Mandavi
(0)
Author:
Asha PrabhatPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Historical-fiction₹
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‘मांडवी’ रामकथा की स्त्री-चरित्रों को लेकर संवेदनशील रही आशा प्रभात की लेखनी का नया पड़ाव है। इससे पहले वह ‘मैं जनकनन्दिनी’ और ‘उर्मिला’ लिख चुकी हैं। ‘मांडवी’ भरत की पत्नी थीं जिनके विषय में न तो रामकथा में बहुत विस्तार से कुछ आता है, न ही बाद के विद्वानों-साहित्यकारों ने उन पर कुछ ख़ास ध्यान दिया, जबकि राम-वनवास के दौरान उन्होंने सम्भवतः लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला से भी ज़्यादा पीड़ा का वहन किया होगा। आशा प्रभात एक सजग लेखिका के रूप में यह ठीक ही प्रश्न उठाती हैं कि रामायण के पुरुष-पात्र जहाँ इतने पराक्रमी, प्रज्ञावान और गुणवान थे, तो फिर स्त्री-पात्र क्या इतने संवेदनहीन और प्रज्ञाशून्य थे कि उनकी मनस्थिति का विस्तृत चित्रण करना कवियों की अनिवार्य नहीं लगा। इसी से प्रेरित होकर उन्होंने सीता और उर्मिला के बाद अब मांडवी को अपना विषय बनाया जो दुर्भाग्य से उस कैकेयी की बहू भी थी जिसके चलते राम को वनवास हुआ और उनसे जुड़े तमाम पात्रों, ख़ासकर स्त्रियों को इतना कुछ झेलना पड़ा। यह उपन्यास एक पौराणिक चरित्र की भावभूमि का अन्वेषण करते हुए स्त्री-मात्र की व्यथा को समझने का प्रयत्न करता है, और रामकथा के महत्त्वपूर्ण लेकिन उपेक्षित चरित्र को, उसके पूरे व्यक्तित्व के साथ रेखांकित करता है।
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‘मांडवी’ रामकथा की स्त्री-चरित्रों को लेकर संवेदनशील रही आशा प्रभात की लेखनी का नया पड़ाव है। इससे पहले वह ‘मैं जनकनन्दिनी’ और ‘उर्मिला’ लिख चुकी हैं।
‘मांडवी’ भरत की पत्नी थीं जिनके विषय में न तो रामकथा में बहुत विस्तार से कुछ आता है, न ही बाद के विद्वानों-साहित्यकारों ने उन पर कुछ ख़ास ध्यान दिया, जबकि राम-वनवास के दौरान उन्होंने सम्भवतः लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला से भी ज़्यादा पीड़ा का वहन किया होगा।
आशा प्रभात एक सजग लेखिका के रूप में यह ठीक ही प्रश्न उठाती हैं कि रामायण के पुरुष-पात्र जहाँ इतने पराक्रमी, प्रज्ञावान और गुणवान थे, तो फिर स्त्री-पात्र क्या इतने संवेदनहीन और प्रज्ञाशून्य थे कि उनकी मनस्थिति का विस्तृत चित्रण करना कवियों की अनिवार्य नहीं लगा।
इसी से प्रेरित होकर उन्होंने सीता और उर्मिला के बाद अब मांडवी को अपना विषय बनाया जो दुर्भाग्य से उस कैकेयी की बहू भी थी जिसके चलते राम को वनवास हुआ और उनसे जुड़े तमाम पात्रों, ख़ासकर स्त्रियों को इतना कुछ झेलना पड़ा।
यह उपन्यास एक पौराणिक चरित्र की भावभूमि का अन्वेषण करते हुए स्त्री-मात्र की व्यथा को समझने का प्रयत्न करता है, और रामकथा के महत्त्वपूर्ण लेकिन उपेक्षित चरित्र को, उसके पूरे व्यक्तित्व के साथ रेखांकित करता है।
Book Details
-
ISBN9789360864484
-
Pages240
-
