Hindi Natak Ke Paanch Dashak
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हिन्दी रंगमंच की परम्परा सन् 1880 में पारसी थिएटर के माध्यम से आरम्भ होकर 1930 में समाप्त मानी जाती है, लेकिन स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी नाटकों के इतिहास में रंगमंचीय नाटकों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी नाटकों का आधुनिक दृष्टि से मूल्यांकन करने के लिए भाव-बोध और शिल्पबोध, इन दोनों ही पहलुओं का अध्ययन आवश्यक है। इस पुस्तक में समकालीन रंग-परिदृश्य के सन्दर्भ में स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी नाटकों में निहित आधुनिकता-बोध का अध्ययन, विवेचन और विश्लेषण किया गया है, और हिन्दी रंग-नाटक की विशिष्ट उपलब्धियों एवं सम्भावनाओं को भारतीय और पाश्चात्य रंगमंचीय सन्दर्भों में जाँचने-परखने की कोशिश भी है। आधुनिक हिन्दी नाटक की प्रमुख विशेषताओं और प्रवृत्तियों के रेखांकन के साथ अन्तिम दो अध्यायों में प्रस्तुत ‘रंगानुभूति और रंगमंचीय परिवेश’ तथा ‘रंग-भाषा की तलाश : उपलब्धि और सम्भावना’ जैसे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण, प्रासंगिक और जटिल विषयों के विवेचन नाटक के गम्भीर अध्येताओं के साथ-साथ शायद रंगकर्मियों के लिए भी उपयोगी सिद्ध होंगे।
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हिन्दी रंगमंच की परम्परा सन् 1880 में पारसी थिएटर के माध्यम से आरम्भ होकर 1930 में समाप्त मानी जाती है, लेकिन स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी नाटकों के इतिहास में रंगमंचीय नाटकों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी नाटकों का आधुनिक दृष्टि से मूल्यांकन करने के लिए भाव-बोध और शिल्पबोध, इन दोनों ही पहलुओं का अध्ययन आवश्यक है।
इस पुस्तक में समकालीन रंग-परिदृश्य के सन्दर्भ में स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी नाटकों में निहित आधुनिकता-बोध का अध्ययन, विवेचन और विश्लेषण किया गया है, और हिन्दी रंग-नाटक की विशिष्ट उपलब्धियों एवं सम्भावनाओं को भारतीय और पाश्चात्य रंगमंचीय सन्दर्भों में जाँचने-परखने की कोशिश भी है।
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Book Details
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ISBN9788183614375
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Pages272
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Avg Reading Time9 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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बादल सरकार के नाटक ‘एवम् इन्द्रजित्’ का भारतीय रंगकर्म में एक विशिष्ट स्थान है। मूलतः बांग्ला में लिखे इस नाटक का अनेक भारतीय भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। विभिन्न भाषाओं के रंगकर्म में इस नाटक ने बार-बार मंचित होकर प्रशंसा और प्रसिद्धि पर्याप्त बटोरी है। इस नाटक की लोकप्रियता का कारण इसके कथा व शिल्प में निहित है। युवा वर्ग की महत्त्वाकांक्षा, परवर्ती कुंठा व निराशा का यथार्थपरक चित्रण इसमें किया गया है। नाटक अपनी निष्पत्ति में रेखांकित करता है कि मृत्यु का वरण समस्या का समाधान नहीं है। यह जानते हुए भी कि हमारे पास कोई सम्बल नहीं, हमें जीना है। नाटक का कथ्य अत्यन्त यथार्थवादी होते हुए भी शिल्प प्रतीकात्मक है। जीवन के दस-पन्द्रह वर्षों की अवधि को समेटे हुए यह नाटक जीने की ज़िद का तर्क है।
