Aadhe-Adhoore
Author:
Mohan RakeshPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Plays0 Ratings
Price: ₹ 159.2
₹
199
Available
‘आधे-अधूरे’ आज के जीवन के एक गहन अनुभव–खंड को मूर्त करता है। इसके लिए हिन्दी के जीवन्त मुहावरे को पकड़ने की सार्थक, प्रभावशाली कोशिश की गई है।</p>
<p>...इस नाटक की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण विशेषता इसकी भाषा है। इसमें वह सामर्थ्य है जो समकालीन जीवन के तनाव को पकड़ सके। शब्दों का चयन, उनका क्रम, उनका संयोजन—सबकुछ ऐसा है जो बहुत सम्पूर्णता से अभिप्रेत को अभिव्यक्त करता है। लिखित शब्द की यही शक्ति और उच्चारित ध्वनि–समूह का यही बल है, जिसके कारण यह नाट्य–रचना बन्द और खुले, दोनों प्रकार के मंचों पर अपना सम्मोहन बनाए रख सकी।</p>
<p>...यह नाट्यलेख, एक स्तर पर स्त्री–पुरुष के बीच के लगाव और तनाव का दस्तावेज़ है...दूसरे स्तर पर पारिवारिक विघटन की गाथा है। एक अन्य स्तर पर यह नाट्य–रचना मानवीय संतोष के अधूरेपन का रेखांकन है। जो लोग ज़िन्दगी से बहुत कुछ चाहते हैं, उनकी तृप्ति अधूरी ही रहती है।</p>
<p>एक ही अभिनेता द्वारा पाँच पृथक् भूमिकाएँ निभाए जाने की दिलचस्प रंगयुक्ति का सहारा इस नाटक की एक और विशेषता है।</p>
<p>संक्षेप में कहें तो ‘आधे–अधूरे’ समकालीन ज़िन्दगी का पहला सार्थक हिन्दी नाटक है। इसका गठन सुदृढ़ एवं रंगोपयुक्त है। पूरे नाटक की अवधारणा के पीछे सूक्ष्म रंगचेतना निहित है।
ISBN: 9788183618564
Pages: 120
Avg Reading Time: 4 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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हंसनी मुख्य रूप से कलाकारों के अपने रचनात्मक और व्यक्तिगत जीवन के बीच तालमेल न बैठा पाने की पीढ़ी का लेखा-जोखा है। प्रतिष्ठित अभिनेत्री आर्कदीना स्थापित और लोकप्रिय लेखक त्रिगोरिन के प्रेम के बिना ज़िन्दा नहीं रह सकती। त्रिगोरिन रचना-कर्म को बेहद नीरस पाता है, मगर लिखने के लिए अभिशप्त है। उसे अपनी जड़ता तोड़ने के लिए हर बार नई उत्तेजना कि तलाश है और इसकी शिकार होती है—नीना अर्थात् आर्कदीना के पुत्र तेपलेव की प्रेमिका। दोनों को नाटक और लेखन की यानी जीवन के नए मुहावरों की तलाश है।
इस जटिल और उलझी हुई थीम को जिस ख़ूबसूरती से चेख़व ने नाटक का रूप दिया है, वह पूरी दुनिया के नाटकों के इतिहास में अभूतपूर्व है।
इस सन्दर्भ में अनुवादक राजेन्द्र यादव का कथन है : चेख़व की रचनाओं की आत्मीयता, करुणा और ख़ास क़िस्म की निराश उदासी (लगभग आत्मदया जैसी) मुझे बहुत छूती है। मैं उसके प्रभाव से लगभग मोहाच्छन्न था। उसी श्रद्धा से मैंने इन नाटकों को हाथ लगाया था। रूसी भाषा नहीं जनता था, मगर अधिक से अधिक ईमानदारी से उसके नाटकों की मौलिक शक्ति तक पहुँचाना चाहता था। इसलिए तीन अंग्रेज़ी अनुवादों को सामने रखकर एक-एक वाक्य पढ़ता और मूल को पकड़ने कि कोशिश करता। आधार बनाया मॉस्को के अनुवाद को। बाद में सुना, अनुवादों को पाठकों ने पसन्द किया, अनेक रंग-संस्थानों और रेडियो इत्यादि ने इन्हें अपनाया, पाठ्यक्रम में भी उन्हें लिया गया।
Son Sagar
- Author Name:
Habib Tanvir
- Book Type:

- Description: सोन सागर को हबीब तनवीर ने सन् 1981 में श्रीराम सेंटर, नई दिल्ली में प्रस्तुत किया था। इस नाटक की नायिका चन्दा एक सशक्त महिला चरित्र के रूप में सामने आती है। वह जीवनसाथी स्वयं चुनने के अधिकार की बात उठाकर एक खुली सोच का उदाहरण रखती है। यह नाटक मूलकथा लोरिक और चन्दा की प्रेम-कहानी है जो छत्तीसगढ़ में ‘चन्दैनी’ और बिहार में ‘लोरिकायन’ के नाम से प्रसिद्ध है। मूलत: एक ही कथा होने के बावजूद अलग-अलग क्षेत्रों में इसके भिन्न-भिन्न रूप मिलते हैं। नाटक में ढालने के लिए मूल कथा में रचनात्मक बदलाव किया गया। कथा एवं चरित्रों के कुछ खास पक्षों पर जोर देकर इसे समकालीन परिप्रेक्ष्य प्रदान करने के लिए इसमें गीत रखे गए। वस्तुत: गीतों में टिप्पणी के जरिये यह काम किया गया। नाटक में कहानी के ग्राम्य तत्वों को प्रमुखता दी गई है तथा कहानी के अलौकिक पक्ष को छोड़ दिया गया है। कुछेक गीतों की धुनें तो चन्दैनी की पारम्परिक धुनों पर ही आधारित हैं।
Amanat Ki Inder Sabha
- Author Name:
Sayyid Agha Hasan Amanat
- Book Type:

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Description:
आज से लगभग दो सौ साल पहले लिखा और खेला गया नाटक ‘इंदर सभा' आधुनिक युग शुरू होने के आसपास लिखा गया दूसरा महत्वपूर्ण नाटक है। पहला नाटक वाजिद अली शाह द्वारा रचित ‘किस्सा राधा कन्हैया’ (1843) माना जाता है। ‘इंदर सभा’ ने ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया था जो सम्भवत: हिन्दुस्तानी में लिखे नाटकों के इतिहास में कोई दूसरा नाटक नहीं कर सका। इसके प्रभाव का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि इसका अनुकरण करते हुए लगभग दो दर्जन नाटक और लिखे गए थे। यह नाटक न केवल एक अत्यंत लोकप्रिय नाटक था बल्कि भारतीय संस्कृति के उस स्वरूप का बेहतरीन उदाहरण भी है जिसे हम साझा संस्कृति का नाम देते हैं। नाटक में उस समय का समाज और लोगों की सांस्कृतिक अभिरुचियों का भी दर्शन होता है। लोक चेतना के साथ-साथ फारसी काव्य परम्परा का सम्मिश्रण यह दर्शाता है कि इस युग में समन्वय और सहयोग की क्या स्थिति थी। फारसी और उर्दू के साथ-साथ खड़ी बोली के लोकगीतों की चाशनी एक अद्भुत प्रभाव उत्पन्न करती है।
मूल नाटक ओपेरा शैली में लिखा गया है लेकिन यह माना जाता है कि उसका प्रेरणा सूत्र ओपेरा शैली नहीं बल्कि रासलीला का बुनियादी ढाँचा था जिसमें संवादों से अधिक कविता का महत्त्व दिखाई पड़ता है। कविता और संगीत के प्रति उसे समय दर्शकों के अन्दर जितना उत्साह और लगन रही होगी इतनी शायद आज नहीं है। दूसरी बात यह है कि नाटक में नाटकीयता के तत्वों पर अधिक बल नहीं दिया गया है।
नाटक का पुनर्पाठ तैयार करते समय आज के रंगमंच और नाटक प्रेमियों को ध्यान में रखा गया है। इस प्रक्रिया में नाटक का आकार छोटा किया गया है और पात्रों के चरित्र चित्रण पर कुछ अधिक ध्यान दिया गया है। नाटकीयता को बढ़ाने की कोशिश की गई है। कुछ संवाद और कुछ पद जोड़े गए हैं लेकिन यह ध्यान रखा गया है की नाटक की मूल आत्मा बनी रहे। पुनर्पाठ निर्देशकों को कल्पनाशील बने रहने की बने रहने की सम्भावनाएँ भी प्रस्तुत करता है। इंदर सभा को आजादी के बाद कई निर्देशकों ने मंच पर अलग-अलग ढंग से प्रस्तुत किया है। यह इस बात का प्रमाण है की नाटक आज भी दर्शकों को आकर्षित करने की क्षमता रखता है। आशा है कि नाटक का पुनर्पाठ इस दिशा में एक सार्थक प्रयास माना जाएगा।
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