Avg Reading Time8 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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"किसी को उम्र के 16वें मोड़ पर चाहना, इस सृष्टि का सबसे खूबसूरत एहसास है।" हमारे पूर्वजों के साथ ज़मीन के बंटवारे में अन्याय हुआ है। एक आदमी के पास मरने के बाद शव दफनाने तक की जगह नहीं है और एक आदमी के पास इतनी जमीनें हैं कि उसे पता ही नहीं है कि उसके पास कितनी जमीनें है। हमें ज़मीन चाहिए। सबको जीने का हक़ है... भूखे मरने से अच्छा है... संघर्ष करो। उनकी जमीनें छीनो! जहाँ लड़ाई अस्तित्व बचाने की हो, वहाँ युद्ध का कोई नियम नहीं होता। कल जब इतिहास के पन्ने सवाल करेंगे तो जवाब होगा कि हाँ, हमने बच्चों को मारा। इसलिए मारा कि कल ये बच्चे बड़े होकर नक्सल बनते। हाँ, हमने औरतों को मारा क्योंकि वे औरतें नक्सल पैदा करती थीं और जवान तो नक्सल थे ही। इन्हें तो हर हाल में मारना ही था हमें। बिहार के इतिहास को बुद्ध, महावीर के शांति सन्देशों के अलावा सामाजिक संरचना में ' डार्विन जस्टिस की थ्योरी को समझाना था। सामाजिक संरचना में सदियों से चला आ रहा असंतुलन, संतुलित होने के नाम पर रक्त रंजित होने जा रहा था। तैयारियाँ शुरू हो गईं। लोग दूर दराज़ से आने लगे। जिन्हें अपने खेतों से लाल झंडे हटवाने थे, वे मनचाहा योगदान देने को तैयार थे। अनय और चश्मिश की कहानी काल के किसी कार्यक्रम का हिस्सा है। किसी इंसान के बहाने इंसानियत को कलंकित करना है। उसे 'कार्ल मार्क्स' के अंदर 'डार्विन के सिद्धान्त' को समझाना है। उसे समझाना है कि 'न्यूटन का सिद्धान्त' सिर्फ़ भौतिकी विज्ञान की किताबों में ही नहीं बल्कि सामाजिक संरचना के अंदर भी घुसा है। उसे समझाना है कि 'लिंकन' के जिस प्रजातंत्र का हम दम्भ भरते हैं, वहाँ भी 'डार्विन की थ्योरी' चुपचाप अपना काम करती रहती है।
Chhaha Swarnim Pristha
- Author Name:
Vinayak Damodar Savarkar
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भारतीय वाड.मय में सावरकर साहित्य का महत्त्वपूर्ण स्थान है। मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए प्राण हथेली पर रखकर जूझनेवाले महान् क्रांतिकारी; जातिभेद, अस्पृश्यता, अंधश्रद्धा जैसी सामाजिक बुराइयों को समूल नष्ट करने का आग्रह रखनेवाले स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने इस ग्रंथ में भारतीय इतिहास पर विहंगम दृष्टि डाली है। विद्वानों में सावरकर लिखित इतिहास जितना प्रामाणिक और निष्पक्ष माना गया है उतना अन्य लेखकों का नहीं। प्रस्तुत ग्रंथ ‘छह स्वर्णिम पृष्ठ’ में हिंदू राष्ट्र के इतिहास का प्रथम स्वर्णिम पृष्ठ है यवन-विजेता सम्राट् चंद्रगुप्त की राजमुद्रा से अंकित पृष्ठ, यवनांतक सम्राट् पुष्यमित्र की राजमुद्रा से अंकित पृष्ठ भारतीय इतिहास का द्वितीय स्वर्णिम पृष्ठ, सम्राट् विक्रमादित्य की राजमुद्रा से अंकित पृष्ठ इतिहास का तृतीय स्वर्णिम पृष्ठ है। हूणांतक राजा यशोधर्मा के पराक्रम से उद्दीप्त पृष्ठ इतिहास का चतुर्थ स्वर्णिम पृष्ठ, मुसलिम शासकों के साथ निरंतर चलते संघर्ष और उसमें मराठों द्वारा मुसलिम सत्ता के अंत को हिंदू इतिहास का पंचम स्वर्णिम पृष्ठ कह सकते हैं और अंतिम स्वर्णिम पृष्ठ है अंग्रेजी सत्ता को उखाड़कर स्वातंत्र्य प्राप्त करना। विश्वास है, क्रांतिवीर सावरकर के पूर्व ग्रंथों की भाँति इस ग्रंथ का भी भरपूर स्वागत होगा। सुधी पाठक भारतीय इतिहास का सम्यक् रूप में अध्ययन कर इतिहास के अनेक अनछुए पहलुओं और घटनाओं से परिचित होंगे।
