Mahaprashthan
(0)
₹
150
120 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
‘महाप्रस्थान’ का स्रोत ‘महाभारत’ है। सहस्रों वर्षों से भारतीय साहित्य इस महागाथा के अखूट स्रोत से अभिनव सृष्टि करता रहा है। कवि ने अपने आधुनिक चिन्तन के लिए इनका आश्रय लिया है। पुस्तक का विषय पांडवों का ‘स्वर्गारोहण’ है, जिसमें युधिष्ठिर के माध्यम से कवि ने राज्य-व्यवस्था की अकूत शक्ति से उत्पन्न संकट और उसके बरक्स व्यक्ति की रक्षा जैसे प्रश्न उठाए हैं, जो चिरन्तन हैं, परन्तु आपात्काल के सन्दर्भ में प्रासंगिक प्रश्न भी हो गए हैं।
Read moreDon’t Miss Out
Pick a membership and see exactly what it gets you
- 15 Free Deliveries
- 1 Free Book up to ₹500 MRP
- 0% off every book, every time
Subscribed already? Continue to your
benefits Login
You pay ₹1,499/Year
You will be auto-charged ₹1,499 every year. Cancel auto-charge anytime.
Benefits with Rachnaye Connoisseur
1 Free Physical Book up to ₹500 MRP
Personal Recommendations
15 Free Deliveries Per Year
Format:
Piracy Free
Express Delivery
Secure Payment
About the Book
‘महाप्रस्थान’ का स्रोत ‘महाभारत’ है। सहस्रों वर्षों से भारतीय साहित्य इस महागाथा के अखूट स्रोत से अभिनव सृष्टि करता रहा है। कवि ने अपने आधुनिक चिन्तन के लिए इनका आश्रय लिया है। पुस्तक का विषय पांडवों का ‘स्वर्गारोहण’ है, जिसमें युधिष्ठिर के माध्यम से कवि ने राज्य-व्यवस्था की अकूत शक्ति से उत्पन्न संकट और उसके बरक्स व्यक्ति की रक्षा जैसे प्रश्न उठाए हैं, जो चिरन्तन हैं, परन्तु आपात्काल के सन्दर्भ में प्रासंगिक प्रश्न भी हो गए हैं।
Book Details
-
ISBN9788180316746
-
Pages109
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Shabri
- Author Name:
Naresh Mehta
- Book Type:

- Description:
‘शबरी’ में कवि आधुनिकता के अधिक पास होते हैं। उन्होंने लिखा है—‘वाल्मीकि ने सामाजिक वर्ण-व्यवस्था से ऊपर व्यक्ति के आध्यात्मिक स्वत्व एवं असंग कर्म को प्रतिष्ठापित किया और शबरी वही बीज चरित्र है। चरित्र की दृष्टि से शबरी मंत्र चरित्र लगती है'—अपनी छोटी-सी उपस्थिति में सार-भूत। ‘शबरी’ काव्य विचारों की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। एक दलित स्त्री को अपने कर्म-श्रम के ज़रिए ऊपर उठाकर ऋषि मतंग जिस भूमि पर प्रतिष्ठित करते हैं, उससे पौराणिकता की रक्षा भी होती है और वर्ण-व्यवस्था के विरुद्ध उठती आज की आवाज़ को भी बल मिलता है।
Sampoorna Kavitayen : Shrinaresh Mehta Vol. 1-2
- Author Name:
Naresh Mehta
- Book Type:

- Description:
मनुष्य के भीतर जो नाना प्रकार के राग-विराग हैं, उनके बीच जब वह अपने अन्तस् में झाँकता है, उसे एक भारहीन दिगन्तव्यापी सौन्दर्य-चेतना का साक्षात्कार होता है। एक कवि अपनी काव्य-यात्रा में अपने अन्तस् की उस हिरण्यमयी सच्चाई को साक्षात्कृत करता है। सारी करुणताएँ उसकी दृष्टिक्षेत्र के बाहर चली जाती हैं। केवल सौन्दर्य, केवल मंगल, केवल प्रार्थना का ही अहसास बचा रहता है। श्रीनरेश मेहता की काव्य-दृष्टि में प्रकृति को एक उदात्त रूप में ग्रहण किया गया है। प्रकृति उनकी समूची संस्कृति में एक केन्द्रीय सत्ता बनकर नई क्रान्ति और नया संस्कार प्रदान करती है। प्रकृति से इस प्रकार का साक्षात्कार पुरुष को अपने विकारों से मुक्त कराता है। श्रीनरेश मेहता की कविताओं में हमें कवि की दृष्टि प्रकृति और पुरुष के उदात्त रूप पर ही गड़ी दिखती है। उनके यहाँ प्रतिस्पर्द्धा के स्थान पर आत्मदान का महत्त्व है। केवल धृति नहीं है, वह उल्लास है, सृजन है, आह्लाद है और एक निरन्तर जीवन्तता है। उसमें संकोच, तिरस्कार या अस्वीकृति नहीं है। वह मनुष्य को एक नव्य मानवीय संस्कार देती है। वह मनुष्य के भीतर जो आसुरी वृत्तियाँ हैं, उन्हें दैवी वृत्तियों में बदलती चलती है। प्रस्तुत पुस्तक में श्रीनरेश मेहता की अद्यतन कृतियाँ सम्मिलित कर ली गई हैं, जो पूर्व प्रकाशित पुस्तक ‘समिधा’ में नहीं थीं।
Utsava
- Author Name:
Naresh Mehta
- Book Type:

