Vartman Jaisa Ateet
Author:
Romila ThaparPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics0 Ratings
Price: ₹ 479.2
₹
599
Available
अतीत के बारे में प्रचलित धारणाओं को तब तक ऐतिहासिक नहीं माना जा सकता जब तक उनकी आलोचनात्मक जाँच-पड़ताल न कर ली जाए। ‘वर्तमान जैसा अतीत’ किताब मुख्यतः यही करती है। उदाहरण के लिए ये कुछ सवाल—सोमनाथ मन्दिर पर हमले के बाद वास्तव में क्या हुआ? हम में से आर्य या द्रविड़ कौन हैं? भारतीय समाज का धर्मनिरपेक्ष होना क्यों ज़रूरी है? साम्प्रदायिकता ने एक विचारधारा के रूप में देश में कब अपने पैर जमाए? हमारी पितृसत्तात्मक मानसिकता ने महिलाओं के विरुद्ध हिंसा की संस्कृति को कैसे और कब बढ़ावा देना शुरू किया? इतिहास की पाठ्यपुस्तकों को फिर से लिखने के लिए कट्टरपन्थी इतने उत्सुक क्यों हैं? इन और इस तरह के अन्य प्रश्नों को लेकर उसी समय से विवाद और बहसें होती आई हैं जब इन्हें पहली बार पूछा गया था।
प्रतिष्ठित इतिहासकार रोमिला थापर अकसर ही ऐसे प्रश्नों के मूल में स्थित ऐतिहासिक तथ्यों की जाँच, विश्लेषण और व्याख्या करती रही हैं। वे कहती हैं कि इतिहास में सिर्फ सूचनाएँ ही नहीं, उन सूचनाओं का विश्लेषण और व्याख्या भी शामिल होती है। चार उपखंडों के तहत विभिन्न प्रश्नों पर तथ्यात्मक और दृष्टि-सम्पन्न ढंग से विचार करने वाली यह पुस्तक ऐसे समय में निहायत ज़रूरी पाठ बन जाती है जब साम्प्रदायिकता, बनावटी ‘राष्ट्रवाद’ और ऐतिहासिक तथ्यों को धूमिल करना हमारे सार्वजनिक, निजी और बौद्धिक जीवन का अभिन्न अंग बनता जा रहा है।
ISBN: 9789360868307
Pages: 392
Avg Reading Time: 13 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Gyanendra Pandey
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- Description: ‘निम्नवर्गीय प्रसंग’ एक ऐसी रचना है जिसमें निम्न वर्ग अर्थात् आम जनता—ग़रीब किसान, चरवाहा, कामगार, स्त्री समाज, दलित जातियों—के संघर्षों और विचार को बहुत क़रीब से समझने का प्रयास किया गया है। यह रचना अभिजन के दायरे से बाहर जाकर निम्न वर्ग की ऐतिहासिक प्रक्रियाओं को परखने के साथ–साथ, अभिजन और निम्न जन की प्रक्रियाओं को दो अलग–अलग पटरियों पर न धकेलकर, इन दोनों के पारस्परिक सम्बन्ध, आश्रय और द्वन्द्व के आधार पर उपनिवेश काल की हमारी समझ को गतिशील करती है। दरअसल निम्नवर्गीय इतिहास एक सफल और चौंका देनेवाला प्रयोग है जिसके तहत भारतीय समाज में प्रभुत्व और मातहती के बहुआयामी रूप सामने आते हैं। वर्ग-संघर्ष और आर्थिक द्वन्द्व को कोरी आर्थिकता (Economism) के कठघरे से आज़ाद कर उसके सामाजिक और सांस्कृतिक प्रतिरूपों और विशिष्टताओं का इसमें गहराई के साथ विवेचन किया गया है। इस पुस्तक में स्वतंत्रता संग्राम, गांधी का माहात्म्य, किसान आन्दोलन, मज़दूर वर्ग की परिस्थितियाँ, आदिवासी स्वाभिमान और आत्माग्रह, निचली जातियों के सामाजिक–राजनीतिक और वैचारिक विकल्प जैसे अहम मुद्दों पर विवेकपूर्ण तर्क और निष्कर्षों से युक्त अद्वितीय सामग्री का संयोजन किया गया है। ‘निम्नवर्गीय प्रसंग : भाग-2’ आम जनता से सम्बन्धित नए इतिहास को लेकर चल रही अन्तरराष्ट्रीय बहस को आगे बढ़ाने का प्रयास है। 