Daryaganj Via Bazaar Fatte Khan
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नीनो फ़त्ते ख़ाँ बाज़ार, बहावलपुर ही रह गई होती, तो शायद वैसी ही होती जैसी अब भी वहाँ रह रही हज़ारों औरते हैं। एक हवेली से दूसरी हवेली में दुल्हन बन कर जाती और ढेर सारे पोते-पोतियों की विरासत छोड़ कर दुनिया को विदा कहती। लेकिन 1947 में नीनो दरयागंज पहुँच गई। बसना चाहा। बिखर गई। एक औरत की यह उजड़न सिर्फ़ उसकी कहानी न रह सकी, राजनीति और इतिहास की अनुगूँजों से भरी हुई वह उसकी सन्तानों में, पोते-पोतियों में रिसती चली गई—तीन पीढ़ियाँ एक अन्तहीन अजनबियत के सिलसिले में बँधी हुईं। दिल्ली वाले मुल्तानी मिट्टी तो जानते हैं। मुल्तान के लोग भी थे, उनकी ज़बान भी थी, उनकी तहज़ीब भी थी—यह कोई नहीं जानता। वह सब दिल्लीवाला बनने की जल्दबाज़ी में, पाकिस्तान से आए पंजाबी न कहलाने के डर में धीरे-धीरे खोता जा रहा है। तीन पीढ़ियों का यह आख्यान विभाजन की उस महात्रासदी से आगे बढ़ता है जिसे हम सब जानते हैं। यह उस अनकही दास्तान को खोलता है जिसमें रिफ़्यूजी दिल्ली में बसे और दिल्ली ख़ुद रिफ़्यूजियों से बसी। दोनों ने एक-दूसरे को नया चेहरा दिया—धीरे-धीरे, दर्द के साथ। मुल्तान की खोई गलियों से दिल्ली के ज़ख़्मी दिल तक, कश्मीर की ख़ामोश, बेचैन वादियों से बॉम्बे की धड़कन तक—यह एक विस्तृत और मार्मिक गाथा है ज़बान की, भूगोल की, और कभी न थमने वाली भटकन की। यह कहानी बताती है कि जब वह सब कुछ जो घर कहलाता है, राख हो जाए, तब भी क्या है जो बचा रह जाता है। एक बड़े जमाने और उसे जीने वाले बड़ी कद-काठी के लोगों और इतिहास की शक्ल बदलने वाली बड़ी घटनाओं का आख्यान है यह उपन्यास जो एक तरफ अगर क़िस्सागोई की नई उठान को संभव करता है, तो दूसरी ओर भाषा के संयम और सामर्थ्य को एक नई ऊँचाई देता है।
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नीनो फ़त्ते ख़ाँ बाज़ार, बहावलपुर ही रह गई होती, तो शायद वैसी ही होती जैसी अब भी वहाँ रह रही हज़ारों औरते हैं। एक हवेली से दूसरी हवेली में दुल्हन बन कर जाती और ढेर सारे पोते-पोतियों की विरासत छोड़ कर दुनिया को विदा कहती। लेकिन 1947 में नीनो दरयागंज पहुँच गई। बसना चाहा। बिखर गई।
एक औरत की यह उजड़न सिर्फ़ उसकी कहानी न रह सकी, राजनीति और इतिहास की अनुगूँजों से भरी हुई वह उसकी सन्तानों में, पोते-पोतियों में रिसती चली गई—तीन पीढ़ियाँ एक अन्तहीन अजनबियत के सिलसिले में बँधी हुईं।
दिल्ली वाले मुल्तानी मिट्टी तो जानते हैं। मुल्तान के लोग भी थे, उनकी ज़बान भी थी, उनकी तहज़ीब भी थी—यह कोई नहीं जानता। वह सब दिल्लीवाला बनने की जल्दबाज़ी में, पाकिस्तान से आए पंजाबी न कहलाने के डर में धीरे-धीरे खोता जा रहा है।
तीन पीढ़ियों का यह आख्यान विभाजन की उस महात्रासदी से आगे बढ़ता है जिसे हम सब जानते हैं। यह उस अनकही दास्तान को खोलता है जिसमें रिफ़्यूजी दिल्ली में बसे और दिल्ली ख़ुद रिफ़्यूजियों से बसी। दोनों ने एक-दूसरे को नया चेहरा दिया—धीरे-धीरे, दर्द के साथ।