- Description:
कविता, सर्वत्र तथा सार्वकालिक भाव से नित्य उपस्थित है। अपनी अभिव्यक्ति के लिए इन कविताओं ने मुझे माध्यम चुना, तो इसका तात्पर्य भी यही है कि कविता का कोई कर्त्ता नहीं होता; और यदि कोई है, तो वह स्वयं अपनी आत्मकर्ता है, स्वयंसृष्टा है। अनभिव्यक्त कविता भी परम सत्य या परात्पर-सत्ता की भाँति ही एक अविभक्त-चेतना है, बल्कि चेतना प्रवाह, जो सतत विद्यमान है। अनभिव्यक्त एक, अभिव्यक्त हो जाने पर अनेक हो जाता है, क्योंकि अभिव्यक्तकर्ता अनेक होते हैं। अभिव्यक्ति एक को अनेक बनाती है। कविता भी वस्तुतः एक ही है, उसका रचनात्मक स्वरूप अनेक का हो जाता है। रचना, अनभिव्यक्त कविता का सम्प्रेषित स्वरूप है। ऐसा भी कहा जा सकता है कि रचना, अनभिव्यक्त कविता की प्रतीक है। मूर्ति प्रभु नहीं, प्रभु की प्रतीक होती है। एक प्रकार से रचना, काव्य के महत्- प्रासाद का मात्र प्रवेश द्वार है। रचना, कविता की प्रतीति है, कविता नहीं। कविता का प्राप्य-रूप रचना ही हो सकता है। सर्वत्र, सार्वकालिक होने पर भी वह अप्राप्य है। समुद्र ही मेघ वर्षण का कारण होने पर भी हम समुद्र से सीधे जल नहीं ग्रहण कर सकते। रचना की गुणात्मकता, कविता की न होकर कवि की होती है। कविता जिस भाव, मुद्रा और स्वरूप में अभिव्यक्त होकर रचना कहलाती है, उससे मात्र इतना ही स्पष्ट होता है कि एक कवि विशेष ने कविता का साक्षात किस आनुभाविक स्तर पर किया था। - श्रीनरेश मेहता
Sanshay Ki Ek Raat
- Author Name:
Naresh Mehta
- Book Type:

- Description:
‘संशय की एक रात’ में कवि ने राम के भीतर युद्ध के प्रति संशय पैदा कर एक आधुनिक मनुष्य की चिन्ता प्रकट की है, राम के चरित्र की पुनर्रचना की है, जिसकी सम्भावना राम के चरित्र में है और निश्चय ही यह कृति हिन्दी साहित्य की उपलब्धि है। नरेश जी की दृष्टि में राम सनातन प्रज्ञा-पुरुष है, ऐसा पुरुष स्वयं तो इतिहास मुक्त होता है, पर इतिहास किसे मुक्त करता है? क्योंकि इतिहास किसी की व्यक्तिगत निर्मिति नहीं है। फिर भी वह अपने प्रश्नों का उत्तर हर युग में प्रज्ञा-पुरुष से माँगता है, यही अभूतपूर्व संकट नरेश मेहता के राम के सामने है, जो न वाल्मीकि के राम के सामने था, न तुलसी या अन्य कवि के राम के सम्मुख। राम के सामने संशय यह है कि सीता के लिए युद्ध करना सार्वत्रिक है या व्यक्तिगत? क्योंकि राम व्यक्तिगत युद्ध में सेना को, प्रजा को झोंकना नहीं चाहते। संशय राम का है, पर उत्तर उन्हें अकेले नहीं देना है, इतिहास-निर्माता के जो घटक हैं, उन्हें मिलकर समाधान निकालना है जिनमें से प्रत्येक इस प्रश्न के भीतर से अपना अर्थ खोजता है।
Pravad Parva
- Author Name:
Naresh Mehta
- Book Type:

- Description:
‘प्रवाद पर्व’ में सीता के चरित्र पर धोबी द्वारा लांच्छन लगाने पर उसे दंड देने के मंत्रि-परिषद् के प्रस्ताव और पूर्व में ली गई अग्नि-परीक्षा जैसे अनुचित कार्य का औचित्य सिद्ध करने के लिए राम जिस तरह 'साधारण मनुष्य' की प्रतिष्ठा का तर्क देते हैं और सीता को राजसत्ता से जोड़ते हैं, उसे राष्ट्र-राज्य की तमाम व्याख्याओं, आपात्काल से उठनेवाले तमाम प्रश्नों, सत्ता के विरुद्ध साधारण मनुष्य की सत्ता को महत्त्व देने के तमाम तर्कों के बावजूद आधुनिक नहीं कहा जा सकता। यहाँ तक तो ठीक है कि सीता पर उँगली उठाना राजद्रोह नहीं है और राम के इस प्रश्न का कि 'क्या मैं या सीता राष्ट्र है?' निश्चित ही उत्तर नकारात्मक होगा। ‘प्रवाद पर्व’ की आधुनिकता वास्तव में मूल कथा की परिणति और (राम के) चरित्र की महत्ता से आक्रान्त है।
Shrinaresh Mehta Rachanawali : Vols. 1-11
- Author Name:
Naresh Mehta +1
- Book Type:

- Description:
श्रीनरेश मेहता अपनी परम्परा के प्रति ‘आत्मविस्मृत आधुनिकों’ में नहीं, बल्कि उन आधुनिक कवियों में हैं, जो तमाम आयातित विचारों और प्रवृत्तियों के लिए खुले रहते हुए भी उनकी अधीनता स्वीकार नहीं करते। इतना ही नहीं, सतत एक आधुनिक भारतीय कवि की उपस्थिति भी दर्ज कराते हैं। वे निषेध नहीं करते, वरन् अपरिहार्य हो उठे आयातित विचारों और विचारधाराओं के बीचोबीच अपनी ही संस्कारगत प्रज्ञा से नई लपट उठाते हैं, अपने भीतर से विचारों और मूल्यों का सन्धान करते हैं, जो वैकल्पिक या ‘प्रति’ नहीं हैं, स्वयं संकल्प हैं, जिनकी सन्दर्भवत्ता भी है, प्रासंगिकता भी और सनातनता भी। भाषा के नए प्रयोगों और अन्वेषणों की दृष्टि से श्रीनरेश मेहता का आधुनिक युग में भी कोई सर्जक उल्लंघन नहीं कर सका है। उसका कारण उनका वैदिक, औपनिषदिक, सांस्कृतिक परम्परा में प्रयुक्त भाषा में नवार्थ भरना है; भागवत, वृन्दावन, प्रार्थना, ऋचा, मंत्र, गायत्री, अनुष्टुप, शिवत्व, उपनिषद्, वैष्णवता, उत्सव, यज्ञ, बिल्व–पत्र, यज्ञोपवीत, अश्वत्थ—जैसे पचासों शब्दों और उनके विभिन्न रूपों का सिर्फ़ प्रयोग ही नहीं, इनमें नया अर्थ भरना सर्वथा भाषा का मौलिक अन्वेषण है। इसके अलावा मालवा के लोक–शब्द, बांग्ला–शब्द आदि का भरपूर प्रयोग श्रीनरेश जी की भाषा में मिलता है; और कहना न होगा कि वह सर्जक वास्तव में बहुत बड़ा होता है जो भाषा का सन्धान करता है। श्रीनरेश मेहता के काव्य में प्रकृति की महत् भूमिका है। प्रकृति से उनका बड़ा घरोपा है। उनके भीतर के तार उससे जुड़े हैं। यहाँ तक कि उनका स्वयं का जीवन प्रकृत रहा—अकृत्रिम, सहज। प्रकृति के अनेक रूप, रंग, बिम्ब, सम्बन्ध श्रीनरेश मेहता के काव्य में आद्यन्त खिले हुए हैं। वह उनके सोच और अभिव्यक्ति की सहयात्री है। ग्यारह खंडों में प्रकाशित श्रीनरेश मेहता रचनावली का यह पहला खंड है। इस खंड में ‘बनपाखी! सुनो!!’, ‘बोलने दो चीड़ को’, ‘मेरा समर्पित एकान्त’, ‘उत्सवा’, ‘तुम मेरा मौन हो’, ‘अरण्या’, ‘आखिर समुद्र से तात्पर्य!’ शीर्षक काव्य–संकलन शामिल हैं।
Do Ekant
- Author Name:
Naresh Mehta
- Book Type:

- Description:
आधुनिकता सामाजिक ढाँचा ही नहीं है, बल्कि हमारी व्यक्तिगत मानसिक स्थिति और स्वत्व बन गई है। इसका नतीजा यह हुआ है कि प्रेम जैसी निजी अनुभूति पर भी इसका तनाव अनुभव होता है। इसलिए कभी-कभी तो आजीवन प्रेम के स्थान पर हम प्रेम के तनाव में ही रहते होते हैं। इस उपन्यास में वानीरा और विवेक के माध्यम से इस आधुनिक तनाव वाली घटना-हीन वास्तविकता को अत्यन्त सूक्ष्म शैली, चित्रों और मन:स्थितियों के द्वारा श्रीनरेश मेहता ने प्रस्तुत किया है।
Shabd Purush Agyey
- Author Name:
Naresh Mehta
- Book Type:

- Description:
आधुनिक हिन्दी साहित्य के लिए यह एक ऐतिहासिक संयोग था कि उसे ‘अज्ञेय’ जैसा विशिष्ट व्यक्ति मिला, जो न केवल अपने निजी लेखन से ही महत्त्वपूर्ण था, बल्कि साहित्य के सभी क्षेत्रों और विषयों पर भी चिन्तातुर था। शायद भारतेन्दु के बाद ऐसी प्रामाणिक साहित्यिक चिन्ता वात्स्यायन में ही दिखलाई देती है। वस्तुत: यह आलेख उनके लेखन और व्यक्ति का आकलन नहीं, बल्कि स्मरण है, और वह भी संस्मरणात्मक आत्मीय भूमि पर से ही किया गया है। साथ ही एक अग्रज समकालीन को जिस सम्यकता से देखा जाना चाहिए, की चेष्टा है।
Jalsaghar
- Author Name:
Naresh Mehta
- Book Type:

- Description:
...गोमती में जो लयात्मकता कभी-कभी विलीन हो जाती है, उसे कुमार गन्धर्व और बेगम अख़्तर बारम्बार आवाज़ देते हैं। ठाकुर ओंकारनाथ विद्यापति के पदों की भाँति, बीजों की भाँति धरती पर लोट-पोट जाते हैं...पर इस पिपासा-यात्रा का कहीं अन्त नहीं होता। विलास मुरझा जाता है, शृंगार बासी हो जाता है, कीन कंठों में ही विलीन हो जाता है और तब केवल गायक तथा वादक में से एक अनासक्त संन्यासी जन्म लेता दिखाई देता है...। ...मैं वादक को देख रहा था या उसके टेराकोटा को। किस काल का, युग का वह टेराकोटा था, मैं नहीं जानता। टेराकोटा की कोई लिपि नहीं होती और यदि कोई लिपि होती भी तो मेरे लिए वह व्यर्थ ही होती। मेरा उस संन्यासी से भाषाहीन अबाध परिचय हो चुका था। वीणा थी, सिद्ध वादक था, वादन की अप्रतिमता नि:सन्देह थी और था फाल्गुन रात्रि का वह जलसाघर, पर सब कुछ अपनी निर्मम यथार्थता में वैसा अविश्वसनीय था।... ...जीप भागती चली जा रही थी। जब हम बाँध पर चढ़ रहे थे तब भी वह वादन स्पष्ट था, यद्यपि अब उसकी परिसमाप्ति होने ही जा रही थी। मैं ऐसे वादन की परिसमाप्ति का साक्षात् नहीं कर सकता था। समाप्ति वैसे भी साक्षात् करने के लिए होती भी नहीं। मैं उस विहाग, उस वादन और उस संन्यासी वादक को गंगा-क्षेत्र के उस जलसाघर में छोड़ आया था, परन्तु मेरे साथ उसका टेराकोटा सदा के लिए चला आया। मुझमें निश्चय ही अपराध भाव था कि मैं बहुत बड़ा अपमान करके आ रहा हूँ। मैं इस अग्नितपे टेराकोटा को सम्भव है, जीवन-भर वहन कर सकूँ, पर उस वादन के बाद उस वादक का यदि साक्षात् करना पड़ता तो—तो कौन पार्थसारथी मुझे बचाता?
Uttarkatha : Vol. 1-2
- Author Name:
Naresh Mehta
- Book Type:

- Description:
कालजयी उपन्यास यह ‘पथ बन्धु था’ के बाद भारतीय जीवन का सर्वांगीण परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करनेवाला यह उपन्यास ‘उत्तरकथा’ आधुनिक कथा-साहित्य की न केवल निष्णात ही, बल्कि सम्पूर्ण सांस्कृतिक औपन्यासिक कृति है। स्वरूप का नहीं, प्रयोजन का नाम है महाकाव्य। आज उपन्यास ही महाकाव्य है, एतदर्थ ‘उत्तरकथा' महाकाव्य भी है। देश और काल के विशाल फलक पर चलते साधारण मनुष्य की बड़ी-छोटी परछाइयाँ ही यह संसार है। जब इसी मानवीय संसार की यथार्थता को प्रयोजन-दृष्टि प्राप्त हो जाती है तब मनुष्य सृष्टि मात्र, प्राणि मात्र का प्रतिनिधित्व करनेवाला 'पुरुष' हो जाता है। बड़ी रचनात्मकता कभी भी केवल यथार्थ को ही अन्तिम नहीं मान सकती, क्योंकि मनुष्य की रचना उदात्तता के लिए ही हुई है। इस प्रथम खंड के सारे साधारण एवं अनाम पात्र कोई बड़ा कार्य नहीं करते परन्तु रोज का तपता हुआ जीवन जीते हैं। यह साधारण उदात्तता प्रकारान्तर से हमें भी पूर्ण बनाती है। दूसरे खंड में जब परिवेश का दबाव और अधिक गहराएगा तब मानवीय विवशता तथा व्यवहार के जल का परिवृत्त और भी सुदूर के तटों तक लहराएगा। यह शती मनुष्य की परीक्षा की शती रही है जिसमें अनाम लोगों की साधारणता, विश्वास खंडित एवं क्षत-विक्षत हुए हैं। इस मानवीय जय-पराजय की गाथा से बड़ी कौन-सी भागवत है?
Uttarkatha : Vol. 2
- Author Name:
Naresh Mehta
- Book Type:

- Description:
‘उत्तरकथा’ के प्रथम खंड को पढ़ते हुए महसूस होता है कि जैसे लेखक, लूसिएँ गोल्डमान के उत्पत्तिमूलक संघटनात्मक समाजशास्त्र के सहारे पुराने मालवा के ख़ौफ़नाक अँधेरे को एक विशिष्ट सामाजिक स्थिति में एक निश्चित वरण की अनिवार्यता का सामना करते हुए उभार रहा है और उजाले में समस्याओं की एक शृंखला प्रस्तुत करते हुए आलोचनात्मक चित्र और चरित्र उकेरते हुए सार्थक समाधान की सम्भावना तक आना चाहता है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह कि पूरा उपन्यास आध्यात्मिक सरोकारों से विच्छिन्न नहीं है। उपन्यास का नायक शिवशंकर आचार्य दुःख-भोग और दायित्व वहन के क्रम में करुणा का अकलंक पुरुष है। ...त्रयम्बक और दुर्गा भारतीय दम्पति के शिवपार्वती जैसे आदर्श हैं। शिवशंकर आचार्य, भारतीय मनीषा की चारित्रिक स्थिति का नाम है। यह चरित्र नहीं है। यह बीज-चरित्र को गोद लेकर वृक्षत्व प्रदान करते हैं...लेखक ने केवल कथा नहीं कही है, बल्कि...उनके बीच से चेतना के अनिवार्य नैरन्तर्य को तलाशा है...तभी तो यह केवल कथा नहीं है, उत्तरकालीन कथा नहीं है, बल्कि प्रश्नों के समाधान की, उत्तर की भी कथा है। —श्री श्रीराम वर्मा (जनपक्ष)
Doobte Mastool
- Author Name:
Naresh Mehta
- Book Type:

- Description:
परिस्थितियों के संघात से टूटती-बनती एक अप्रतिम सुन्दर नारी की विवश-गाथा का प्रतीक नाम है—‘डूबते मस्तूल’। वस्तुत: नारी की यह विवशता किसी भी युग में कम नहीं हुई है। उसका विन्यास परिवेश के बदलने के साथ कुछ परिवर्तित भले ही लगे, पर पुरुष कभी उसे वही स्थान और मान्यता नहीं देता जो वह किसी अन्य पुरुष को देता है। स्वयं नारी को अपने इस भोग्या स्वरूप से कितना विद्रोह है पर प्रकृति के विधान का उल्लंघन कर पाना एक सनातन समस्या है। अपने इस प्रथम उपन्यास ‘डूबते मस्तूल’ में नरेश जी ने नारी के एक प्रखर स्वरूप को भावनाओं और घटनाओं, के माध्यम से जब प्रस्तुत किया था सन् 1954 में, तभी से इसकी नायिका रंजना हिन्दी-उपन्यास के पाठकों की स्मृति बन गई।
Pratham Phalgun
- Author Name:
Naresh Mehta
- Book Type:

- Description:
इसका कथानक उस प्रथम प्रेम की मार्मिकता को अभिव्यक्त करता है जिसका सम्मोहन सार्वकालिक तथा सार्वदेशिक होता है। इस उपन्यास में दो पात्र—गोपा और महिम। आज से तीस-चालीस वर्ष पहले का लखनऊ। परिपार्श्व की इस ऐकान्तिकता के साथ-साथ दो पात्रों का अपना निजपन, जहाँ किसी तीसरे का कोई अर्थ या महत्त्व नहीं। रागात्मकता के किन-किन और कैसे-कैसे प्रसंगों, स्थितियों तथा मुद्राओं से होकर गोपा और महिम यात्रा करते हैं, यह इस उपन्यास की बुनावट, भाषा तथा प्रतीकों के माध्यम से देखा जा सकता है। जिस प्रकार गोपा और महिम को किसी अन्य की अपेक्षा नहीं, वैसी ही तन्मयता इसे पढ़ते हुए मिलती हैं।
Yah Path Bandhu Tha
- Author Name:
Naresh Mehta
- Book Type:

- Description:
भारतीय स्वाधीनता संग्राम-काल के एक साधारण व्यक्ति श्रीधर ठाकुर की असाधारण-कथा का यह बृहत् उपन्यास श्रीनरेश मेहता के विवादास्पद प्रथम उपन्यास ‘डूबते मस्तूल’ से बिलकुल भिन्न भावभूमि, संस्कार तथा शैली को प्रस्तुत करता है। कथा-नायक श्रीधर बाबू एक व्यक्ति न रहकर प्रतीक बन गए हैं, उन सब अज्ञात छोटे-छोटे लोगों के जो उस काल के राष्ट्रीय संघर्ष, परम्परागत-निष्ठा तथा वैष्णव-मूल्यों के लिए चुपचाप होम हो गए। इतिहास ऐसे साधारण-जनों को नहीं देखता है, लेकिन उपन्यासकार किसी एक साधारण-जन को इतिहास का महत्त्व दे देता है। लेखक की परिपक्व जीवनी-दृष्टि, जीवनानुभव और कलात्मक-शक्ति ने एक साधारण-जन को सारी मानवीय संवेदना देकर अनुपम बना दिया है। श्रीनरेश मेहता अपनी भाषा, संस्कार तथा शिल्प के लिए कवियों और गद्यकारों में सर्वथा विशिष्ट माने जाते हैं और यह महत्त्वपूर्ण उपन्यास हमारे इस कथन की पुष्टि करता है।
Main Jab Tak Aayi Bahar
- Author Name:
Gagan Gill
- Book Type:

- Description:
‘मैं क्यों कहूँगी तुम से/अब और नहीं/सहा जाता/मेरे ईश्वर’—गगन गिल की ये काव्य-पंक्तियाँ किसी निजी पीड़ा की ही अभिव्यक्ति हैं या हमारे समय के दर्द का अहसास भी? और जब यह पीड़ा अपने पाठक को संवेदित करने लगती है तो क्या वह अभिव्यक्ति प्रकारान्तर से प्रतिरोध की ऐसी कविता नहीं हो जाती, जिसमें ‘दर्दे-तनहा’ और ‘ग़मे-ज़माना’ का कथित भेद मिटकर ‘दर्दे-इनसान’ हो जाता है? कविता इसी तरह इतिहास अर्थात समय का काव्यान्तरण सम्भव करने की ओर उन्मुख होती है। गगन गिल की इन आत्मपरक-सी लगती कविताओं के वैशिष्ट्य को पहचानने के लिए मुक्तिबोध के इस कथन का स्मरण करना उपयोगी हो सकता है कि कविता के सन्दर्भ ‘काव्य में व्यक्त भाव या भावना के भीतर से भी दीपित और ज्योतित’ होते हैं, उनका स्थूल संकेत या भाव-प्रसंगों अथवा वस्तु-तथ्यों का विवरण आवश्यक नहीं है। इन कविताओं का अनूठापन इस बात में है कि वे एक ऐसी भाषा की खोज करती हैं, जिसमें सतह पर दिखता हल्का-सा स्पन्दन अपने भीतर के सारे तनावों-दबावों को समेटे होता है—बाँध पर एकत्रित जलराशि की तरह। यह भी कह सकते हैं कि ये कविताएँ प्रार्थना के नये-से शिल्प में प्रतिरोध की कविताएँ हैं—प्रतिरोध उस हर सत्ता-रूप के सम्मुख जो मानवत्व मात्र पर, स्त्रीत्व पर भी, आघात करता है। इन आघातों का दर्द अपने एकान्त में सहने पर ही कवि-मन पहचान पाता है कि ‘मैं जब तक आयी बाहर एकान्त से अपने/बदल चुका था मर्म भाषा का’। ये कविताएँ काव्य-भाषा को उसकी मार्मिकता लौटाने की कोशिश कही जा सकती हैं। —नन्दकिशोर आचार्य
Dhoop Ka Tukda
- Author Name:
Amrita Preetam +1
- Book Type:

- Description:
अमृता प्रीतम की कविताओं में रमना, हृदय में कसकती व्यथा का घाव लेकर, प्रेम और सौन्दर्य की धूपछाँह-वीथी में विचरने के समान है, जहाँ वियोग तथा अतृप्ति के तीखे नुकीले काँटे भावना के सुकुमार चरणों को क्षत-विक्षत करते रहते हैं । ऐसी गहरी, दर्द में डूबी, प्राणिक संवेदनाओं के गीत कम ही देखने को मिलते हैं। अमृताजी धरती के जीवन के गीत भी गाती हैं । वह युग-संघर्ष के प्रति प्रबुद्ध होने के कारण प्रगतिशील भावधारा से प्रेरित हैं, किन्तु प्रेम के प्रति एकाग्र समर्पण ही उनकी जीवन-साधना तथा आत्म-विकास का एकान्त पथ है। अमृताजी की कविताओं के अनुवाद से हिन्दी काव्य भाव-धनी, स्वप्न-संस्कृत तथा शिल्प-समृद्ध बनेगा। इन कविताओं से यह सहज ही प्रमाणित हो जाता है कि अमृताजी का स्थान पंजाबी ही नहीं, समस्त भारतीय भाषाओं में भी प्रथम श्रेणी के योग्य है । इस संग्रह से हिन्दी के नये कवियों को विशेष प्रेरणा मिलेगी। जिस गहरी भाव-संवेदना, सामाजिक यथार्थ तथा युग मानव की व्यथा का सच्चा चित्रण अमृताजी ने अपनी नारी-हृदय की जादू-तूली से इन कविताओं में किया है, वह उनकी कृति को एक अत्यन्त उच्च तथा व्यापक स्तर पर उठा देती है। —सुमित्रानन्दन पंत
Saptaparna
- Author Name:
Mahadevi Verma
- Book Type:

- Description:
मनुष्य की स्थूल पार्थिव सत्ता उसकी रंग-रूपमयी आकृति में व्यक्त होती है। उसके बौद्धिक संगठन से जीवन और जगत सम्बन्धी अनेक जिज्ञासाओं, उनके तत्त्व के शोध और समाधान के प्रयास, चिन्तन की दिशा आदि संचालित और संयमित होते हैं! उसकी रागात्मक वृत्तियों का संघात उसके सौन्दर्य-संवेदन, जीवन और जगत के प्रति आकर्षण-विकर्षण, उन्हें अनुकूल और मधुर बनाने की इच्छा, उसे अन्य मानवों की इच्छा से सम्पृक्त कर अधिक विस्तार देने की कामना और उसकी कर्म-परिणति आदि का सर्जक है।
Ullanghan
- Author Name:
Rajesh Joshi
- Book Type:

- Description:
उल्लंघन संग्रह में कवि हुक्म-उदूली की अपनी प्राकृतिक इच्छा से आरम्भ करते हुए मौजूदा दौर की उन विवशताओं से अपनी असहमति और विरोध जताता है, जिन्हें सत्ता हमारी दिनचर्या का स्वाभाविक हिस्सा बनाने पर आमादा है। एक ऐसे समय में ‘जिसमें न स्मृतियाँ बची हैं/न स्वप्न और जहाँ लोकतंत्र एक प्रहसन में बदल रहा है/एक विदूषक किसी तानाशाह की मिमिक्री कर रहा है’—ये कविताएँ हमें निर्प्रश्न अनुकरणीयता के मायाजाल से निकलने का रास्ता भी देती हैं, और तर्क भी। कवि देख पा रहा है कि ‘सिकुड़ते हुए इस जनतंत्र में सिर्फ़ सन्देह बचा है’, ताक़त के शिखरों पर बैठे लोग नागरिकों को शक की निगाह से देखते हैं, तरह-तरह के हुक्मों से अपने को मापते हैं; कहते हैं कि साबित करो, तुम जहाँ हो वहाँ होने के लिए कितने वैध हो, और तब कविता जवाब देती है–‘ओ हुक्मरानो/मैं स्वर्ग को भूलकर ही आया हूँ इस धरती पर/तुम अगर मुझे नागरिक मानने से इनकार करते हो/तो मैं भी इनकार करता हूँ /इनकार करता हूँ तुम्हें सरकार मानने से!’ लगातार गहरे होते राजनीतिक-सामाजिक घटाटोप के विरुद्ध पिछले चार-पाँच सालों में जो स्वर मुखर रहते आए हैं, राजेश जोशी उनमें सबसे आगे की पाँत में रहे हैं। इस संग्रह की ज़्यादातर कविताएँ इसी दौर में लिखी गई हैं। कुछ कविताएँ महामारी के जारी दौर को भी सम्बोधित हैं जिसने सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने के सरकारी उद्यम पर जैसे एक औपचारिक मुहर ही लगा दी–‘सारी सड़कों पर पसरा है सन्नाटा/बन्द हैं सारे घरों के दरवाज़े/एक भयानक पागलपन पल रहा है दरवाज़ों के पीछे/दीवार फोड़कर निकल आएगा जो/किसी भी समय बाहर/और फैल जाएगा सारी सड़कों पर!’
Kavya Chayanika
- Author Name:
Pramod Kovaprath
- Book Type:

- Description:
बिगड़ते पर्यावरण की समस्या आज मनुष्य के लिए भूख के बाद दूसरी सबसे बड़ी समस्या है। भूख जिस तरह एक देह के अस्तित्व के लिए आसन्न ख़तरा होती है, उसी तरह पर्यावरण-विनाश सृष्टि के अस्तित्व के लिए होता है। एक-एक व्यक्ति के रूप में जी रहे हम लोगों की आँखों से वह ख़तरा भले ही इतने स्पष्ट और ठोस रूप में न दिखाई देता हो, और भले ही हम बीच-बीच में प्रकृति द्वारा दी जानेवाली चेतावनियों को नज़रअन्दाज़ करने की ढीठता भी जुटा लेते हों, लेकिन जल, ज़मीन, हवा और हरियाली का सतत क्षरित होता जीवन उन निगाहों से अनचीन्हा नहीं रह जाता जो प्रस्तुत उल्लास की झीनी चदरिया के पार दूर क्षितिज के धुँधलके में लिखी जा रही नाश-विनाश की पटकथाओं की पंक्तियाँ पढ़ लेती हैं, यानी कवियों और रचनाशील हृदयों की निगाहें। यह पुस्तक प्रकृति और कवि के इसी अपने, और समाज की रिश्तेदारियों के धोखादेह प्रपंच से परे, उनके निहायत पवित्र और निजी रिश्ते का दस्तावेज़ है। पाठकगण इस किताब को सरकारों और संस्थाओं के रस्मी पर्यावरण-प्रेम और शुष्क रुदन के काव्यानुवाद के रूप में न लें। यह समष्टि-मन के रचनाकुल और ईमानदार स्नायुओं की पीड़ाजनित प्रतिक्रियाओं का संकलन है जिसमें हिन्दी के नए-पुराने, वरिष्ठ, श्रेष्ठ और सजग रचनाकारों ने प्रकृति के साथ अपनी सम्बन्ध-यात्रा के सबसे चिन्तित क्षणों को वाणी दी है। संग्रह में एक सौ एक समकालीन कविताएँ और पैंतालीस कवि शामिल हैं। कौन छोटा है, कौन बड़ा है, यह सवाल अप्रासंगिक है। क्योंकि कविता का विषय महत्त्वपूर्ण है, समस्याओं की भयंकरता प्रासंगिक है। एक ही त्रासदपूर्ण मुद्दा सबके लिए महत्त्वपूर्ण है। सब में आशंकाएँ हैं तो साथ ही आशाएँ भी हैं। प्रकृति की आसन्न मृत्यु पर चीख़ने के बजाय प्रतिरोध खड़ा करना ये रचनाकार अपना दायित्व समझते हैं।
Aakash Dharti Ko Khatkhataata Hai
- Author Name:
Vinod Kumar Shukla +1
- Book Type:

- Description:
विनोद कुमार शुक्ल समकालीन कविता के संसार में उन थोड़े से ऐसे कवियों में शुमार हैं जिन्होंने समकालीन कविता की दिशा और दृष्टि को काफ़ी हद तक नियंत्रित किया है। उनकी इस हैसियत को हिन्दी में लगभग सभी कवियों ने स्वीकार किया है। काव्याभिव्यक्ति में मित कथनों का जितना सार्थक प्रयोग वे करते हैं, उतना शमशेर ही कर पाते थे। शब्दों को कम से कम ख़र्च करके कैसे अर्थ के भंडार को समेटा जाए इसे सीखने के लिए विनोद कुमार शुक्ल की कविता काम की चीज़ है। उनकी कविता नितांत समसामयिक होकर भी समयातीत लगती है। वह पीछे भी देखती है और आगे भी, पर उल्लेखनीय बात यह है कि वह अपने समय में धँसी होने के बावजूद अपने समय में फँसती नहीं है। उनके काव्यबोध में जो अचूक क़िस्म की पारदर्शी सूक्ष्मता है, वह कई लोगों को जटिलता, रूपवाद, कलावाद का अवतार लगती है लेकिन रूपवादी कविता है नहीं। काव्य-प्रयोगों के लिए उनसे बड़ा कवि आज कम से कम हिन्दी में दिखाई नहीं देता वे विचारधारा के पुल से होकर रास्ता तय करने वाले कवि नहीं हैं, बल्कि वे कविता की नदी को ख़ुद तैर कर पार करने वाले कवि हैं। कम से कम उनके लम्बे कवि-कर्म का संघर्ष यही प्रतिमान हमारे सामने रखता है। वे हिन्दी कविता के संसार में उन थोड़े से कवियों में हैं जिन्होंने चालू मुहावरे को तोड़कर अपनी कविता में संवेदना और काव्य-शिल्प के लिए अनोखा आयाम चुना है। अपनी काव्यभाषा के चुनाव में वे जितने विरल, संयमी और जागरूक कवि हैं, उतने कम ही कवि रहे हैं। यह उनकी चुनिन्दा कविताओं का संकलन है।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book