई लिपि नहीं होती और यदि कोई लिपि होती भी तो मेरे लिए वह व्यर्थ ही होती। मेरा उस संन्यासी से भाषाहीन अबाध परिचय हो चुका था। वीणा थी, सिद्ध वादक था, वादन की अप्रतिमता नि:सन्देह थी और था फाल्गुन रात्रि का वह जलसाघर, पर सब कुछ अपनी निर्मम यथार्थता में वैसा अविश्वसनीय था।... ...जीप भागती चली जा रही थी। जब हम बाँध पर चढ़ रहे थे तब भी वह वादन स्पष्ट था, यद्यपि अब उसकी परिसमाप्ति होने ही जा रही थी। मैं ऐसे वादन की परिसमाप्ति का साक्षात् नहीं कर सकता था। समाप्ति वैसे भी साक्षात् करने के लिए होती भी नहीं। मैं उस विहाग, उस वादन और उस संन्यासी वादक को गंगा-क्षेत्र के उस जलसाघर में छोड़ आया था, परन्तु मेरे साथ उसका टेराकोटा सदा के लिए चला आया। मुझमें निश्चय ही अपराध भाव था कि मैं बहुत बड़ा अपमान करके आ रहा हूँ। मैं इस अग्नितपे टेराकोटा को सम्भव है, जीवन-भर वहन कर सकूँ, पर उस वादन के बाद उस वादक का यदि साक्षात् करना पड़ता तो—तो कौन पार्थसारथी मुझे बचाता?</p> <p>
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...गोमती में जो लयात्मकता कभी-कभी विलीन हो जाती है, उसे कुमार गन्धर्व और बेगम अख़्तर बारम्बार आवाज़ देते हैं। ठाकुर ओंकारनाथ विद्यापति के पदों की भाँति, बीजों की भाँति धरती पर लोट-पोट जाते हैं...पर इस पिपासा-यात्रा का कहीं अन्त नहीं होता। विलास मुरझा जाता है, शृंगार बासी हो जाता है, कीन कंठों में ही विलीन हो जाता है और तब केवल गायक तथा वादक में से एक अनासक्त संन्यासी जन्म लेता दिखाई देता है...। ...मैं वादक को देख रहा था या उसके टेराकोटा को। किस काल का, युग का वह टेराकोटा था, मैं नहीं जानता। टेराकोटा की कोई लिपि नहीं होती और यदि कोई लिपि होती भी तो मेरे लिए वह व्यर्थ ही होती। मेरा उस संन्यासी से भाषाहीन अबाध परिचय हो चुका था। वीणा थी, सिद्ध वादक था, वादन की अप्रतिमता नि:सन्देह थी और था फाल्गुन रात्रि का वह जलसाघर, पर सब कुछ अपनी निर्मम यथार्थता में वैसा अविश्वसनीय था।... ...जीप भागती चली जा रही थी। जब हम बाँध पर चढ़ रहे थे तब भी वह वादन स्पष्ट था, यद्यपि अब उसकी परिसमाप्ति होने ही जा रही थी। मैं ऐसे वादन की परिसमाप्ति का साक्षात् नहीं कर सकता था। समाप्ति वैसे भी साक्षात् करने के लिए होती भी नहीं। मैं उस विहाग, उस वादन और उस संन्यासी वादक को गंगा-क्षेत्र के उस जलसाघर में छोड़ आया था, परन्तु मेरे साथ उसका टेराकोटा सदा के लिए चला आया। मुझमें निश्चय ही अपराध भाव था कि मैं बहुत बड़ा अपमान करके आ रहा हूँ। मैं इस अग्नितपे टेराकोटा को सम्भव है, जीवन-भर वहन कर सकूँ, पर उस वादन के बाद उस वादक का यदि साक्षात् करना पड़ता तो—तो कौन पार्थसारथी मुझे बचाता?</p>
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Book Details
-
ISBN9788180318269
-
Pages104
