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हिन्दी कथा साहित्य में अपनी एकल और अलग पहचान बनाती ममता कालिया की कहानियाँ पहले वाक्य से ही पाठक का ध्यान आकर्षित करती हैं। इन कहानियों में सातवें दशक के बाद के जीवन और जगत् की हलचल महसूस की जा सकती है। जब भारतीय समाज में परिवर्तन हो रहा था। इन कहानियों को महज़ स्त्री-लेखन के कोष्ठक में सीमित नहीं किया जा सकता, क्योंकि इनमें समूचे समाज की संघर्षधर्मिता विभिन्न पात्रों और स्थितियों द्वारा व्यक्त हुई है। प्रमुख आलोचक मधुरेश के शब्दों में, ‘संरचना की दृष्टि से ममता कालिया की कहानियाँ इस औपन्यासिक विस्तार से मुक्त हैं जिसके कारण ही कृष्णा सोबती की अनेक कहानियों को आसानी से उपन्यास मान लिया जाता है। काव्योपकरणों के उपयोग में भी ये संयत कहानियाँ हैं। यह अकारण नहीं कि उनकी भाषा में एक ख़ास तरह की तुर्शी है। जिसकी मदद से वे सामाजिक विद्रूपताओं पर व्यंग्य का बहुत सीधा और सधा उपयोग करती हैं।’

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हिन्दी कथा साहित्य में अपनी एकल और अलग पहचान बनाती ममता कालिया की कहानियाँ पहले वाक्य से ही पाठक का ध्यान आकर्षित करती हैं। इन कहानियों में सातवें दशक के बाद के जीवन और जगत् की हलचल महसूस की जा सकती है। जब भारतीय समाज में परिवर्तन हो रहा था। इन कहानियों को महज़ स्त्री-लेखन के कोष्ठक में सीमित नहीं किया जा सकता, क्योंकि इनमें समूचे समाज की संघर्षधर्मिता विभिन्न पात्रों और स्थितियों द्वारा व्यक्त हुई है। प्रमुख आलोचक मधुरेश के शब्दों में, ‘संरचना की दृष्टि से ममता कालिया की कहानियाँ इस औपन्यासिक विस्तार से मुक्त हैं जिसके कारण ही कृष्णा सोबती की अनेक कहानियों को आसानी से उपन्यास मान लिया जाता है। काव्योपकरणों के उपयोग में भी ये संयत कहानियाँ हैं। यह अकारण नहीं कि उनकी भाषा में एक ख़ास तरह की तुर्शी है। जिसकी मदद से वे सामाजिक विद्रूपताओं पर व्यंग्य का बहुत सीधा और सधा उपयोग करती हैं।’

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
2nd
Publication year
2014
Weight
106 grams
ISBN-13
9788180317972
Pages
108
Reading time
~4 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
13.5 × 21 cm
Language
Hindi

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