Andher Nagari
(0)
₹
50
₹ 40 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
प्रस्तुत पुस्तक 'अंधेर नगरी' भारतेन्दु ने बनारस में नेशनल थियेटर के लिए एक दिन में सन् 1881 में लिखा था जो काशी के दशाश्वमेघ घाट पर उसी दिन अभिनीत भी हुआ था। 'अंधेर नगरी' को रोचक विनोदपूर्ण बनाने के लिए उसका कथात्मक ढाँचा सादा सामान्य रखा है, पर व्यंग्य को तीव्रतर बनाने के लिए ज़रूरी संकेत पहले दृश्य से ही दिए गए हैं। 'अंधेर नगरी' अंग्रेज़ राज्य का ही दूसरा नाम है। संवाद व्यंग्यपूर्ण अभिप्रायमूलक है। समूचा प्रकरण तमाशा जैसा ही है। क्योंकि 'अंधेर नगरी' की अंधेरगर्दी जिस हास्यास्पद परिणति तक दिखाई गई है, वह अकल्पनीय या अविश्वसनीय होते हुए भी यथार्थ के निकट है।
Read moreDon’t Miss Out
Pick a membership and see exactly what it gets you
- 15 Free Deliveries
- 1 Free Book up to ₹500 MRP
- 0% off every book, every time
Subscribed already? Continue to your
benefits Login
You pay ₹1,499/Year
You will be auto-charged ₹1,499 every year. Cancel auto-charge anytime.
Benefits with Rachnaye Connoisseur
1 Free Physical Book up to ₹500 MRP
Personal Recommendations
15 Free Deliveries Per Year
Format:
Piracy Free
Express Delivery
Secure Payment
About the Book
प्रस्तुत पुस्तक 'अंधेर नगरी' भारतेन्दु ने बनारस में नेशनल थियेटर के लिए एक दिन में सन् 1881 में लिखा था जो काशी के दशाश्वमेघ घाट पर उसी दिन अभिनीत भी हुआ था।
'अंधेर नगरी' को रोचक विनोदपूर्ण बनाने के लिए उसका कथात्मक ढाँचा सादा सामान्य रखा है, पर व्यंग्य को तीव्रतर बनाने के लिए ज़रूरी संकेत पहले दृश्य से ही दिए गए हैं।
'अंधेर नगरी' अंग्रेज़ राज्य का ही दूसरा नाम है। संवाद व्यंग्यपूर्ण अभिप्रायमूलक है। समूचा प्रकरण तमाशा जैसा ही है। क्योंकि 'अंधेर नगरी' की अंधेरगर्दी जिस हास्यास्पद परिणति तक दिखाई गई है, वह अकल्पनीय या अविश्वसनीय होते हुए भी यथार्थ के निकट है।
Book Details
-
ISBN9789386863294
-
Pages64
-
Avg Reading Time2 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Pratinidhi kavitayen : Kedarnath Singh
- Author Name:
Kedarnath Singh +2
- Book Type:

- Description:
केदारनाथ सिंह शायद हिन्दी के समकालीन काव्य-परिदृश्य में अकेले ऐसे कवि हैं, जो एक ही साथ गाँव के भी कवि हैं और शहर के भी। अनुभव के ये दोनों छोर कई बार उनकी कविता में एक ही साथ और एक ही समय दिखाई पड़ते हैं। शायद भारतीय अनुभव की यह अपनी एक विशेष बनावट है जिसे नकारकर सच्ची भारतीय कविता नहीं लिखी जा सकती। केदार की कविता जो पहली बार रूप या तंत्र के धरातल पर एक आकर्षक विस्मय पैदा करती है क्रमश: बिम्ब और विचार के संगठन में मूर्त होती है और एक तीखी बेलौस सच्चाई की तरह पूरे सामाजिक दृश्य पर अंकित होती चली जाती है।
केदारनाथ सिंह की कविताएँ समय में देर तक टिकनेवाली कविताएँ हैं। केदार की कविताओं की दुनिया एक ऐसी दुनिया है जिसमें रंग, रोशनी, रूप, गन्ध, दृश्य एक-दूसरे में खो जाते हैं। पर यही दुनिया है, जिसमें कविता का 'कमिटमेंट' खो नहीं जाता; वहाँ हमें कविता के मूल सरोकार, कविता की बुनियादी चिन्ता, कविता का कथ्य या सन्देश (बेशक स्थूल अर्थ में नहीं) पूरी तीव्रता के साथ ध्वनित या स्पन्दित रहता है।
केदार की कविता किसी अर्थ में एकालाप नहीं, वह हर हालत में एक सार्थक संवाद है। वह एक पूरे समय की व्यवस्था और उसकी क्रूर जड़ता या स्तब्धता को विचलित करती है। चुप्पी और शब्द के रिश्ते को वह बख़ूबी पहचानती है और उसे एक ऐसी काव्यात्मक चरितार्थता या विश्वसनीयता देती है, जिसके उदाहरण कम मिलते हैं।
Upanyas Ke Virudh Upanyas
- Author Name:
Parmanand Shrivastava
- Book Type:

- Description:
प्रस्तुत पुस्तक ‘उपन्यास के विरुद्ध उपन्यास’ आलोचना की एक किताब-भर नहीं है। वह जहाँ उपन्यास की सैद्धान्तिकी, प्रतिसैद्धान्तिकी बनाता है, वहीं हमारे समाज का आईना भी है। क्या उपन्यास एक सामाजिक संस्था है जैसे निबन्ध छपते-छपते चर्चा में आ गये। लेखक के अनुसार जहाँ किस्सागोई जरूरी है, वहीं सामाजिक प्रश्नों पर जिरह भी जरूरी है। आज उपन्यास पहले-जैसा इकहरा एकरेखीय नहीं है। कहीं वह काव्यात्मक है कहीं नाटकीय। उसमें विभिन्न विधाओं की आवाजाही है। ‘उपन्यास के विरुद्ध उपन्यास’ साक्ष्य है कि आज स्त्री, दलित, आदिवासी उपन्यास के केन्द्र में हैं। उपन्यास साम्प्रदायिक उन्माद पर चोट करता है और इस अर्थ में प्रेमचन्द पर नया भरोसा जताता है। इस कृति को समाज से रू-ब-रू होने की कोशिश कहा जा सकता है। उपन्यास में जहाँ वैश्विक विमर्श हैं, वहीं स्थानीय आंचलिक प्रश्न भी हैं। आशा है, पुस्तक नये विवादों की पृष्ठभूमि में नयी सार्थकता अर्जित करेगी।
Chautha Shabda
- Author Name:
Parmanand Srivastav +1
- Book Type:

- Description:
‘उजली हँसी के छोर पर’ (1960) और ‘अगली शताब्दी के बारे में’ (1981) संग्रहों के बाद परमानंद श्रीवास्तव की कविताओं का तीसरा संग्रह ‘चौथा शब्द’ एक दशक से कुछ अधिक के अन्तराल पर प्रकाशित हो रहा है। कविता के इतिहास में यह बीता हुआ दशक कविता के लिए ही कठिन समय बनकर उपस्थित नहीं हुआ, शब्द या अभिव्यक्ति के सभी रूपों और माध्यमों के लिए और सबसे अधिक मानवीय अस्तित्व के लिए, मनुष्य द्वारा अर्जित समस्त मूल्य सम्पदा के लिए चुनौती बनकर उपस्थित हुआ। यह दौर बीता नहीं है बल्कि आज और अधिक भयावह प्रश्नों और शंकाओं से घिरा है। परमानंद श्रीवास्तव ने कविता के बाहर भी शब्द के पक्ष में, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में, मानवीय मूल्यों के पक्ष में लगातार संघर्ष किया है और कविता के भीतर भी धीमी शान्त ऐन्द्रिकता, राग संवेदना और जीवन के प्रति सहज आसक्ति मात्र से सन्तुष्ट न होकर ऐसा उत्तेजक नाटकीय
शिल्प विकसित किया है जो कविता के पाठकों के रूप में अपने समाज के प्रति सीधा सम्बोधन है।
परमानंद श्रीवास्तव के इस संग्रह में ‘इन दिनों’, ‘साध्वियों’, ‘बटोर’ जैसी कविताएँ अपने कठिनतम समय के मुख्य संकट को न किसी शब्द-छल से छिपाती हैं, न ख़तरनाक ताक़तों को सीधे लक्ष्य करने से बचती हैं। इसके बाद भी परमानंद श्रीवास्तव कविता के अपने विन्यास या रूप-तंत्र के प्रति कितने सजग हैं, इसका अनुमान सहज ही किया जा सकता है। ‘चौथा शब्द’ में उनका अनुभव-संसार अधिक विस्तृत है और स्थितियों, चरित्रों तथा समय की त्रासदियों को देखने-समझने की दृष्टि भी अधिक विकसित और सचेत है। ‘वह अघाया हुआ आदमी‘, ‘फ़ुर्सत में’, ‘अपरिचित', ‘सहपाठी मिले एक दिन’ जैसी कविताएँ एक तरह के कथातन्तु का आश्रय लेती हैं जबकि ‘स्त्री सुबोधनी’ जैसी कविता मानवीय अनुभव और भाषा के स्रोतों तक जाने के लिए एक विलक्षण लोकरंग प्राप्त करती है। स्त्री की यातना के अनुभव प्रत्यक्ष कई कविताओं मे दर्ज हैं। यह कविता भी उसी अनुभव को अतीत की यातनापूर्ण यादों में जोड़कर देखने की सार्थक कोशिश है। परिप्रेक्ष्य-सम्पन्न कविताओं के लिए यह संग्रह ज़रूर ही पाठकों के बीच देर तक चर्चा में रहेगा और शायद आनेवाली कविता का संकेत भी देगा।
Kavita Ka Uttar Jiwan
- Author Name:
Parmanand Srivastav +1
- Book Type:

- Description:
‘कविता का उत्तर जीवन’ उत्तर समय में लिखी जा रही कविता का एक आलोचनात्मक पाठ-भर नहीं है, एक पूरे समय और काव्य-समय पर सघन विमर्श भी है। ‘शब्द और समय’ (1988) और ‘कविता का अर्थात्’ (1999) से जुड़कर अब वह एक त्रयी का हिस्सा भी है और फलश्रुति भी। (यद्यपि कोई भी फलश्रुति एक मिथ या यूटोपिया है)। परमानन्द श्रीवास्तव आधी सदी की कविता और आलोचना के संघर्ष के साक्षी ही नहीं रहे, उनके आलोचनात्मक हस्तक्षेप की विश्वसनीयता भी प्रायः असन्दिग्ध रही। उनका आलोचनात्मक गद्य ख़ास रचनात्मक चमक लिये हुए है, जिसकी छाप ‘कविता का उत्तर जीवन’ पर सबसे अधिक है।
‘कविता का उत्तर जीवन’ इस प्रमुख स्थापना के साथ पाठकों-लेखकों के बीच है कि किसी भी समय की महत्त्वपूर्ण कविता का एक वृहत्तर स्पेस होता है और वही दूसरे-तीसरे पाठ को दूसरे-तीसरे जीवन में फिर से घटित करता है। कविता का कोई भी नया पाठ एक पुनर्जीवन है, जो आस्वाद और मूल्यांकन के द्वन्द्व को अनिवार्य बनाता है। ‘कविता का उत्तर जीवन’ इसका साक्ष्य है कि कैसा भी प्रतिमानीकरण; (canonization) समूचे काव्यन्याय में अपने को असमर्थ पाता है; इसलिए भी कि ग़ालिब और कबीर हमारे लिए उतने ही समकालीन हो सकते हैं, जितने मुक्तिबोध और शमशेर। परमानन्द श्रीवास्तव की यह कृति शुद्ध स्वायत्त कविता की जगह अशुद्ध अनगढ़, पर जब-तब अथाह, कोशिश को महत्त्व देती है जिसमें आश्चर्य नहीं कि कभी डायरी, आत्मकथा तथा कॉलमनुमा लेख भी शामिल हैं। यह एक नई पहल है—इससे आलोचना, रचना—दोनों में समय की आहटों का पता चलता है।
Nirmala : Patkatha
- Author Name:
Mannu Bhandari
- Book Type:

- Description:
‘निर्मला' प्रेमचन्द का सुपरिचित उपन्यास है जिस पर एकाधिक बार टीवी धारावाहिक और फ़िल्मों का निर्माण हो चुका है। मन्नू भंडारी लिखित इस उपन्यास की यह पटकथा हिन्दी टेलीविज़न के दर्शकों को दूरदर्शन के उन दिनों में वापस ले जाएगी जब इस सरकारी चैनल ने एक से एक क्लासिक धारावाहिक प्रस्तुत किए थे। यह वह दौर था जब हिन्दी के नामचीन लेखकों ने दूरदर्शन के स्तरीय धारावाहिकों के लेखन में बड़ा योगदान दिया और हमारे सामने ‘तमस’, ‘मालगुडी डेज़’, ‘कक्काजी कहिन’, ‘राग दरबारी’ और ‘निर्मला’ जैसे धारावाहिक आए। यह दूरदर्शन और भारतीय टेलीविज़न का मनोरंजन के क्षेत्र में स्वर्णकाल था। ‘निर्मला’ उसी समय का धारावाहिक है जिसका स्क्रीनप्ले हिन्दी की लोकप्रिय और बहुपठित कहानीकार मन्नू भंडारी ने लिखा। ‘निर्मला' एक मध्यवर्गीय युवती की कथा है जो दुर्दैव के चलते आजीवन कष्ट में रही और अन्ततः कष्ट के अतिरेक में ही इस दुनिया को विदा कह गई। लेकिन उसके जीवन की दारुण यात्रा का आरम्भ और अन्त पारम्परिक भारतीय समाज में प्रचलित स्त्री-जीवन के प्रति नज़रिए में है, जहाँ माना जाता रहा है कि लड़की सयानी हो गई है तो उसका समय रहते विवाह सबसे महत्त्वपूर्ण सामाजिक कार्य है जिसे हर हाल में हो जाना है। इसी के चलते निर्मला को पहले दहेज का और फिर बेमेल विवाह का शिकार होना पड़ता है। विवाह उससे कहीं बड़ी आयु के जिस व्यक्ति से होता है, उसके तीन बच्चे हैं। परिणाम क़िस्म-क़िस्म की मानसिक जटिलताएँ और संघर्ष पैदा होते हैं और अन्ततः पूरा परिवार बिखर जाता है। बचे रह जाते हैं विधुर तोताराम। मन्नू जी ने एक स्त्री की निगाह से देखते हुए जिस तरह इस कहानी को कहा, उसने उनके नज़रिए को अत्यन्त परिपक्व रूप में परदे पर रूपायित किया था। मन्नू जी उन चुनिन्दा लेखकों में रही हैं जिन्हें शब्दों के साथ दृश्यों में भी अपनी बात कहने का हुनर आता है। ‘निर्मला’ उसका बेजोड़ उदाहरण है। यहाँ बता दें कि मन्नू जी ने इसके अलावा भी बड़े और छोटे पर्दे के लिए लेखन किया और उनकी कहानियों और उपन्यासों पर भी फ़िल्में और टी.वी. फ़िल्में बनती रही हैं।
Arthdosh
- Author Name:
Albert Camus +1
- Book Type:

