Seat Number Chheh
Author:
Mamta KaliyaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections0 Ratings
Price: ₹ 159.2
₹
199
Available
हिन्दी कथा साहित्य में अपनी एकल और अलग पहचान बनाती ममता कालिया की कहानियाँ पहले वाक्य से ही पाठक का ध्यान आकर्षित करती हैं। इन कहानियों में सातवें दशक के बाद के जीवन और जगत् की हलचल महसूस की जा सकती है। जब भारतीय समाज में परिवर्तन हो रहा था। इन कहानियों को महज़ स्त्री-लेखन के कोष्ठक में सीमित नहीं किया जा सकता, क्योंकि इनमें समूचे समाज की संघर्षधर्मिता विभिन्न पात्रों और स्थितियों द्वारा व्यक्त हुई है। प्रमुख आलोचक मधुरेश के शब्दों में, ‘संरचना की दृष्टि से ममता कालिया की कहानियाँ इस औपन्यासिक विस्तार से मुक्त हैं जिसके कारण ही कृष्णा सोबती की अनेक कहानियों को आसानी से उपन्यास मान लिया जाता है। काव्योपकरणों के उपयोग में भी ये संयत कहानियाँ हैं। यह अकारण नहीं कि उनकी भाषा में एक ख़ास तरह की तुर्शी है। जिसकी मदद से वे</p>
<p>सामाजिक विद्रूपताओं पर व्यंग्य का बहुत सीधा और सधा उपयोग करती हैं।’
ISBN: 9788180317972
Pages: 108
Avg Reading Time: 4 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Description:
गोपीकृष्ण गोपेश ने नवम्बर 1956 से 1962 तक के अपने रूस प्रवास में रचनात्मक साहित्य (उपन्यास, कहानी, कविता आदि) ही नहीं बल्कि विज्ञान, शिक्षा व्यवस्था, ट्रेड यूनियन, श्रम और मजदूरी सम्बन्धी अनेक महत्त्वपूर्ण दस्तावे़ज़ों का भी रूसी से हिन्दी में अनुवाद किया। चूँकि वे स्वयं एक रचनाकार थे, उनके अनुवाद में भी एक रचनाकार के किए हुए अनुवाद हैं, जिसमें एक गहरी सांस्कृतिक सजगता है। उनके इन अनुवादों में वहाँ की सांस्कृतिक विविधता में एकता दर्शनीय है। अनूदित कथाकारों में शोलोखोव कज़ाक जीवन के रचनाकार हैं, तो फातिह निया़ज़ी, ताज़िक जीवन के और ओल्गा मार्कोवा यूराल क्षेत्र के जीवन को उकेरती हैं। लेकिन इन कथाकृतियों को एक में बाँधने वाला तत्व वह सोवियत संस्कृति है जो संघ के अनेक गणराज्यों में साथ-साथ आकार ले रही थीं, ठीक अपने देश की संस्कृति की तरह ये कहानियाँ उस अतीत हो गए सपने की याद दिलाती है जिसे मनुष्यता ने एक सदी पहले देखा था। एक अनुवादक के रूप में गोपेश जी ने दो महान संस्कृतियों के बीच संवाद की वह भूमिका निभाई जो किसी सांस्कृतिक राजदूत की ही हो सकती है। इन कहानियों की सार्थकता उन स्मृतियों को संजोने में भी है जिन्हें ये अनुवाद प्रक्षेपित करते हैं। आज के भूमंडलीय स्मृति-युद्धों की दुनिया में इन कहानियों में प्रक्षेपित स्मृतियाँ बेहद बहुमूल्य हैं।
—प्रो. प्रणय कृष्ण
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