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Author:
Mamta Kaliya, Mamta KaliaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Contemporary-fiction₹
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शीर्षस्थ कथाकार ममता कालिया की प्रत्येक रचना पर उनकी रचनाशीलता के हस्ताक्षर रहते हैं। संवेदना की थाह लेने और भाषा में उसे संभव करने का उनका अपना एक अनूठा ढंग है। ‘कल्चर वल्चर’ ममता कालिया का एक महत्त्वपूर्ण उपन्यास है। इसके बीज-विचार के सन्दर्भ में उन्होंने लिखा है, 'कला, साहित्य व संस्कृति आज सरोकार न रहकर कारोबार बनते जा रहे हैं और इसके प्रबन्धक, कारोबारी। इनके हाथों में संस्कृति, विकृति बन रही है और साहित्य, वाहित्य।' ममता कालिया ने बहुत कुशलता के साथ कोलकाता की पृष्ठभूमि में इस उपन्यास की कथा बुनी है। महत्तर उद्देश्यों को लेकर अस्तित्व में आई एक साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था किस तरह विडंबनाओं, विरूपताओं, अन्तर्विरोधों, कपट, कलह, चतुर चाटुकारिता व निजी महत्त्वाकांक्षाओं का तलघर बन जाती है—यह तथ्य 'कल्चर वल्चर' में बहुत बारीकी से उजागर हुआ है। लेखकीय कौशल यह है कि सारे चरित्र और कथा-प्रसंग कल्पना पर आधारित होते हुए भी अपनी निष्पत्तियों में अत्यन्त जीवन्त हैं। चाहें तो इस उपन्यास में समकालीनता की पदचाप या अनुगूँज भी सुन सकते हैं। नवीन और सुषमा जैसे चरित्र अपने निहितार्थों के साथ पाठक के चित्त पर अंकित हो जाते हैं। लेखक ने व्यापक सन्दर्भों के साथ उन मनोवृत्तियों को टटोला है जो शब्द में सिक्कों की खनक और साहित्य में सरोकारों का शोकगीत सुनना चाहती हैं। यह उपन्यास भूमंडलीकरण, उद्दंड पूँजी, निरंकुश सोच आदि के आशयों को भी खंगालता है। अपनी प्रांजल व खिलंदड़ी भाषा के लिए ममता कालिया बहुप्रशंसित हैं। यह उपन्यास उनकी रचनात्मक सिद्धि का एक अभिनव आयाम है।
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शीर्षस्थ कथाकार ममता कालिया की प्रत्येक रचना पर उनकी रचनाशीलता के हस्ताक्षर रहते हैं। संवेदना की थाह लेने और भाषा में उसे संभव करने का उनका अपना एक अनूठा ढंग है।
‘कल्चर वल्चर’ ममता कालिया का एक महत्त्वपूर्ण उपन्यास है। इसके बीज-विचार के सन्दर्भ में उन्होंने लिखा है, 'कला, साहित्य व संस्कृति आज सरोकार न रहकर कारोबार बनते जा रहे हैं और इसके प्रबन्धक, कारोबारी। इनके हाथों में संस्कृति, विकृति बन रही है और साहित्य, वाहित्य।'
ममता कालिया ने बहुत कुशलता के साथ कोलकाता की पृष्ठभूमि में इस उपन्यास की कथा बुनी है। महत्तर उद्देश्यों को लेकर अस्तित्व में आई एक साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था किस तरह विडंबनाओं, विरूपताओं, अन्तर्विरोधों, कपट, कलह, चतुर चाटुकारिता व निजी महत्त्वाकांक्षाओं का तलघर बन जाती है—यह तथ्य 'कल्चर वल्चर' में बहुत बारीकी से उजागर हुआ है। लेखकीय कौशल यह है कि सारे चरित्र और कथा-प्रसंग कल्पना पर आधारित होते हुए भी अपनी निष्पत्तियों में अत्यन्त जीवन्त हैं। चाहें तो इस उपन्यास में समकालीनता की पदचाप या अनुगूँज भी सुन सकते हैं। नवीन और सुषमा जैसे चरित्र अपने निहितार्थों के साथ पाठक के चित्त पर अंकित हो जाते हैं। लेखक ने व्यापक सन्दर्भों के साथ उन मनोवृत्तियों को टटोला है जो शब्द में सिक्कों की खनक और साहित्य में सरोकारों का शोकगीत सुनना चाहती हैं।
यह उपन्यास भूमंडलीकरण, उद्दंड पूँजी, निरंकुश सोच आदि के आशयों को भी खंगालता है। अपनी प्रांजल व खिलंदड़ी भाषा के लिए ममता कालिया बहुप्रशंसित हैं। यह उपन्यास उनकी रचनात्मक सिद्धि का एक अभिनव आयाम है।
Book Details
-
ISBN9788199170957
-
Pages256
-
Avg Reading Time9 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘लड़कियाँ’ को ममता कालिया की उन कथा-रचनाओं में रखा जा सकता है जहाँ उनकी गद्य-सामर्थ्य अपने चरम पर है। छल-छल बहते वाक्यों की चुस्ती, व्यंग्य की सूक्ष्मता, तीक्ष्ण आब्ज़र्वेशन और उसकी सटीक अभिव्यक्ति, हाथ से छुई जा सकने वाली चित्रात्मकता—शब्द की ताक़त जो आपको फ़ौरन पकड़ लेती है, और अपने साथ बहा ले जाती है। बम्बई का एक पुराना मैंशन इस कहानी की पृष्ठभूमि है। उसके एक फ़्लैट में नायिका अकेली रहती है। नौकरीपेशा है। जीवन ऑफ़िस और घर के बीच आने-जाने और विज्ञापन फ़िल्मों के लिए नए प्लॉट सोचने में गुज़र रहा है। तभी कुछ दिन के लिए उसके बॉस की एक रिश्तेदार अफ़शाँ पाकिस्तान से आती है और उसके पास ही रहने लगती है। जीवन की एकरसता भंग होती है। दीवाली पर उसका जो फ़्लैट वीरान पड़ा रहता था, अफ़शाँ के जलाए दीयों से रात-भर जगमगाता रहता है। कहानी का अन्त दोनों के बीच एक मामूली-से संदेह के उगने और फिर उसके ख़त्म होने पर होता है और इस सन्देश पर कि मुसीबत आए तो हथियार नहीं, इनसान ही काम आता है। लेकिन इसके बीच यह छोटा-सा उपन्यास बम्बई, वहाँ के जीवन, रोज़मर्रा के संघर्षों और लोगों के बारे में बहुत कुछ बता जाता है।
Katha Saptak - Mamta Kalia
- Author Name:
Mamta Kalia
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7 Short Stories
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