बादल सरकार की काव्यात्मक भाषा सम्प्रेषण और अर्थ दोनों को समृद्ध करती है। नए कलेवर में प्रस्तुत यह प्रसिद्ध नाटक पाठकों व रंगकर्मियों को ख़ूब भाएगा, ऐसा विश्वास किया जा सकता है ।
प्रसिद्ध रंगकर्मी डॉ. प्रतिभा अग्रवाल ने ‘एवम् इन्द्रजीत्’ का मनोयोगपूर्वक अनुवाद किया है। उनके अनुसार, ‘...मेरे द्वारा किए गए अनुवादों में यह सर्वश्रेष्ठ है।’
Madhavi
- Author Name:
Bhisham Sahni +1
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प्रख्यात लेखक भीष्म साहनी का यह तीसरा नाटक ‘माधवी’ महाभारत की एक कथा पर आधारित है। ऋषि विश्वामित्र का शिष्य गालव अपनी शिक्षा समाप्ति के समय गुरु-दक्षिणा देने की हठ करता है और विश्वामित्र उसके हठी स्वभाव से क्रुद्ध होकर आठ सौ अश्वमेधी घोड़े माँग लेते हैं। अश्वमेधी घोड़ों की खोज में भटकता हुआ गालव अन्त में दानवीर राजा ययाति के आश्रम में पहुँचता है। राज-पाट से निवृत्त राजा ययाति गालव की प्रतिज्ञा सुनकर असमंजस में पड़ जाते हैं, किन्तु वे दैवी गुणों से युक्त अपनी एकमात्र पुत्री माधवी को, यह कहकर उसे सौंप देते हैं कि जहाँ कहीं किसी भी राजा के पास आठ सौ अश्वमेधी घोड़े मिलें, उनके बदले वह माधवी को राजा के पास छोड़ दें। माधवी के बारे में कहा गया है कि उसके गर्भ से उत्पन्न बालक चक्रवर्ती राजा बनेगा।
यहीं से माधवी की कथा आरम्भ होती है। अनूठे और मर्मस्पर्शी घटना-चक्र में गुज़रते हुए, इस नाटक के प्रधान पात्र—माधवी, गालव, ययाति, विश्वामित्र और अनेक राजागण अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं, और एक विकट, हृदयग्राही मानवीय स्थिति के परिप्रेक्ष्य में, ये चरित्र नए-नए आयाम ग्रहण करते हैं। इनके केन्द्र में ययाति-कन्या माधवी है, जो लगभग एक अलौकिक मिथकीय परिवेश में रहते-बसते हुए भी अत्यधिक सजीव, सर्वथा प्रासंगिक और आकर्षक बनकर उभरती है।
Agni Aur Barkha
- Author Name:
Girish Karnad +1
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- Description:
इतिहास, पुराण, जातक और लोकथाएँ गिरीश कारनाड के लिए सर्वाधिक समृद्ध उत्प्रेरक और आकर्षक कथा-बीज स्रोत रहे हैं। नई दृष्टि एवं संवेदना के वहन के लिए वे अपनी रचना का शरीर अतीत से चुनते हैं। उनकी विशिष्टता यह है कि वे मिथकीय कथानकों से आधुनिक और सामयिक समस्याओं के सम्प्रेषण का काम लेते हैं। अग्नि और बरखा के लिए कारनाड पुनः अतीत की ओर लौटे हैं, इसके केन्द्र में है–महाभारत का वन पर्व। अपने वनवास काल में देशाटन में पांडव इधर-उधर भटक रहे हैं। सन्त लोमष इन्हें यवक्री अर्थात् यवक्रत की गाथा सुनाते हैं। महाभारत जैसी महागाथा का पटल इतना जटिल है कि ऐसे छोटे वृत्तान्त पर ध्यान न जाना स्वाभाविक था, लेकिन कारनाड को इस कथा ने सर्वाधिक प्रभावित किया। इस कथा के भीतर कई गम्भीर अर्थ विद्यमान हैं, नाटककार इस नाट्य-रूपान्तर में इसके निहित अर्थों व अभिप्रायों को स्पष्ट करता है। अतीत के प्रकाश में वर्तमान धुँधलके को साफ़ और उजला करने की यह रचनात्मक कोशिश निःसन्देह पठनीय और दर्शनीय है, इसका एक प्रमाण यह भी है कि अब तक इस नाटक के दर्जनों सफल मंचन हो चुके हैं।