मुल्तान की खोई गलियों से दिल्ली के ज़ख़्मी दिल तक, कश्मीर की ख़ामोश, बेचैन वादियों से बॉम्बे की धड़कन तक—यह एक विस्तृत और मार्मिक गाथा है ज़बान की, भूगोल की, और कभी न थमने वाली भटकन की। यह कहानी बताती है कि जब वह सब कुछ जो घर कहलाता है, राख हो जाए, तब भी क्या है जो बचा रह जाता है।
एक बड़े जमाने और उसे जीने वाले बड़ी कद-काठी के लोगों और इतिहास की शक्ल बदलने वाली बड़ी घटनाओं का आख्यान है यह उपन्यास जो एक तरफ अगर क़िस्सागोई की नई उठान को संभव करता है, तो दूसरी ओर भाषा के संयम और सामर्थ्य को एक नई ऊँचाई देता है।
Book Details
-
ISBN9789360864156
-
Pages440
-
Avg Reading Time15 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘मुझे चाँद चाहिए’ की जगह ‘मुझे सूरज चाहिए’ की सशक्त दावेदारी ठोकती तीन अलग-अलग आयु वर्ग की स्त्रियाँ। जो अपने ही साथ भगवान या तथाकथित भगवान की भी आज़ादी की माँग करती हैं। मुझे चाँद चाहिए ये इच्छा जहाँ एक सादगी भरी सौम्य ऊँचाई की, अस्तित्व की माँग हैं। वहीं मुझे सूरज चाहिए अधिक उग्र किंतु आत्मविश्वास से सूरज को सम्भाल लेने की भावना को इंगित करती है। ये किसी ऐसे फ़रियादी की फ़रियाद भी लगती है जो सहनशक्ति के आख़िरी छोर पर आ पहुँचा है और अब चाँद की शीतलता भरी ऊँचाई नहीं आकाश के भाल पर चमकते सूरज की गर्मी ही उसे ठंडक दे सकती है। आकाश माथुर का लिखा ये उपन्यास शिवना प्रकाशन से आया है। जिसका विमोचन 2024 के विश्व पुस्तक मेला नई दिल्ली में हुआ। इस से पहले उनका उपन्यास ‘उमेदा-एक योद्धा नर्तकी’ सफलता अर्जित कर चुका है और आज भी चर्चित है। इस उपन्यास की कहानी शुरू होती है एक सम्भ्रांत परिवार की मध्य-आयु की एक विधवा के सादे जीवन के साथ जिसे एक भरा-पूरा संयुक्त परिवार बहुत सम्मान के साथ देखता है और पूजता है। साथ ही परिवार की एक पुत्र-वधू और उसकी बेटी के अपने-अपने पीढ़िगत संघर्षों को उपन्यास बहुत संवेदना के साथ चित्रित करता है। मध्य-प्रदेश के ग्रामीण समाज की कुरितियों को बहुत विस्तार से आकाश स्पष्ट करते हैं। ये सामाजिक कुरीतियाँ आख़िर तो स्त्री के मन और तन को रौंद कर की ख़ुद को जीवित रखें हुए हैं। वो फिर चाहे शादी की आटा-साटा प्रथा हो या नातरा। आटा-साटा में जहाँ वार या वधू के ससुराल के ही किसी महिला या पुरुष से घर की किसी महिला या पुरुष की शादी कर दी जाती हैं। यानि ये ज़रुरी नहीं आप ससुराल में जाकर अपनी बहन के ननदोई ही बने, आप उसके दामाद भी बन सकते हैं। जिन अयोग्य पात्रों की शादी ना हो रही हो वहाँ प्रभावी परिवार दूसरे परिवार पर इस तरह का दबाव बना लेता है। जिस में आर्थिक कमजोरी सबसे बड़ा कारण होता है। इसी प्रकार नातरा में दूसरी शादी आपसी सहमति से तलाक़ ले कर ली जाती है और दूसरी शादी के एवज़ में