1982 में भारतीय इतिहास को लेकर की गई यह पहल, आज भारत ही नहीं, वरन् ‘तीसरी दुनिया’ के अन्य इतिहासकारों और संस्कृतिकर्मियों के लिए एक चुनौती और ध्येय दोनों है। हाल ही में सबॉल्टर्न स्टडीज़ शृंखला से जुड़े भारतीय उपनिवेशी इतिहास पर केन्द्रित लेखों का अनुवाद स्पैनिश, फ़्रेंच और जापानी भाषाओं में हुआ है। प्रस्तुत संकलन के लेख आम जनता से सम्बन्धित आधे-अधूरे स्रोतों को आधार बनाकर, किस प्रकार की मीमांसाओं, संरचनाओं के ज़रिए एक नया इतिहास लिखा जा सकता है, इसकी अनुभूति कराते हैं। रणजीत गुहा का निबन्ध ‘चन्द्रा की मौत’ 1849 के एक पुलिस-केस के आंशिक इक़रारनामों की बिना पर भारतीय समाज के निम्नस्थ स्तर पर स्त्री-पुरुष प्रेम-सम्बन्धों की विषमताओं का मार्मिक चित्रण है। ज्ञान प्रकाश दक्षिण बिहार के बँधुआ, कमिया-जनों की दुनिया में झाँकते हैं कि ये लोग अपनी अधीनस्थता को दिनचर्या और लोक-विश्वास में कैसे आत्मसात् करते हुए ‘मालिकों’ को किस प्रकार चुनौती भी देते हैं। गौतम भद्र 1857 के चार अदना, पर महत्त्वपूर्ण बागियों की जीवनी और कारनामों को उजागर करते हैं। डेविड आर्नल्ड उपनिवेशी प्लेग सम्बन्धी डॉक्टरी और सामाजिक हस्तक्षेप को उत्पीड़ित भारतीयों के निजी आईनों में उतारते हैं, वहीं पार्थ चटर्जी राष्ट्रवादी नज़रिए में भारतीय महिला की भूमिका की पैनी समीक्षा करते हैं। इस संकलन के लेख अन्य प्रश्न भी उठाते हैं। अधिकृत ऐतिहासिक महानायकों के उद्घोषों, कारनामों और संस्मरण पोथियों के बरक्स किस प्रकार वैकल्पिक इतिहास का सृजन मुमकिन है? लोक, व्यक्तिगत, या फिर पारिवारिक याददाश्त के ज़रिए ‘सर्वविदित' घटनाओं को कैसे नए सिरे से आँका जाए? हिन्दी में नए इतिहास-लेखन का क्या स्वरूप हो? नए इतिहास की भाषा क्या हो? ऐसे अहम सवालों से जूझते हुए ये लेख हिन्दी पाठकों के लिए अद्वितीय सामग्री का संयोजन करते हैं।
Chocolate Ki Vaishvik Rajdhani Belgium
- Author Name:
Ramesh Pokhriyal 'Nishank'
- Book Type:

- Description: "बेल्जियम की एक समृद्ध ऐतिहासिक विरासत और संस्कृति रही है, जिसका चित्रों, संगीत, साहित्य, नक्शानवीसी और वास्तुकला में साक्षात् दर्शन कर सकते हैं। बेल्जियम भले ही सबसे छोटे यूरोपीय देशों में से एक है, फिर भी इसके पर्यटन स्थल पर्यटकों से भरे रहते हैं। ये पर्यटन स्थल इस देश के समृद्ध इतिहास और परंपराओं की कहानियाँ बयाँ करते हैं। बेल्जियम के बारे में कई अनूठी, बेजोड़ बातें हैं, जो अनायास ही सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लेती हैं। बेल्जियम में दुनिया की सबसे बड़ी संख्या में प्रति वर्गमीटर महल हैं। कुछ क्षेत्रों में प्रति गाँव दो महल भी हैं। इनमें से कुछ को यूनेस्को द्वारा धरोहर घोषित किया गया है। बेल्जियम में विश्व के श्रेष्ठ संस्थानों के कॉर्पोरेट मुख्यालयों की बड़ी संख्या है। बेल्जियम में समृद्ध विरासत एवं परपंराएँ, विश्वविद्यालय, स्थापत्य कला को समेटे भवन, शिक्षा के उत्कृष्ट केंद्र, युद्ध स्मारक, मनमोहक प्राकृतिक छटा के अतिरिक्त अत्यंत दोस्ताना संबंध वाले लोग हैं। प्रस्तुत पुस्तक बेल्जियम के विषय में एक हैंडबुक है जो वहाँ की संपूर्ण जानकारी कम शब्दों में, रोचक शैली में देती है। "
