Jalsaghar
(0)
Author:
Naresh MehtaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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...गोमती में जो लयात्मकता कभी-कभी विलीन हो जाती है, उसे कुमार गन्धर्व और बेगम अख़्तर बारम्बार आवाज़ देते हैं। ठाकुर ओंकारनाथ विद्यापति के पदों की भाँति, बीजों की भाँति धरती पर लोट-पोट जाते हैं...पर इस पिपासा-यात्रा का कहीं अन्त नहीं होता। विलास मुरझा जाता है, शृंगार बासी हो जाता है, कीन कंठों में ही विलीन हो जाता है और तब केवल गायक तथा वादक में से एक अनासक्त संन्यासी जन्म लेता दिखाई देता है...। ...मैं वादक को देख रहा था या उसके टेराकोटा को। किस काल का, युग का वह टेराकोटा था, मैं नहीं जानता। टेराकोटा की कोई लिपि नहीं होती और यदि कोई लिपि होती भी तो मेरे लिए वह व्यर्थ ही होती। मेरा उस संन्यासी से भाषाहीन अबाध परिचय हो चुका था। वीणा थी, सिद्ध वादक था, वादन की अप्रतिमता नि:सन्देह थी और था फाल्गुन रात्रि का वह जलसाघर, पर सब कुछ अपनी निर्मम यथार्थता में वैसा अविश्वसनीय था।... ...जीप भागती चली जा रही थी। जब हम बाँध पर चढ़ रहे थे तब भी वह वादन स्पष्ट था, यद्यपि अब उसकी परिसमाप्ति होने ही जा रही थी। मैं ऐसे वादन की परिसमाप्ति का साक्षात् नहीं कर सकता था। समाप्ति वैसे भी साक्षात् करने के लिए होती भी नहीं। मैं उस विहाग, उस वादन और उस संन्यासी वादक को गंगा-क्षेत्र के उस जलसाघर में छोड़ आया था, परन्तु मेरे साथ उसका टेराकोटा सदा के लिए चला आया। मुझमें निश्चय ही अपराध भाव था कि मैं बहुत बड़ा अपमान करके आ रहा हूँ। मैं इस अग्नितपे टेराकोटा को सम्भव है, जीवन-भर वहन कर सकूँ, पर उस वादन के बाद उस वादक का यदि साक्षात् करना पड़ता तो—तो कौन पार्थसारथी मुझे बचाता?</p> <p>
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About the Book
...गोमती में जो लयात्मकता कभी-कभी विलीन हो जाती है, उसे कुमार गन्धर्व और बेगम अख़्तर बारम्बार आवाज़ देते हैं। ठाकुर ओंकारनाथ विद्यापति के पदों की भाँति, बीजों की भाँति धरती पर लोट-पोट जाते हैं...पर इस पिपासा-यात्रा का कहीं अन्त नहीं होता। विलास मुरझा जाता है, शृंगार बासी हो जाता है, कीन कंठों में ही विलीन हो जाता है और तब केवल गायक तथा वादक में से एक अनासक्त संन्यासी जन्म लेता दिखाई देता है...। ...मैं वादक को देख रहा था या उसके टेराकोटा को। किस काल का, युग का वह टेराकोटा था, मैं नहीं जानता। टेराकोटा की कोई लिपि नहीं होती और यदि कोई लिपि होती भी तो मेरे लिए वह व्यर्थ ही होती। मेरा उस संन्यासी से भाषाहीन अबाध परिचय हो चुका था। वीणा थी, सिद्ध वादक था, वादन की अप्रतिमता नि:सन्देह थी और था फाल्गुन रात्रि का वह जलसाघर, पर सब कुछ अपनी निर्मम यथार्थता में वैसा अविश्वसनीय था।... ...जीप भागती चली जा रही थी। जब हम बाँध पर चढ़ रहे थे तब भी वह वादन स्पष्ट था, यद्यपि अब उसकी परिसमाप्ति होने ही जा रही थी। मैं ऐसे वादन की परिसमाप्ति का साक्षात् नहीं कर सकता था। समाप्ति वैसे भी साक्षात् करने के लिए होती भी नहीं। मैं उस विहाग, उस वादन और उस संन्यासी वादक को गंगा-क्षेत्र के उस जलसाघर में छोड़ आया था, परन्तु मेरे साथ उसका टेराकोटा सदा के लिए चला आया। मुझमें निश्चय ही अपराध भाव था कि मैं बहुत बड़ा अपमान करके आ रहा हूँ। मैं इस अग्नितपे टेराकोटा को सम्भव है, जीवन-भर वहन कर सकूँ, पर उस वादन के बाद उस वादक का यदि साक्षात् करना पड़ता तो—तो कौन पार्थसारथी मुझे बचाता?</p>
<p>
Book Details
-
ISBN9788180318269
-
Pages104
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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