Is Shahar Mein Ik Shahar Tha
(1)
Author:
Jaya JadwaniPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Contemporary-fiction₹
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विभाजन भारतीय उपमहाद्वीप का ऐसा दारुण जख़्म है जो न जाने कितने दिलों के भीतर मुसलसल टीस रहा है। जया जादवानी का उपन्यास ‘इस शहर में इक शहर था’ विभाजित सिन्ध और उसके लोगों की कसक और पीड़ा का आख्यान है। यह एक जगह से उजड़ और बिखर कर दूसरी जगहों पर जड़ें जमाने की संघर्ष भरी दास्तान भी है जहाँ ऊपरी तौर पर भले ही सब कुछ सहज लगता हो पर उनकी रूह का एक हिस्सा कहीं बहुत पीछे के शहर में फंसा रह गया है। अपनी रूह के इसी गुम हिस्से की तलाश में उपन्यास का वाचक ‘नन्द’ कराची पहुँचता है जहाँ से उसे शिकारपुर जाना है, जहाँ जाने की उसे अनुमति नहीं है। जहाँ उसे अपने ही जैसे बिखरे हुए लोगों से मिलना है, जिन्हें उसकी तलाश में इस तरह से मददगार होना है जैसे वे अपनी ही मदद कर रहे हों। शिकारपुर—जहाँ उसका बचपन बीता है, जहाँ से निकलकर वह बम्बई में रहते हुए दुनिया भर में भटक रहा है। यह स्मृति में धँसी हुई एक ऐसी विलक्षण यात्रा है जहाँ एक बूढ़ा आईने के सामने अपने आपसे सिन्धी में बतिया रहा है; कोई बरसों बाद मिली एक बूढ़ी औरत के साथ रोटी खाते हुए उसकी गोद में रो रहा है, वह श्मशान जहाँ नन्द के लोग जलाए गए, वह गलियाँ जहाँ वे चले, उनमें ठहरते और चलते हुए नन्द अपने पुरखों के तलवों का दुख-दर्द जी रहा है। जहाँ से अपने बचपन के प्यार की एक झलक भर देखकर बिना कुछ कहे वह वापस चला आता है कि बार-बार आने की एक वजह यह भी बनी रहे।
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About the Book
विभाजन भारतीय उपमहाद्वीप का ऐसा दारुण जख़्म है जो न जाने कितने दिलों के भीतर मुसलसल टीस रहा है। जया जादवानी का उपन्यास ‘इस शहर में इक शहर था’ विभाजित सिन्ध और उसके लोगों की कसक और पीड़ा का आख्यान है।
यह एक जगह से उजड़ और बिखर कर दूसरी जगहों पर जड़ें जमाने की संघर्ष भरी दास्तान भी है जहाँ ऊपरी तौर पर भले ही सब कुछ सहज लगता हो पर उनकी रूह का एक हिस्सा कहीं बहुत पीछे के शहर में फंसा रह गया है। अपनी रूह के इसी गुम हिस्से की तलाश में उपन्यास का वाचक ‘नन्द’ कराची पहुँचता है जहाँ से उसे शिकारपुर जाना है, जहाँ जाने की उसे अनुमति नहीं है। जहाँ उसे अपने ही जैसे बिखरे हुए लोगों से मिलना है, जिन्हें उसकी तलाश में इस तरह से मददगार होना है जैसे वे अपनी ही मदद कर रहे हों। शिकारपुर—जहाँ उसका बचपन बीता है, जहाँ से निकलकर वह बम्बई में रहते हुए दुनिया भर में भटक रहा है।
यह स्मृति में धँसी हुई एक ऐसी विलक्षण यात्रा है जहाँ एक बूढ़ा आईने के सामने अपने आपसे सिन्धी में बतिया रहा है; कोई बरसों बाद मिली एक बूढ़ी औरत के साथ रोटी खाते हुए उसकी गोद में रो रहा है, वह श्मशान जहाँ नन्द के लोग जलाए गए, वह गलियाँ जहाँ वे चले, उनमें ठहरते और चलते हुए नन्द अपने पुरखों के तलवों का दुख-दर्द जी रहा है। जहाँ से अपने बचपन के प्यार की एक झलक भर देखकर बिना कुछ कहे वह वापस चला आता है कि बार-बार आने की एक वजह यह भी बनी रहे।
Book Details
-
ISBN9789360863463
-
Pages136