Barff
- Author Name:
Saurabh Shukla
- Book Type:

- Description:
सही और ग़लत के बीच किसी राह की तलाश की तरह है–सौरभ शुक्ला का ‘बर्फ़’।
–‘द हिन्दू’
‘बर्फ़’ नाटक जैसा देखने में है, जितना दिखता है, उससे कहीं ज़्यादा अनुभव के स्तर पर नाटक है।
–‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’
सच की बेहतरीन नाट्य-प्रस्तुति।
–‘सन्डे गार्डियन’
‘बर्फ़’ जितना भयानक है उतना ही मानवीय भी है। सौरभ ने एक पतली रस्सी पर चलने जैसा ख़तरनाक काम किया है, जिसमे वे पूरी तरह सफल हुए हैं। रंगमंच की दुनिया का यह चकित करनेवाला काम है।
–सुधीर मिश्रा
San 2025
- Author Name:
Piyush Mishra
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दो पात्रों का यह नाटक एक लेखक के रहस्यमय जीवन और लेखन से एक-एक कर कई पर्दे उठाता है। गड़गड़ सूफ़ी एक जासूस है, जो उसके चर्चित-पुरस्कृत उपन्यासों की सच्चाई की तस्दीक अख़बारी कतरनों से करता चलता है और एक दिन आकर लेखक को बताता है कि मुझे मालूम है कि आपने जो भी हत्या-कथाएँ लिखी हैं, वे आपने स्वयं की हैं; और लेखक उसके इस आरोप को स्वीकार कर लेता है और कहता है कि हाँ, वे सब हत्याएँ मैंने ही की हैं। इससे पहले कि जासूस लेखक से कुछ हासिल करने के लिए अपनी शर्तें मनवाता लेखक पिस्तौल के इशारे पर उसे बाल्कनी से गिरकर मरने पर बाध्य कर देता है।
तुर्की-ब-तुर्की संवादों के माध्यम से आगे बढ़ता यह छोटा-सा नाटक दर्शक के सामने सच और झूठ का एक तिलस्म रचता है जिसमें हमें यथार्थ का एक नया चेहरा दिखाई देता है।
Gagan Damama Bajyo
- Author Name:
Piyush Mishra
- Book Type:

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इस नाटक के लिए दिल्ली के प्रसिद्ध ‘एक्ट-वन नाट्य समूह’ और ख़ुद पीयूष मिश्रा ने इतना शोध और परिश्रम किया था कि भगतसिंह पर इतिहास की कोई पुस्तक बन जाती, लेकिन उन्हें नाटक लिखना था जिसकी अपनी संरचना होती है, सो उन्होंने नाटक लिखा जिसने हमारे मूर्तिपूजक मन के लिए भगतसिंह की एक अलग महसूस की जा सकनेवाली छवि पेश की। सुखदेव से एक न समझ में आनेवाली मित्रता में बँधे भगतसिंह, पंडित आज़ाद के प्रति एक लाड़-भरे सम्मान से ओत-प्रोत भगतसिंह, महात्मा गांधी से नाइत्तफ़ाक़ी रखते हुए भी उनके लिए एक ख़ास नज़रिया रखनेवाले भगतसिंह, नास्तिक होते हुए भी गीता और विवेकानन्द में आस्था रखनेवाले भगतसिंह, माँ-बाप और परिवार से अपने असीम मोह को एक स्थितप्रज्ञ फ़ासले से देखनेवाले भगतसिंह, पढ़ाकू, जुझारू, ख़ूबसूरत, शान्त, हँसोड़, इंटेलेक्चुअल, युगद्रष्टा, दुस्साहसी और...प्रेमी भगतसिंह। यह नाटक हमारे उस नायक को एक जीवित-स्पन्दित रूप में हमारे सामने वापस लाता है जिसे हमने इतना रूढ़ कर दिया कि उनके विचारों के धुर दुश्मन तक आज उनकी छवि का राजनीतिक इस्तेमाल करने में कोई असुविधा महसूस नहीं करते। यह नाटक पढ़ें, और जब खेला जाए, देखने जाएँ और अपने पढ़े के अनुभव का मिलान मंच से करें। नाटक के साथ इस जिल्द में निर्देशक एन.के. शर्मा की टिप्पणी भी है, और पीयूष मिश्रा का शफ़्फ़ाफ़ पानी जैसे गद्य में लिखा एक ख़ूबसूरत आलेख भी, और साथ में भगतसिंह की लिखी कुछ बार-बार पठनीय सामग्री भी।
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