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ममता कालिया की अनुभवी कलम से निकली ये तेरह नई कहानियाँ समाज और मन की ऐसी छुपी हुई जगहों का आख्यान हैं जिनपर सामान्यतः नज़र नहीं जाती । इन्हें रचते हुए वे अलग- अलग शैलियों, चरित्रों और स्थितियों का बड़े ही सिद्धहस्त तरीके से संधान करती हैं। पढ़ते हुए आप यह महसूस करते हैं कि ये कहानियाँ सहज-पठनीय हैं, अपनी बुनावट में सरल प्रतीत होती हैं लेकिन अपने कथ्य और विषयवस्तु के चयन में, जटिल और बहुस्तरीय हैं। इनकी सूक्ष्मता ज़ाहिर नहीं है, वह पाठक की चेतना में घटित होती है । पारिवारिक सामाजिक ताने-बाने में कुचली जाती स्त्री हो या बदलाव की ऊर्जा से भरे किन्तु दिशाहीन युवा, साहित्यिक आयोजनों का छिछलापन हो या एकाकी पिता का बुढ़ापा; इन कहानियों में ऐसे सभी पात्र, समुदाय और घटनाएँ अपनी मार्मिकता, विडम्बना और हास्यबोध को ऐसे ही साथ लिए चलते हैं जैसे वे हमारी इस दुनिया में मौजूद हैं ।
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ममता कालिया की अनुभवी कलम से निकली ये तेरह नई कहानियाँ समाज और मन की ऐसी छुपी हुई जगहों का आख्यान हैं जिनपर सामान्यतः नज़र नहीं जाती । इन्हें रचते हुए वे अलग- अलग शैलियों, चरित्रों और स्थितियों का बड़े ही सिद्धहस्त तरीके से संधान करती हैं। पढ़ते हुए आप यह महसूस करते हैं कि ये कहानियाँ सहज-पठनीय हैं, अपनी बुनावट में सरल प्रतीत होती हैं लेकिन अपने कथ्य और विषयवस्तु के चयन में, जटिल और बहुस्तरीय हैं। इनकी सूक्ष्मता ज़ाहिर नहीं है, वह पाठक की चेतना में घटित होती है । पारिवारिक सामाजिक ताने-बाने में कुचली जाती स्त्री हो या बदलाव की ऊर्जा से भरे किन्तु दिशाहीन युवा, साहित्यिक आयोजनों का छिछलापन हो या एकाकी पिता का बुढ़ापा; इन कहानियों में ऐसे सभी पात्र, समुदाय और घटनाएँ अपनी मार्मिकता, विडम्बना और हास्यबोध को ऐसे ही साथ लिए चलते हैं जैसे वे हमारी इस दुनिया में मौजूद हैं ।
Book Details
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ISBN9788169235136
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Pages144
-
Avg Reading Time5 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIN
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