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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पीयूष मिश्रा जब मंच पर होते हैं तो वहाँ उनके अलावा सिर्फ़ उनका आवेग दिखता है। जिन लोगों ने उन्हें मंडी हाउस में एकल करते देखा है, वे ऊर्जा के उस वलय को आज भी उसी तरह गतिमान देख पाते होंगे। अपने गीत, अपने संगीत, अपनी देह और अपनी कला में आकंठ एकमेक एक सम्पूर्ण अभिनेता! अब वे फिल्में कर रहे हैं, गीत लिख रहे हैं, संगीत रच रहे हैं; और यह उनकी आत्मकथा है जिसे उन्होंने उपन्यास की तर्ज पर लिखा है। और लिखा नहीं; जैसे शब्दों को चित्रों के रूप में आँका है। इसमें सब कुछ उतना ही ‘परफ़ेक्ट’ है जितने बतौर अभिनेता वे स्वयं। न अतिरिक्त कोई शब्द, न कोई ऐसा वाक्य जो उस दृश्य को और सजीव न करता हो। मध्य प्रदेश के ग्वालियर में एक ‘अनयूजुअल’—से परिवार में जन्मा एक बच्चा चरण-दर-चरण अपने भीतर छिपी असाधारणता का अन्वेषण करता है; और क़स्बाई मध्यवर्गीयता की कुंठित और करुण बाधाओं को पार करते हुए धीरे-धीरे अपने भीतर के कलाकार के सामने आ खड़ा होता है। अपने आत्म के सम्मुख जिससे उसे ताज़िन्दगी जूझना है; अपने उन डरों के समक्ष जिनसे डरना उतना ज़रूरी नहीं, जितना उन्हें समझना है। इस आत्मकथात्मक उपन्यास का नायक हैमलेट, यानी संताप त्रिवेदी यानी पीयूष मिश्रा यह काम अपनी ख़ुद की कीमत पर करता है। यह आत्मकथा जितनी बाहर की कहानी बताती है—ग्वालियर, दिल्ली, एनएसडी, मुम्बई, साथी कलाकारों आदि की—उससे ज़्यादा भीतर की कहानी बताती है, जिसे ऐसी गोचर दृश्यावली में पिरोया गया जो कभी-कभी ही हो पाता है। इसमें हम दिल्ली के थिएटर जगत, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और मुम्बई की फ़िल्मी दुनिया के कई सुखद-दुखद पहलुओं को देखते हैं; एक अभिनेता के निर्माण की आन्तरिक यात्रा को भी। और एक संवेदनशील रचनात्मक मानस के भटकावों-विचलनों-आशंकाओं को भी। लेकिन सबसे बड़ी उपलब्धि इस किताब की इसका गद्य है। पीयूष मिश्रा की कहन यहाँ अपने उरूज़ पर है। पठनीयता के लगातार संकरे होते हिन्दी परिसर में यह गद्य खिली धूप-सा महसूस होता है।
Khari Nadi
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Richa Nagar +2
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खारी नदी को आप मुमताज़ बेगम की कहानी कहिए, या फिर उनकी कहानी से हिम्मत बटोरती कई कहानियाँ कहिए, आपबीती कहिए, ज़िन्दगी के तजुर्बे कहिए, पर यह कहानी हमें अपने आप से और दुनिया की कठोर सच्चाई से रू-ब-रू कराती है और आगे के रास्ते भी दिखाती है। इसलिए ये महज़ कहानी या आपबीती नहीं रह जाती बल्कि खारी नदी कहलाती है। खारा तो समुन्दर भी होता है, लेकिन इस नदी का खारापन आँसुओं से जुड़ा है। उसके बावजूद इसमें उमंगों की लहरें हैं जो इस कहानी को ख़ास बनाती हैं। हमारे आसपास की दुनिया ने कुछ दस्तूर बना दिए हैं, कुछ ठप्पे बना दिए हैं, जो बस इनसानों पर लगा दिए जाते है, कि ये तो ऐसा ही होगा। एक तयशुदा नज़रिया और तयशुदा सज़ा... लेकिन खारी नदी तो इन सब नज़रियों से परे एक औरत का संघर्ष दिखाती है जो किसी भी वंचित समुदाय की औरत का संघर्ष हो सकता है। खारी नदी में बयाँ की गई मुमताज़ बेगम, नन्दा, और चन्द्रभागा के साथ-साथ तमाम औरतों की आपबीतियाँ हमें झकझोर कर रख देती हैं। हर कहानी किसी एक औरत की नहीं, बल्कि तमाम औरतों का बयान है जो उन पर लगाए गए असंख्य बन्धनों और दुखों को उजागर करता है। और ये सारे बन्धन और दुख कहीं-न-कहीं धर्म और जाति के साथ उलझकर अलग-अलग जगहों पर अपना जाल बिछाए हुए हैं, औरत गाँव-देहात की हो या शहर की, अनपढ़ हो चाहे पढ़ी-लिखी। लेकिन खारी नदी की हर कहानी में एक ज़िन्दा मन भी है, और संघर्ष की तैयारी भी। खारी नदी औरतों के दुख, आँसू और शोषण के साथ-साथ उनकी ज़िन्दगी को बेहतरीन बनाने के लिए किया गया संघर्ष है। उम्मीद है यह संघर्ष पाठक को बहुत कुछ सोचने, समझने, आँकने और उसे जीवन में उतारने पर मजबूर करेगा; एक नया नज़रिया देगा।
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