परिवार बड़ी रक़म कमाता है। इसमें स्त्री को एक घर से उठ दूसरे घर जा बसने की पीड़ा से गुजरना पड़ता है। रमा ऐसे ही आटा-साटा की चपेट में आकर अपने ही भाई की विधवा सास बन बैठी थी। एक पढ़ी-लिखी उमंगो से भरी लड़की की एक बूढ़े व्यक्ति से शादी, उसके कौन-कौन से अरमानो को तिरोहित करती है इसका वर्णन लेखक ने बहुत संवेदनशीलता के साथ किया है। जंगल को, प्रकृति को सम्मान देना और पूजना हमारी परम्परा है और ये उसकी जीवनदायिनी शक्ति का सम्मान व आदर है। जिसे पूजते-पूजते हम उसकी पूजा में उसे ही नष्ट करने लगते हैं और कर्मकांडों में फँस कर स्वयं की और भगवान की ग़ुलामी की नीवों को पोषित करते हैं। इस भाव की विवेचना, कारण और निवारण पर लेखक ने खुल कर कलम चलाई है और विस्तार के साथ बहुत ही सुलझी हुई भाषा में इस विषय को बरता है। उसमें जहाँ लेखक पर्यावरण संरक्षण और आदिवासी समाज के उपेक्षा के सवाल उठाते हैं। वहीं वो धर्मांधता पर भी कटाक्ष करने से नहीं चूकते। आकाश के स्त्री पात्र परिस्थितियों के शिकार अवश्य हैं, लेकिन कमज़ोर नहीं हैं। और अंत में सशक्त रूप से अपने हिस्से के सूरज के लिए खड़े होते हैं। यहाँ अच्छी बात ये है कि वे एक दूसरे के दुश्मन नहीं है और बहनापे की सहायता से पित्र-सत्ता और रूढ़ियों के ख़िलाफ़ खड़ी होती हैं। जो आकाश के लेखन को सामयिक बनाता है। उपन्यास की भाषा देशकाल - अनुकूल है और सहज है। अपने पात्रों के साथ। एडिटिंग अच्छी है, इसलिए उपन्यास को बहुत अधिक लम्बाई तक ना खींच कर विषयानुसर लेखक कम में ही अपनी बात रख पाने में समर्थ है। जिसके लिए लेखक को बहुत शुभकामनाएँ। ये एक सामाजिक सरोकारों से भरा उपन्यास है जो भगवान सहित अपने पात्रों की वकालत सफलता से करता नज़र आता है। वन और प्रकृति के कुछ द्रश्य बहुत ही सुंदरता से लिखे गए हैं। वहीं स्त्रियों के सन्दर्भ में एक जगह आकाश लिखते हैं। — ‘महिलाओं की ख़ासियत है कि वे उम्र में छोटी होकर भी अपने से बड़ों पर मातृत्व न्योछावर कर देती हैं। जबकि एक छोटा पुरुष इस तरह का व्यवहार अपने से बड़े पुरुष के साथ नहीं कर सकता। असल में महिलाओं का मूल ही प्रेम है।’ वहींं एक जगह वो लिखते हैं। — ‘स्त्रियों के मन और तन पर उनका अपना अधिकार नहीं है। उस पर भी पुरुष, धर्म, समाज और पता नहीं किस-किस का क़ब्ज़ा है।’ सती को पूजना भी कहीं ना कहीं सती-प्रथा को अभी तक सही मानना ही है, परिवर्तन अपने जीवन में ला सकती है तो स्त्री ही ला सकती हैं, जैसी हिम्मत देता आकाश माथुर का ये नया उपन्यास निश्चय ही पठनीय है।
Kaath Ka Ullu
- Author Name:
Pallavi Prasad