- Description:
विश्वविख्यात फ्रेंच लेखक अल्बैर कामू की यह नाट्यकृति मनुष्य की अछोर, लेकिन अपूर्ण सुखाकांक्षाओं से उपजी क्रूरता का ऐसा दृश्यालेख है, जो हमें हतप्रभ कर देता है।
नाटक की नायिका मार्था अपनी बूढ़ी माँ के साथ एक सराय में एक छोटा होटल चलाती है। लेकिन उस स्थान की अनाकर्षक और असुविधाजनक स्थिति उसे पसन्द नहीं। वह कहीं सुदूर समुद्र तट पर जाकर रहना और जीवन के तमाम सुख पाना चाहती है—उबरना चाहती है अपने चुकते हुए उबाऊ और नीरस जीवन से। किन्तु इसके लिए बहुत-सा धन चाहिए, इसलिए वह अपने यहाँ कभी-कभार ठहरनेवाले मुसाफिरों को जहर देकर मार डालती है। इस काम में वह अपनी बूढ़ी माँ को भी साथ रखती है। एक दिन जब बीस साल पहले घर से गया उसका भाई, जॉन, एक मुसाफिर की ही तरह आकर वहाँ ठहरता है, तो माँ के साथ मिलकर वह उसकी भी हत्या कर देती है। सचाई सामने आने पर माँ की व्यथा, विलाप और पश्चात्ताप का उसे कोई मूल्य नहीं दिखता, क्योंकि सिर्फ अपने बेटे की हत्या पर सदय और मानवीय हो उठना दूसरी तमाम हत्याओं के अपराध को कम नहीं कर सकता।
यही वह कठोर जीवन-यथार्थ है, जिसे झेलने के लिए वह जॉन की पत्नी मारिया को पत्थर हो जाने की सलाह देती है, ताकि इस अमानवीय समाज का सामना किया जा सके।
कहने की जरूरत नहीं कि अपने ही सुख की तलाश और परिस्थितिवश उसमें असफल रहने के कारण हद दर्जे तक क्रूर हो चुकी मार्था जैसी स्त्री भी अर्थदोष से ग्रस्त इस पत्थरदिल समाज पर एक तीखा व्यंग्य बनकर उभरती है।
Kabira Khada Bazaar Mein
- Author Name:
Bhisham Sahni +1
- Book Type:

- Description:
बेपरवाह, दृढ़ और उग्र—संक्षेप में मस्तमौला—कबीर का व्यक्तित्व सदियों से भारत मन और मनीषा को प्रभावित करता रहा है। यही कारण है कि पाँच सौ वर्षों से कबीर के पद भारतीयों की ज़बान पर हैं और उनके विषय में कितनी ही कहानियाँ लोकविश्रुत हैं। अपने युग की तानाशाही, धर्मान्धता, बाह्याचार और मिथ्या धारणाओं के विरुद्ध अनथक संघर्ष करनेवाला यह व्यक्ति हमारे बीच आज भी एक स्थायी और प्रेरक मूल्य की तरह स्थापित है। ‘कबिरा खड़ा बज़ार में’ कबीर के ऐसे ही मूल्यवान व्यक्तित्व को प्रस्तुत करनेवाली बहुमंचित और चर्चित नाट्यकृति है। सुविख्यात प्रगतिशील कथाकार भीष्म साहनी की ‘हानूश’ के बाद यह दूसरी नाट्य-रचना थी, जिसे हिन्दी रंगमंच पर व्यापक प्रशंसा प्राप्त हुई है। कबीर की फक्कड़ाना मस्ती, निर्मम अक्खड़ता और युगप्रवर्तक सोच इस कृति में पूरी जीवन्तता के साथ मौजूद है। साथ ही इसमें यह भी उजागर हुआ है कि कबीर की साहित्यिकता सामाजिक जड़ता को तोड़ने का ही एक माध्यम थी, जिसके सहारे उन्होंने अनेकानेक मोर्चों पर संघर्ष किया। कृति से गुजरते हुए पाठक कबीर के इस संघर्ष को उसकी तमाम तत्कालीन सामाजिकता के बावजूद समकालीन भारतीय समाज की विभिन्न विकृतियों से सहज ही जोड़ पाता है। संक्षेप में कहें तो भीष्म साहनी की यह नाट्यकृति मध्ययुगीन वातावरण में संघर्ष कर रहे कबीर को—उनके पारिवारिक और सामाजिक सन्दर्भों सहित—आज भी प्रासंगिक बनाती है।
Hanoosh
- Author Name:
Bhisham Sahni +1
- Book Type:

- Description:
‘हानूश’ भीष्म साहनी का एक ऐसा नाटक है जिसमें कलाकार की सृजन की अदम्य अकुलाहट और उसकी निरीहता को रूपायित किया गया है। धर्म और सत्ता के गठबन्धन के साथ सामाजिक शक्तियों के संघर्ष की मार्मिक अभिव्यक्ति भी है यह अनमोल नाटक ‘हानूश’। कलाकार के पारिवारिक तनावों का अनूठा अंकन हुआ है ‘हानूश’ में। इस नाटक में एक ऐसे कलकार को केन्द्रीय भूमिका मिली है जो शुरू में ताला बनानेवाला एक सामान्य मिस्त्री है, बाद में उसके दिमाग़ में घड़ी बनाने का विचार उत्पन्न होता है और वह घड़ी बनाने में लग जाता है। विषम परिस्थितियों से जूझता हुआ वह घड़ी बनाने के काम में लगातार सत्रह साल गुज़ार देता है और अन्ततः इस लगन और कड़ी मेहनत के परिणामस्वरूप वह चेकोस्लोवाकिया की पहली घड़ी बनाने में कामयाब होता है। उसकी बनाई गई घड़ी नगरपालिका की मीनार पर लगाई जाती है, लेकिन इतनी बड़ी सफलता के बाद कलाकार को क्या मिलता है? बादशाह कलाकार की आँखें निकलवा लेता है, ताकि वह उस तरह की दूसरी घड़ी नहीं बना सके। चेक-इतिहास की इस छोटी-सी घटना से भीष्म साहनी ने हिन्दी को यह यादगार नाटक सौंपा है जो आज छह दशक बाद भी रंग-प्रेमियों के लिए यथार्थ और आश्चर्य का एक सामंजस्य-सा प्रतीत होता है।
Evam Indrajit
- Author Name:
Badal Sarkar +1
- Book Type:

- Description:
बादल सरकार के नाटक ‘एवम् इन्द्रजित्’ का भारतीय रंगकर्म में एक विशिष्ट स्थान है। मूलतः बांग्ला में लिखे इस नाटक का अनेक भारतीय भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। विभिन्न भाषाओं के रंगकर्म में इस नाटक ने बार-बार मंचित होकर प्रशंसा और प्रसिद्धि पर्याप्त बटोरी है। इस नाटक की लोकप्रियता का कारण इसके कथा व शिल्प में निहित है। युवा वर्ग की महत्त्वाकांक्षा, परवर्ती कुंठा व निराशा का यथार्थपरक चित्रण इसमें किया गया है। नाटक अपनी निष्पत्ति में रेखांकित करता है कि मृत्यु का वरण समस्या का समाधान नहीं है। यह जानते हुए भी कि हमारे पास कोई सम्बल नहीं, हमें जीना है। नाटक का कथ्य अत्यन्त यथार्थवादी होते हुए भी शिल्प प्रतीकात्मक है। जीवन के दस-पन्द्रह वर्षों की अवधि को समेटे हुए यह नाटक जीने की ज़िद का तर्क है।
बादल सरकार की काव्यात्मक भाषा सम्प्रेषण और अर्थ दोनों को समृद्ध करती है। नए कलेवर में प्रस्तुत यह प्रसिद्ध नाटक पाठकों व रंगकर्मियों को ख़ूब भाएगा, ऐसा विश्वास किया जा सकता है ।
प्रसिद्ध रंगकर्मी डॉ. प्रतिभा अग्रवाल ने ‘एवम् इन्द्रजीत्’ का मनोयोगपूर्वक अनुवाद किया है। उनके अनुसार, ‘...मेरे द्वारा किए गए अनुवादों में यह सर्वश्रेष्ठ है।’
Hansini
- Author Name:
Anton Chekhav +2
- Book Type:

- Description:
हंसनी मुख्य रूप से कलाकारों के अपने रचनात्मक और व्यक्तिगत जीवन के बीच तालमेल न बैठा पाने की पीढ़ी का लेखा-जोखा है। प्रतिष्ठित अभिनेत्री आर्कदीना स्थापित और लोकप्रिय लेखक त्रिगोरिन के प्रेम के बिना ज़िन्दा नहीं रह सकती। त्रिगोरिन रचना-कर्म को बेहद नीरस पाता है, मगर लिखने के लिए अभिशप्त है। उसे अपनी जड़ता तोड़ने के लिए हर बार नई उत्तेजना कि तलाश है और इसकी शिकार होती है—नीना अर्थात् आर्कदीना के पुत्र तेपलेव की प्रेमिका। दोनों को नाटक और लेखन की यानी जीवन के नए मुहावरों की तलाश है।
इस जटिल और उलझी हुई थीम को जिस ख़ूबसूरती से चेख़व ने नाटक का रूप दिया है, वह पूरी दुनिया के नाटकों के इतिहास में अभूतपूर्व है।
इस सन्दर्भ में अनुवादक राजेन्द्र यादव का कथन है : चेख़व की रचनाओं की आत्मीयता, करुणा और ख़ास क़िस्म की निराश उदासी (लगभग आत्मदया जैसी) मुझे बहुत छूती है। मैं उसके प्रभाव से लगभग मोहाच्छन्न था। उसी श्रद्धा से मैंने इन नाटकों को हाथ लगाया था। रूसी भाषा नहीं जनता था, मगर अधिक से अधिक ईमानदारी से उसके नाटकों की मौलिक शक्ति तक पहुँचाना चाहता था। इसलिए तीन अंग्रेज़ी अनुवादों को सामने रखकर एक-एक वाक्य पढ़ता और मूल को पकड़ने कि कोशिश करता। आधार बनाया मॉस्को के अनुवाद को। बाद में सुना, अनुवादों को पाठकों ने पसन्द किया, अनेक रंग-संस्थानों और रेडियो इत्यादि ने इन्हें अपनाया, पाठ्यक्रम में भी उन्हें लिया गया।
Gandhi Ki Mrityu
- Author Name:
Nemeth Laszlo +2
- Book Type:

- Description:
“महात्मा गाँधी अपने समय में ही नहीं हमारे समय में भी एक प्रतिरोधक उपस्थिति हैं : उनका बीसवीं शताब्दी के विचार, राजनीति और सामाजिक कर्म पर गहरा प्रभाव पड़ा। इन दिनों उनका बहुत बारीक़ पर अचूक अवमूल्यन करने का एक अभियान ही चला हुआ है। इस सन्दर्भ में उनकी मृत्यु पर लिखा गया यह हंगेरियन नाटक, जो सीधे हिन्दी में अनूदित किए जाने का एक बिरला उदाहरण भी है, प्रस्तुत करते हुए हमें उम्मीद है कि गाँधी-विचार और कर्म को ताज़ा नज़र से देखने के प्रयत्न में सहायक होगा।"
—अशोक वाजपेयी
Teen Bahanein
- Author Name:
Anton Chekhav +2
- Book Type:

- Description:
"तुम कहते हो, जीवन सुन्दर है...ठीक है, लेकिन उसके सुन्दर लगने से ही क्या होता है। हम तीनों बहनों के लिए अभी तक के जीवन में क्या सुन्दर है? जैसे पौधे को दीमक खा जाती है, उसी तरह हम तीनों जीवन के हाथों में घुटती रही हैं...अरे लो, मैं तो रोने भी लगी—मुझे रोना नहीं चाहिए..." "मुझे लगता है कि मनुष्य के पास एक आस्था होनी चाहिए, या और कुछ नहीं तो उसे कोई विश्वास और आस्था खोज लेनी चाहिए, वर्ना उसकी जिंदगी सूनी और खोखली हो जाएगी।...आदमी को मालूम तो होना चाहिए कि उसकी जिंदगी का अर्थ क्या है..." "प्यारी बहनों, हमारे जीवन का अन्त यहीं नहीं हो जाएगा। हम लोग जीवित रहेंगी, यह संगीत कैसा आनन्ददायक, कैसा सुखद है कि मन होता है, थोड़ी देर और चलता रहे, ताकि हम जान लें कि हम किसलिए ज़िन्दा हैं, हमें पता चल जाए कि हम दु:ख क्यों भोग रही हैं।" "काश, जो कुछ हमने जिया है, वह सिर्फ़ ज़िन्दगी का रफ़-ड्राफ़्ट होता और इसे फ़ेयर करने का एक अवसर हमें और मिलता।" चेख़व की रचनाओं की आत्मीयता, करुणा और ख़ास क़िस्म की निराश उदासी (लगभग आत्मदया जैसी) मुझे बहुत छूती है। मैं उसके प्रभाव से लगभग मोहाच्छन्न था। उसी श्रद्धा से मैंने इन नाटकों को हाथ लगाया था। रूसी भाषा नहीं जनता था, मगर अधिक से अधिक ईमानदारी से उसके नाटकों की मौलिक शक्ति तक पहुँचाना चाहता था। इसलिए तीन अंग्रेज़ी अनुवादों को सामने रखकर एक-एक वाक्य पढ़ता और मूल को पकड़ने कि कोशिश करता। आधार बनाया मॉस्को के अनुवाद को। बाद में सुना, अनुवादों को पाठकों ने पसन्द किया, अनेक रंग-संस्थानों और रेडियो इत्यादि ने इन्हें अपनाया, पाठ्यक्रम में भी उन्हें लिया गया। —राजेन्द्र यादव
Achanak
- Author Name:
Gulzar
- Book Type:

- Description:
साहित्य में मंज़रनामा एक मुकम्मिल फ़ॉर्म है। यह एक ऐसी विधा है जिसे पाठक बिना किसी रुकावट के रचना का मूल आस्वाद लेते हुए पढ़ सकें। लेकिन मंज़रनामा का अन्दाज़े-बयाँ अमूमन मूल रचना से अलग हो जाता है या यूँ कहें कि वह मूल रचना का इन्टरप्रेटेशन हो जाता है।
मंज़रनामा पेश करने का एक उद्देश्य तो यह है कि पाठक इस फ़ॉर्म से रू-ब-रू हो सकें और दूसरा यह कि टी.वी. और सिनेमा में दिलचस्पी रखनेवाले लोग यह देख-जान सकें कि किसी कृति को किस तरह मंज़रनामे की शक्ल दी जाती है। टी.वी. की आमद से मंज़रनामों की ज़रूरत में बहुत इज़ाफ़ा हो गया है।
गुलज़ार की लोकप्रिय फ़िल्म 'अचानक’ उनकी सभी फ़िल्मों की तरह संवेदनशील और सधी हुई फ़िल्म है जिसको अपने वक़्त में बहुत सराहा गया था। दाम्पत्य-प्रेम, पति-पत्नी के बीच भरोसे और शक, भटकाव, प्रतिहिंसा और पश्चाताप की महीन नक़्क़ाशी इस फ़िल्म की विशेषता है। इस पुस्तक में उसी फ़िल्म का मंज़रनामा पेश किया गया है।
पाठकों को दर्शक में तब्दील कर देनेवाली एक प्रभावशाली प्रस्तुति।
Madhavi
- Author Name:
Bhisham Sahni +1
- Book Type:

- Description:
प्रख्यात लेखक भीष्म साहनी का यह तीसरा नाटक ‘माधवी’ महाभारत की एक कथा पर आधारित है। ऋषि विश्वामित्र का शिष्य गालव अपनी शिक्षा समाप्ति के समय गुरु-दक्षिणा देने की हठ करता है और विश्वामित्र उसके हठी स्वभाव से क्रुद्ध होकर आठ सौ अश्वमेधी घोड़े माँग लेते हैं। अश्वमेधी घोड़ों की खोज में भटकता हुआ गालव अन्त में दानवीर राजा ययाति के आश्रम में पहुँचता है। राज-पाट से निवृत्त राजा ययाति गालव की प्रतिज्ञा सुनकर असमंजस में पड़ जाते हैं, किन्तु वे दैवी गुणों से युक्त अपनी एकमात्र पुत्री माधवी को, यह कहकर उसे सौंप देते हैं कि जहाँ कहीं किसी भी राजा के पास आठ सौ अश्वमेधी घोड़े मिलें, उनके बदले वह माधवी को राजा के पास छोड़ दें। माधवी के बारे में कहा गया है कि उसके गर्भ से उत्पन्न बालक चक्रवर्ती राजा बनेगा।
यहीं से माधवी की कथा आरम्भ होती है। अनूठे और मर्मस्पर्शी घटना-चक्र में गुज़रते हुए, इस नाटक के प्रधान पात्र—माधवी, गालव, ययाति, विश्वामित्र और अनेक राजागण अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं, और एक विकट, हृदयग्राही मानवीय स्थिति के परिप्रेक्ष्य में, ये चरित्र नए-नए आयाम ग्रहण करते हैं। इनके केन्द्र में ययाति-कन्या माधवी है, जो लगभग एक अलौकिक मिथकीय परिवेश में रहते-बसते हुए भी अत्यधिक सजीव, सर्वथा प्रासंगिक और आकर्षक बनकर उभरती है।
Muaawze
- Author Name:
Bhisham Sahni +1
- Book Type:

- Description:
‘मुआवज़े’ भीष्म साहनी के पहले तीन नाटकों से इस अर्थ में अलग है कि इसकी पृष्ठभूमि वर्तमान में स्थित है और इसका मिज़ाज व्यंग्य तथा हास्यप्रधान है। हालाँकि इसकी विषयवस्तु में भी समाज और व्यवस्था के वे सब स्याह पक्ष शामिल हैं जिनको अक्सर भीष्म साहनी ने अपने उपन्यासों, कहानियों और नाटकों में उघाड़ा है। साम्प्रदायिक दंगों और उसमें शिकार लोगों को मिलनेवाले मुआवज़े को लेकर बुना गया इस नाटक का कथानक पुलिस, प्रशासन, राजनेताओं और व्यावसायिक तबके के स्वार्थी और संवेदनहीन रवैये को दर्शाता है। साथ ही मुआवज़े के लिए ग़रीब श्रमिक वर्ग के लोगों की हताश कोशिशों की विडम्बना को भी इसमें पकड़ा गया है। नाटक की विशेषता यह है कि व्यंग्य के लिहाज़ से इतने संवेदनशील विषय और लगभग पैंतीस पात्रों और अनेक समूह-दृश्यों के बावजूद नाटक की गति कहीं शिथिल होती नहीं दिखती, और न ही कहीं नाटककार के सरोकार हँसी के तूफ़ान में ग़ायब होते हैं। शायद यही कारण है कि देश के कितने ही रंग-समूह, निर्देशक और रंगकर्मी इस नाटक को खेलते रहे हैं और दर्शक आज भी इसके मंचन की प्रतीक्षा करते रहते हैं।
Pagla Ghora
- Author Name:
Badal Sarkar +1
- Book Type:

- Description:
सुप्रसिद्ध नाटककार बादल सरकार की यह कृति बांग्ला और हिन्दी दोनों भाषाओं में अनेक बार मंचस्थ हो चुकी हैं। बांग्ला में शम्भू मित्र (‘बहुरूपी’, कलकत्ता) और हिन्दी में श्यामानन्द जालान (‘अनामिका’, कलकत्ता), सत्यदेव दुबे (‘थियेटर यूनिट’, बम्बई) तथा टी.पी. जैन (‘अभियान’, दिल्ली) ने इसे प्रस्तुत किया। गाँव का निर्जन श्मशान, कुत्ते के रोने की आवाज़, धू-धू करती चिता और शव को जलाने के लिए आए चार व्यक्ति—इन्हें लेकर नाटक का प्रारम्भ होता है। हठात् एक पाँचवाँ व्यक्ति भी उपस्थित हो जाता है—जलती हुई चिता से उठकर आई लड़की, जिसने किसी का प्रेम न पाने की व्यथा को सहने में असमर्थ होकर आत्महत्या कर ली थी और जिसके शव को जलाने के लिए मोहल्ले के ये चार व्यक्ति उदारतापूर्वक राजी हो गए थे। आत्महत्या करनेवाली लड़की के जीवन की घटनाओं की चर्चा करते हुए एक-एक करके चारों अपने अतीत की घटनाओं की ओर उन्मुख होते हैं, उन लड़कियों के, उप-घटनाओं के बारे में सोचने को बाध्य होते हैं जो उनके जीवन में आई थीं और जिनका दुखद अवसान उनके ही अन्याय-अविचार के कारण हुआ था । किन्तु ‘पगला घोड़ा’ में नाटककार का उद्देश्य न तो शमशान की बीभत्सता के चित्रण द्वारा बीभत्स रस की सृष्टि करना है और न ही अपराध-बोध का चित्रण। बादल बाबू के शब्दों में यह ‘मिष्टि प्रेमेर गल्प’ अर्थात् ‘मधुर प्रेम-कहानी’ है।
Woh Ab Bhi Pukarata Hai
- Author Name:
Piyush Mishra
- Book Type:

- Description:
Awating description for this book
Barff
- Author Name:
Saurabh Shukla
- Book Type:

- Description:
सही और ग़लत के बीच किसी राह की तलाश की तरह है–सौरभ शुक्ला का ‘बर्फ़’।
–‘द हिन्दू’
‘बर्फ़’ नाटक जैसा देखने में है, जितना दिखता है, उससे कहीं ज़्यादा अनुभव के स्तर पर नाटक है।
–‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’
सच की बेहतरीन नाट्य-प्रस्तुति।
–‘सन्डे गार्डियन’
‘बर्फ़’ जितना भयानक है उतना ही मानवीय भी है। सौरभ ने एक पतली रस्सी पर चलने जैसा ख़तरनाक काम किया है, जिसमे वे पूरी तरह सफल हुए हैं। रंगमंच की दुनिया का यह चकित करनेवाला काम है।
–सुधीर मिश्रा
Chaturbhani
- Author Name:
Motichandra +2
- Book Type:

- Description:
'चतुर्भाणी’ एक विलक्षण क्लैसिक है : मूल में बोलचाल की संस्कृत और लोक-जीवन की छटाओं का रोचक और नाटकीय इज़हार है और अनुवाद में बनारसी बोली का चटपटा रस-भाव। बरसों पहले ब.व. कारन्त ने उज्जैन के कालिदास समारोह के लिए 'चतुर्भाणी’ की रंग-प्रस्तुति की थी। डॉ. मोतीचन्द्र द्वारा अनूदित और डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल द्वारा विस्तार से समझाई गई इस कृति को नए संस्करण में प्रस्तुत करते हुए हमें गहरा सन्तोष है। भारतीय परम्परा की दुर्व्याख्या के इस अभागे समय में यह कृति याद दिलाती है कि हमारी परम्परा में कैसी रसिकता और लोक-जीवन का उन्मुक्त रचाव रहा है जो कहीं से भी किसी संकीर्णता में बाँधा नहीं जा सकता।
—अशोक वाजपेयी
Agni Aur Barkha
- Author Name:
Girish Karnad +1
- Book Type:

- Description:
इतिहास, पुराण, जातक और लोकथाएँ गिरीश कारनाड के लिए सर्वाधिक समृद्ध उत्प्रेरक और आकर्षक कथा-बीज स्रोत रहे हैं। नई दृष्टि एवं संवेदना के वहन के लिए वे अपनी रचना का शरीर अतीत से चुनते हैं। उनकी विशिष्टता यह है कि वे मिथकीय कथानकों से आधुनिक और सामयिक समस्याओं के सम्प्रेषण का काम लेते हैं। अग्नि और बरखा के लिए कारनाड पुनः अतीत की ओर लौटे हैं, इसके केन्द्र में है–महाभारत का वन पर्व। अपने वनवास काल में देशाटन में पांडव इधर-उधर भटक रहे हैं। सन्त लोमष इन्हें यवक्री अर्थात् यवक्रत की गाथा सुनाते हैं। महाभारत जैसी महागाथा का पटल इतना जटिल है कि ऐसे छोटे वृत्तान्त पर ध्यान न जाना स्वाभाविक था, लेकिन कारनाड को इस कथा ने सर्वाधिक प्रभावित किया। इस कथा के भीतर कई गम्भीर अर्थ विद्यमान हैं, नाटककार इस नाट्य-रूपान्तर में इसके निहित अर्थों व अभिप्रायों को स्पष्ट करता है। अतीत के प्रकाश में वर्तमान धुँधलके को साफ़ और उजला करने की यह रचनात्मक कोशिश निःसन्देह पठनीय और दर्शनीय है, इसका एक प्रमाण यह भी है कि अब तक इस नाटक के दर्जनों सफल मंचन हो चुके हैं।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book