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: आयशा आरफ़ीन की कहानियाँ मेरे लिए ख़ुशगवार हैरत और मसर्रत का सबब बनी हैं। किसी भी नए लिखने वाले से ऐसी उम्मीद करना कि उनकी कहानियाँ मज़बूत और पुख़्ता हों, मुश्किल है लेकिन आयशा आरफ़ीन की कहानियों में एक ख़ास क़िस्म की मज़बूती भी है और इनकी बुनावट भी पुख़्ता है। ‘मिर्र’ की कहानियों की सतह बुलन्द है और प्लॉट, थीम और चरित्र-चित्रण के हवाले से भी ये कहानियाँ मुकम्मल हैं। इन सब से बढ़ कर आयशा आरफ़ीन के आख्यान एक अजीब से असरार से भरे हुए हैं जिसे हम रहस्य का नाम दे सकते हैं। यही तत्व उनकी कहानियों का सब से बड़ा जौहर (Essence) है जिसकी जड़ें उनके किरदारों के वजूदी-संकट (Existential Crisis) में अन्दर तक समाई हुई हैं। मैं आयशा आरफ़ीन को इतनी उम्दा और दिल को छू लेने वाली कहानियाँ लिखने के लिए दिल से मुबारकबाद पेश करता हूँ और मुझे यक़ीन है कि उनका ये कहानी-संग्रह संजीदा साहित्यिक गलियारों में बड़े पैमाने पर स्वीकृति हासिल करेगा। — ख़ालिद जावेद
Aabhar Tumhara
- Author Name:
Meenu Tripathi
- Book Type:

- Description: जीवन के विभिन्न पहलुओं को उजागर करती तथा सामाजिक सरोकारों को परिलक्षित करती सात कहानियों को अपने में समाहित किए मीनू त्रिपाठी का चौथा कथा-संग्रह ‘आभार तुम्हारा’ पाठकों को साहित्य के नए धरातल से परिचित कराने में सक्षम है। सातों कहानियाँ मानव जीवन से जुड़ी क्लिष्टताओं, भावनात्मक-मानसिक द्वंद्वों तथा कालबाह्य सामाजिक मान्यताओं को न केवल उजागर करती हैं, अपितु पाठकों की आशा और अनुमान के विपरीत सर्वथा नई परिणति के दर्शन कराती हैं। समकालीन भाषा-शैली की प्रधानता की खदबदाहट के बीच पात्रों के अनुरूप देशज भाषा का तड़का पाठक की पठनीय भूख को आस्वादन से तृप्त करने में सक्षम है। सात मुक्तामणियों-सा सुशोभित सात कहानियों का मनोरंजक तथा पठनीय कहानी-संग्रह।
Pratinidhi Kahaniyan : Amarkant
- Author Name:
Amarkant
- Book Type:

- Description: अमरकान्त की कहानियों में मध्यवर्ग, विशेषकर निम्न-मध्यवर्ग के जीवनानुभवों और जिजीविषाओं का बेहद प्रभावशाली और अन्तरंग चित्रण मिलता है। अक्सर सपाट-से नज़र आनेवाले कथ्यों में भी वे अपने जीवन्त मानवीय संस्पर्श के कारण अनोखी आभा पैदा कर देते हैं। सहज-सरल रूपबन्धवाली ये कहानियाँ ज़िन्दगी की जटिलताओं को जिस तरह समेटे रहती हैं, कभी-कभी उससे चकित रह जाना पड़ता है। लेकिन यह अमरकान्त की ख़ास शैली है। अमरकान्त के व्यक्तित्व की तरह उनकी भाषा में भी एक ख़ास क़िस्म की फक्कड़ता है। लोक-जीवन के मुहावरों और देशज शब्दों के प्रयोग से उनकी भाषा में माटी का सहज स्पर्श तथा ऐसी सोंधी गन्ध रच-बस जाती है जो पाठकों को किसी छद्म उदात्तता से परे, बहुत ही निजी लोक में ले जाती है। उनमें छिपे हुए व्यंग्य से सामान्य स्थितियाँ भी बेहद अर्थव्यंजक हो उठती हैं। अमरकान्त के विभिन्न कहानी-संग्रहों में चरित्रों का विशाल फलक ‘ज़िन्दगी और जोंक’ से लेकर ‘मित्र मिलन’ तक फैला हुआ है। उन्ही संग्रहों की लगभग सब चर्चित कहानियाँ एक जगह एकत्र होने के कारण इस संकलन की उपादेयता निश्चित रूप से काफ़ी बढ़ गई है।
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