Itihas Ki Punarvyakhya
- Author Name:
Romila Thapar
- Book Type:

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Description:
यदि किसी राष्ट्र के वर्तमान पर उसका अतीत अथवा इतिहास अनिष्ट की तरह मँडराने लगे तो उसके कारणों की पड़ताल नितान्त आवश्यक है। इतिहास की पुनर्व्याख्या इसी आवश्यकता का परिणाम है। विज्ञानसम्मत इतिहास-दृष्टि के लिए प्रख्यात जिन विद्वानों का अध्ययन-विश्लेषण इस कृति में शामिल है, उसे दो विषयों पर केन्द्रित किया गया है। पहला, ‘भारतीय इतिहास के अध्ययन के लिए नई दृष्टि’, और दूसरा, ‘साम्प्रदायिकता और भारतीय इतिहास-लेखन’। सर्वविदित है कि इतिहास के स्रोत अपने समय की तथ्यात्मकता में निहित होते हैं, लेकिन इतिहास तथ्यों का संग्रह-भर नहीं होता। उसके लिए तथ्यों का अध्ययन आवश्यक है और अध्ययन के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण। इसके बिना उन प्रवृत्तियों को समझना कठिन है, जो पिछले कुछ वर्षों से भारतीय इतिहास के मिथकीकरण का दुष्प्रयास कर रही हैं। इसे कई रूपों में रेखांकित किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, अतीत को लेकर एक काल्पनिक श्रेष्ठताबोध, वर्तमान के लिए अप्रासंगिक पुरातन सिद्धान्तों का निरन्तर दोहराव, सन्दिग्ध और मनगढ़ंत प्रमाणों का सहारा, तथ्यों का विरूपीकरण आदि। स्वातंत्र्योत्तर भारत में हिन्दू और मुस्लिम परम्परावादियों में इसे समान रूप से लक्षित किया जा सकता है। मस्जिदों में बदल दिए गए तथाकथित मन्दिरों के पुनरुत्थान-पुनर्निर्माण या फिर पुरातत्त्व विभाग द्वारा संरक्षित मस्जिदों में नए सिरे से उपासना के प्रयास ऐसी ही प्रवृत्तियों को उजागर करते हैं।
वस्तुत: ज्यों-ज्यों इतिहास और परम्परा के वैज्ञानिक मूल्यांकन की कोशिशें हो रही हैं, त्यों-त्यों उसके समानान्तर मिथकीकरण के प्रयासों में भी तेज़ी आ रही है। कहने की आवश्यकता नहीं कि ऐसे प्रयासों के पीछे राजनीति-प्रेरित कुछ इतर स्वार्थों की पूर्ति भी एक उद्देश्य है, जिसका भंडाफोड़ करना आज की ऐतिहासिक ज़रूरत है, क्योंकि प्रजातीय और धार्मिक श्रेष्ठता का दम्भ संसार में कहीं भी टकराव और विनाश को आमंत्रण देता रहा है। प्रो. रोमिला थापर के शब्दों में कहें तो, “20वीं शताब्दी के प्रारम्भ में जर्मनी में सामाजिक परिवर्तन की अनिश्चितता और मध्यवर्ग का विस्तार आर्य-मिथक का उपयोग कर रहे फासीवाद के उदय के मूल कारण थे। इस अनुभव से यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि जातीय मूल और पहचान के सिद्धान्तों का उपयोग बड़ी सावधानी से किया जाए, वरना उसके कारण ऐसे विस्फोट हो सकते हैं, जो एक पूरे समाज को तबाह कर दें। इन परिस्थितियों में इतिहास के नाम पर वृहत्तर समाज द्वारा ऐतिहासिक विचारों के ग़लत इस्तेमाल के तरीक़ों से इतिहासकार को सावधान रहना होगा।”