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‘काठ का उल्लू’ को ‘दोआबा’ पत्रिका में प्रकाशित करते हुए, सम्पादकीय के अन्तर्गत एक महत्त्वपूर्ण टिप्पणी की गई थी कि यह उपन्यास अपनी थीम के कारण पाठकों के बीच लोकप्रिय होगा। प्रश्न उठता है कि इस उपन्यास की ‘थीम’ है क्या? निःसन्देह इसका उत्तर एक शब्द में नहीं दिया जा सकता है। ‘काठ के उल्लू’ की थीम के कई स्तर हैं जो प्याज के छिलके की भाँति परत दर परत खुलते चले जाते हैं। सपनों में पलती नौकरशाही, अभिजात्य वर्ग की ढँकी-छुपी सच्चाई, स्याह-सफेद के बीच खिलवाड़ करती राजनीति... और एक सामान्य-सी लड़की को ‘दलित इकाई’ के रूप में बदल देने की चतुराई। अर्थात इस उपन्यास में हमारे समाज के इतने रंग हैं कि उन सबको मिला कर यदि ‘रंगामेज़ी’ शैली में कोई चित्र बनाया जाए तो वह बदरंग ही होगा, आकर्षक भले हो। जाहिर है कि यह एक जटिल यथार्थ है, जिसे एक छोटे से उपन्यास में व्यक्त कर देना आसान काम नहीं था। मगर, पल्लवी प्रसाद ने उसे बखूबी कर दिखाया है। इस उपन्यास में कई अन्य यथार्थ भी दर्ज हैं। जैसे गाँवों का ‘आधुनिक’ हो जाना, हर व्यक्ति का लगभग ‘आम आदमी’ हो जाना और अन्ततः कृष्णकान्त जैसे महत्वाकांक्षी व्यक्ति का ‘काठ का उल्लू’ बन जाना। उल्लू का पसन्दीदा समय ‘अँधेरा’ पूरे उपन्यास में आदि से अन्त तक छाया हुआ है। मगर लेखिका ने उसमें भी रोशनी की एक ‘झिरी’ देख ली है। वह है एक बूढ़ी स्त्री जो गाँव में रहती है और जो किसी की माँ है, किसी की दादी तो किसी की परदादी। वास्तव में इस ‘झिरी’ ने ही इस उपन्यास को वह सार्थकता बख्शी है, जो उसका मूल उदेश्य प्रतीत होती है। पल्लवी प्रसाद का यह उपन्यास ऐसे समय में आया है जबकि अभिजात्य वर्ग में ही नहीं बल्कि सामान्य जीवन में भी पारिवारिक सम्बन्धों की दीवारें दरक रही हैं। इसलिए इस उपन्यास का अपना अलग ही महत्त्व है। —अब्दुल बिस्मिल्लाह
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Q1. ‘Daryaganj Via Bazaar Fatte Khan’ क्या है?
Daryaganj Via Bazaar Fatte Khan एक ऐतिहासिक-सामाजिक उपन्यास है जो 1947 विभाजन के बाद दिल्ली की दरियागंज में बसे एक परिवार की कहानी बताता है, विशेष रूप से नीनो फ़त्ते ख़ाँ और उसकी संतानों के निजी संघर्ष, पहचान और सामाजिक बदलाव को उजागर करता है।
Q2. इस किताब के मुख्य विषय क्या हैं?
इस उपन्यास में विभाजन, पलायन, सांस्कृतिक पहचान, भाषा, परिवार, और दिल्ली के बदलते सामाजिक ताने-बाने जैसे गहरे और बड़े विषयों को भावनात्मक रूप से प्रस्तुत किया गया है।
Q3. यह किताब किसके लिए उपयुक्त है?
यह उपन्यास ऐसे पाठकों के लिए उपयुक्त है जो ऐतिहासिक कथाएँ, सामाजिक कहानियाँ, पारिवारिक स्मृतियाँ और विभाजन के बाद के भारतीय अनुभवों को समझना चाहते हैं।
Q4. क्या यह किताब इतिहास पर आधारित है?
हालाँकि यह उपन्यास कल्पनात्मक रूप से लिखा गया है, लेकिन यह विभाजन के ऐतिहासिक अनुभवों, दिल्ली के समाजिक परिवर्तनों, और सांस्कृतिक संघर्षों को गहरे मानवीय दृष्टिकोण से दर्शाता है।
Q5. उपन्यास का संदेश क्या है?
यह किताब बताती है कि घर, पहचान और भाषा कितनी महत्वपूर्ण होती हैं और कैसे ये तत्व विभाजन और समय के साथ बदलते-बदले समाज में जड़ें बनाते हैं।