Nadiyan Hi Raah Batayengi

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Author:

Rakesh Kabeer

Language:

Hindi

Category:

Poetry

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खलील जिब्रान अपनी एक छोटी-सी कहानी में कहते हैं कि मैंने एक ऐसे प्राणी को देखा जिसका सिर मनुष्य का और धड़ विशालकाय पशु का था। जो बहुत तेजी से पहाड़ों को खा रहा था और समुन्दरों को पी रहा था। मैंने पूछा कि आप इतनी जल्दी-जल्दी यह सब क्यों खा रहे हैं तो उसने जवाब दिया कि कहीं ऐसा न हो कि कल यह सब न रहे इसलिए तेजी से खा रहा हूँ। गौर करने की बात है कि खलील जिब्रान ने पूँजीवाद का यह जो रूपक गढ़ा है उसमें सिर मनुष्य का और धड़ विशालकाय पशु का क्यों रखा? शायद इसलिए कि जो इतनी निर्ममता से प्रकृति का विनाश कर रहा है दरअसल उसके पास एक दिमाग है जो सोच सकता है लेकिन उसका पेट भर ही नहीं रहा है। इसलिए उसका दिमाग काम नहीं कर रहा है कि यह सब खत्म हो जाएगा तो क्या परिणाम होगा? उसके दिमाग की नसें पेट की भाषा से अधिक कुछ पढ़ नहीं पा रही हैं कि कल यह नहीं होगा तो क्या होगा! सारी दुनिया में यही चक्र चल रहा है। मारियो वार्गास ल्योसा के उपन्यास ‘क़िस्सागो’ की माचिग्वेंगा जनजाति हो, चाहे बक्सवाहा के जंगलों के आदिवासी या कि नियमगिरि पहाड़ों में बसे डोंगरिया कोंध। सबके पर्यावरण को ऐसे ही प्राणी लगातार बेरहमी से निगल रहे हैं। राकेश की कविताओं में ऐसे ही भयावह प्राणियों के हजारों छोटे-छोटे संस्करण दिख रहे हैं जो अपने स्तर पर समस्त प्रकृति को चर रहे हैं। लेकिन कवि भी अपने भरोसे पर कायम है कि नदियाँ भले आज विलोपित हैं, लेकिन कल वे अपनी राह खोजेंगी। यही नहीं, वे मनुष्य को जीने का शऊर भी सिखाएँगी। —रामजी यादव

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ISBN
9789377473136
Pages
192
Avg Reading Time
6 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

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खलील जिब्रान अपनी एक छोटी-सी कहानी में कहते हैं कि मैंने एक ऐसे प्राणी को देखा जिसका सिर मनुष्य का और धड़ विशालकाय पशु का था। जो बहुत तेजी से पहाड़ों को खा रहा था और समुन्दरों को पी रहा था। मैंने पूछा कि आप इतनी जल्दी-जल्दी यह सब क्यों खा रहे हैं तो उसने जवाब दिया कि कहीं ऐसा न हो कि कल यह सब न रहे इसलिए तेजी से खा रहा हूँ।
गौर करने की बात है कि खलील जिब्रान ने पूँजीवाद का यह जो रूपक गढ़ा है उसमें सिर मनुष्य का और धड़ विशालकाय पशु का क्यों रखा? शायद इसलिए कि जो इतनी निर्ममता से प्रकृति का विनाश कर रहा है दरअसल उसके पास एक दिमाग है जो सोच सकता है लेकिन उसका पेट भर ही नहीं रहा है। इसलिए उसका दिमाग काम नहीं कर रहा है कि यह सब खत्म हो जाएगा तो क्या परिणाम होगा? उसके दिमाग की नसें पेट की भाषा से अधिक कुछ पढ़ नहीं पा रही हैं कि कल यह नहीं होगा तो क्या होगा! सारी दुनिया में यही चक्र चल रहा है। मारियो वार्गास ल्योसा के उपन्यास ‘क़िस्सागो’ की माचिग्वेंगा जनजाति हो, चाहे बक्सवाहा के जंगलों के आदिवासी या कि नियमगिरि पहाड़ों में बसे डोंगरिया कोंध। सबके पर्यावरण को ऐसे ही प्राणी लगातार बेरहमी से निगल रहे हैं।
राकेश की कविताओं में ऐसे ही भयावह प्राणियों के हजारों छोटे-छोटे संस्करण दिख रहे हैं जो अपने स्तर पर समस्त प्रकृति को चर रहे हैं। लेकिन कवि भी अपने भरोसे पर कायम है कि नदियाँ भले आज विलोपित हैं, लेकिन कल वे अपनी राह खोजेंगी। यही नहीं, वे मनुष्य को जीने का शऊर भी सिखाएँगी।
—रामजी यादव

Book Details

  • ISBN
    9789377473136
  • Pages
    192
  • Avg Reading Time
    6 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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