कहना न होगा कि यह मूल्यवान कृति इतिहास और इतिहास-लेखन की ज्वलन्त समस्याओं से तो परिचित कराती ही है, आज के लिए अत्यन्त प्रासंगिक विचार-दृष्टि को भी हमारे सामने रखती है।
Mahashakti Bharat
- Author Name:
Vedpratap Vaidik
- Book Type:

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Description:
इस ग्रन्थ के निबन्धों और हमारी वर्तमान विदेश नीति में एक तरह से आँख–मिचौनी चलती रहती है। कभी विदेश नीति आगे होती है और निबन्ध पीछे और कभी निबन्ध आगे होते हैं और विदेश नीति पीछे। जब निबन्ध पीछे–पीछे चलता है तो वह हर विदेश नीति से सम्बन्धित पहल की चीर–फाड़ करता है, कार्य–कारण में उतरता है, जड़ों तक पहुँचता है और दूध को दूध और पानी को पानी कहता है। ताँगे में जुते घोड़े को वह अगर पुचकारता है तो कभी–कभी उस पर चाबुक भी बरसाता है। इसके अलावा यह भी बताता है कि सरकार ने किसी ख़ास मुद्दे पर जो पहल की है, उसे वह बेतहर ढंग से कैसे उठा सकती थी। जब निबन्ध आगे–आगे चलता है तो उसकी कोशिश होती है कि विदेश नीति को वह अपने पीछे खींचता चले।
भारत सरकार की पाकिस्तान–नीति की विचित्रताएँ और वक्रताएँ इन निबन्धों में जमकर अनावृत हुई हैं। लाहौर का आकाश और आगरा की खाई इस लेखक को जैसे पहले से दिखाई पड़ रही थी, अगर भारत सरकार को भी दिखाई पड़ जाती तो जिस निराशा के दौर में वह बाद में फँसी, वह नहीं फँसती। अन्य पड़ोसी देशों और महाशक्तियों के साथ भारत के सम्बन्धों के अन्त:सूत्रों को खोजने और उन्हें नए आयाम देने का प्रयत्न भी इन निबन्धों में हुआ है।
इस ग्रन्थ के अधिकतर निबन्ध तात्कालिक प्रतिक्रिया के रूप में हैं लेकिन हर तत्काल की जड़ें कई कालों तक फैली हुई होती हैं। व्यक्ति के अपने, अन्य व्यक्तियों के, राष्ट्रों के, संस्कृतियों के कालों तक। कालों के विशेष अनुभवों तक। प्रत्येक विश्लेषण में, वह कितना ही तात्कालिक हो, इन सब अनुभवों का निकष होता है। और सबसे बड़ी बात यह कि अपने मस्तिष्क में अगर कोई चिन्तन का ढाँचा हो, चिन्तन–प्रणाली हो तो अलग–अलग समय पर पिरोए गए अलग–अलग आकार–प्रकार के मोती भी अपने–आप सुघड़ माला का रूप धारण करते चले जाते हैं। वाद्य–यंत्रों की विभिन्नता के बावजूद जैसे आर्केस्ट्रा का संगीत समवेत और समरस होता है, वैसे ही विभिन्न विषयों और विभिन्न तिथियों पर लिखे गए ये निबन्ध पाठकों को विदेश नीति चिन्तन की एक प्रणाली के अनुशासन में बँधे हुए लगेंगे।
The Gandhian Statesman of Bihar Nitish Kumar
- Author Name:
Ashok Choudhary +1
- Book Type:

- Description: "In the eyes of those who had lost all hopes in Bihar, Nitish Kumar has acquired the status of a miracle man. After all, how did he work for the revival of the state? Nitish Kumar is not a professional manager, he is a politician. When he took over as the Chief Minister of Bihar in November 2005, he frequently reminded the officials that the performance of the government was at stake in his ministry and not in the bureaucracy. If the government succeeds, then all the credit will be given his ministry. If it fails, his ministry will have to own the responsibility. Bureaucrats would not lose their jobs, but he (the Chief Minister) will have to go. Inspite of all this, Nitish Kumar earned a permanent place in the hearts of the people by working towards solving the issues related to the basic needs of the people and he emerged as the pioneer of social revolution. This process of improvement continues unabated. A readable and collectable saga that introduces you to the untold, inspiring, interesting, and adventurous campaigns of the social revolution of Nitish Kumar."
Sarfaroshi Ki Tamanna
- Author Name:
Kuldeep Nayar
- Book Type:

- Description: भगत सिंह (1907-1931) का समय वही समय था जब भारत का स्वतंत्रता-संग्राम अपने उरूज की तरफ़ बढ़ रहा था और जिस समय आंशिक आज़ादी के लिए महात्मा गांधी के अहिंसात्मक, निष्क्रिय प्रतिरोध ने लोगों के धैर्य की परीक्षा लेना शुरू कर दिया था। भारत का युवा वर्ग भगत सिंह के सशस्त्र विरोध के आह्वान और हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के आर्मी विंग की अवज्ञापूर्ण साहसिकता से प्रेरणा ग्रहण कर रहा था, जिससे भगत सिंह और उनके साथी सुखदेव और राजगुरु जुड़े थे। ‘इंकिलाब ज़िन्दाबाद’ का उनका नारा स्वतंत्रता-संघर्ष का उद्घोष बन गया था। लाहौर षड्यंत्र मामले में एक दिखावटी मुक़दमा चलाकर ब्रिटिश सरकार द्वारा भगत सिंह को मात्र 23 साल की आयु में फाँसी पर चढ़ा दिए जाने के बाद भारतवासियों ने उन्हें, उनके युवकोचित साहस, नायकत्व और मौत के प्रति निडरता को देखते हुए शहीद का दर्जा दे दिया। जेल में लिखी हुई उनकी चीज़ें तो अनेक वर्ष उपरान्त, आज़ादी के बाद सामने आईं। आज इसी सामग्री के आधार पर उन्हें देश की आज़ादी के लिए जान देनेवाले अन्य शहीदों से अलग माना जाता है। उनका यह लेखन उन्हें सिर्फ़ एक भावप्रवण स्वतंत्रता सेनानी से कहीं ज़्यादा एक ऐसे अध्यवसायी बुद्धिजीवी के रूप में सामने लाता है जिसकी प्रेरणा के स्रोत, अन्य विचारकों के साथ, मार्क्स, लेनिन, बर्ट्रेंड रसेल और विक्टर ह्यूगो थे और जिसका क्रान्ति-स्वप्न अंग्रेज़ों को देश से निकाल देने-भर तक सीमित नहीं था, बल्कि वह उससे कहीं आगे एक धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी भारत का सपना सँजो रहा था। इसी असाधारण युवक की सौवीं जन्मशती के अवसर पर कुलदीप नैयर इस पुस्तक में उस शहीद के पीछे छिपे आदमी, उसके विश्वासों, उसके बौद्धिक रुझानों और