Hasanpur Ke Ram
- Author Name:
Dr. Parshuram Gupt
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अंतर्वस्तु यह उपन्यास एक ऐसे राजवंश से संबंधित है, जो सम्राट् पृथ्वीराज चौहान केवंशज रहे। पानीपत की पहली लड़ाई के दौरान परिस्थितिवश उन्हें इसलाम स्वीकार करना पड़ा, लेकिन सगोत्रियों तथा अपने पूर्वजों के संस्कारों पर उनकी आस्था यथावत् बनी रही; ठीक वैसे ही, जैसे इंडोनेशिया के निवासी पंथ बदलने के बाद भी अपने पूर्वजों की संस्कृति पर आज भी आस्था रखते हैं। रामकथा लगभग संपूर्ण एशिया की आस्था का केंद्र रही है और आज भी इसमें इस पूरे क्षेत्र को एकता केसूत्र में पिरोने की अद्भुत क्षमता है। अयोध्या में भव्य राम-मंदिर के निर्माण ने इस आस्था को और अधिक बलवती किया है। ‘पंथ बदलने पर भी हम अपनी संस्कृति से बँधे रहते हैं’ यह भाव इस ऐतिहासिक उपन्यासका प्राण-तत्त्व है। यह ऐतिहासिक उपन्यास अपने तरीके से भारतीय संस्कृति की जिजीविषा की अनूठी कहानी एक अनूठे अंदाज में प्रस्तुत करता है। यह कहानी खंड-खंड से प्रचंड शक्ति बनने की कहानी है। यह अंधकार को चीरकर प्रकाश का नया सूरज उगाने की कहानी है। यह अनेक रोचक ऐतिहासिक तथ्यों का उद्घाटन भी करता है, जो भारतीय इतिहास को नए दृष्टिकोण से देखने का कुतूहल पैदा करता है। यह अनेक उलझी हुई समस्याओं के समाधान के रास्ते भी सुझाता है।
Krantiveer Bhagat Singh : 'Abhyudaya' Aur 'Bhavishya'
- Author Name:
Chaman Lal
- Book Type:

- Description:
‘क्रान्तिवीर भगत सिंह : ‘अभ्युदय’ और ‘भविष्य’’ आज़ादी की लड़ाई, ख़ासकर इन्क़लाबी नौजवानों के संघर्ष की हक़ीक़त तलाशती कोशिश का नतीजा है। पुस्तक में शामिल पत्रिकाओं ‘अभ्युदय’ और ‘भविष्य’ की सामग्री हिन्दुस्तान की आज़ादी के संग्राम को ठीक से समझने के लिए बेहद ज़रूरी है। ‘अभ्युदय’ ने भगत सिंह के मुक़दमे और फाँसी के हालात पर भरपूर सामग्री छापी और 8 मई, 1931 को प्रकाशित उसका ‘भगत सिंह विशेषांक’ ब्रिटिश सरकार द्वारा ज़ब्त कर लिया गया। भगत सिंह के जीवन, व्यक्तित्व और परिवार को लेकर जो सामग्री ‘अभ्युदय’ व ‘भविष्य’ में छापी गई—विशेषतः भगत सिंह व उनके परिवार के चित्र—उसी से पूरे देश में भगत सिंह की विशेष छवि निर्मित हुई। ‘भविष्य’ साप्ताहिक इलाहाबाद से रामरख सिंह सहगल के सम्पादन में निकलता था। पहले पं. सुन्दरलाल के सम्पादन में ‘भविष्य’ निकलता था, जिसमें रामरख सिंह सहगल काम करते थे। 2 अक्टूबर, 1930 को गांधी जयन्ती पर रामरख सिंह सहगल ने, जो स्वयं युक्तप्रान्त कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य थे, ‘भविष्य’ साप्ताहिक का प्रकाशन शुरू किया। पहले अंक से ही भगत सिंह आदि पर सामग्री प्रकाशित कर, ‘भविष्य’ ने सनसनी फैला दी। ‘भविष्य’ में भगत सिंह की फाँसी के बाद के हालात का जीवन्त चित्रण हुआ है। ‘भविष्य’ और ‘अभ्युदय’ से कुछ चुनिन्दा चित्र इस किताब में शामिल किए गए हैं। सम्पादक प्रो. चमन लाल ने विलुप्तप्राय तथ्यों को इस पुस्तक में सँजोकर ऐतिहासिक कार्य किया है। वस्तुतः इस इन्क़लाबी वृत्तान्त को पढ़ना स्वतंत्रता की अदम्य जिजीविषा से साक्षात्कार करना है।