निराशाओं पर प्रकाश डाल रहे हैं। यह पुस्तक पहली बार स्पष्ट करती है कि हंसराज वोहरा ने भगत सिंह के साथ धोखा क्यों किया, साथ ही इसमें सुखदेव के ऊपर भी नई रोशनी में विचार किया गया है जिनकी वफ़ादारी पर कुछ इतिहासकारों ने सवाल उठाए हैं। लेकिन इसके केन्द्र में भगत सिंह का हिंसा का प्रयोग ही है जिसकी गांधी जी समेत अन्य अनेक लोगों ने इतनी कड़ी आलोचना की है। भगत सिंह की मंशा अधिक से अधिक लोगों की हत्या करके या अपने हमलों की भयावहता से अंग्रेज़ों के दिल में आतंक पैदा करना नहीं था, न उनकी निर्भयता का उत्स सिर्फ़ बन्दूक़ों और जवानी के साहस में था। यह उनके अध्ययन से उपजी बौद्धिकता और उनके विश्वासों की दृढ़ता का मिला-जुला परिणाम था।
Bhartiya Swadhinta Sangram Ka Itihas
- Author Name:
Ashok Ganguli
- Book Type:

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यह पुस्तक भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद और उसके विरुद्ध हुए भारतीयों के विभिन्न संग्रामों का विवरण है। आरम्भ में अंग्रेज़ों के भारत में सर्वोपरि ताक़त के रूप में उभरने का विवरण है, साथ ही अंग्रेज़ों की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध भारतीय प्रायद्वीप के विभिन्न अंचलों में हुए विद्रोहों का उल्लेख है। तत्पश्चात् 1857 में हुई महान क्रान्ति का व्यापक उल्लेख, भारतीय राष्ट्रवाद की भावना का उदय और उसके बाद हुए आन्दोलनों एवं क्रान्तिकारी गतिविधियों का विशद विवरण है। इस प्रकार पुस्तक से जहाँ एक ओर भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम (1857) और आज़ादी की लड़ाई में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अन्य क्रान्तिकारियों की भूमिका के बारे में पता चलता है, वहीं पाठकों को स्थानीय विद्रोहों एवं उनके नायकों जैसे मजनूशाह, वेलु थम्पी, चेनम्मा, तीतू मीर, सीधु व कानू, बिरसा मुंडा आदि के बारे में भी जानकारी प्राप्त होती है। भारत के मध्ययुगीन परम्पराओं से बाहर निकलने एवं नई चेतना के विकास के लिए विभिन्न महापुरुषों के सत्प्रयासों का भी विवरण पुस्तक में है।
भारत की आज़ादी का अनिवार्य प्रसंग है देश का विभाजन। बीसवीं सदी के प्रारम्भ में पनपे मुस्लिम पृथकतावाद को समझने की कोशिश करते हुए पाकिस्तान के निर्माण के कारणों पर चर्चा पुस्तक का प्रमुख आकर्षण है। साथ ही दोनों विश्वयुद्धों, जिनमें ब्रिटिश मुख्य खिलाड़ी था पर भारत को जबरन उसके दुष्परिणाम भुगतने पड़े, के बारे में भी आवश्यक जानकारियाँ पाठकों तक पहुँचाई गई हैं।
पुस्तक अत्यन्त ही सरल भाषा में लिखी गई है जिसमें अंग्रेज़ों की भारत में उपस्थिति का सारगर्भित वृत्तान्त है। पुस्तक छात्रों, शोधकर्ताओं, इतिहासकारों, लेखकों एवं उन सबके लिए उपयोगी सिद्ध होगी जो भारत की ब्रिटिश साम्राज्यवाद से स्वतंत्रता के बारे में जानने के इच्छुक हैं। यह पुस्तक विशेष तौर पर आज की पीढ़ी के लिए लिखी गई है।
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