Ek Kishori Ki Diary
- Author Name:
Anne Frank +1
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अने फ़्रांक की लिखी 'एक किशोरी की डायरी' विश्व की श्रेष्ठ कृतियों में गिनी जाती है। जर्मनी में जन्मी अने ने यह ‘डायरी’ 1942 से 1944 के दौरान लिखी। इसमें युद्ध के बाद जर्मन क़ब्ज़े के दौरान डच लोगों की पीड़ा का आँखों-देखा विवरण है। एक 15 वर्षीय किशोरी ने समाज की उथल-पुथल और अपने मन की कशमकश को बहुत ही ईमानदारी से व्यक्त किया है। जन्मदिन के उपहार स्वरूप मिली एक डायरी को जिस समय उन्होंने अपना सच्चा मित्र बनाया था, उस समय ख़ुद उन्होंने भी कल्पना नहीं की होगी कि एक दिन यह डायरी विश्व की महानतम कृतियों में शुमार होगी। डायरी की प्रविष्टियों में जहाँ स्कूल की बातें हैं, तो सहेलियों की ईर्ष्या, मनपसन्द खिलौनों की चाह, छुट्टियों में बिताए समय के साथ देश में तेज़ी से बदलते हालात का भी वर्णन है। कैसे जर्मनी में रहनेवाले यहूदियों की ज़िन्दगी एक सनक-भर से जहन्नुम हो गई थी, लेकिन जीने की उत्कट इच्छा आख़िरी समय तक भी हार मानने को तैयार नहीं हुई। अने का बाल-मन कहीं न कहीं मानता है कि एक दिन सब सही हो जाएगा और वो वापस अपने परिवार के साथ एक सामान्य जीवन जी पाएगी। एक किशोरी की यह मार्मिक डायरी सिर्फ़ उसी की न रहकर सीधे पाठक के दिल में घर कर जाती है।
TEESA
- Author Name:
Nandani Agrawal
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"भारत में किस्से-कहानियों में राजा और उनकी रियासत को आज भी जिंदा रखा गया है। राजाओं के भोग-विलास की कहानियाँ उस दौर में प्रजा के साथ हुई घटनाओं और राजा के कुटिल स्वभाव को भी बयान करती हैं। ‘तीसा’ उपन्यास का तानाबाना भी राजा और मंत्री की चालबाजी से शुरू होता है। जहाँ राजा लालची तो है ही लेकिन एक खौफ के साये में अपनी जिंदगी को जी रहा है। राजा का अपनी ही रानी से मोहभंग सिर्फ इसलिए हो जाता है क्योंकि रानी राजा की कुटिल करतूतों पर खामोश नहीं होती है। कहानी का केंद्र बिंदु तीसा का शांत स्वभाव और चाँद सी शीतलता ओढ़े उसकी खूबसूरती है जो जंगल में चंदन की खूशबू फैलाती हुई सी लगती है। अब जहाँ चंदन हो, वहाँ विषैले साँप तो होंगे ही। ऐसे में राजा के मायाजाल से खुद को बचाना, यह चुनौती का काम तो होगा ही। तीसा कैसे मुश्किल समय में धैर्य और साहस से अपनी जीत को सुनिश्चित करती है, यह हम सबके लिए एक सबक की तरह हो सकता है। आप किसी भी मुश्किल समय में क्यों न हों, बस उम्मीद रखिए कि बुरा समय जरूर बीत जाएगा और अधर्म कितना भी क्यों न पाँव पसारे, जीत अंत में धर्म की ही होती है।"
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